गुरुवार, 28 जून 2018

अनजाना सुख - -

अपनी अपनी चाहत का है
अपना ही अलग पैमाना,
कोई सुख तो है ज़रूर,
मोती और सीप के
दरमियां,
उस बंद दरवाज़े का रहस्य,
चिरंतन हैं अनजाना।
मेघों का अस्तित्व,
नहीं मिटा
पाए वज्रों के हुंकार, बरसने
की ज़िद्द  में, दुश्वार था
उनका रुक जाना।
उस दिगंत
रेखा पर जा मिलते हैं - - - 
तिमिर -आलोक,
एक तीर
उठता
धुंआ, दूसरी ओर बेसुध है
ज़माना। पहेलियों का
शहर है, हर मोड़
से जुड़े मायावी
रस्ते, इस
मोह के
सफ़र से मुश्किल है दोस्त
लौट आना।
* *
- शांतनु सान्याल

सोमवार, 25 जून 2018

अंतराल - -

ज़िन्दगी में कहीं न कहीं, थोड़ा
बहुत अंतराल चाहिए,
नज़दीकियों के
अपने
अलग ही हैं कुछ नफ़ा नुक़सान,
फिर भी सर रखने के लिए
कोई कंधा हर हाल
चाहिए।
वजूद की असलियत कुछ और
थी, अक्स थे अर्थहीन,
जवाब हैं मुंतज़िर
लेकिन
कोई दमदार सवाल चाहिए। - -
उनकी बसीरत वो जाने,
हर चीज़ कहना
नहीं मुमकिन,
दुनिया
है फ़ानी तो रहे, दिल मगर - -
मालामाल चाहिए। चाँद
तारों को यूँ ही
आसमान
में रहने
दो अपनी जगह, दे सके रूह को
सुकूं ऐसा कोई ख़्वाब ओ
ख़्याल चाहिए। 

* *
- शांतनु सान्याल

 

शनिवार, 16 जून 2018

लौटने की मजबूरी - -

वो मिले मुद्दतों बाद कुछ इस तरह
कि आईना जैसे अपने पास
बुलाए मुझे, मौसमों
की  है अपनी
अलग
मजबूरी, फिर भी लौटतीं बहारें - -
जाते - जाते, बरगलाए मुझे।
उम्र, यूँ तो बीत गई ठीक
करते हुए रिश्तों के
नाज़ुक -
समीकरणों को, नियति भी किसी - -
अनबूझ ज्यामिति से कुछ
कम नहीं, हर क़दम,
अदृश्य रेखाओं
में उलझाए
मुझे।
अनगिनत ज़ख्मों को लिए सीने में,
उठ तो आए उनकी महफ़िल से
हम, न जाने कौन सा क़र्ज़
अभी तलक है बाक़ी,
रह - रह कर यूँ
ज़िन्दगी
अपने पास बुलाए मुझे।

* *
- शांतनु सान्याल


शनिवार, 9 जून 2018

ऐनक के इस पार - -

दूर तक वही बियाबां, वही अंतहीन शून्यता,
प्रतिध्वनियों का इंतज़ार अब बेमानी है,
जो कभी था चिड़ियों के कलरव 
से आबाद, वो गूलर का पेड़
अब किताबों की कहानी
है। कंक्रीट के जंगल
में उड़ान पुल के
सिवा कुछ
भी नहीं,
सभी रिश्तों के जिल्द हैं ख़ूबसूरत, लेकिन -
अंदर से महज मुँह ज़ुबानी है। कोई नहीं
पढ़ता दिल की किताब, शायद
आजकल, सभी को वक़्त
न मिलने की, बहुत
परेशानी है।
ऐनक के
उस  पार दुनिया अपनी जगह झिलमिलाती
सी नज़र आए, ऐनक के इस पार सिर्फ़
पानी ही पानी है।

* *
- शांतनु सान्याल  




 

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