इस विशाल राज पथ का कोई अंत
नहीं, ये मिलता है सभी से,
शहरों के गली कूचों
से, बहते हुए
आवर्जना
से,
गाँव गंज के कीचड़ सने रास्तों से,
कोहरे से ढके घाटियों से, उस -
का कुर्ता हमेशा रहता है
चमकदार, मुट्ठियों
में रखता है
वो
अदृश्य कटार, और ओंठों पर - -
फ़रेबों का बाज़ार, जब भी
वो गुज़रता है मर्क़ज़ ए
शहर से, लोग
देखते हैं
उसे
बड़ी हसरत भरी नज़र से, कौन
समझाए इन पथराई आँखों
को, ये वो मसीहा नहीं
है, जिसे समझते
हैं लोग यूँ
ही
अपना परवरदिगार, ये वो रास्ता
है जो निगलता है सभी छोटे
बड़े रास्तों को, इसे
रोकना नहीं
आसान,
ये
हर एक पांच साल में कर जाता -
हमारे जंग लगे दिमाग़ों का
मुफ़्त में जीर्णोद्धार, फिर
हम लग जाते हैं उसी
पंक्ति में ख़ुद को
निगलवाने
के लिए,
वो
राज पथ से सीधा निकल जाता है
राजधानी, हम हाथ पाँव यूँ
ही पटकते रह जाते
हैं बीच मझधार।
* *
- - शांतनु सान्याल

सुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
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