Thursday, 29 March 2018

सदियों का दर्द - -

वो सभी थे शामिल आधी
रात की साजिश में,
फूलों की ख़ुश्बू
हो या
चाँद का डूबना उभरना,
मोम की तरह ख़ाक
हुई रात, नींद
की
आज़माइश में। बुझते
चिराग़ों ने हमें
गिर के
संभलना है सिखाया, कुछ
रौशनी अक्सर रहती
है बाक़ी, जीने की
 गुंजाइश में।
तुम चाह
कर भी मिटा नहीं सकते
 इन्क़लाब ए जुनूं,
सदियों का दर्द
होता है भरा
इनकी
इक अदद पैदाइश में। - -

* *
- शांतनु सान्याल


Thursday, 22 March 2018

शेष पहर - -

बहुत दूर जहाँ नदी मुड़ जाती है अनजान
द्वीप की ओर, और किनारे खो जाते
हैं निविड़ अंधकार में, जीवन तब
खोजता है अपनी परछाइयां,
कुछ जीत में कुछ हार
में। धूप का धुआँ
ही था तुम्हारा
अपनापन,
दिल से उठा या देवालय से, तर्क है बेमानी,
मानों तो सब कुछ है यहाँ, और ग़र न
मानों तो कुछ भी नहीं इस संसार
में। जिन्हें उतरना था घाट पर
वो कब से उतर गए, शून्य
नौकाओं के सिवाय
अब कुछ भी
नहीं इस
पार में। ईशान कोण में फिर उभर चले हैं -
आवारा बादल, शेष पहर शायद बिखर
के बरसें, और सुबह हो जागृत
दोनों प्रणय कगार में। 
जीवन तब खोजता
है अपनी
परछाइयां, कुछ जीत में कुछ हार में। - -

* *
- शांतनु सान्याल

तितली या व्याध - पतंग - -

घेरे लगाए हुए वही विस्मित चेहरे और
डमरू की आवाज़, मदारी का वही
जादूभरा अंदाज़, व्यस्क घुटनों
से अंदर झांकता हुआ कोई
बच्चा उम्र से पहले
बुढ़ाता हुआ
देखता
है वही खोया हुआ सपनों का देश। वो -
कोई पारदर्शी - तितली है, या एक
ख़ूबसूरत, लेकिन ख़तरनाक
व्याध - पतंग, कहना
बहुत है मुश्किल,
निरीह शिशु
चाहता
है उसे क़रीब से छूना, महसूस करना।
सभी ख़ामोश हैं पोखर का मटमैला
पानी हो या, अधझुके,  ख़ज़ूर
पेड़ वाले गौरैयों के झुंड,
जंग लगे साइकिल
का रिंग आज
भी है वो
वहीँ एक कोने में पड़ा हुआ लावारिस।
कुछ भी ख़ास नहीं बदला मेरे गाँव
में, ये और बात है कि मेरी
उम्र साठ कब पार कर
गई मुझे कुछ
भी याद
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल 

 

Sunday, 18 March 2018

कहीं और चलें - -

मायावी अंधकार अपनी जगह अगोचर, ये
ज़रूरी नहीं कि हर एक शरीर की अपनी
ही परछाई हो, महानगर सोया हुआ,
राजपथ ऊंघते हुए, ज़रूरी नहीं
कि सांसों के डूबने के लिए
अंतहीन गहराई हो।
आकाश से उठ
चले हैं, एक
के बाद एक, सभी रौशनी के जागीरदार - -
कांधे पर ज़रा रख लूँ, लहूलुहान वही
आख़री पहर का ख़्वाब, ख़ुदा -
करे मुझ पे भी, सुबह तक
तो कम अज़ कम,  
मसीहाई हो।
अब यूँ भी समेटने को कुछ भी नहीं है मेरे
पास, कुछ उजालों ने लूटा, कुछ अंधेरों
ने जज़्ब किया, चलो चलें हिसाब
किताब से बाहर निकल,
कहीं दूर जहाँ इक
पुरसुकूं  तन्हाई
हो - -

* *
- शांतनु सान्याल



 

Friday, 16 March 2018

आधा - अधूरा ख़त - -

फिर मुद्दतों बाद जी चाहता है कि पढ़ें
तुम्हारा वही आधा - अधूरा ख़त,
कुछ  लजाए - सकुचाए से
अल्फ़ाज़, कुछ  नाज़ -
अंदाज़ लिए भीगे
हुए जज़्बात -
अलमस्त।
मेहंदी की तरह कब हाथों से छूट गए
वो सभी मुहोब्बत के नक़्श ओ -
निगार, इक लम्बी सी रात
गुज़री हो जैसे अभी -
अभी, और
पथराई
आँखों में तैरते हों जैसे धुंधभरे ख़ुमार।
आईना देखना कैसे छोड़ दें हम,
कि ज़िन्दगी का सफ़र अभी
है बाक़ी, उन्हें हम से
लेना - देना कुछ
भी न हो
लेकिन हम आज भी हैं सिर्फ़ उन्हीं के
तलबगार।

* *
- शांतनु सान्याल
 

 


Thursday, 15 March 2018

सुबह से पहले - -

मुझे मालूम है, उन्हें मुद्दतों से 
मेरी तलाश है, है रास्ता
वही पुराना मगर
मंज़र बदल
गए।
वही झील का किनारा, वही - -
परिंदों का डेरा, न जाने
कितने शाम आए,
और यूँ ही ढल
गए। सच
है कि
कुछ तो मेरा, अब तक उनके
पास है, कुछ सीने में हैं
दफ़्न, कुछ आँखों
से निकल
गए।
नज़रबंद सांसों का बाहर
निकलना था मुश्किल,
चिलमन ए जिस्म
में ख़ामोश
वो सभी
जल गए। कोई घायल मुसाफ़िर
 गुज़रा है इन सख़्त राहों से,
शीशे के सभी नाज़ुक
दरीचे अचानक
से दहल
गए।
इक ख़ामोशी जो सारे शहर को -
सुन्न कर गई, जो लोग
समझदार थे वो
सुबह से पहले
संभल
गए। 

* *
- शांतनु सान्याल

 



 

Thursday, 1 March 2018

रंग ज़ाफ़रानी - -

फीके थे तमाम रंग दुनिया के, शाम
ढले अपने आप उतर गए, कोई
ख़्वाब था आख़री पहर वाला
या निगाहों में तैरती
मृगजल की बूंदे,
साथ तो
चले थे सभी, लेकिन सुबह से पहले -
न जाने लोग किधर गए। बहुत
सहेज कर रखा था तुम्हारा
वही बंद, पुरअसरार
लिफ़ाफ़ा, लेकिन
खोलते ही,
तमाम रंगे ज़ाफ़रानी हवाओं में बिखर
गए। राज़ ए ख़ामोशी रहने दे यूँ ही
गुमशुदा, निगाह की वादियों
में ऐ दोस्त, खिल उठे
हज़ार ख़्वाहिश
तुम्हारे
क़दम जिधर गए। फीके थे तमाम रंग
दुनिया के, शाम ढले अपने आप
उतर गए - -

* *
- शांतनु सान्याल

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