सोमवार, 5 दिसंबर 2022

पतझर की कहानी - -

स्मृति आलोक दीर्घायु नहीं होते, बहुत जल्द
लोग भूल जाते हैं झरते पत्तों की कहानी,
सूखे पलों को कोई नहीं चाहता है
सहेजना, टहनियों में कोंपलें
उभरते हैं रिक्त स्थानों
को भरते हुए, हिम
परतों के नीचे
सदैव रहता
है जमा
हुआ
पानी, लोग भूल जाते हैं झरते पत्तों की कहानी ।
जिल्द चाहे जितना भी हो रंगीन, श्वेत श्याम लकीरों में लिखी रहती हैं ज़िन्दगी की
दास्तां, हर एक को गुज़रना होता
है एक दिन तपते हुए धरातल
से, अक्सर बेबस होता है
उन लम्हों में नीला
आसमां, कोई
नहीं उठाता
ख़ुद के
सिवा
ज़िन्दगी की परेशानी,  बहुत जल्द लोग भूल जाते हैं झरते पत्तों की कहानी ।
* *
- - शांतनु सान्याल

 आगे बढ़ने का हुनर - -

निर्बंध हवाएं अपने ही शर्तों पर बहती हैं,
वो किसी का निर्देश नहीं सुनतीं, हमें
पाल समायोजित करने का तरीक़ा
खोजना होगा, अंधेरे में भी हम
उम्मीद की सुबह देख सकते
हैं, भले ही हमारे पास कुछ
भी न हो, फिर भी इस
अमूल्य जीवन को
मुस्कराहटों के
साथ, जैसा
है वैसा ही क़ुबूल करना होगा, हमें पाल 
समायोजित करने का तरीक़ा खोजना
होगा । अन्तःस्थल का सौंदर्य ही
प्रकृत सुंदरता है, जो काँच
की तरह है पारदर्शी,
अरण्य निर्झर
की तरह
बहती
हैं
उन्मुक्त भावनाएं, उसे जिसने नियंत्रित
कर लिया वही शख़्स है मुक्कमल
ख़ूबसूरत, जब हम अपनी  
मानसिकता को अपने
वश में कर लें तब
खुलने लगते हैं
सफलता
के बंद
कपाट, हर एक क़दम में छुपा होता है नए
गंतव्य का ठिकाना, आगे बढ़ने का
हुनर हर हाल में सीखना होगा,  
हमें पाल समायोजित
करने का तरीक़ा
खोजना
होगा।  
* *
- - शांतनु सान्याल

रविवार, 4 दिसंबर 2022

अंतरतम का प्रवास - -

 
असमाप्त ही रहता है अन्तरतम का प्रवास,
रास्ते के पड़ाव, ख़ामोशी से देखते रहते
हैं दृश्यों का बदलाव, हर एक मोड़
पर ज़िन्दगी बदल जाती है
अपना बहाव, समय
मोड़ लेता है वजूद
अपने शर्तों पर,
हम चाह कर
भी रहते
हैं असहाय, शून्यता के सिवाय कुछ भी नहीं
रहता हमारे पास, असमाप्त ही रहता है
अंतरतम का प्रवास । कभी कभी जान
बूझ कर हम हार जाते हैं अपना
दांव, किसी और के चेहरे में
खोजते हैं राहत भरी
छांव, दरअसल
हम चाहते
हैं उस
का
प्यार बेपनाह, उसे परिपूर्ण पाने के लिए हम
हो जाते हैं लापरवाह, कोई हमारी छोटी
मोटी ग़लतियों पर झिड़के, रोके टोके,
हम जाने अनजाने में बढ़ा जाते
हैं उसकी गहरी चाह, उसे
निकट से निकटतम
लाने का होता
है असल में
एक मधुर
प्रयास,
असमाप्त ही रहता है अंतरतम का प्रयास ।
फिर भी बनी रहनी चाहिए ज़िन्दगी में
परिपूर्ण जीने की अतृप्त प्यास ।
* *
- - शांतनु सान्याल


शनिवार, 3 दिसंबर 2022

मोम का सांचा - -

अक्स कुछ बदला सा नज़र आए, मोम का सांचा था, निःशब्द अपने आप के संग

मिला गया कोई, एक विचित्र सी

अनुभूति है देह के बहुत अंदर, 

अभिशप्त पत्थरों को पुनः

जिला गया कोई । उस

प्रणय पिंजर के

मध्य हैं न

जाने 

कितने ही अंध मोहपाश, हृदय पट पर रहते

हैं फंसे सहस्त्र अदृश्य फांस, उम्र भर जो

देते हैं मीठे दर्द का एहसास, बंजर

भूमि में सहसा, अनगिनत फूल

खिला गया कोई, निःशब्द

अपने आप के संग 

मिला गया 

कोई ।

- - शांतनु सान्याल


 उम्मीद की लौ - -

अंधकार घिरने से पहले, न कोई अफ़सोस,
न ही कोई शिकायत रही, हर एक के पास
है प्राथमिकता की अपनी सूचि,
शून्य अपेक्षा ही होती है
सर्वोत्तम संतुष्टि,
जंग लगे दर
ओ दीवार
पर है
लटकती हुई शब्द विहीन नाम की तख़्ती,
अध खुले दरवाज़े से झांक कर चाँद
की रौशनी जताती है अपनी
उपस्थिति, हर एक के पास
है प्राथमिकता की
अपनी सूचि !
रंगहीन,
गंध -
विहीन सूखे फूलों का कोई नहीं तलबगार,
आत्मीयता का बहाव सर्वदा होता है
निम्नमुखी, सुबह और शाम के
मध्य कितना कुछ बह जाता
है केवल साक्षी रहता है
एक मात्र नमनीय
सूरजमुखी,
रिक्त
स्थानों को भर जाता है मौसम का पहिया,
अतीत के भित्ति पर ज़्यादा दिन नहीं
ठहरते कांच के यादगार, रंगहीन,
गंध विहीन सूखे फूलों का
कोई नहीं तलबगार !
फिर भी ज़िन्दगी
हर हाल में
देखती
है आइना, पुनर्रचना के लिए खोजती है -
नए गंतव्य, रंगीन क्षितिज, भरना
चाहती है रंगों से घिसा पीटा
धूसर कैनवास,कदाचित
मरुभूमि को भिगो
जाए अनाहूत
सांध्य वृष्टि,
हर एक के
पास है प्राथमिकता की अपनी सूचि, शून्य
अपेक्षा ही होती है सर्वोत्तम
संतुष्टि - - -
* *
- - शांतनु सान्याल


 


शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

दूसरे जहान में - -

 

विखंडित पलों को जोड़ती हुई ज़िन्दगी बढ़

जाती है एक नए सफ़र के लिए, अभी

अभी गुज़री है कोई दूरगामी रेल,

पटरियों के दोनों तरफ है एक

अजीब सी थरथराहट भरी

ख़ामोशी, गहराती रात

के साथ हम गुज़रते

हैं नींद के सुरंग

से हो कर

किसी

अनजाने शहर के लिए, ज़िन्दगी बढ़ जाती है

एक नए सफ़र के लिए । मुंडेर से उतर कर

चाँदनी, अलिंद पर ठहरती है कुछ देर के

लिए, निढाल देह पर गिरते हैं बूंद -

बूंद ओस, खुलते हैं परत दर 

परत ख़ुश्बुओं के स्पर्श, 

नज़दीकियां ले जाती

हैं हमें सितारों के

उस पार किसी

और ही 

जहान

में, हम बुनते हैं रेशमी स्वप्न परस्पर में डूब कर,

ज़िन्दगी ढूंढती है कोई न कोई नया विकल्प

गुज़र बसर के लिए, ज़िन्दगी बढ़ जाती

है एक नए सफ़र के लिए ।

- - शांतनु सान्याल 









तर्जुमा ए ख़्वाब - -

हर बार लौट आता है, पिंजरे का परिंदा अपनी जगह,
दुनिया है हैरां, देख कर मुझ को  ज़िंदा अपनी  जगह,

उस अहाते की शबनमी चाँदनी आती है मेरे घर तक,
ख़ुश्बू ए गुल बदन बनी रहती है, आहट ए सहर तक,

लौट आता हूँ मैं ख़ला ए अज़ीम से किसी की चाह में,
तलाशता हूँ मैं अनमोल मोती, किसी गहरे  निगाह में,

दहलीज़ पे कोई अक्सर रख जाता है, म'अतर  रुमाल,
एहसास ए लम्स है या कोई ओढ़ा जाए कश्मीरी शाल,

नरम धूप को बुलाता है धीरे से अधखिला सुर्ख़ गुलाब,
नम पंखुड़ियों में है छुपा कहीं  अदृश्य तर्जुमा ए ख़्वाब,
* *
- - शांतनु सान्याल
 

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past