पृथ्वी और आकाश जब एकाकार, सघन गाढ़ अंधकार, मर्म को स्पर्श करती हुई आदिम
बरसात, टूट जाते हैं
शीशे के सभी
दीवार, रोके
रुकते
नहीं
विक्षिप्त अभिलाषित जलधार, पृथ्वी और आकाश जब एकाकार । सब
कुछ बह जाता है क्षण में हम
देखते रह जाते हैं अवाक,
उन निःशब्द पलों में
जीवन पा जाता
है आत्म सुख
अपरम्पार,
इस
असीम डूब में निहित है सारा संसार,
पृथ्वी और आकाश जब
एकाकार ।
-- शांतनु सान्याल






























