Monday, 10 December 2018

कटु सत्य है लेकिन - -

रात गहराते ही निशि पुष्पों ने
वृन्त छोड़ दिया, हवाओं
की मनःस्थिति
समझना
आसान नहीं, गंध चुरा के फूलों
का सुबह से नाता जोड़ दिया।
कोई नहीं रुकता किसी
के लिए ये कटु
सत्य है,
उगते ही सूरज के अंधेरों से - -
रिश्ता तोड़ दिया। जीवन -
मरण का आलेख,
अनवरत धुंध
भरा,
इसीलिए जीवन वक्र को सीधे
राह मोड़ दिया। अब चाहे
कोई, जो भी समझे
कुछ अंतर नहीं,
जो मन
को करे अशांत ऐसी चाहत छोड़ -
दिया।

* *
- शांतनु सान्याल 
 

Wednesday, 28 November 2018

सजल अभिलाष - -

उस निशीथ मौन के अंदर, बिखराव समेटे
मेरा मन, कच्ची मटकी तपने से पूर्व
जैसे देखे लाख सपन।  किसे ख़बर
कौन क्षितिज से उभरे बिहान
सतरंगी, ओस में डूबे हुए
हर पल मेरे चंचल
दिगंत - विहंगी।
कहीं कोई
फिर फूल खिले और सुरभित हो अंतरतम,
बुझे सभी आग्नेय अरण्य, मिले हर
एक साँस को जीने का वरदान 
कम से कम।

* *
- शांतनु सान्याल

  

Wednesday, 21 November 2018

प्रवासी मन - -

सूखते कांटेदार बेलों के बीच अभी तक हैं
बाक़ी कुछ गुलाबी मुस्कान, कोई
आए या न आए, हर चीज़ हो
जैसे यथावत, खिलता
हुआ अपने स्थान।
उम्मीद के
फूल
शायद कभी मुरझाते नहीं,चाहे पतझर हो
या मधुऋतु, क्या धूप और क्या छाँव,
गेरुआ मन हर पल एक समान।
जलविहीन फल्गु तट हो या
ज्वलंत मणिकर्णिका -
घाट, उन्मुक्त -
पाखी, सदा
प्रवासी,
प्राणों में बाँधे अंतहीन उड़ान। - - - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल  

Monday, 12 November 2018

नज़्म जो निगाहों से छलके - -

मुस्कराहटों से जीवन के सभी व्यतिक्रम
छुपाए नहीं जाते, फिर भी ये सत्य है,
कि हर एक शख़्स कहीं न कहीं
अपने आप में गहराइयों
तक है उथला, कुछ
रिसते घाव
दिखाए
नहीं जाते। मेरी ख़ामोशी को उसने इक
नया आयाम ही दे दिया, बियाबां के
सीने में जैसे सुलगता कोई सावन,
तमाम ही दे दिया, ये ज़िन्दगी
की हैं ज़मीं, किसी अंतहीन
बंजर से कम नहीं, जज़्बा
ए दरख़्त इक बार
जो सूखे, दोबारा
किसी
हाल पे उगाये नहीं जाते। सुबह ओ शाम
के दरमियां कोई अनदेखा पुल ही था
शायद, जो सांसों को टूटने न दिया,
इस पार कौन था और उस पार
कौन, ये सोचना है बेमानी,
चाँद रात की ख़्वाहिश
 ने, शायद हमें
उनसे छूटने
न दिया,
इक अजीब सा कोहराम था रात भर मजलिस
ए आसमां पर, जो नज़्म मेरी निगाहों से
छलके वो फिर दोहराए नहीं जाते,
मुस्कराहटों से जीवन के
सभी व्यतिक्रम
छुपाए नहीं
जाते। 
* *
- शांतनु सान्याल  

Thursday, 1 November 2018

ग़र कभी गुज़रो - -

अब पूछते हैं वो मेरा गुमशुदा
ठिकाना, जब याद नहीं
मुझको तारीख़ ए
रवाना।
वहीँ मोड़ पे कहीं हम सब कुछ
छोड़ आए, कोई याद हो
बाक़ी तो यूँ ही भूल
जाना।
उम्र की बदहाल सड़क ही तो - -
है ज़िन्दगी, कभी अपनों
ने लूटा, कभी बेदर्द
ज़माना।
सभी सब्ज़ दरख़्त सूख गए
अपने आप, दरअसल
बारिश तो था सिर्फ़
इक बहाना।
इस ज़मीं के सीने में सोतों - -
की कमी नहीं, मुश्किल
है लेकिन झरनों
को ढूंढ लाना।
हर कोई जैसे है अपने ही - - -
दायरे में गुम, आशना
चेहरा भी लगे यहाँ
अनजाना।

* *
- शांतनु सान्याल

Tuesday, 30 October 2018

बाक़ी अब कुछ भी नहीं - -

जो कुछ भी था उसमे में बाक़ी,
 ढलती रात ने ले लिया,
कुछ बूँद छुपाए
सीने में
आकाश तकता रहा ज़मीं को, -
मुसलसल सूनापन छोड़,
सभी कुछ बरसात
ने ले लिया।
अंतहीन कोई प्यास है वो, या  -
मेरी अनबुझ आरज़ू ! नफ़स
ख़्वाबों से छूटे मगर,
कुछ ख़्वाहिशात
ने ले लिया।
उम्र भर हम को न समझ आए
वो सभी राज़े तक़ाज़ा,
महसूल के बहाने
कुछ ज़ियादा
ही उसकी
ज़ात ने ले लिया। हम आज भी - -
उसी घाट पर हैं बैठे मुंतज़िर
निगाह लिए, जन्मों का
इम्तहान एक ही
पल में रूहे
निजात
ने ले लिया।  - -
* *
- शांतनु सान्याल
 


Friday, 12 October 2018

RAISE VOICE FOR # Me Too Movement

After observing continuously the campaign of # Me Too Movement, one thing became very clear that so-called the superhero of the era or the face of every advertisement is the great diplomate too - - no need to write the name, other politicians of present government who are claimed the torch bearer of beti bachao or save the daughter movement are also predators - - though particularly English news media are doing their work honestly - - anyways its a great beginning by Tanushree Dutta against the sexual predators of our society whom we are giving the status of god and saying the pride of humanity, days of Hippocrates, pseudo gentleness and so-called '' sanskari log'' are over, every citizen should raise their voice against these sexual predators of our society
who are just like woodworm making the Indian society day by day too much hollow and weak. Those people of Bollywood (who are against women's movement ) are actually hidden pimp, they want to earn the money after forcing the innocent women indirectly to flesh trade, there should be strict law and regulation for contract/employment for women's safety and protection, there shouldn't be any compromise of their dignity in the film industry / IT sectors/media / or any other organizations. If present government is really honest in their so-called women empowerment policy then they must show 56 inches chest for making immediately law and regulation regarding this comprehensive policy otherwise in coming election women shouldn't vote them.
- Shantanu Sanyal



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