रविवार, 9 जनवरी 2022

रतजगा - -

उगते सूरज का था सभी को इंतज़ार,
जो पीछे छूट गए, वो सभी कोहरे
में कहीं खो गए, उनका पता
शायद, दे पाए खोह के
अंधकार, कुछ मृत
स्मृतियों के
जीवाश्म
उभरे
पड़े
थे पिछले पहर, दूर तक जाती है इक
सुनसान सी सड़क, कोई नहीं
जानता, कहाँ, किस मोड़
पर जा कर रुकेगा ये
बोझिल सांसों का
सफ़र, उम्र
भर था
वो
परेशां, देख कर फ़िरौन का कारोबार,  
उगते सूरज का था सभी को
इंतज़ार। न जाने किस
दर पर उस ने दी
थी दुआओं
वाली
दस्तक, हर किसी ने कंपन महसूस
किया था ज़रूर, जिसने दरवाज़ा
खोल कर उसे इक नज़र
देखा, वो तर गया
ज़िन्दगी और
मौत के
दोनों
जहान से, न था वो कोई फ़रिश्ता न
ही देवता किसी उजड़े मंदिर का,
वो समदर्शी अक्स था मेरा
जो उतरा था, आईने
के आसमान से,
जो मध्य
रात
बुलाता रहा मुझे बारम्बार, उगते - -
सूरज का था सभी को
इंतज़ार।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

मंज़िल दर मंज़िल - -

सर ज़मीं ए ख़्वाब दिखा कर,
लोग न जाने कहाँ गए,
मुसलसल बियाबां
के सिवा कुछ
न था हम
जहाँ  
गए, उनका अपना है जो
चश्म ए अंदाज़, कैसे
कोई बदले, संग
ए बुत हो,
या
ख़ुदा का घर, हम सिर्फ़
तनहा गए, कहते हैं
यहाँ कभी था
इक लहराता
हुआ झील
दूर तक,

दरख़्त, न कोई साया, न
जाने किधर वो कारवां
गए, आईना कहता
है मुझसे ऐनक
को ज़रा
बेहतर
पोंछ
लूँ,
कोहरा है घना, राह बता कर
जाने कहाँ वो रहनुमा
गए - -
* *
- - शांतनु सान्याल

  

सोमवार, 20 दिसंबर 2021

अंतहीन यात्रा - -

हमेशा संधि - स्थल नहीं होता अंतिम
बिंदु, कुछ दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न दिशाओं
में, सूखे हुए तलछट
पर रह जाते हैं
निःशब्द से
कुछ
क़दमों के निशां, दौड़ते हुए से लगते
हैं पेड़ पौधे, खेत खलियान, नदी
पहाड़, फूलों से लदी वादियां,
कुहासे में डूबी हुई अंध
घाटियां, ज़िन्दगी
अपने अंदर
तब होती
है एक
वेगवान सी परिश्रांत नदी, वो रुकना
चाहती है किसी मोड़ पर एक रात
के लिए, लेकिन ज़रूरी नहीं
मिल जाए कोई सराय
सघन अरण्य
राहों में,
हमेशा संधि - स्थल नहीं होता अंतिम
बिंदु, कुछ दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न दिशाओं
में। मध्य रात के थे वो
सभी मेघ दल, छू
कर गए हैं
शायद  
मेरी
ओंठों के सतह, एक नमी सी है दिल
की गहराइयों तक, फिर सुबह
की है तलाश सर्द चाँदनी
रात के बाद, कुछ
पल सुकून तो
मिले नर्म
धूप
के पनाहों में, हमेशा संधि - स्थल
नहीं होता अंतिम बिंदु, कुछ
दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न
दिशाओं
में।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

शनिवार, 18 दिसंबर 2021

क्षितिज पार के पथिक - -

बूंद बूंद ओस रुकी है कहीं, दिगंत के
नयन कोर, अंगुष्ठ और तर्जनी
के मध्य है कहीं मुहाने की
ज़मीं, देखती है जिसे
मेरी ज़िन्दगी
हो कर
आत्म विभोर, यहां अष्ट प्रहर चलता
रहता है क्रय विक्रय, कदाचित हो
निस्तब्धता तुम्हारी ओर, बूंद
बूंद ओस रुकी है कहीं,
दिगंत के नयन
कोर। सभी
स्रोत हैं
रुके रुके से तुम्हारी भव्यता के आगे,
सभी नदियों का अंत है निश्चित,
सांझ घिरते ही लौट आएंगे
सभी विहग वृन्द, अपने
अपने घर, तुम हो
वहीं अपनी
जगह
स्थिर, समय चक्र अपनी लय पर है
भागे, बिखरे पड़े हैं दूर दूर तक
अतीत के सभी छिन्न -
भिन्न पृष्ठ, क्लांत
रात्रि खड़ी है
अपने
दहलीज़ पर एकाकी, सुदूर धुंध में -
है कहीं कांपता हुआ निरीह
भोर, बूंद बूंद ओस
रुकी है कहीं,
दिगंत के
नयन
कोर।
* *
- - शांतनु सान्याल

बुधवार, 15 दिसंबर 2021

अशेष रात्रि - -

 

मन की अगम गहराई जाने न कोई,
सतह को छू कर बस मुस्कुरा
जाते हैं लोग, जल चक्र
में थे सभी अटके
हुए, मौसम
का यूँ
सहसा रुख़ बदलना पहचाने न कोई,
मन की अगम गहराई जाने न
कोई। कौन डूबे कहां, किस
अंध घाटी के अंदर,
कहना नहीं
आसान,
इसी
पल में है समाहित सारा ब्रह्माण्ड - -
और पलक झपकते ही उस
पार बिखरा हुआ सारा
आसमान, सांस
के साथ ही
उठते
गिरते हैं चाहतों के रंगीन यवनिका,
नेपथ्य के हाथों में है अदृश्य
डोर, परम सत्य को
जान कर भी
उसे माने
न कोई,
मन की अगम गहराई जाने न कोई।
कोहरे के सीढ़ियों से उतरता है
धीरे धीरे आख़री पहर का
चाँद, तुम हो दिल के
क़रीब या रस्म
अदायगी
है ये
ज़िन्दगी, उड़ते हुए मेघ कणों को है
छूने की आस या मरू थल के
सीने में है भटकती हुई
कोई सदियों की
प्यास, किसी
चकमक
पत्थर
से
अपने आप उठती हैं चिंगारियां या
कुछ सुख के पल आज भी हैं
मेरे आसपास, अजीब सी
है ये नज़दीकियां,
दिल के क़रीब
हो कर भी
सभी,
दरअसल अपना माने न कोई, मन
की अगम गहराई
 जाने न
कोई।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

बुधवार, 8 दिसंबर 2021

कुछ याद रहा कुछ भूल गए - -

कोई चिड़िया थी, या कोई बल
खाती हुई कटी पतंग, बहुत
दूर किसी टीले से उसने
 समंदर को देखा
होगा,  न
चाह
कर भी ज़िन्दगी यहां बहुत - -
कुछ करा जाती है, दिल
को कोई देखता
नहीं, डूबती
नज़र
को
देखा होगा, उनकी चाहतों
का दरिया मुहाने तक
पहुँचता ही नहीं,
किसी
अनजान पहाड़ी से शाम के
मंज़र को देखा होगा,
परछाइयों के
शहर में
तुम
ढूंढते हो गुमसुदा जिस्म को,
बियाबां रात के सीने पर,
ओस के असर को
देखा होगा,
साहिल
पर
हैं बिखरे हुए अनगिनत
सीपों की कहानियां,
गहरी नींद में
उसने
किसी ख़्वाब ए रहगुज़र को
देखा होगा।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

टूटे हुआ तारों का पता - -

बहुत दीर्घ, नहीं होते जीवन के रास्ते, फिर भी
कोई नहीं करता प्रतीक्षा, बेवजह किसी
के वास्ते, सुदूर उस मोड़ से कहीं
मुड़ गए सभी यादों के साए,
मील का पत्थर रहा
अपनी जगह
यथावत,
उसे
क्या लेना देना, कोई आए या जाए, न जाने क्या
क्या न  लिखता रहा वो उम्र भर, फिर भी
अहसास की डायरी रही अधूरी, उस
एक धुंध भरे पड़ाव में आकर
उसने छोड़ दी आगे की
डगर, ख़त्म कहां
होती है मगर
अंतर्यात्रा,
जिधर
भी देखा घूमते प्रतिबिंबों की सिवा कुछ भी न - -
था, ताउम्र करता रहा अनगिनत हिसाब
किताब, अंत्यमिल में लेकिन प्रश्न
चिन्हों के सिवा कुछ भी न था,
मुश्किल था लौट के
आना हालांकि
अतीत की
आवाज़
आती
रही रुक रुक कर दूर तक, जब टूटा गुमनाम - -
कोई यायावर तारा, एक मौन अट्टहास
बिखरा हुआ था, अंतरिक्ष में दूर
दूर तक - -
* *
- - शांतनु सान्याल

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past