उस तमिस्रा, अंध रात्रि में, हाथों में -
थामे अजर लावा पात्र, हमने
पाया था, शब्दों के परे
का वो आकाश,
जहाँ जीवन
था पूर्ण
निर्लिप्त, सुख दुःख के पाशों से मुक्त,
सभी उत्कण्ठाओं से अवकाश, उस
चन्द्र विहीन उल्का पात के
नभ में, हमने देखा
था परस्पर
का वो
श्वासरोधी मिलन, नव जागरण का -
अग्निचूर्णक उदय, हिमयुग का
पुनर्विगलन, उस महाकाश
में उभरे थे, दिव्य
मन्त्रों के
प्रभा -
मंडल "सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु
निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चित् दुःखभाग् -
भवेत्।।" इन से
परावर्तित
किरणों
के
सिवा कुछ भी न था हमारे पास, हमने
पाया था, शब्दों के परे का
वो नील निःसीम
आकाश।
* *
- - शांतनु सान्याल

लिखते चलें इसी तरह।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
हटाएंबेहतरीन। बहुत बढ़िया लिखे है।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
हटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंसद्भावों का असीम आकाश झलकाता प्रभावशाली लेखन!
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
हटाएंशब्दों के परे... जाता-
जवाब देंहटाएंश्वासरोधी मिलन, नव जागरण का -
अग्निचूर्णक उदय, हिमयुग का
पुनर्विगलन...अद्भुत कविता ...सुमित्रानंदन पंत की भांति प्रकृति में प्रेम को ढूढ़ती...वाह
हार्दिक आभार - - नमन सह।
हटाएंउस तमिस्रा, अंध रात्रि में, हाथों में -
जवाब देंहटाएंथामे अजर लावा पात्र, हमने
पाया था, शब्दों के परे
का वो आकाश,
जहाँ जीवन
था पूर्ण
निर्लिप्त, सुख दुःख के पाशों से मुक्त,
सभी उत्कण्ठाओं से अवकाश,
वाह!!!
बहुत ही लाजवाब सृजन।
हार्दिक आभार - - नमन सह।
हटाएंNice BLOg And Great Content thank
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंनील निःसीम
जवाब देंहटाएंआकाश।
अद्भुत, अप्रतिम
आपकी लेखन प्रतिभा लाजवाब है।
शब्दों का शानदार समन्वय और जादूगरी।
अभिनव।
तहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
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