सोमवार, 12 अप्रैल 2021

सेतु विहीन नदी - -

कहने को हमारे अंदर बहती हैं सहस्त्र
स्रोतस्विनी, फिर भी बहुत अकेली
होती है ये ज़िन्दगी, दरअसल
हम कई हिस्से में ख़ुद
को यूँ बांट जाते
हैं कि स्वयं
को देने
के
लिए कुछ भी बचा रहता नहीं, कहने
को हमारे अंदर बहती हैं सहस्त्र
स्रोतस्विनी। अनगिनत
तरंगों में बहते बहते,
फिर भी सूखती
नहीं हमारे
अंदर
की नदी, हाट बाज़ार, घाट किनार,
आकाश को छूते हुए, घूमते हैं
चाहतों के उड़न खटोले,
हर तरफ होता है
एक अंतहीन
शोर, मगर
भीड़
में भी हम होते हैं बेहद अकेले, लेन
देन थमता नहीं उम्रभर, कुछ
पलों के सुख के लिए सब
कुछ लगा आते हैं हम
दांव पर, जीत हार
का लेखा जोखा
पड़ा रहता
है वक़्त
के रेत पर, दोनों किनारों के दरमियां
लेकिन दूर तक कोई सेतु बंध,
कहीं नज़र आता नहीं,  
कहने को हमारे
अंदर बहती
हैं सहस्त्र
स्रोतस्विनी। फिर भी बहुत अकेली
होती है ये ज़िन्दगी।

* *
- - शांतनु सान्याल



रविवार, 11 अप्रैल 2021

ये अंतिम बिंदु नहीं है - -

हर तरफ है उदासियों का दृश्यांतर,
आख़री सांसों में तैरते हैं कहीं
कुछ दिन और जीने की
एक अदम्य उत्कंठा,
प्रकृति अपना
महसूल
हर
हाल में करती है वसूल, पड़े रहते
हैं भस्म में लिपटे हुए सभी
अधजले उम्मीद, कुछ
बांझ महत्वाकांक्षा,
चिंगारियों में
उड़ जाते
हैं न
जाने कहाँ सभी जन्म जन्मांतर
साथ रहने की अंतहीन मंशा,
आख़री सांसों में तैरते
हैं, कहीं कुछ दिन
और जीने की
एक अदम्य
उत्कंठा।
सभी
पर्वतारोही नहीं पहुँच पाते हैं उस
अलौकिक बिंदु पर, फिर भी
जीवन यात्रा नहीं रूकती,
नदी, अरण्य, प्रस्तर -
खंड, झूलते हुए
सेतु बंध,
सभी
अपनी जगह हैं यथावत मौजूद, -
विलीन पदचिन्हों पर फिर
चलते जाएंगे अनाहूत
निर्भीक आरोही,
फिर उभरेंगे
सभी
डूबे हुए चेहरे, पुनः पृथ्वी में गूंजेगा
एक दिन हर्षोल्लास का अंतहीन
डंका - -

* *
- - शांतनु सान्याल
   
 

 

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

कंटक सीमांत के अतिक्रम - -

इक अजीब सा खिंचाव है ज़िन्दगी,
दूर जितना भी जाना चाहें, हम
उतना ही ख़ुद को मोह
जाल में उलझता
पाएं, मुक्त
करने
की
चाह में क्रमशः डूबता जाए, गहन
से गहनतम अतल की ओर
ये अस्तित्व हमारा,
अदृश्य गोंद
की तरह
हैं
लिपटे हुए स्पृहा के घोल, जितना
ख़ुद को छुड़ाएं हम, उतना ही
उस से लिपटता जाएं,
दूर जितना भी
जाना चाहें,
हम
उतना ही ख़ुद को मोह जाल में - -
उलझता पाएं। वो प्रेम है या
जीने की अनबुझ कोई
तृषाग्नि, जितना
भूलना चाहें
उतना
ही
हम स्वयं को उस के क़रीब पाएं,
उन अंतरंग पलों में करने को
कुछ होता नहीं, घुटनों
के बल तब रेंगता
है अंदर का
आदिम
सरीसृप, समुद्र, आकाश, आलोक
सम्मेलन के अतिक्रम, तब
तुम्हारा अस्तित्व कर
जाता है मुझे पूर्ण
छायाच्छन्न,
हर तरफ
होती
है
अदृश्य कांटेदार सीमान्त, जीवन
उन भूमिगत पलों में आख़िर
जाए भी तो कहाँ जाए,
अदृश्य रस्साकशी
में उलझ के
रह जाए
सभी
उन्मुक्त भावनाएं, दूर जितना - -
भी जाना चाहें, हम उतना
ही ख़ुद को मोह जाल
में उलझता
पाएं।

* *
- - शांतनु सान्याल
    

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

खंडित परकोटा -

ऊँचे खम्बों में लटकते हैं कहीं सपनों
के विज्ञापन, बिखरा हूँ मैं उसी
के नीचे कहीं, उपभुक्त
किताबों की तरह,
तुम्हारा दर्द
है गहरा,
सोम -
रस से बुझ जाए शायद, जीर्ण पृष्ठों
में तलाशता हूँ मैं दिनयापन,
ऊँचे खम्बों में लटकते हैं
कहीं सपनों के
विज्ञापन।
पास
तुम्हारे खोने को कुछ भी नहीं, तुम
पा चुके समयोपरि, तुम्हारा
मन बहता है मुहाने
की ओर समुद्र
को पाने,
हम
खोजते हैं बैठ किनारे, डूबे हुए कुछ
रौशनी के दर्पण, ऊँचे खम्बों में
लटकते हैं कहीं सपनों के
विज्ञापन। तुम्हारी
रातें, करती हैं
अनगिनत
ग्रह -
नक्षत्र से बातें, मैं तह करता हूँ - -
क्रमशः घातें - प्रतिघातें, शेष
प्रहर जोगी है कोई, उतार
फेंकता है सभी छद्म -
अपनापन, ऊँचे
खम्बों में
लटकते हैं कहीं सपनों के विज्ञापन।
इस शहर के अंतिम छोर में
कहीं आज भी है मौजूद,
समय का एक टूटा
हुआ परकोटा,
जहाँ से
हो
कर जाती है एक पगडण्डी, सुदूर - -
खंडित तारों के देश, कदाचित
जहाँ कोई नहीं चाहेगा
अस्तित्व का
सत्यापन,
ऊँचे
खम्बों में लटकते हैं कहीं सपनों के
विज्ञापन।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

अदल-बदल का खेल - -

कैसे छोड़ दूँ सपनों के पीछे दौड़ना, अंदर
का रिले रेस, हर हाल में चाहता है,
तुम तक पहुंचना, मैंने बांध
ली है, ज़ख्मों के ऊपर
स्मृति रुमाल,
हाथों में हैं
कुछ
रंगीन पताका, हर एक जनम में लेकिन
तुम उसी दिगंत बिंदु पर रुकना,
अंदर का रिले रेस, हर हाल
में चाहता है, तुम तक
पहुंचना। कुछ
तितलियों
के मृदु
स्पर्श, कुछ सुबह की कच्ची धूप, कुछ
रंगीन पेंसिलों के उपहार, कहानियों
की किताब, कुछ मुस्कान भरे
उम्मीदों का हाथ बदल,
तुम उड़ान पल के
नीचे किसी
मासूम
शिशु
के आसपास कहीं ठहरना, अंदर का रिले
रेस, हर हाल में चाहता है, तुम तक
पहुंचना। उस कांच की दीवार
के उस पार, बसते हैं कुछ
रेशमी लिबास वाले,
काश, वो भी
जान पाते
ये ख़ुशियों का खेल, भावनाओं का अदल -
बदल, जो बंद है उनकी सोच में कहीं,
वो अक्सर चाहते हैं अन्तःस्थल
से बाहर छलकना, अंदर का
रिले रेस, हर हाल में
चाहता है, तुम
तक
पहुंचना।
 
* *
- - शांतनु सान्याल   
 

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

मायावी बंद संदूक - -

खोल न पाएंगे दुर्ग द्वार किसी तरह,
चाहे जितना भी बढ़ा लें हम क़द
अपना, नियति ने फेंक दी
है चाबियों का गुच्छा,
पोखर में कहीं,
तैरता है
टूटा
हुआ बिहान का सपना, चाहे जितना
भी बढ़ा लें हम क़द अपना। उम्र
भर हम ने छीनी है ग़र हक़
पराया, चौक पर कुत्तों
को बिस्कुट खिलाने
से अब क्या
फ़ायदा,
चाहे
दाने चुगाओ कबूतरों को, या चीटियों
को कराओ मधु पान, अतीत के
पृष्ठ नहीं बदलते, वो सभी
बंद हैं दराज़ में, मुद्दतों
से बाक़ायदा, जो
कुछ लिखा
जा चुका
है उसे
मुश्किल है अब बदलना, चाहे जितना
भी बढ़ा लें हम क़द अपना। उस बंद
दिव्य द्वार के अन्तःस्थल
में क्या है, किसे मालूम,
फिर भी हर कोई
चाहता है उसे
खोलना,
कोई
कोहरे की है वो ज़मीं, या शून्य के सिवा
कुछ भी नहीं, आलोक स्रोत का है
कोई उद्गम स्थल या स्वयं
को अंधकार में है अविरत
टटोलना, उस परम
सत्य के आगे
हर हाल
में है
हमें झुकना, चाहे जितना भी बढ़ा लें - -
हम क़द अपना।

* *
- - शांतनु सान्याल    

 

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

स्तुतिपाठकों के बीच - -

किस से कहें अपनी व्यथा, खड़े हैं सामने
कुछ प्रणम्य चेहरे और कुछ पुरातन
पत्थर के स्तम्भ, सिंहासन पर
हैं पसरे हुए बिसात और
पासा, हलक पार
नहीं निकलते
उपालम्भ,
ख़ुद
ही उठा लो बिखरा हुआ अस्तित्व अपना,
कोई नहीं है आसपास, जो कर सके
युद्धारम्भ, खड़े हैं सामने कुछ
प्रणम्य चेहरे, और कुछ
पुरातन पत्थर के
स्तम्भ। छंद
विहीन हैं
सभी
अंग प्रत्यंग, उतरता जाए सुबह से शाम
ख़्वाबों का अंगरखा, स्तुतिपाठक
हैं खड़े पंक्तिबद्ध, इस जनपद
का जीवन है, अपने आप
में अनोखा, सवाल
से पहले हैं सभी
जवाब यहाँ
हाजिर,
काश, कोई तोड़ पाता महाधिराज का
विश्व विजयी दम्भ, ख़ुद ही उठा
लो बिखरा हुआ अस्तित्व
अपना, कोई नहीं है
आसपास, जो
कर सके
युद्धारम्भ - -

* *
- - शांतनु सान्याल

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past