तारों का टूटना और बिखरना
अनादिकाल से
है जारी,
आकाश निहारता है
चिर निर्विकार,
दिवा स्वप्न
विलासी
ये जीवन चाहे आलोकमय
चंद्रहार, कोई नहीं जाने
कल प्रस्थान की है
किस की बारी,
तारों का
टूटना
और बिखरना अनादिकाल से है
जारी । अशेष नक्षत्रों में जिसे
खोजते हैं वो प्रकाश बिंदु
छुपा रहता है अंतरतम
में कहीं, वो मोती
जो त्रिलोक
में भर
दे
अविरल आलोक, कदाचित
मिलता है हृदयस्थ
गहनतम में
कहीं,
वो महत दाता हो कर भी रहता
है सदा प्रणय भिखारी, तारों
का टूटना और बिखरना
अनादिकाल से
है जारी ।
- - शांतनु सान्याल
आकाश निहारता है
चिर निर्विकार,
दिवा स्वप्न
विलासी
ये जीवन चाहे आलोकमय
चंद्रहार, कोई नहीं जाने
कल प्रस्थान की है
किस की बारी,
तारों का
टूटना
और बिखरना अनादिकाल से है
जारी । अशेष नक्षत्रों में जिसे
खोजते हैं वो प्रकाश बिंदु
छुपा रहता है अंतरतम
में कहीं, वो मोती
जो त्रिलोक
में भर
दे
अविरल आलोक, कदाचित
मिलता है हृदयस्थ
गहनतम में
कहीं,
वो महत दाता हो कर भी रहता
है सदा प्रणय भिखारी, तारों
का टूटना और बिखरना
अनादिकाल से
है जारी ।
- - शांतनु सान्याल






























