Wednesday, 10 July 2019

अब किसे है चाहत - -

हाशिए से उन्वान का सफ़र नहीं आसां,
हर एक मोड़ पर हैं पेंच बेशुमार,
न थाम सीढ़ियों को इतने
सख़्त हाथों से, अपनों 
ने ही मुझे गिराया
है कई बार।
अब वो
आए हैं पूछने हाले दिल मरीज़ का, जो
जीते जी मर चुका हज़ारों बार। ये
मख़मली पैबंद न भर पाएंगे
मेरे अरमानों को दोबारा,
अब किसे है चाहत,
आए या न आए
फ़सले बहार।
* *
- शांतनु सान्याल


 

Friday, 10 May 2019

मुक्त द्वार - -

कहीं दूर, अदृश्य दिशा में,
साँझ ढले बरसे हैं
मेघ, अतीत
की
परछाइयों से फिर जाग - -
उठे हैं आवेग।
आकाशमुखी
हैं सभी
मुक्त
द्वार, पिंजर एकाकी, - - -
उन्मुक्त जीवन
सभी चाहें, हम,
तुम हों या
पाखी।
तितलियों के संग, उड़ - -
गए सभी स्वप्न
अभिलाष,
मौसम
की
नियति में है बदलना उसे -
कहाँ अवकाश।

* *
- शांतनु सान्याल





 

Saturday, 20 April 2019

आख़िरकार - -

सुबह और शाम के दरमियां बहुत कुछ
बदल ही जाता है, कुछ मुरझाए फूल
गुलदान में झुके रहते हैं और
परिश्रांत सूरज अन्ततः
ढल  ही जाता है।
अब किस से
कहें दिल
की
बात, तन्हाइयों में ये ख़ुद ब ख़ुद बहल
ही जाता है। यूँ तो सारा शहर है
उजाले में डूबा हुआ, फिर भी
अँधेरे का जादू चल ही
जाता है। हमने
लाख चाहा
कि
तुम्हारा इंतज़ार न करें, फिर भी, हर -
एक आहट में, नादां दिल बेवजह
मचल ही जाता है। सुबह और
शाम के दरमियां बहुत
कुछ बदल ही
जाता
है।

* *
- शांतनु सान्याल

Thursday, 11 April 2019

पलातक - -

कब तक यूँ ही फ़रारी का स्वांग रचोगे,
आईने के सामने हर शख़्स है, इक
अदद नंगा सच, चाहे जितना
भी पहन लो रंग गेरुआ,
सिद्धार्थ फिर भी
क्या बन
सकोगे। नियति की ज्यामिति में, क्या
राजा, क्या रंक, हर कोई है बंधा
निमिष मात्र से, अदृश्य -
प्रहार से चाह कर
भी बच न
सकोगे। कुछ बूंद मेरी निगाह के, कुछ 
नूर तेरी चाह के, बहुत कुछ हैं ये
ज़िन्दगी के लिए, चाहतों का
क्या आसमान भी कम
सा लगे है, चार
दिन की है
चांदनी,
उम्र भर इन्हें सहेज कर कहाँ रखोगे। - -
चाहे जितना भी पहन लो रंग
गेरुआ, सिद्धार्थ फिर भी
क्या बन सकोगे।
* *
- शांतनु सान्याल  
 

Wednesday, 27 March 2019

हिय के अंदर - -

कदाचित मरुधरा है हिय के अंदर, अनवरत -
प्यास जगाए, ख़ानाबदोश हो कर भी
मेरी दुनिया, तुम्हीं तक आ कर,
न जाने क्यों रुकना चाहें।
इक अजीब सा मोह
है, तुम्हारे सजल
नयन के
कोर,
अलस दुपहरी में जैसे बरगद की जटाएँ, सूखती
नदी को छूना चाहें। बहोत मुश्किल है, इन
हथेलियों के अंकगणित को समझना,
जो कुछ भी हो हासिल, इस पल
की मेहरबानी है, जो खो
गया, सो खो गया,
हम क्यों न
उसे भूलना
चाहें। ख़ानाबदोश हो कर भी मेरी दुनिया, तुम्हीं
तक आ कर, न जाने क्यों रुकना चाहें। 

* *
- शांतनु सान्याल






Monday, 25 March 2019

अंतहीन प्रतीक्षा - -

उम्र से भी कहीं लम्बी है प्रतीक्षा, गली के
आख़री छोर में, कील ठोंकते हाथों को
आज भी है किसी का  इंतज़ार।
कहने को यूँ तो बहुत कुछ
बदल गया मेरे शहर
में, लेकिन अभी
तक है ज़िंदा,
अंधेरों का संसार। क्षितिज में फिर उभरी
हैं उम्मीद की किरण, शायद सुबह
का आलम हो कुछ ज्यादा ही
ख़ुशगवार। ख़्वाब देखते
हुए बूढ़ा जाती हैं
जहाँ जवां -
आँखें, कहाँ रुकता है किसी के लिए ये - -
ज़माने का कारोबार। जीवन स्रोत
को है बहना, हर पल, हर एक
लम्हा, ये और बात है कि
कभी तुम उस पार
और कभी
हम रहें  इस पार।  कहाँ रुकता है किसी के
लिए ये ज़माने का कारोबार।

* *
- शांतनु सान्याल

Friday, 22 March 2019

दस्तक से पहले - -

हमेशा की तरह फिर हाथ हैं ख़ाली, अंजुरियों
से जो गुज़र गए उनका अफ़सोस नहीं,
कुछ नेह रंग यूँ घुले मेरी रूह में
कि चाह कर भी अब उनसे
निजात नहीं, न जाने
कितनी बार ओढ़ी
है ख़्वाबों के
पैरहन,
ये ज़िन्दगी फिर भी लगे है इक ख़ूबसूरत - -
उतरन। सूखे पत्तों का वजूद जो भी
हो, मौसम को तो है हर हाल में
बदलना, मेरे घर का पता
तुम्हें याद रहे या न
रहे, हर मोड़ पर
है कहीं न
कहीं
पुरअसरार दहलीज़ ! ऐ दोस्त, दस्तक से पहले
ज़रा संभलना। सूखे पत्तों का वजूद जो
भी हो, मौसम को तो है हर हाल में
बदलना।

* *
- शांतनु सान्याल

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