Monday, 9 July 2018

उजाले का वहम - -

न बुझा यूँ चिराग़ ए अहसास
मेरा, कुछ उजाले का
वहम रहने दे, इस
शाहराह
से निकलते हैं न जाने कितने
धुंध भरे गली कूचे, कुछ
रौशनी के टुकड़े
अनजाने
ही सही, इस तरफ तो बहने दे।
 हाँ पहचानता हूँ अच्छी
तरह से मैं,  उन
नक़ाबपोशों
का फ़रेब,
जो भी हो अंजाम, उन अंधेरों
का दर्द खुल के आज मुझे
कहने दे। हर सिम्त
हैं ताजिर ए
ख़्वाब, हर तरफ है बिकने की
लाचारी, मेरे ज़ख़्म हैं नासूर,
लाइलाज, बहते हैं तो
यूँ ही इन्हें बहने
दे। जो अभी
अभी जलसा ए रहनुमा था
उसी ने ख़रीदा मुझे कई
बार, ज़ंजीर जड़े
पांवों का दर्द
ग़र मेरा
अपना है तो मुझे तनहा सहने दे।
न बुझा यूँ चिराग़ ए अहसास
मेरा, कुछ उजाले का
वहम रहने दे।

* *
- शांतनु सान्याल 



Thursday, 5 July 2018

शाश्वत पथ - -

धूप - छाँव के उतरन पे, -
रफू करता ये जीवन,
साथ यवनिका
के जागृत
है रंगमंच अष्टप्रहर,मुखौटे
के दर्द में है छुपा, अट्टहास
प्रतिवेदन। नेपथ्य के
 रेशमी डोर,
नियति के हैं हाथ गढ़े, सुधार
कठिन है चाहे कर लो
जितना आवेदन।
सिद्धार्थ हो
या सुजाता कोई नहीं मोह - -
विहीन, एक ही है
शाश्वत पथ,
याचक
चले या महाजन।

* *
- शांतनु सान्याल


  

स्थिर बिंदु - -

जल भँवर हो जब तुम, मैं
एक पत्ता
टूटा
हुआ, अभी नदी का उतार 
है मुहाने की ओर
अविरल बहते
जाओ, शाम
ढले,
बेशक तुम्हें याद आएगा,
दूर किनारा छूटा हुआ।
निःसीम है मेरा
अधिकार,
तुम्हें
हर हाल में लौटा ले आएगा,
अपनी जगह है अचल
पाषाणी घाट, कहने
को यूँ ही रूठा
हुआ। 

* *
- शांतनु सान्याल


 

Wednesday, 4 July 2018

सृष्टि का सौंदर्य - -

बदस्तूर, सपनों का फेरीवाला, रात के आख़री
पहर, हमेशा की तरह, चाँदनी के फ़र्श पर,
खोलता है अपनी दुकान, और तुम्हारे
स्पर्श का तिलिस्म, धीरे - धीरे
देह को ले जाता है महाशून्य
की ओर, उन अंतरंग
क्षणों में कहीं -
जीवन
चाहता है अभ्यंतरीण मुक्ति, लेकिन कहाँ - -
इतना आसान है, मोहपाश से पूर्ण बाहर
निकलना, अभिलाषों के मायाजाल
में तब भटकते हैं श्वास तंतु !
फेरीवाला, गहराते रात
के साथ, और भी
क़रीब से 
आवाज़ देता है - - "अभी तो रात बहोत बाक़ी है,
अभी - अभी निशि पुष्पों ने खोला है गंध -
कोष, चाँदनी को और सुरभित होने
दो, जीवन के बंजर ज़मीन पर
कुछ बूँद शिशिर के गिरने
दो, सृष्टि का सौंदर्य
इसी में है, हर
हाल में
जीवन का नव अंकुरण होने दो, मुझे कुछ देर यूँ
ही शुभ्र प्रवाह में बहने दो।"

* *
- शांतनु सान्याल   

Sunday, 1 July 2018

सर्वस्व - -

तुम एक दिन आए अनंत वृष्टि के साथ,
और बहा ले गए सब कुछ मेरा, ठीक
अप्रत्याशित मरू सैलाब की
तरह। अब कुछ है मेरे
अंदर, तो वो है इक
मृत नदी, रेत
और पत्थरों
से भरी,
दूर तक सूखे किनारों को अपने आलिंगन
में समेटे हुए, किसी अभिशापित टूटे
ख़्वाब की तरह। अदृश्य पंखों
की दुनिया बदल देती है
सब कुछ, यहाँ तक
की लोग भूला
देते हैं सभी
अंतरंग
चेहरे, हम खड़े रहते है अपनी जगह किसी
खोखले वृक्ष, बाओबाब की तरह। हाँ,
मैं आज भी चाहता हूँ अतीत  को
पुनः लौटा लाना, तुम्हारे
वही  अंतहीन वर्षा
वाली रात को
निःशब्द,
अपने
अंदर तक उतार लाना, सांसों के तटबंध - -
आज भी हैं तने हुए अपनी जगह,
किसी तामीर लाजवाब की
तरह।तुम एक दिन
आए अनंत
वृष्टि के
साथ, और बहा ले गए सब कुछ मेरा, ठीक
अप्रत्याशित मरू सैलाब की तरह।

* *
- शांतनु सान्याल



Thursday, 28 June 2018

अनजाना सुख - -

अपनी अपनी चाहत का है
अपना ही अलग पैमाना,
कोई सुख तो है ज़रूर,
मोती और सीप के
दरमियां,
उस बंद दरवाज़े का रहस्य,
चिरंतन हैं अनजाना।
मेघों का अस्तित्व,
नहीं मिटा
पाए वज्रों के हुंकार, बरसने
की ज़िद्द  में, दुश्वार था
उनका रुक जाना।
उस दिगंत
रेखा पर जा मिलते हैं - - - 
तिमिर -आलोक,
एक तीर
उठता
धुंआ, दूसरी ओर बेसुध है
ज़माना। पहेलियों का
शहर है, हर मोड़
से जुड़े मायावी
रस्ते, इस
मोह के
सफ़र से मुश्किल है दोस्त
लौट आना।
* *
- शांतनु सान्याल

Monday, 25 June 2018

अंतराल - -

ज़िन्दगी में कहीं न कहीं, थोड़ा
बहुत अंतराल चाहिए,
नज़दीकियों के
अपने
अलग ही हैं कुछ नफ़ा नुक़सान,
फिर भी सर रखने के लिए
कोई कंधा हर हाल
चाहिए।
वजूद की असलियत कुछ और
थी, अक्स थे अर्थहीन,
जवाब हैं मुंतज़िर
लेकिन
कोई दमदार सवाल चाहिए। - -
उनकी बसीरत वो जाने,
हर चीज़ कहना
नहीं मुमकिन,
दुनिया
है फ़ानी तो रहे, दिल मगर - -
मालामाल चाहिए। चाँद
तारों को यूँ ही
आसमान
में रहने
दो अपनी जगह, दे सके रूह को
सुकूं ऐसा कोई ख़्वाब ओ
ख़्याल चाहिए। 

* *
- शांतनु सान्याल

 

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