दो चकमक पत्थरों के बीच की चिंगारी,दूर तक जला जाती है स्मृति नगर सारी,
पड़े रहते हैं कुछ एक अधजले अनुभूति,
फिर भी जीवन का चलना रहता है जारी,
अनवरत चलायमान है देह का पुनर्वासन,
एकमेव जन्म में, हज़ार जन्मों की तैयारी,
आसपास बिखरे पड़े हैं असंख्य आत्माएं,
सहज नहीं कहना, कब आए अपनी बारी,
कागज़ी फूल ही सही ये रिश्तों की दुनिया,
गन्धहीन कोषों में बसता है प्रणय भिखारी,
दीवार से लटकी पड़ी है एक बूढ़ी बंद घड़ी,
वक़्त का ऋण चुकाना पड़ता है बहुत भारी,
वक़्त का ऋण चुकाना पड़ता है बहुत भारी,
कोई विकल्प काम नहीं आता अंतिम पहर,
सामने खड़े हैं जब धर्मराज दंड गदा धारी ।
- - शांतनु सान्याल
बहुत सुंदर ,लाजवाब रचना।
जवाब देंहटाएंसादर।
जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ४ अप्रैल २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।