Wednesday, 27 March 2019

हिय के अंदर - -

कदाचित मरुधरा है हिय के अंदर, अनवरत -
प्यास जगाए, ख़ानाबदोश हो कर भी
मेरी दुनिया, तुम्हीं तक आ कर,
न जाने क्यों रुकना चाहें।
इक अजीब सा मोह
है, तुम्हारे सजल
नयन के
कोर,
अलस दुपहरी में जैसे बरगद की जटाएँ, सूखती
नदी को छूना चाहें। बहोत मुश्किल है, इन
हथेलियों के अंकगणित को समझना,
जो कुछ भी हो हासिल, इस पल
की मेहरबानी है, जो खो
गया, सो खो गया,
हम क्यों न
उसे भूलना
चाहें। ख़ानाबदोश हो कर भी मेरी दुनिया, तुम्हीं
तक आ कर, न जाने क्यों रुकना चाहें। 

* *
- शांतनु सान्याल






Monday, 25 March 2019

अंतहीन प्रतीक्षा - -

उम्र से भी कहीं लम्बी है प्रतीक्षा, गली के
आख़री छोर में, कील ठोंकते हाथों को
आज भी है किसी का  इंतज़ार।
कहने को यूँ तो बहुत कुछ
बदल गया मेरे शहर
में, लेकिन अभी
तक है ज़िंदा,
अंधेरों का संसार। क्षितिज में फिर उभरी
हैं उम्मीद की किरण, शायद सुबह
का आलम हो कुछ ज्यादा ही
ख़ुशगवार। ख़्वाब देखते
हुए बूढ़ा जाती हैं
जहाँ जवां -
आँखें, कहाँ रुकता है किसी के लिए ये - -
ज़माने का कारोबार। जीवन स्रोत
को है बहना, हर पल, हर एक
लम्हा, ये और बात है कि
कभी तुम उस पार
और कभी
हम रहें  इस पार।  कहाँ रुकता है किसी के
लिए ये ज़माने का कारोबार।

* *
- शांतनु सान्याल

Friday, 22 March 2019

दस्तक से पहले - -

हमेशा की तरह फिर हाथ हैं ख़ाली, अंजुरियों
से जो गुज़र गए उनका अफ़सोस नहीं,
कुछ नेह रंग यूँ घुले मेरी रूह में
कि चाह कर भी अब उनसे
निजात नहीं, न जाने
कितनी बार ओढ़ी
है ख़्वाबों के
पैरहन,
ये ज़िन्दगी फिर भी लगे है इक ख़ूबसूरत - -
उतरन। सूखे पत्तों का वजूद जो भी
हो, मौसम को तो है हर हाल में
बदलना, मेरे घर का पता
तुम्हें याद रहे या न
रहे, हर मोड़ पर
है कहीं न
कहीं
पुरअसरार दहलीज़ ! ऐ दोस्त, दस्तक से पहले
ज़रा संभलना। सूखे पत्तों का वजूद जो
भी हो, मौसम को तो है हर हाल में
बदलना।

* *
- शांतनु सान्याल

Tuesday, 19 March 2019

सुबह का फेरीवाला - -

हाशिए के लोग हमेशा की तरह हैं गुमशुदा,
अपनी अलग दुनिया में, वो आज भी
हैं बंजारे ऊँची इमारतों के नीचे,
न जाने कौन अलसुबह,
फिर ख़्वाबों के
इश्तहार
लगा गया, फिर मासूम मेरा दिल दौड़ चला
है, दिलफ़रेब, चाहतों के पीछे। क़ातिल
है, या मसीहा, ख़ुदा बेहतर जाने,
सुना है कोई जादू है, उसके
लच्छेदार बातों के
पीछे। चलो
फिर
तुम्हारे वादों पे यक़ीन कर लें, ज़िन्दगी को
कुछ पल ही सही आराम मिले, दवा है
या सुस्त ज़हर किसे ख़बर उन
नाम निहाद राहतों के
पीछे। वो आज भी
हैं बंजारे ऊँची
इमारतों के
नीचे।

* *
- शांतनु सान्याल

Friday, 8 March 2019

गन्धकोष - -

चाहे जितना भी अंतहीन साम्राज्य हो किसी का,
नियति के आगे असहाय, सभी एक समान,
सभी मुसाफ़िर एक ही पथ के, अज्ञात
भोर की ओर अग्रसर, एक ही
पांथनिवास में रात्रि
अवस्थान।
अनभिज्ञ सभी एक दूजे से, फिर भी अदृश्य नेह -
बंधन, कभी खिले भावनाओं में विरल हास -
परिहास, और कभी जीवन तट पर उठे
अशेष क्रंदन। किसे ख़बर कौन
देखे प्रथम, आख़री पहर
का तारक बिहान,
निशि पुष्पों
की है अपनी अलग मजबूरी, सुबह की आहट के 
साथ, सभी सुरभित कोषों का अवसान।
चाहे जितना भी अंतहीन साम्राज्य
हो किसी का, नियति के आगे
असहाय, सभी एक
समान।

* *
- शांतनु सान्याल

अतीत के पृष्ठों से - -