मंगलवार, 28 सितंबर 2021

आत्म दीपो भवः - - -

अदम्य जिजीविषा हर एक वृत्त से
निकल कर, उन्मुक्त हो कर
हर एक परिधि लांघ
जाती है, उस
केंद्र बिंदु
में रह
जाते हैं सिर्फ अवसाद भरे दिन, इस
अंधकार से मुक्ति दिलाता है
केवल अपना अंतर्मन,
शुष्क नदी पथ पर
होते हैं दूर तक
प्रस्तर खंड,
लेकिन
इन्हीं
के नीचे होते है भूगर्भस्थ जल स्रोत -
नदी सूखने से पूर्व अपने सीने
के अंदर एक झील बांध
जाती है, ज़िन्दगी
उन्मुक्त हो
कर हर
एक
परिधि लांघ जाती है। न जाने कितनी
बार मृत्यु को पुकारा मैंने, न
जाने कितने बार जीवन
ने डूबने से उबारा
मुझ को, हर
एक की
होती
है अपनी अलग अहमियत, सहज पथ
कहीं भी नहीं, दिवा निशि चलता
रहता हैं लेन देन, ये जान
कर भी कि कुछ भी
नहीं रहता है
हमेशा,
फिर
भी लोग चाहते हैं ज़रूरत से अधिक - -
संचय, काश अंदर का दीप जला
पाता, किसे ख़बर पुनर्जन्म
मिले न मिले दोबारा
मुझ को, न जाने
कितने बार
जीवन
ने
डूबने से उबारा मुझ को।  
* *
- - शांतनु सान्याल
 

  

शनिवार, 25 सितंबर 2021

तट रेखा का इतिहास - -

अंधकार में सो जाते हैं जब सभी स्मृति
अरण्य, हम तलाशते हैं झींगुरों के
मध्य, जुगनुओं की बस्तियां,
तमाम रात शंखमय  
अस्तित्व बहता
चला जाता
है तट
की
ओर, कौन किस की ख़बर रखता है यहाँ,
डूब जाती हैं मझधार में, न जाने
कितनी ही अनजान कश्तियां,
हम तलाशते हैं झींगुरों
के मध्य, जुगनुओं
की बस्तियां।
बुनते हैं
हम
अपने अदृश्य खोल के अंदर असंख्य -
छद्म परिधान, अंदर में दूर तक
होता है खोखलापन का
साम्राज्य, लेकिन
हम दिखाते
हैं बाहर
लोगों
को, अभिजात्य की मिथ्या आन - बान,
समय सब कुछ धीरे धीरे निगल
जाता है, ढह जाते हैं एक दिन
शानदार महल हो या
रंगीन हवेलियां,
इतिहास के
पृष्ठों में
खो
जाते हैं तथाकथित महान हस्तियां, हम
तलाशते हैं झींगुरों के मध्य,
जुगनुओं की
बस्तियां।
* *
- - शांतनु सान्याल   
 
 
 

शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

आगंतुक - -

स्तब्धता के अंदर भी हैं अनेक स्तब्धता,
अश्वत्थ पल्लवों के अदृश्य सिहरन
में है कहीं, छुपे हुए आगंतुक
समीरण की दिशा, सब
कुछ घटता जाता
है प्रकृत लय
के साथ
कभी
हैं सुहावना दिन और कभी जीवन से - -
दीर्घ होती है महा निशा, अदृश्य
सिहरन में है कहीं, छुपे हुए
आगंतुक समीरण की
दिशा। किसी से
मिलने की
चाह में
हम
कई बार करते हैं चहलक़दमी रात भर,
और कई दफ़ा, मिल कर भी हम
रहते हैं बेहद उदास, जीवन
के इस ग्राफ में बहुधा
छूट जाते हैं कुछ
हाशिए के
बिंदु
जिन्हें हम ढूंढते हैं उम्र भर अपने आस -
पास, आख़िर में हम समेट लेते हैं
बचा - खुचा उपलब्ध हिस्सा,
अदृश्य सिहरन में है कहीं,
छुपे हुए आगंतुक
समीरण की
दिशा।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 23 सितंबर 2021

जागृत कुरुक्षेत्र - -

सुदूर तलहटी में ऊँघता सा है पुरातन
शहर, धीरे धीरे दिमाग़ से उतर
रहा है अफ़ीम का असर,
बिखरे हुए हैं, हर
तरफ राजसी
उतरन,
लोग
देख रहे हैं मुद्दतों से खुशहाल दिनों का
सपन, कौन किसे समझाए, हर
एक मोड़ पर है नशेड़ियों की
जमात, होशवाले बस
भटक रहे हैं दर
ब दर, धीरे
धीरे
दिमाग़ से उतर रहा है अफ़ीम का असर।
मुश्किल है विकल्प की खोज यहाँ,
लेकिन नामुमकिन नहीं, बस
दिलों में चाहिए कुछ कर
गुज़रने की आस,
वक़्त नहीं
लगता
उतारने में, सम्राट के मूल्यवान पोशाक,
दिलों में कहाँ सोता है कुरुक्षेत्र आठ
प्रहर, धीरे धीरे दिमाग़ से उतर
रहा है अफ़ीम का
असर।   
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

मंगलवार, 21 सितंबर 2021

हारी हुई बाज़ी - -

कई बार रास्ता भूल कर भी हम,
आख़िरकार लौट आते हैं उसी
जगह, और लौट आती
है हमारे संग, देह
से लिपटी हुई
धूप छाँव,
कई
बार न चाह कर भी हम जीते हैं
किसी और के लिए, इस
सोच में कि हमारे
खोने से कहीं
उजड़ न
जाए
किसी और का सपनों का गांव, - -
लौट आती है हमारे संग, देह
से लिपटी हुई धूप छाँव।
कई बार हम बिन
चश्मे के यूँ
ही देखना
चाहते
हैं नज़दीक के चेहरे, ताकि लोगों -
का नाटकीय अपनापन नज़र
न आए, अजीब सा मोह
होता है ज़िन्दगी में,
पलकों में होते
हैं घनीभूत
मेघ, और
हम
चाहते हैं कि टूट कर बूंद कहीं - -
चेहरे पर बिखर न जाए,  
हम जान बूझ कर
हार जाते हैं
हर बार
वो
ख़ुश होते हैं बाज़ीगर की तरह - -
खेल कर बच्चों वाला दांव,
लौट आती है हमारे
संग, देह से
लिपटी
हुई
धूप छाँव।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 
 


सोमवार, 20 सितंबर 2021

अंतर्नाद - -

मुहाने पर जा कर नदी भूल जाती है
समस्त अहंकार, सुदूर पीछे
छूट जाते हैं, झाऊ वन,
धसते हुए नाज़ुक
किनारे, घाट
के अध
डूबी
सीढ़ियां, सांध्य आरती, देवालय के
शीर्ष से उठता हुआ रास पूर्णिमा
का चाँद, विलीन होती हुई
गौ कंठी रुनझुन, सिर्फ़
सामने होता है एक
अंतहीन नील
पारावार,
मुहाने
पर
जा कर नदी भूल जाती है समस्त
अहंकार। सागरीय गर्भपथ से
हो कर जीवन करता है
अनवरत गहन
अंध यात्रा,
असंख्य
युगों
की तृष्णा लिए प्राण खोजता है उस
अतल में मुक्ति दायिनी मोती,
निमज्जित प्रवाल द्वीपों
में कहीं कदाचित हो
लुप्तप्राय विरल
प्रणय की
ज्योति,
फिर
भी कहाँ बुझ पाता है अभ्यंतरीण -
हाहाकार, मुहाने पर जा कर
नदी भूल जाती है समस्त
अहंकार।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

रविवार, 19 सितंबर 2021

निष्पलक दृष्टि - -

यथारीति, गंध बिखेर कर निशि पुष्प
झर गए रात के तृतीय प्रहर में,
उड़ चले हैं जाने कहाँ सभी
रतजगे विहग वृन्द,
हमारे दरमियां  
ठहरा हुआ
सा है
निःस्तब्ध, समय का घूमता आईना,
निष्पलक देखता हूँ मैं, तुम्हारी
आँखों में अपना, उभरता
डूबता हुआ प्रतिबिम्ब,
खो रहे हैं न जाने
कितने ही
लहर
अधर तीर के शहर में, यथारीति,
गंध बिखेर कर निशि पुष्प
झर गए रात के तृतीय
प्रहर में। थम गया
है आकाश में
आलोक
पर्व,
डूबने को है बस बिहान का सितारा,
तुम तलाशते हो मेरे बहुत
अंदर तक पहुँच कर
पुरसुकून कोई
मरुद्यान,
मैं भी
खोजता हूँ तुम्हारे दिल में उतर कर  
जीवन नदी का किनारा, काश
मिल जाते कुछ पीयूष
बूँद वास्तविकता
के ज़हर में,
यथारीति,
गंध
बिखेर कर निशि पुष्प झर गए रात
के तृतीय प्रहर में।
* *
- - शांतनु सान्याल 

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past