क़दमों के निशान दूर जा कर खो जाएंगे कहीं, किनारे
का बिखराव कोई
मुड़ कर देखता
नहीं, बारहा
एक ही
सवाल
और
लाजवाब ये ज़िंदगी, धुआँ
धुऑं सा हर तरफ फिर
भी रात अधजली,
चंद्र बिम्ब को
छूना चाहती
हैं रंगीन
मछलियां, अदृश्य जाल है
जानलेवा बुझती नहीं
दिल की लगी,
शून्य घरौंदें
तकते रहे
आसमां,
उड़
चुके प्रवासी पखेरु,धरातल
में बिखरे पड़े हैं कुछ
स्वप्न सप्तरंगी,
- - शांतनु सान्याल





























