Wednesday, 27 May 2020

नेपथ्य में कहीं -

ये धूप - छांव का अनुबंध है
बहोत नाज़ुक, कब बदल
जाए रंगीन परदों का
जादू कोई जाने
ना, कल
और
आज के दरमियां बहुत कुछ
बदल गया, कल मेरा
वजूद किसी राजा
से कम न था,
आज हूँ
भीड़
में भी अकेला, जाहिर है अब
मुझे कोई पहचाने ना। इस
रंगमंच में सभी को है
निभाना अपना
अपना
किरदार, कभी भरपूर सभागृह,
इत्र में डूबी हुई सांसे करे
इंतज़ार, और कभी
ज़िन्दगी एक
शब्द भी
जाने
ना। ख़त ओ किताबत मेरी कुछ
कम न थी, लेकिन जवाब थे
कि गुम हो गए लौटते
हुए, किसे दोष दें,
जब बहुत
अपना
कोई, हमें अपना ही माने ना।
- - शांतनु सान्याल


Saturday, 16 May 2020

अब कोई दुआ न देना - -


अब लम्बी उम्र की दुआ न देना
के अब बहलने की उमर नहीं 
हमारी, इक मीठा सा है
ख़ुमार रूह की
गहराइयों
तक,
वो नशा जो चेहरे तक आ
के सिमट जाए, वो
चाहत अपने
आप उतर
गई
सारी । चाँदनी का लिबास
ओढ़े कब तक इंतज़ार
करे कोई, झरते
फूलों के
साथ
आख़िर, ये रात भी यूँ ही सो
गई बेचारी, तर्जुमा है
बहोत मुश्किल,
रहने दे गुम,
तहे -
निगाह भूली हुई दास्ताँ हमारी।
- - शांतनु सान्याल


Sunday, 10 May 2020

बहाने तलाश करें - -


हर सांस हैं बोझिल, हर एक
नज़र में सूनापन, फिर भी
ज़िन्दगी मुस्कुराने के
बहाने तलाश
करे, वो
कोई
आशना चेहरा है या ख़्वाब
पिछले पहर का, दूर
जितना जाना
चाहूँ, वो
क़रीब
आने के बहाने तलाश करे।
मेरा पता है कहीं क्षितिज
की नाज़ुक लकीरों में
छुपा हुआ, वो अपने
सीने में अक्सर
मुझे छुपाने
के बहाने,
तलाश
करे। मैं चाह कर भी यूँ
निजात पा न सकूँ,
वो शख़्स मुझे,
हर लमहा
अपने
में समाने के बहाने, तलाश
करे। न उसके इख़्तियार
में है कुछ, न मेरे वश
में ज़रा भी, फिर
भी न जाने क्यूँ
वो मुझे से
लौट के न जाने के बहाने
तलाश करे।
- - शांतनु सान्याल




Thursday, 7 May 2020

निरुपाय हर एक चेहरा - -

कुछ भी नहीं वश में अपने,
चाहे हो दो गज़ ज़मीं या
मुट्ठीभर आसमान,
तुम भी हो
परदेशी
मुसाफ़िर, मेरा भी नहीं यहां
कोई चिरकालिक स्थान ।
परिभाषाओं का क्या,
धुंध की तरह
अक्सर
बदलते हैं वादियों का रुख,
कभी बिखरे नदिया
कगार, कभी
पहाड़ों सी
ऊंची
उड़ान । विलिनता ही है - -
इस जीवन का एकमेव
शाश्वत - सत्य, फिर
क्यूँ हो हम इतना
आंतकित,
ख़ुद के सिवा कोई नहीं - -
दे हमें यहां अभयदान ।
उदय के साथ
अदृश्य
चले हमेशा सूरज का चिर
अवसान ।
- - शांतनु सान्याल






Tuesday, 5 May 2020

मरहमी स्पर्श - -


न जाने कौन सी जगह है
उस पार, जो लुभाती है
मुझे जुगनुओं के
द्वीप की तरह
हर बार,
मेरा जिस्म होना चाहे कोई
विस्मृत, पुरातन मंदिर,
तुम विशालकाय
बरगद बन
पाओ
अगर इक बार, मुझे तुम्हारे
आवर्त में है जीना मरना,
नहीं चाहिए छद्मवेशी
ये संसार, ये सही
है कि हर एक
के भाग्य
में नहीं
मोंगरे की तरह खुल के - -
महकना, हर्ज़ क्या है
आख़िर माटी गंध
हो जाना कभी
कभार,
देह मेरा है ढहता कोई प्राचीर,
ढहने दो इसे यूँ ही वक़्त के
साथ, हो सके तो ढक लो
मुझे अपने मरहमी -
शैवाल से
आरपार ।
- शांतनु सान्याल








Sunday, 3 May 2020

नदी और किनारे के दरमियान


नदी और किनारे के
दरमियाँ
रहता है एक ख़ामोश सा
रिश्ता, डूबने का सुख
वही जाने जो
टूटने को
हो
तैयार । उठ गई रात ढले आसमां
की महफ़िल, फिर दिल में है
जागी सुबह की उम्मीद,
फिर कलियां हैं
खिलने को
बेक़रार ।
कहने को दूर दूर तक है एक न
ख़त्म होने वाली वीरानगी,
किसे ख़बर कितनी
दूर तक ले चले
ऐ बहती
हुई
दिल की आवारगी, न जाने इसे
है किससे यूँ मुक्कमल
मिलने का अशेष
इंतज़ार ।
- शांतनु सान्याल

Friday, 7 February 2020

उम्मीद की लकीर - -

किसी की चाहतों में ख़ुद को मिटा देना
नहीं आसां, बड़ी सहजता से उसने
तोड़ा था नाज़ुक रिश्ते, लेकिन
न जाने क्यूँ वो शख़्स रहा
ताउम्र परेशां।  बिखरे
हुए ख़्वाबों में
कहीं न
कहीं
होता है सुबह का ठिकाना, आज की
रात चाहे गुज़री हो दहकते हुए
रास्तों से, ग़र मुमकिन
हो कभी, मुंतज़िर
आँखों में
लौट आना। सितारों का उभरना नहीं
छूटता उजाले और अँधेरे के
दरमियां, इक हलकी
सी लकीर होती
उम्मीद की
हमेशा,
चाहे बेशुमार हों  ज़िन्दगी में कमियां।

* *
- शांतनु सान्याल   

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