12 जून, 2024

मनोभ्रंश - -

ऐनक है सामने घूरता हुआ, हम तलाशते हैं

उसे न जाने कहाँ कहाँ, कौन रोकता है

ज़िन्दगी को अदृश्य डोर से पीछे,

बिखरे पड़े हैं स्मृति बूंद हर

तरफ़ यहाँ वहाँ । उम्र

के अंतिम पड़ाव

पर रुक जाते

हैं शब्दों के 

जुलुस

बस यही तो है उल्टी गिनती वाला मनोभ्रंश,

मुझे ज्ञात है तुम्हारे उकताहट का रहस्य,

मिठास में बंधा हुआ मद्धम विष 

दंश । तुम जानते हो अच्छी

तरह से मेरी दुर्बलताओं

के कारण, रिक्त थाल

पर बिखरा पड़ा 

है इंद्रधनुषी 

आवरण ।

- - शांतनु सान्याल


03 जून, 2024

नख चिन्ह - -

देह पर रह जाते हैं वक़्त के नख चिन्ह, जीवन 

फिर भी खड़ा रहता यथावत मौन वृक्ष की 

तरह, व्याघ्र छोड़ जाते हैं अपनी सत्ता

के क्रूर निशान, उस पार बहती है 

मायावी कोसी नदी, जीने की

अदम्य इच्छा का कभी 

नहीं होता अवसान, 

फिर सुबह जाग

उठेगा सारा

जन -

अरण्य, पुनः बिछाई जाएगी शतरंज की बिसात,

बढ़ते हुए जुलूस में फिर मोहरें तलाशे जाएंगे,

क्रमशः आतिशबाज़ी में दब के रह जाएंगे 

सभी ख़्वाब, सभी अरमान, कुछ भी

नहीं बदलेगा, वही सियासत के

नाख़ून वही कराहता हुआ

जिस्म ओ जान, जीवन

फिर भी खड़ा रहता 

यथावत मौन 

वृक्ष की 

तरह, व्याघ्र छोड़ जाते हैं अपनी सत्ता के क्रूर 

निशान ।

- - शांतनु सान्याल



02 जून, 2024

छायाहीन - -

चल रहा हूँ छायाहीन दरख़्तों के नीचे बिल्कुल

अकेला, मैंने सभी हरित पल लौटा दिए

तुम्हें, याद की शाखाओं में बस छूट 

गए कुछ जुगनुओं के आलोक

कण, निःस्व होने के बाद

जनशून्य सा लगे है

सुदूर ख़्वाबों

का मेला,

चल रहा 

हूँ छायाहीन दरख़्तों के नीचे बिल्कुल अकेला ।

इस ढलान के आख़री मोड़ पर कहीं हुआ

करता था एक गुलमोहर का पेड़, क़रीब

से आज भी बहती है अरण्य नदी, 

जिस के सीने में कहीं सूख

चुका है पुरातन सजल

स्रोत, किनारे में 

बस आबाद

हैं भट -

कटई

के पौधे, रेत पर बिखरे पड़े है हिंस्र पद चिन्ह,

असमाप्त रहता है आखेट का खेल, बस

मौसम के साथ जीवन भी बदलता है 

पोशाक, कभी सिंदूरी सुबह और

कभी रहस्यमय साँझ की बेला, 

चल रहा हूँ छायाहीन 

दरख़्तों के नीचे 

बिल्कुल

अकेला ।

- - शांतनु सान्याल


29 मई, 2024

बहोत दूर - -

न जाने कितनी योजन दूर है सुबह की पहली

किरण, ताहम रात का आँचल है सितारों 

का शुक्रगुज़ार, तुम लांघ सकते नहीं

सुलगते हुए बंदिशों के ज़ंजीर,

फिर भी मेरी बाहों को है

जां से गुज़र जाने का

इंतज़ार, ज़रूरी

नहीं सभी

नदियां

पा

जाएं समंदर की अंतहीन गहराई, राह चलते

हर शख़्स नहीं होता दिल से मददगार,

दवा के नाम पर झूठी तस्सली ही

सही, किसे ख़बर कौन सी

दुआ हो जाए असरदार,

हर कोई चाहता है

पाना जिस्मानी 

ख़ुशी, बहुत

मुश्किल

है पाना

रूह

तक उतरने वाला दिलदार, इस मोड़ के आगे

भी हैं अनगिनत मंज़िलों के रास्ते, आसां

नहीं पहचानना रहनुमाई का किरदार,

न जाने कितनी योजन दूर है सुबह 

की पहली किरण, ताहम रात 

का आँचल है सितारों 

का शुक्रगुज़ार ।

- - शांतनु सान्याल


16 मई, 2024

अर्पण - -

साँझ और बिहान के मध्य है आलोकित उत्थान -
पतन, अमावस हो या चाँदनी रात, शुक्र ग्रह
की रहती है हर सांस को तलाश,
ईशान कोण में जब कभी
उभरते हैं श्यामवर्णी
मेघ दल, कुछ
पल के
लिए
ही सही बुझता सा लगे जीवन दहन, साँझ और बिहान के मध्य है आलोकित उत्थान -
पतन । शब्दों के परे रहती हैं कुछ
अनुभूतियां, एक अनुरागी
छुअन जो क्रमशः 
जीवाश्म को 
लौटा जाते 
हैं 
विलुप्त स्पंदन, शताब्दियों से थमा हुआ वक़्त पुनः
हो जाता है गतिशील, मृत सीप के सीने में
रहता है झिलमिल प्रणय मोती, टूटे हुए
खोल से झाँकती सी है एक अद्भुत 
सप्तरंगी किरण, उन अनमोल 
पलों की अंजलि मैं तुम्हें
करना चाहता हूँ पूर्ण
अर्पण, साँझ और 
बिहान के 
मध्य है 
आलोकित उत्थान -पतन ।।
- - शांतनु सान्याल

10 मई, 2024

विखंडन - -

प्रकाश स्तम्भ की तरह अपनी जगह अनंत

काल से ठहरा हुआ रहता है एकाकी
प्रणय, लवणीय हवाओं से ख़ुद
का अपक्षरण करता हुआ,
क्रमशः देह प्राण का
अगोचर विखंडन,
चाँदनी रात हो
या मेघाच्छन्न
कालरात्रि,
असमाप्त प्रतीक्षा में अंतर्निहित रहता है एक
अपरिभाषित आनंद, क्षितिज और सैकत
के मध्य कभी नहीं टूटता अदृश्य मेल
बंधन, क्रमशः देह प्राण का अगोचर
विखंडन । अनगिनत नौकाएं
लौट आती हैं अपने
गंतव्यों की ओर,
झिलमिलाते
बंदरगाहों
में रात
भर
चलता रहता है क्रय विक्रय, निःसंग प्रकाश - -
स्तम्भ सुनता रहता लहरों का मौन क्रंदन,
फिर भी वो अनिद्रित आंखों से करता
है नव बिहान का अभिनंदन, क्रमशः
देह प्राण का अगोचर
विखंडन ।
- - शांतनु सान्याल

04 मई, 2024

द्विधा - -

सिर्फ़ निष्पलक देखते रहे, शब्दों के अमलतास

अपने आप मौन झर से गए, बहुत कुछ कहा
था उसने नयन कोण से, बरसने से पहले
कुछ जल बिंदु पलकों के तीर ठहर
से गए, न जाने क्या बात थी
हृदय तल की गहनता में,
कुछ कोंपलें निकले
ज़रूर लेकिन
अल्पायु में
मर से
गए, शब्दों के अमलतास अपने आप मौन झर से
गए । कोई ढूंढता रहा रेत की नदी में विलुप्त
जल स्रोत का पता, हवाएं मिटा देती हैं
सभी पदचिन्हों के निशान, यात्रा
नहीं रुकती किसी के लिए,
आमंत्रण नहीं करता
कोई भी रस्ता,
सुदूर पहाड़ों
में जल
रहे हैं
मायाविनी अरण्य, स्मृति भस्म में रह जाएंगे सभी
अमर लता, कोई ढूंढता रहा रेत की नदी में
विलुप्त जल स्रोत का पता ।
- - शांतनु सान्याल

28 अप्रैल, 2024

स्वीकारोक्ति - -

उम्र भर देखा है आईना ताहम
ए'तराफ़ कर न सके,
गहराइयों तक हैं धुंध दिल अपना साफ़ कर न सके,

दोहरे म'यार की सियासत है मीर ए कारवां के अंदर,
फिर भी वो बेदार ज़मीर को मेरे ख़िलाफ़ कर न सके,

दर्दे मुहोब्बत अपनी जगह ज़िंदगी का सच एक तरफ़,
जीने की सज़ा ले कर ख़ुद को कभी माफ़ कर न सके,
- - शांतनु सान्याल

26 अप्रैल, 2024

माया डोरी - -

देखता हूँ पारदर्शी इत्रदान के आर पार,

अनगिनत पुष्पों का अंतहीन हाहाकार,

असीम प्रणय को देना होता है बलिदान,
सजल आँख पर उष्ण बूंदों का वंदनवार,

समय के संग ढलना ही है जीवन सारांश,
बहुत मुश्किल है चलना स्वप्नों के अनुसार,

दो स्तम्भ के मध्य तनी रहती है माया डोरी,
टूटने पर, किसी को नहीं कोई भी सरोकार,
- - शांतनु सान्याल

बिखरे बिखरे अहसास - -

कुछ याद की पंखुडियां है मौजूद अभी तक टूटे गुलदान के तहत,

बिखरे बिखरे अहसास, पिघलते मोम की तरह, बूंद बूंद रिसते हुए
पलकों में अश्क थमें हों जैसे आबसार कोई बियाबाँ के तहत,

जाहिर न हो आम, वो इक सुलहनामा था, भूल जाने का अहद
मुद्दतों से जिसे सजा रखा है, सुलगते दिल-ऐ-अरमाँ के तहत ,

वो शमा जो बुझ कर है रौशन, हज़ार शम्स के बराबर
कोई खुशबू-ऐ-हयात हो जैसे, बिखरा ज़मीं ओ आसमां के तहत,

कोई तो होगा जहाँ में, जिसे मालूम हो उसका ठिकाना
सहरा सहरा, वादी वादी ,मंज़र आये गए उम्र-ऐ- रवां के तहत,

कभी मंदिर, कभी मस्जिद, हर शै पे लिखा पाया उसी का नाम
इक प्यास, इक आश दबी हो जैसे, हर इबारत-ऐ-बयां के तहत,
-- शांतनु सान्याल

24 अप्रैल, 2024

बेवजह ही - -

आख़िर मिलें तो किस से, जो भी मिले तो पूछे

मिलने की वजह, बस इसी एक बिंदु पर
आ कर मैं लौट आता हूँ अपने अंदर,
और खोजता हूँ सूखी नदी का
गुमशुदा स्रोत, वैसे दोनों
किनारे हैं मुद्दतों से
यथावत अपनी
जगह,
आख़िर मिलें तो किस से, जो भी मिले तो पूछे
मिलने की वजह । पलटता हूँ मैं आधी रात
आत्मीयता की किताब, सूखे पंखुड़ियों
के संग झर चली हैं शब्दों की नाज़ुक
पत्तियां, अल्बम के पृष्ठों से आज
भी उठ रहे हैं अनाम ख़ुश्बू !
उभर चले हैं धीरे धीरे
देह कोशिकाओं
में अदृश्य
स्पर्श
की उष्णता, ज़िन्दगी उभर रही है सतह दर सतह,
आख़िर मिलें तो किस से, जो भी मिले तो पूछे
मिलने की वजह ।
- - शांतनु सान्याल

23 अप्रैल, 2024

कोहरे में कहीं - -

तर्क ए मरासिम के अफ़साने थे बेशुमार,
शबनमी पलकों के सिवाय सब थे बेकार,

इक लकीर जो उफ़क़ में कहीं खो सी गई,
नई सुबह का हर शख़्स होता है तलबगार,

मुसलसल मर के जी उठना ही है ज़िन्दगी,
उभरने की चाह नहीं रोक सकती मंझधार,

ख़्वाब की घड़ी रोक रखती है उम्र के कांटे,
ये सही है कि रुकती नहीं वक़्त की रफ़्तार,

वही शाही रस्ता वही शहर भर की रौशनाई,
लामौजूद हूँ ताहम सज चले हैं मीनाबाज़ार,

कुछ चेहरों को नहीं मिलती वाजिब पहचान,
घने धुंध की वादियों में छुपे होते हैं आबशार,
- - शांतनु सान्याल

21 अप्रैल, 2024

वो नहीं लौटे - -

चारों तरफ असंख्य चेहरे फिर भी शून्यता दूर

तक, हर कोई बढ़ चला है अनजान सफ़र
में, हाथों में थामे हुए अनेक रहस्यमयी
तख्तियां, न जाने कौन है जो उन्हें
हाँक कर ले जा रहा है सुदूर
मिथक देश की ओर,
जहां बसते हैं
देवदूत,
उड़ती हैं महाकाय रंगीन परों की तितलियाँ, हर
कोई बढ़ चला है अनजान सफ़र में, हाथों
में थामे हुए अनेक रहस्यमयी तख्तियां ।
वो सभी चेहरे हैं भाषा विहीन, मूक
कदाचित बधिर भी, उनकी
आँखे हैं पथराई सी,
मशीन मानव की
तरह वो बढ़े
जा रहे हैं
नंगे
पांव ओंठों में लिए हुए शताब्दियों की अनबुझ
प्यास, शायद उन्हें है कल्प सरोवर की
तलाश, जहां पहुंच कर मिल जाए
जीवन को शाप मुक्ति, लुप्त
हो जाएं सभी चेहरे से
असमय की झुर्रियां,
हर कोई बढ़
चला है
अनजान सफ़र में, हाथों में थामे हुए अनेक
रहस्यमयी तख्तियां ।
- - शांतनु सान्याल

17 अप्रैल, 2024

समाधिस्थ अनुराग - -

तमाम आलोक स्रोत बुझ जाते हैं अपने आप,

जब अस्तित्व से कोई निकटस्थ तारा टूट
जाता है, महाशून्य में रह जाता है
केवल अनंत निस्तब्धता का
साम्राज्य, दरअसल,
अबूझ जीवन
विलम्ब से
जान
पाता है हृदय की मौन भाषा, कुछ कविताएं
अमूल्य अंगूठी की तरह खो जाती हैं
समय के गर्त में, जिसे उम्र भर
हम खोजते रह जाते हैं बस
स्मृति कुंज में पड़े रहते हैं
कुछ टूटे हुए अक्षर के
कंकाल, कोहरे में
भटकती रह
जाती है
प्रणय
आत्मा, समाधिस्थ हो जाती हैं देह की दुनिया,
पत्थरों पर पड़ा रह जाता है फूलों का
स्तवक निष्प्राण सा गंध विहीन ।
- - शांतनु सान्याल

13 अप्रैल, 2024

अदृश्य किनारा - -

परछाई बढ़ चली है, सुबह का मंजर न रहा,

हद ए निगाह, अब साहिल ए समंदर न रहा,

ये सच है कि, मुहोब्बत की कोई इंतहा नहीं,
वो जुनून ए इश्क़ अब दिलों के अंदर न रहा,

चेहरों पे हैं चस्पां, मुख़्तलिफ़ रंगों के मुखौटे,
जो सिखाए जीने का फ़न वो क़लन्दर न रहा,

ओढ़ कर ख़ुत्बा ए पैरहन हर मोड़ पे रहज़नी,
दिलों को जीत सके ऐसा कोई सिकंदर न रहा,

अजीब दौर है कि हज़ार ख़ेमों में बंट गए इंसां,
किस किनारे उतरें, घाट पे हक़ गो लंगर न रहा,
- शांतनु सान्याल

10 अप्रैल, 2024

स्वर्ण मीन - -

छूना चाहता हूं उसे समीप से, स्वर्ण मीन सा वो

डूबता चला जाता है गहन अंधकार में, उलंग
देह बढ़ता जाता है उसकी ओर पूर्णग्रासी
चंद्र की तरह, अथाह जलराशि के तल
को ढूंढता हूँ मैं मायावी इस संसार
में, स्वर्ण मीन सा वो डूबता
चला जाता है गहन
अंधकार में ।
हरित नील
रंगों के
जल
बिंदु खेलते हैं उन्माद लहरों के साथ, जुगनुओं
का नृत्य चलता है रात भर, अद्भुत एक
आभास जीवित रखती है मुझे उस
गहराई में प्राणवायु विहीन,
शेष प्रहर में वृष्टि भिगो
देती है अंदर तक मरु
धरा को, उर्वर
भावनाओं
में पुनः
खिल
उठते हैं नन्हें नन्हें अनाम फूल, जीने की अदम्य
उत्कंठा अशेष रहती है कृष्ण मृग के चीत्कार में,
स्वर्ण मीन सा वो डूबता चला जाता
है गहन अंधकार में ।
- - शांतनु सान्याल

07 अप्रैल, 2024

मर्म कथा - -

मुझे ज्ञात है विलीन उपरांत की मर्म कथा,

हृद्पिण्ड देह का भस्मीभूत होना, नदी
ही एकमात्र अंतिम वक्षस्थल है जहाँ
तमाम मान अभिमान डूब जाते
हैं, किनारे पर तैरते रह जाते
हैं शुभ्र वस्त्र, छिन्न पुष्प -
हार, धुएँ के साथ
उठता हुआ
दग्ध मांस
गंध !
कोई मुड़ कर नहीं देखता, बस मूकाभिनय
के सिवाय कुछ भी बाक़ी नहीं होता,
एक यही परम सत्य मुझे स्वयं
से जोड़े रखता है, दरअसल
एक कल्प लोक में हम
करते हैं निवास, हर
कोई पास रहने
का दावा
करता
ज़रूर है पर वास्तविकता में कोई भी नहीं
होता हमारे आसपास, स्वयं को भोगनी
होती है अपनी सभी व्यथा, मुझे
ज्ञात है विलीन उपरांत की
मर्म कथा ।।
- - शांतनु सान्याल












05 अप्रैल, 2024

महकती चाँदनी - -

महकती सी फ़िज़ा चाँदनी उतर चली है मद्धम मद्धम,

नाज़ुक दिल की परतों पे गिर रही है क़तरा ए शबनम,
लरज़ते ओंठ पे, गोया बिखर चली हैं नशीली सुर्ख़ियां,
चल रहे हैं सितारों की ज़मीं पे हाथ थामे दम - ब -दम, 
बहुत ख़ूबसूरत है ज़िन्दगी का ये फ़लसफ़ा ए रहगुज़र,
हज़ार मुश्किलें, रुकावटें फिर भी रवां रहे अपने क़दम,
कहाँ पे मिले किस की तलाश थी कुछ भी याद न रहा,
ज़रुरी नहीं ख़ालिस निकले, हर चेहरा राहत ए मरहम,
- - शांतनु सान्याल

28 मार्च, 2024

शून्य निवास - -

एक अंतर्निहित सुरंग खोजती है अंतिम प्रस्थान,

प्रतिबिम्ब से चेहरे को अलग करना नहीं आसान,

शरीर और छाया के मध्य रहती है जन्मों की संधि,
उदय अस्त अनवरत, सृष्टि का नहीं होता अवसान,

महा शून्य में बह रहे हैं, जन्म मृत्यु के अग्नि वलय,
इसी धरा में है अभिशप्त जीवन, यहीं मुक्त बिहान,

मायाविनी रात्रि में खोजता हूँ व्यर्थ का अज्ञातवास,
मोहक जुगनू कभी हथेली पर और कभी अंतर्ध्यान,

अनगिनत प्रयास फिर भी आँचल में शून्य निवास,
विश्व भ्रमण के बाद भी, स्वयं से व्यक्ति है अनजान,
- - शांतनु सान्याल

25 मार्च, 2024

प्रवाहिनी - -

अंतःसलिला बहती है अंतरतम की गहराई में,

मौन प्रणय साथ निभाए जीवन की उतराई में,

सभी रंग मिल कर हो जाते हैं सहज एकाकार,
महत शांति मिलती है दिव्य वृक्ष की परछाई में,

वक्षस्थल के अंदर बहती है, अंतहीन प्रवाहिनी
बिन डूबे मिले न मोती सागर के अनंत खाई में,

अनमोल शल्कों को देह से उतरना है एक दिन,
प्रत्याभूति कुछ भी नहीं, नियति की सिलाई में,
- - शांतनु सान्याल 

22 मार्च, 2024

ठहराव से पहले - -

रंग गहरा ऐसा कि निगाह से रूह में उतर जाए,

छुअन ऐसी हो कि रिसते घाव छूते ही भर जाए,

कुछ जुड़ाव जो दूर रह कर भी जिस्म को जकड़े,
ख़ुश्बू वो कि रगों से बह कर दिल में बिखर जाए,

हर एक मुस्कुराहट में, हज़ार फूलों की पंखुड़ियां,
हर सिम्त गुलशन दिखाई दे जहां तक नज़र जाए,

इक अजीब सी कशिश है उस तिलस्मी निगाह में,
दिन ढलते ही बहकते क़दम अपने आप घर जाए,

वफ़ा ऐसी हो कि सात जन्मों के परे भी रहे ज़िंदा,
जिस्म का क्या, लाज़िम है कोहरे में कहीं मर जाए,

बेशुमार हसरतें अंतहीन चाह बस उम्र है मुख़्तसर,
सांस के झूले जाने किस पल अचानक ठहर जाए,
- - शांतनु सान्याल







19 मार्च, 2024

विलिनता की ओर - -

मृत्यु पार की दुनिया का मानचित्र जो भी हो,
हर किसी को उस कुहासे में एक दिन
खो जाना होगा, किसे पता कौन सा
मार्ग है कितना सहज या
कठिन, तर्क वितर्क
से दूर देह का
का है ये
अवसान, जन्म लेते ही हर एक जीव करता है
मृत्यु पत्र में हस्ताक्षर, समय शेष होते ही
उसे मुरझाना होगा, हर किसी को
उस कुहासे में एक दिन खो जाना
होगा । वो तमाम प्रेम घृणा
प्रकृत कृत्रिम, रिश्तों के
मुखौटे, आजन्म
साथ निभाने
के शपथ
पत्र,
सब कुछ फ़र्श पर पड़े रह जाएंगे, इत्र की ख़ाली
शीशी की तरह धीरे धीरे स्मृति गंध भी विलीन
हो जाएगी, परित्यक्त शीशी भी एक दिन
टूट जाएगी, किसी को याद करना तब बेवजह
का बहाना होगा, हर किसी को
उस कुहासे में एक दिन खो
जाना होगा ।
- - शांतनु सान्याल

17 मार्च, 2024

गहन बिंदु - -

सुदूर दिगंत में सघन मेघ उभर चले, नदी खोजती

है एक निरापद आश्रय समुद्र के वक्षस्थल में,
लौटेंगे सभी पंछी अपनी अपनी नीड़ों में
ये ज़रूरी नहीं, डूब जाते हैं कुछ एक
नाव, दिग्भ्रम हो कर मुहाने के
अतल में, नदी खोजती
है एक निरापद
आश्रय
समुद्र के वक्षस्थल में । अस्ताचलगामी सूर्य भी तलाशता है रात्रि पांथशाला, आकाश पथ
से गुज़रता है निःशब्द सपनों का चाँद
फेरीवाला, अंधकार कर देता है
सभी मान  - अभिमान का
निपटारा, धीरे धीरे
जागृत होता है
स्पर्श का
वर्णमाला, सुलग उठते हैं शेष प्रहर रक्तिम पलाश
वासंतिक अनल में, नदी खोजती है एक
निरापद आश्रय समुद्र के
वक्षस्थल में ।
- - शांतनु सान्याल

16 मार्च, 2024

कौन हो तुम - -

वो नदी हो तुम जिस की चाहत में प्यासे हैं बंजर किनारे,

वो मेघ छाया हो तुम जिसे छूने को तरसते हैं देव
दूत सारे,

कल्पना से परे है तुम्हारी शिल्प कृति जो मिट्टी में
प्राण डाले,
तुम्हारी दृष्टि में हर व्यक्ति है बराबर चाहे वो जीते
अथवा हारे,

वो अदृश्य ज्योत्स्ना हो तुम जो देह का पुनरुद्धार
कर जाए,
निराकार कोई प्रियतम हो तुम जो भ्रमित जीवन
को सुधारे,

न जाने क्या हो तुम, कभी अगोचर और कभी पूर्ण
प्रकाशित,
जो भी हो तुम अन्तःस्थल में बहाते हो आलोक स्रोत
के धारे ।
- - शांतनु सान्याल


15 मार्च, 2024

दिल की बात - -

दिल की बात हर्फ़ ए आग बन अल्फ़ाज़ से उभरे,

इंसानियत का तक़ाज़ा, हर एक आवाज़ से उभरे,

महदूद नज़रिया रुक जाती है मज़ाहिब के बाड़ में,
इक नया समा, आज़ाद परिंदे के परवाज़ से उभरे,

लहू का रंग एक सा है, फिर सलूक इम्तियाज़ी क्यूं,
एक दूजे के लिए दुआएं ख़ूबसूरत अंदाज़ से उभरे,

हर एक इंसां को चाहिए ज़िन्दगी के वाज़िब हक़ूक़,
दरख़्त ए एतिहाद, इस ज़मीं पे बहुत नाज़ से उभरे,
- - शांतनु सान्याल 

14 मार्च, 2024

ख़ामोशी का सफ़र - -

अजीब सी है ख़मोशी दूर ठहरा हुआ तूफ़ां सा लगे है,

हाकिम का ख़ुदा हाफ़िज़, मुझे देख के हैरां सा लगे है,

उठ गई बज़्म ए अंजुम रात भी है कुछ लम्हे की साथी,
आंख की गहराइयों में डूबता  हुआ कहकशां सा लगे है,

सारे उतरन उतरते गए, नज़दीक से देखने की ज़िद्द में,
दाग़ ए दिल देखते ही आईना बहोत पशेमां सा लगे है,

लफ्ज़ तक सिमट के रह जाते हैं सभी तरक़्क़ी के दावे
इंतिख़ाब क़रीब है वज़ीर कुछ ज़्यादा परेशां सा लगे है,

रक़ीब ओ रफीक़ में फ़र्क़ करना अब है बहुत मुश्किल
जिसने खंज़र उठाया, वो शख़्स मेरा आश्ना सा लगे है,
- - शांतनु सान्याल


13 मार्च, 2024

कुछ याद आया - -

मुद्दतों बाद, मुस्कुराने का हुनर याद आया,

फिर ज़िन्दगी का, अधूरा सफ़र याद आया,

यूँ तो, अपना ठिकाना भी याद नहीं हम को,
उसे देखते ही वो खोया हुआ घर याद आया,

आईना पूछता रहा, ज़िन्दगी भर का हिसाब,
ख़्वाब से उभरे तो इश्क़ का असर याद आया,

नज़दीकी समझा देती है असलियत खुल कर,
रस्ते में फलों से लदा कड़ुआ सज़र याद आया ।
- - शांतनु सान्याल






11 मार्च, 2024

ग़ुबार के उस पार - -

किसी वीरान टूटे फूटे स्टेशन की तरह लोग तकते

रहे गुज़रती हुई सभ्यता की ट्रेन, उसकी तेज़
रफ़्तार, दूर तक सिर्फ़ नज़र आता रहा
ग़ुबार ही ग़ुबार, ये और बात है कि
किसी ने भी उन्हें नहीं देखा,
वो छूटते गए अंध रास्ते
के मोड़ पर, आख़िर
धुंध में वो सभी
चेहरे गुम
हो गए,
उनका किसी भी बही ख़ाते में नहीं मिलेगा कोई
समाचार, दूर तक सिर्फ़ नज़र आता रहा
ग़ुबार ही ग़ुबार । दरअसल वो सभी
थे किसी निम्न देवता के बच्चे,
अपने अस्तित्व को जीवित
रखने की कोशिश में
वक़्त से पहले
बूढ़ा गए,
वो ख़ुद
को
तलाशते रहे महुए की टोकरी में, चकमक पत्थरों
की क्षणिक स्फुलिंग में, सूखे हुए पलाश फूलों
में, तेंदू पत्तों के बंडलों में, सप्ताहांत के हाट
में कप बसी धोते हुए, वो ख़ुद को खोजते
रहे दूर गुज़रती हुई तीव्रगामी रेल की
आवाज़ में, जो क़रीब से जाती
ज़रूर है लेकिन अपने साथ
नहीं ले जाती, बिहान का
स्वप्न सत्य होता है
लोग कहते हैं
काश ऐसा
ही होता,
सुबह सवेरे सज उठता दूर तक खुशियों का मीनाबाज़ार, दूर तक सिर्फ़ नज़र आता
रहा ग़ुबार ही
ग़ुबार ।
- - शांतनु सान्याल



10 मार्च, 2024

महकता हुआ ख़त - -

सूखे किनार समेटे इक उदास नदी तलाशती है

गुमशुदा जलधार को, रेत की घड़ी वक़्त
का पीछा निरंतर करती रही, फिर
भी न मिला सजल भूमि का
का वो टुकड़ा, जहां
कभी उगते थे
खुशियों के
मासूम
पौधे,
सजते थे पलकों तले जुगनुओं की नीलाभ रौशनी,
समय छीन लेता है चेहरे की नमी, अंततः
इक रेत का द्वीप हासिल होता है
मझधार को, सूखे किनार
समेटे इक उदास नदी
तलाशती है गुमशुदा
जलधार को ।
सोचने से
कहीं
होती है बरसात, स्मृतियों के काग़ज़ी नाव अनबहे
पड़े रहते हैं बंद खिड़कियों के आसपास, कोई
आवाज़ नहीं देता लेकिन हमें सुनाई देता है,
कदाचित दस्तक भी उड़ते हैं ले कर
तितलियों के पंख उधार, आँखों
की मृत नदी खोजती है
विलुप्त वृष्टि की
संभावना,
चलो
फिर दोबारा लिखें महकते हुए ख़त रूठे हुए बहार
को, सूखे किनार समेटे इक उदास नदी तलाशती
है गुमशुदा जलधार को ।
- - शांतनु सान्याल















08 मार्च, 2024

सुबह की दस्तक - -

एक अद्भुत निस्तब्धता ओढ़े रात गुज़रती है

सहमी सहमी सी, पड़े रहते हैं राह में
सघन कोहरे के चादर, कुछ ओस
की बूंदें, मकड़जाल के उस
पार बिखरे रहती हैं कुछ
अनकही भावनाएं,
कुछ असमाप्त
कविताएं,
तमाम
ज़ख़्म
सुबह के साथ भर चले हैं, फिर दहलीज़ पर
नज़र आते हैं ख़्वाबों के निशान, ज़िन्दगी
दोबारा संवरती है, एक अद्भुत
निस्तब्धता ओढ़े रात
गुज़रती है । सीने
पर हैं जीवित
कुछ अदृश्य
छुअन की
गहराई,
कुछ
उष्ण सांसों की गर्माहट, जिस्म में घुलती हुई
सजल मेघ की परछाई, रंध्र रंध्र से उठता
हुआ मायाविनी गंध, बिखरा हुआ
अस्तित्व किसी और के सांचे
में ढलता सा लगे है, इक
ख़ूबसूरत अंदाज़ में
फिर रूह की
दुनिया
निखरती है, एक अद्भुत निस्तब्धता ओढ़े
रात गुज़रती है ।
- - शांतनु सान्याल

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