रेल पटरियों के उस पार बिखरी
पड़ी हैं टुकड़ों में दोपहर की
धूप, कुछ आगे पुल के
साए में टूटी पड़ी
है उम्र से कहीं
लंबी सांस,
अंतिम
रेलगाड़ी के गुज़रते ही सुनाई देती है एक अजीब सी दबी आहट,
सीने से उतर कर रूह की
गहराइयों तक सूखे
पत्तों की हो जैसे
सरसराहट,
महुआ
फूल
की तरह हम बीनते हैं टूटे सपनों
को, करते हैं सुबह से पहले
जीवन का पुनर्विन्यास,
कुछ आगे पुल के
साए में टूटी पड़ी
है उम्र से कहीं
लंबी सांस ।
चाँदनी
का स्पर्श था या छू कर आए हम रंगीन तितलियों के पर, न
जाने कौन रख गया
कुछ शिशिर बिंदु
पलकों के
ऊपर,
यद्यपि हाथों से छूट कर लुढ़क गया कोई अनमोल पत्थर,
दूर तक बिखरे पड़े हैं
गुलमोहर, फिर
आज हमें
हो चला
है पुनः जीने का एहसास, कुछ आगे पुल के
साए में टूटी पड़ी
है उम्र से कहीं
लंबी सांस ।
- - शांतनु सान्याल






























