शनिवार, 27 अप्रैल 2013

गुज़रा वक़्त नहीं - -

इस मोड़ के आगे हैं बहोत मुश्किल भरे 
रास्ते, बेनूर चेहरे, नंगे दरख़्त,
संकरी गलियां, खंडहर 
की ख़ामोशी, इक 
सवालिया 
निशां !
उस टूटे पुल से आगे है ख़्वाबों की  ज़मीं,
उजड़ी हुई रात की थकन, चाँद 
के बिखरे अक्स, सिमटी 
हुई रौशनी, हिराज 
ए ज़िन्दगी !
लौट 
जाओ कि ये सफ़र नहीं आसां, फिर  - - 
कभी शीशमहल से ग़र निकल 
पाओ हमेशा के लिए, तो 
आवाज़ दे लेना, कि 
मैं कोई गुज़रा 
वक़्त नहीं 
जो 
कभी न लौट पाऊं तुम्हारे करीब - - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
हिराज  - नीलाम 
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art by ESPERANZA GALLEGO

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

कोई ख़्वाब भीगा - -

रख जाओ कोई ख़्वाब भीगा, पथरीली 
आँखों में इस तरह, कि देर तक
ज़िन्दगी में इक पुरनमी 
अहसास रहे तारी,
इक छुअन 
जो 
कर जाए तरोताज़ा, जिस्म ओ जां  में 
भर जाए उम्मीद की लहर, कहीं 
से आओ भूले ही सही, कि 
तपते जज़्बात को 
चाहिए इक 
मुश्त 
संदली ऐतबार, मुद्दतों से बिखरे हैं दूर 
तक बेतरतीब, मेरे दिल के 
अरमां जुनूनी - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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art by susan duda

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

चश्म अन्दाज़ - -

कुछ और मेरे सीने में है, पेश नज़र ज़माना -
कुछ और जुदा, किससे कहें हाल ए 
दिल अपना, दुनिया की 
सियासत अपनी 
जगह, न 
देख 
मुझे यूँ हैरत ए निगाह, मेरी मंज़िल का निशां 
है तेरी आँखों में छुपा, ये परवाज़ सीड़ियाँ 
हैं या कोई मकनूं इम्तहां, हर सांस 
इक नयी आरज़ू, हर क़दम 
ख़्वाबों का कारवां !
इस दौर का 
अपना 
ही 
है क़ानून ज़मीं, जो तोड़ पाए तो हासिल हो 
मानी ज़िन्दगी ! फ़र्क़ गुज़ारी उनका 
अपना नज़रिया, चश्म अन्दाज़ 
मेरा यकसानी - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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Vernazza Door Flowers

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

निजात कहाँ - -

उसका आना ग़ैर मुन्तज़िर बारिश था, या 
पोशीदा पेशगोई, तूफां से पहले, शाम 
सहमी सी रही देर तक उसके 
जाने के बाद, ज़िन्दगी 
देखती रही उफ़क़ 
पे बुझते 
हुई इक लकीर ए आतिश, इक सन्नाटा 
पुरअसर छू सा गया अंदरूनी वजूद,
रात की अपनी है मजबूरी, 
निजात कहाँ तीरगी 
से, चाँद निकले 
न निकले,
फिर हम जलाए जाते हैं दिल के फ़ानूस,
कहीं खो न जाए उसकी मुहोब्बत 
स्याह राहों में दोबारा - - 
* * 
- शांतनु सान्याल  

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

फ़रेब दिलकश - -

अब इस दूरबीन ए अहसास के मानी कुछ 
भी नहीं, कि वो शख्स है ओझल !
वक़्त का कोहरा, था बहोत 
गहरा, बारहा लौट 
आई आवाज़ 
मेरी,
दूर तक जा कर, वादियों का रव्वैया भी न 
रहा मुनासिब, मौसम के साथ बदल 
से गए बाज़गश्त सदाएं ! ये 
ख़ामोशी हैं शायद 
शरीक ए 
सफ़र 
अपना, हर हाल में घेरे रहता है वजूद के 
अन्दर बाहर, चलो हमने भी कर 
ली इक पैमां ज़िन्दगी से,
कि वक़्त के आईने 
में अपना 
अक्स, 
कम से कम न करे, यूँ फ़रेब दिलकश !
* * 
- शांतनु सान्याल 
depth of reflection 

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

महक उसकी - -

ख़्वाब ही सही, रहने दे मेरी आँखों में उसकी
चाहत की नमी, कोहरा ही सही, छाया 
रहे वादियों में पुरअसर, उसकी
जुस्तजू में रूह चाहती 
है भटकना, कई 
जन्मों तक, 
कभी गुलशन, कभी सहरा, इक तलाश - - 
मुसलसल, सुलगते दिन या पुरनम 
रातें, इक उसकी ख़्वाहिश बाक़ी 
सब रस्मी बातें, दरमियाँ 
ज़मीं ओ फ़लक !
इक प्यास 
अनबुझ, दिल की गहराइयों में सिर्फ़ रंग 
उसका, तहे ज़मीर महक उसकी !
* * 
- शांतनु सान्याल 
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no idea about painter.jpg 1

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

क़ाफ़िले मुहोब्बत के - -


इक इंतज़ार अंतहीन, तरबतर जिस्म 
ओ जां मगर, ज़िन्दगी है या कोई
बियाबां बिखरा दूर तलक !
उस मोड़ पर अक्सर 
खोजता है, ये 
मुस्ताक़ 
ज़मीर, जहाँ वजूद को मिले इक मुश्त 
राहत ए तिश्नगी, ख़्वाबों को मिले 
इक क़तअ हक़ीक़त की 
ज़मीं ! हमसफ़र 
कोई आरज़ी,
या कोई 
गुमशुदा राही, मिल जाए रात ढलने 
से पहले, कि उफ़क़ पे आज 
भी रुके रुके से हैं कुछ 
क़ाफ़िले मुहोब्बत 
के बेक़रार !
* * 
- शांतनु सान्याल 

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alone waiting

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

शमादान आतफ़ी - -

दर ओ दीवार के रंग से न आज़मा, दिल 
की ज़मीं की ख़ूबसूरती, ढह जाए 
मेहराब तो क्या, चांदनी हर 
चंद तलाशती है छूना 
अहसास ए संग -
मरमरी !
फ़रामोश करके मेरी इश्क़ बुनियाद, वो 
रहा बहोत परेशां, ताउम्र कोई देता 
रहा दस्तक, ताउम्र दहलीज़ 
पे थी महकती इक 
ख़ामोशी, हर 
लम्हा 
वो सजाए गुलदान क़ीमती, हर पल - - 
कहीं फिसल जाए हाथों से, 
शमादान आतफ़ी !
* * 
- शांतनु सान्याल 
आतफ़ी - जज़्बाती 


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palermo - art by john lovett

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

पैकर कहकशां !

अंजुमन ए नजूम में था रात भर, इक मुबाहसा 
बेइन्तहा, के ज़मीं पे नज़र आता है कोई 
पैकर कहकशां ! मोज़ूअ बहस 
रुक सी जाती है अक्सर 
आ कर उनकी 
आँखों में 
बारहा, हसूद दिल चाहता है मुक्कमल फ़तह - - 
खुला आसमां ! इक संदली ख़ुशबू सा है, 
तारी तहे ज़मीर, ज़िन्दगी फिर 
चाहती है तेरे इश्क़ में, बूंद 
बूंद कामिल शबनम 
की मानिंद, 
फूलों पे 
बग़ैर शर्त अन्दर तक लबरेज़ जज़्ब हो जाना !
* * 
- शांतनु सान्याल 
अंजुमन ए नजूम - सितारों का समूह 
मुबाहसा - बहस 

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colour splash by Hugh Morrow

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

रहने भी दें - -

कुछ भी न था दरमियाँ हमारे, ये सच है 
या हिजाब रस्मी, रहने भी दें सीने 
में दफ़न ये ख़ूबसूरत राज़ 
इब्दी ! कुछ ख़्वाब जो 
न टूटे उम्र भर, 
रहने भी 
दे दिल के कोने में कहीं वो इबादत - - 
मख़फ़ी, कि लग न जाए कहीं 
इलज़ाम ग़ैर मोमिन का 
उम्र भर के लिए 
मुझ पर !
* * 
- शांतनु सान्याल 
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इब्दी - गुप्त 
मख़फ़ी - छुपा हुआ 
मोमिन - विश्वास करने वाले 
ART BY MELTEM KILIC

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

शबनमी अहसास - -

मबहम तीरगी से निकल फिर जिस्म ओ जां 
चाहती है, इक चश्म मुसाफ़िरख़ाना, 
ख़ुदा के वास्ते न करो यूँ बंद 
ज़िन्दगी के रास्ते, कि 
मुद्दतों बाद देखी 
है हमने 
नूर ए आशियाना, कुछ देर सही, रहे रौशन -
चाहतों के बेक़रार जरयां, कुछ पल 
और खुला रहे, ख़्वाबों का 
शामियाना, फिर 
सराब ए 
जज़्बात को मिले शबनमी अहसास, फिर - - 
ज़िन्दगी में खिले गुल नादिर कि 
ज़माना हुआ ख़ुशबू छुपाए 
हम बैठे हैं दिल की 
गहराइयों में !
* * 
- शांतनु सान्याल 
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मबहम तीरगी - सघन अँधेरा 
चश्म मुसाफ़िरख़ाना - आँखों का सराय 
जरयां - बहाव 
सराब - मृगजल 
नादिर - दुर्लभ 
painting by STUART 

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

शीशा ए कायनात - -

मय्यसर कहाँ, वो मंज़िल जहाँ ज़िन्दगी को 
दो पल राहत मिले, उठते हैं हर सिम्त 
मौज कोहराम, हर जानिब है 
इक ग़ैर यक़ीनी सूरत -
हाल, न तुझे 
खोज 
पाए चश्म तिश्ना, न कोई ग़ैर मुन्तज़िर - - 
बारिश का ही इमकां, इक दहन 
मुसलसल है ज़िन्दगी में 
बहरहाल, तेरा 
इश्क जुनूं 
कहीं 
न कर जाए तबाह, दिल का ये नाज़ुक शीशा
ए कायनात - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 


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art by Yvonne Harry

रविवार, 7 अप्रैल 2013

जिस्म ओ जां के परे - -

तक़ाज़े उनके तस्सवुर के परे, ज़िन्दगी 
के किनारे सिमटते हुए, चाहत 
के धारे बेलगाम, वजूद
का बचना बहोत 
मुश्किल,
हर फ़सील पे दहकते जुनूं, हर मोड़ पे 
हैं चमकते ख़्वाबों के जुगनू, 
कहाँ से लाएं संग -
पारस उनकी 
आरज़ू 
ज़रीन कायनात, अपनी हैसियत इक -
ख़ाक ए महक, उनकी ख्वाहिश 
संदली जहान, मुमकिन 
कहाँ ख़यालों का, 
ज़िन्दगी 
में यूँ हुबहु शक्ल में ढलना, न जाने फिर
भी क्यूँ दिल चाहता है तुम्हें 
ज़िन्दगी से ज़ियादा 
फ़राहम करना,
जिस्म ओ 
जां 
के परे रूह तक निसार करना - - - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
ज़रीन - सुनहरी 
drops - - no idea about painter 

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

अंतहीन जुस्तजू - -

सब कुछ बिखरा सा रहा दरिया के दोनों 
जानिब, वक़्त था या कोई बहता 
हुआ लहरों का आसमां !
मुख़्तसर दामन 
न समेट 
पाया 
किसी की मुहोब्बत बेशुमार, ज़िन्दगी -
के उस मोड़ पर था मैं बहोत ही 
अकेला, न वो सुन पाए 
मेरी गूंजती सदा, न 
मैं रुक पाया 
उनके 
इंतज़ार में कुछ और ज़रा, जज़्बात रहे 
दूर तक बिखरे हुए, हद ए नज़र !
किसे ख़बर कि वो आज 
भी तलाशते हैं मेरा 
पता, गलियों 
गलियों, 
मंज़िल दर मंज़िल, इक ला मतनाही - 
जुस्तजू - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

ला मतनाही - अंतहीन 


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art by edvaldas ivanauskas

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

सुबह दुआओं वाली !


इक सन्नाटा सा है दूर तलक, अक्स चाहे 
निजात, लेकिन आईना गुमसुम !
इक मुसाफ़िर पोशीदा और 
अंधेरों से उभरती 
आवाज़ !
तेरी मुहोब्बत बेशक ख़याल से परे, फिर 
भी जाने क्यूँ, बाँध न पाए मेरे 
मज़तरब जज़्बात, कोई 
रूह बदवी, दे जाए 
मुसलसल 
दस्तक आधी रात, कि बसती  हैं गली - - 
नुक्कड़ में रात ढले ख़ामोश 
कराहों की बस्तियां 
लिए निगाहों 
में एक 
शबनमी ख़्वाब, हर चेहरे पे जहाँ तैरतीं 
हों इक किरण इत्मीनान ! ज़िन्दगी 
खोजती है बड़ी शिद्दत से, वो 
सुबह दुआओं वाली !
जहाँ तेरे सिवा 
भी और, 
मुस्कुराते हों लिए इक ख़ूबसूरत अन्दाज़,
* * 
- शांतनु सान्याल 
रूह बदवी - आदिम आत्मा 

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deserted street - -

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

हमनफ़स किसी का - -

ज़िन्दगी का सफ़र नहीं रुकता, गुज़र जाते हैं 
मौसमों के मक़ाम, सुबह शाम के यूँ 
तनासब में, फिर कहीं उसकी 
मुहोब्बत खोजती 
है मेरा निशां,
गुमशुदा,
जज़्बात हैं कि ढलते नहीं, उम्र का भरोसा कुछ 
भी नहीं, आज भी वो शामिल है, शाम 
के धुंधलके में कहीं, आज भी 
इक इंतज़ार हैं ज़िन्दा,
दिल की गहराइयों 
में कहीं, इस 
अहसास 
का, अपना ही है लुत्फ़ बेशुमार, तनहा हो कर 
भी वजूद बन जाए हमनफ़स किसी 
का - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

artist ZELIC VICTOR ANDREEVICH

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

नज़रिया अपना अपना - -

दुनिया की वही दायमी नुक़्तह नज़र, अन्दर 
कुछ और बाहर कुछ, अपनी भी वही 
अलग मजबूरी, हर वक़्त 
आमदा बा सिम्त 
इन्क़लाब,
फिर 
ज़माने की वही दलील किताबी, असलियत 
से कोसों दूर, अपना वजूद फिर तनहा 
राह ए संगसार की जानिब, हर 
चेहरा काज़ब, लिए हाथों 
में इंसाफ़ ए शलाक़,
अपनी तक़दीर 
में फिर 
सज़ा ए इंसानियत मुक़रर, दुनिया की है 
अपनी ही, इक तरजीह फ़ेहरिस्त, 
बहोत पुरानी, लेकिन अपना 
नज़रिया लीक से हट 
कर, आप कह 
लें जो 
चाहे, ज़हर ए असलियत या फिर ज़मीर 
ए अमृत, ये आप पर है मनहसर !
* * 
- शांतनु सान्याल 
अर्थ - 
दायमी नुक़्तह नज़र - स्थायी दृष्टिकोण 
आमदा बा सिम्त इन्क़लाब - क्रांति की तरफ बढ़ना 
काज़ब - छद्म 
शलाक़ - कोड़ा
 मनहसर - निर्भर 
संगसार - पत्थरों की मार 
Art symbols - - 

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past