Wednesday, 28 November 2018

सजल अभिलाष - -

उस निशीथ मौन के अंदर, बिखराव समेटे
मेरा मन, कच्ची मटकी तपने से पूर्व
जैसे देखे लाख सपन।  किसे ख़बर
कौन क्षितिज से उभरे बिहान
सतरंगी, ओस में डूबे हुए
हर पल मेरे चंचल
दिगंत - विहंगी।
कहीं कोई
फिर फूल खिले और सुरभित हो अंतरतम,
बुझे सभी आग्नेय अरण्य, मिले हर
एक साँस को जीने का वरदान 
कम से कम।

* *
- शांतनु सान्याल

  

Wednesday, 21 November 2018

प्रवासी मन - -

सूखते कांटेदार बेलों के बीच अभी तक हैं
बाक़ी कुछ गुलाबी मुस्कान, कोई
आए या न आए, हर चीज़ हो
जैसे यथावत, खिलता
हुआ अपने स्थान।
उम्मीद के
फूल
शायद कभी मुरझाते नहीं,चाहे पतझर हो
या मधुऋतु, क्या धूप और क्या छाँव,
गेरुआ मन हर पल एक समान।
जलविहीन फल्गु तट हो या
ज्वलंत मणिकर्णिका -
घाट, उन्मुक्त -
पाखी, सदा
प्रवासी,
प्राणों में बाँधे अंतहीन उड़ान। - - - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल  

Monday, 12 November 2018

नज़्म जो निगाहों से छलके - -

मुस्कराहटों से जीवन के सभी व्यतिक्रम
छुपाए नहीं जाते, फिर भी ये सत्य है,
कि हर एक शख़्स कहीं न कहीं
अपने आप में गहराइयों
तक है उथला, कुछ
रिसते घाव
दिखाए
नहीं जाते। मेरी ख़ामोशी को उसने इक
नया आयाम ही दे दिया, बियाबां के
सीने में जैसे सुलगता कोई सावन,
तमाम ही दे दिया, ये ज़िन्दगी
की हैं ज़मीं, किसी अंतहीन
बंजर से कम नहीं, जज़्बा
ए दरख़्त इक बार
जो सूखे, दोबारा
किसी
हाल पे उगाये नहीं जाते। सुबह ओ शाम
के दरमियां कोई अनदेखा पुल ही था
शायद, जो सांसों को टूटने न दिया,
इस पार कौन था और उस पार
कौन, ये सोचना है बेमानी,
चाँद रात की ख़्वाहिश
 ने, शायद हमें
उनसे छूटने
न दिया,
इक अजीब सा कोहराम था रात भर मजलिस
ए आसमां पर, जो नज़्म मेरी निगाहों से
छलके वो फिर दोहराए नहीं जाते,
मुस्कराहटों से जीवन के
सभी व्यतिक्रम
छुपाए नहीं
जाते। 
* *
- शांतनु सान्याल  

Thursday, 1 November 2018

ग़र कभी गुज़रो - -

अब पूछते हैं वो मेरा गुमशुदा
ठिकाना, जब याद नहीं
मुझको तारीख़ ए
रवाना।
वहीँ मोड़ पे कहीं हम सब कुछ
छोड़ आए, कोई याद हो
बाक़ी तो यूँ ही भूल
जाना।
उम्र की बदहाल सड़क ही तो - -
है ज़िन्दगी, कभी अपनों
ने लूटा, कभी बेदर्द
ज़माना।
सभी सब्ज़ दरख़्त सूख गए
अपने आप, दरअसल
बारिश तो था सिर्फ़
इक बहाना।
इस ज़मीं के सीने में सोतों - -
की कमी नहीं, मुश्किल
है लेकिन झरनों
को ढूंढ लाना।
हर कोई जैसे है अपने ही - - -
दायरे में गुम, आशना
चेहरा भी लगे यहाँ
अनजाना।

* *
- शांतनु सान्याल

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