बुधवार, 31 मार्च 2021

असमाप्त कोलाहल - -

बूढ़ा बरगद, अपनी जटाओं से भूमध्य  
में कहीं, तलाशता है एक जलज
भूमि, स्वप्न डिम्बक की
तरह जीवन खोजता है
शाखा - प्रशाखाओं
में उड़ने की
जमीं,
कुछ भावनाएं हैं कोषस्थ कीट, झूलते
रहते हैं जीर्ण पल्लव के तीर, वो
रेशमी तंतुओं को चीर, एक
दिन उड़ जाएंगे बहुत
दूर, किसी ऐसे
जगह जहाँ
रहती है
अंतहीन नमी, जीवन खोजता है शाखा -
प्रशाखाओं में उड़ने की ज़मीं। एक
दीर्घवृत्त उभरता है, क्षितिज
की ओर, माटी पर पड़े
रहते हैं, छितराए
सभी अमूल्य
देहावरण,
और
अंतहीन नीरवता की वट छाया, उड़ चली
हैं न जाने कहाँ सभी ख़्वाहिशों की
तितलियाँ, सुबह होगी शाम
भी, उभरेंगे कुछ अंकुर,
धूसर तनों के
कोटरों से,
मकड़
जालों में, झिलमिलाएंगी ओस बूंदों की -
अशेष माया, कोई रहे न रहे, किसी
को यहाँ कुछ भी फ़र्क़ पड़ता
नहीं, हर हाल में जीवन
खोजता है, शाखा -
प्रशाखाओं में
उड़ने की
जमीं।

* *
- - शांतनु सान्याल

 


 







 

मंगलवार, 30 मार्च 2021

अयाचित अवतरण - -

शताब्दियों से चल रहे हैं लोग उत्क्रांति
की ओर, आफ्रिका के गोचर भूमि
से निकल कर, शुष्क महा -
द्वीप से हो कर पृथ्वी
के अंतिम बिंदु
तक, फिर
भी
अपने अंदर के आईने में हम पाते हैं - -
अंधेरा घन घोर, शताब्दियों से
चल रहे हैं, लोग उत्क्रांति
की ओर। असमाप्त
ये रास्ता न जाने
किस शीर्ष
बिंदु
पर रुकेगा, अक्ष रेखा पर बिखरे पड़ें हैं
अनगिनत उम्मीद के बिम्ब, लहू -
लुहान कणों में, समय तलाश
करता है कोई अयाचित
अवतरण, जो रोक
पाए, मानवता
का अंतिम
क्षरण,
जिसके शिराओं में बहता हो सत्य का
रक्त पुरज़ोर, शताब्दियों से चल
रहे हैं लोग उत्क्रांति की
ओर।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

 




 

सोमवार, 29 मार्च 2021

प्रकृत घड़ीसाज़ - -

समय हो चला है स्थविर, सीने के
नीचे लेकिन बहती है कोई
प्रबल धारा, खिड़की
के कांच पर हैं
ठहरे हुए
कुछ
जल बिंदु, सूख जाएंगे अपने आप
सभी क्षत विक्षत घाव के दाग़,
घड़ी के कांटे फिर चल
पड़ेंगे, विंडस्क्रीन
पर चलते ही
वाइपर
ब्लेड,
सारा शहर है गहरी नींद में लीन,
जीवन पृष्ठ को है आगे बढ़ने
का इशारा, सीने के नीचे
लेकिन बहती है कोई
प्रबल धारा। अभी
तक हूँ जीवित,
ये और बात
है कि -
जीवाश्म घड़ियों में तलाशता हूँ
मैं विलुप्त पद चिन्ह, कुछ
बिखरे हुए निशि पुष्प,
निस्तब्ध वीथिका,
क्रमशः ज़र्द
पत्तों का
झरना
है जारी, मध्य रात, कुछ रतजगे
अध्याय, करवट बदलते हुए
पहर, सुदूर दिगंत रेखा
में कहीं उभरता सा
उच्छ्वास भरा
किनारा,
सीने
के
नीचे लेकिन बहती है, कोई प्रबल
धारा।

* *
- - शांतनु सान्याल

 
 
 
 

 

रविवार, 28 मार्च 2021

अविराम मृगया - -

न तराश सब को अपने मूल्यों के छेनियों
से, कुछ पत्थर हैं, जो समय को भी
रोक लेते हैं अपनी जगह किसी
चुम्बक की तरह, रहने दे
मुझे यूँ ही उपेक्षित
माटी में सना,
किसी एक
दिन
मैं ज़रूर उभर आऊंगा आत्म कृत तक्षक
की तरह, जो समय को भी रोक लेते
हैं, अपनी जगह किसी चुम्बक
की तरह। न जाने कितनी
सभ्यताएं यहाँ उजड़ी
और बसी, कुछ
अज्ञात मुख
नेपथ्य
में
रहे विलीन, कुछ चेहरे अकारण ही बने -
कालजयी, युग के साथ बदलते रहे
इतिवृत्त कथा, प्रस्तर काल
से ले कर सम्प्रति पहर
तक, वही अदम्य
जिजीविषा,
वही
जन्म से ले कर मृत बिंदु तक असमाप्त
जीवन की व्यथा, करने दें नियति
को पीछा, जहाँ तक वो चाहे,
किसी शातिर आखेटक
की तरह, कुछ
पत्थर हैं,
जो
समय को भी रोक लेते हैं, अपनी जगह
किसी चुम्बक की तरह।

* *
- - शांतनु सान्याल
 


 
 






 

शनिवार, 27 मार्च 2021

सप्तरंगी स्पर्श - -

कुछ प्रतीक्षारत बौर, रहते हैं चिरंतन
सिरमौर, झरते नहीं कभी, चाहे
गुज़रें कितने ही काल -
वैशाखी, एक
अगोचर
दहन,
लिए जीवन, बढ़ता है नए क्षितिज की
ओर, कुछ शेष बसंत के रंग, कुछ
रंगीन पलों के मस्त मलंग,
उड़ते जाएं, सुदूर कुछ
अबीर रंगों के
पाखी, वो
थमते
नहीं कभी, चाहे गुज़रें कितने ही काल -
वैशाखी। अलस भरी दोपहरी, झरते
सेमल फूल के घूंघर, अनंत
संगीत स्रोत, माटी के
अंदर, कदाचित
बसता है
कोई
परजन्म का नगर, उन्मुक्त ह्रदय में है
मन्नतों का वृन्दावन, दुःख हो या
सुख, वो खेले होली आजीवन,
देह प्राण रंग जाए बार
बार, आए न किसी
तरह नज़र,
ह्रदय -
तीर में बसे वो अदृश्य नागर, अलस - -
भरी दोपहरी, झरते सेमल फूल
के घूंघर - -

* *
- - शांतनु सान्याल

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

अन्तः उदय - -

सहसा पथ बदल कर, किसी अन्य राह से
तुम जा चुके हो, अपने सुरक्षित गंतव्य
की ओर, सुना है प्रेम और युद्ध में है
सात ख़ून माफ़, कुछ शिराओं
में बहते हैं, छद्म रंगों के
अनगिनत कण,
परिवेश के
तहत
लोग बदल जाते हैं अपने आप, प्रेम और -
युद्ध में है सात ख़ून माफ़। अपने ही  
प्रेत बिम्ब के सामने, खड़ा हूँ मैं
ले कर हाथ में, एक नग्न
कटार, गढ़ने चला
हूँ, स्वयं को
एक
स्वयंभू अवतार, हालांकि मुखौटे के बहुत
अंदर, अभी तक हैं मौजूद रक्त के
ताज़े छाप, प्रेम और युद्ध में है
सात ख़ून माफ़। सीने का
दुर्ग क्रमशः हो चला
है कमज़ोर, ठीक
आँखों के
सीध
उभर चला है एक संकरे रास्ते का भोर, -
वीरत्व का उपहार मुझे ही मिलेगा,
चाहे जितनी भी दुनिया रहे
मेरे ख़िलाफ़, प्रेम और
युद्ध में है सात
ख़ून माफ़।
असल
में,
मुझे मालूम है नक़ाब ओढ़ कर रात्रि भ्रमण,
अदृश्य रह कर भी देह प्राण तक का
अतिक्रमण, युग पुरुष हूँ मैं
मुझ पर हैं प्रभावहीन
सभी अभिशाप,
प्रेम और
युद्ध में है सात ख़ून माफ़।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 25 मार्च 2021

मुठ्ठीबन्द अमरत्व - -

दुःख को हर हाल में ख़ारिज़ करो,
जितना सीने से उसे जकड़ोगे
उतना ही वो, अंदर ही अंदर
जड़ें फैलाता जाएगा,
और कर जाएगा
सर्वनाश,
मुझे
ज्ञात है, दुःखों से बचना भी इतना
सहज नहीं, फिर भी अनुतापी
छद्मवेश से निकल कर,
पाप पुण्य के वृत्त
से बच कर,
ख़ुद में
भरो
आनंद प्रकाश, जो भी उपलब्ध
हैं जीवन के पल उन्हें समेटो
हथेलियों में, उछालो
उन्हें, सागर तट
में, उड़ा दो
हवाओं
में,
निरीह शिशु के रंगीन फुग्गों की
तरह, देखो ज़रा कितनी
हसरत भरी नज़र से
देख चला है तुम्हें
नीलाकाश,
आनंद
के
अंदर ही है सहस्र जीवन, आनंद के
अतल में है मृत्यु का वास, फिर
भी हे जीवन, तुम्हें छू लूँ
एक बार जी भर के,
फिर हो जाऊं
क्यों न,
कोई
पाषाण युगीन, विस्मृत इतिहास !

* *
- - शांतनु सान्याल 

बुधवार, 24 मार्च 2021

आत्म विभोर पल - -

रेत के लहरों में, कुछ वायु स्पर्श रह गए,
मरू सर्प की तरह रेंगते से हैं अहसास,
न जाने किस ओर मुड़ गए, वो
सभी रंगसाज़ रास्ते, उन
नागफणी के जंगल
में ढूंढता हूँ कुछ
केंचुली के
उतरन,
कुछ
अनमोल छद्मावरण तुम्हारे वास्ते, न -
जाने किस ओर मुड़ गए, वो सभी
रंगसाज़ रास्ते। वो विष था
या सत्य का पारदर्शी
प्याला, हलक से
आख़िर उतर
ही गया,
उस
मनुहार में है, शत जन्म निछावर, जो
भी हो अमर्त्य की परिभाषा, वो
अनंत प्रणय, बूंद की तरह
देह - प्राण में बिखर
ही गया, कौन
रखता है
याद,
ज़िन्दगी का हिसाब किताब, जब उठ
जाता है नक्षत्रों का महा समारोह,
अवाक से, देखते रह जाते हैं,
पृथ्वी के गुमाश्ते, न
जाने किस ओर
मुड़ गए, वो
सभी
रंगसाज़ रास्ते।

* *
- - शांतनु सान्याल   

 

मंगलवार, 23 मार्च 2021

जन्म स्थान - -

दृष्टि रेखा के समान्तराल, हर चीज़ है
वेगवान, उद्वेग व उच्छ्वास के
बहुत नीचे बहते हैं कहीं,
अनगिनत ख़ामोश
जलयान, उड़ते
हैं खुले वक्ष
के ऊपर
कुछ
मांसभक्षी परिंदे, ठीक उसके ऊपर हैं
कुछ प्रजातान्त्रिक विमान, दृष्टि
रेखा के समान्तराल, हर चीज़
है वेगवान। उस महीन
आंचल के नीचे
है मातृत्व
स्रोत,
और अंतहीन बियाबान, खण्डहर पार
बसते हैं कहीं, मौन लोरियों के  
जन्म स्थान, कुछ टूटे हुए
पुरातन मंदिर, बांस
वन, कुछ बूंद
रक्त के
सूखे
निशान, सुदूर सीमान्त पर उड़ रहे हैं
गिद्धों के झुण्ड, कोई दिखाए
कहाँ है, निर्मेघ नीलाभ
आसमान, कल भी
वही जंग लगी
प्रतिश्रुति,
आज
भी वो ले कर आए हैं, वही घिसी पिटी
अनुभूति, एक छाया जो अपने
गोद में लिए बैठी है, दूसरी
परछाई, छिंद का पेड़
और विषण्ण
शुक्र तारा,
सभी
हैं, जैसे जड़वत अपनी जगह, मेघ आ
कर गुज़र जाते हैं, रास्ते हो चले
हैं, निःशब्द अजगर की तरह
स्थिर व सुनसान, स्नेह
अंचल रोके रखता
है जीवन का
अवसान।
दृष्टि
रेखा के समान्तराल, हर चीज़ है वेगवान।
* *
- - शांतनु सान्याल   

 




सोमवार, 22 मार्च 2021

उसे कहीं देखा है - -

उठती हुई, हर एक मंज़िल में कहीं, उसे
देखा है, ढोते हुए सिर पर गारे का
घमेला, किसी और की थी वो
ख़्वाबों की सीढ़ियां, उसे
पाया है टिन की
टपरी में
बहुत
अकेला, रुकता नहीं है, किसी के लिए
ज़िन्दगी का मेला। सरसरी निगाह
से तुम बदलते जाओगे सभी
धूसर पृष्ठ, छूट जाएंगे
शब्द के जंगल में
कहीं यथार्थ
के दृश्य,
शून्य
पर कहीं ठहरा हुआ है काठ का हिंडोला,
उठ गया है सितारों का मीनाबाज़ार,
हमेशा की तरह दोनों हाथ हैं
ख़ाली, रहस्यमय हँसी
लिए, अरगनी से
झांकता है
नियति
का
फटेहाल झोला, शून्य पर कहीं ठहरा
हुआ है काठ का हिंडोला।

* *
- - शांतनु सान्याल
 


  

शनिवार, 20 मार्च 2021

डूबे हुए पहिए - -

उभरे हुए माटी के गर्भ में, कहीं सोते हैं
राख़रंगी सभी ख़्वाब, बुझ चुके हैं
एक मुद्दत से, हड्डियों के
ढांचे में कहीं वक्ष -
स्थल के
आग,  
रास्ते के उस पार, एक और है कच्चा -  
रास्ता जो खो जाता है थोड़ी दूर जा
कर अंधेरे में कहीं, उसी काई
भरे किराए के घर में
जलता है, एक
चालीस
वाट
का पीला बल्ब सारी रात, बुझ चुके हैं
एक मुद्दत से, हड्डियों के ढांचे में
कहीं वक्ष स्थल के आग। एक
प्याली चाय से उठता
हुआ ताज़गी
भरा वाष्प,
सामने
तुम्हारे खुला हुआ है जलरंग समाचार,
सिलवट भरी रात की चादर, सुबह
उठा कर जाता है झटक, छुप
जाते हैं सभी बिलों के
बहोत अंदर कुछ
महाकाय
मूस,
और कुछ विषाक्त सांप, एक प्याली -
चाय से उठता हुआ, ताज़गी भरा
वाष्प। बारिश में डूब जाता है
कच्चा आंगन, ईंटों के
ऊपर अंदाज़न,
गिरते और
संभलते
पांव
रखते हुए रात गुज़ारता है जीवन, हाथ
में लिए एक किलो कनकी, लौटता
है जुलूस से नेकलाल, रिक्शे
के आधे चक्के डूब चुके
हैं काले बदबूदार
पानी में,
पीठ
में उभर आया है समय का कुबड़, टाट
के दरवाज़े पर हैं उभरे हुए जीवन
संवाद, सभी जलरंग चित्र
धीरे धीरे मिट जाते
हैं, मौन हैं सभी
राजप्रांगण,
बारिश
में
डूब जाता है कच्चा आंगन, उलटे छाते
से खेलता है अनवरत श्रावण - -

* *
- - शांतनु सान्याल

 



शुक्रवार, 19 मार्च 2021

स्वस्फूर्त रचना - -

शब्द पहेलियों की तरह कभी ऊपर और
कभी नीचे, मिलन बिंदुओं में कहीं
उभर आते हैं, कुछ स्वस्फूर्त
इबारतें, जिनकी हम
अक्सर कल्पना
नहीं करते,
कुछ
लोग जीवन पथ में अचानक स्तम्भित
कर जाते हैं, रह जाती हैं, देर तक
ज़ेहन में उनकी असमाप्त
बातें, मिलन बिंदुओं
में कहीं उभर
आते हैं,
कुछ
स्वस्फूर्त इबारतें। कई बार बहुत कुछ -
समझ कर भी हम, नासमझी का
करते हैं भान, दरअसल, उन
पलों में हम सींचते हैं
झुलसे हुए, दिल
के बाग़ान,
बहोत
मुश्किल से बदलती हैं, ख़ुद को छलने
की आदतें, मिलन बिंदुओं में कहीं
उभर आते हैं, कुछ स्वस्फूर्त
इबारतें। इसी पुरातन
ग्रह के हम सभी
हैं एकात्म
प्राणी,
वही साझा बर्बर जीवन अभी तक है -
हमारे अन्तर्निहित, सिर्फ़ कोस
कोस बदलता जाए पोशाक
और वाणी, कुछ अंधेरे
के भूमिगत स्पृहा,
कुछ उजाले
की सभ्य
चाहतें,
मिलन बिंदुओं में कहीं उभर आते हैं, -
कुछ स्वस्फूर्त इबारतें।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
 

गुरुवार, 18 मार्च 2021

अंतहीन आखेट - -

बिम्बित चतुष्कोण से हम हट सकते हैं,
लेकिन भाग नहीं सकते, वो मौन
पीछा करते हैं अंतिम पहर
तक, हर एक चेहरे में है
कहीं एक अदृश्य
जंगल, दौड़
पड़ते हैं
हिंस्र
पशु की तरह, ग़र ज़रा भी कोई लड़खड़ा
गया, खेदते हुए ले जाएंगे वो सभी
गाढ़ अंधेरे से, रौशनी के शहर
तक, वो मौन पीछा करते
हैं अंतिम पहर तक।
उस सुनहरे
फ्रेम के
पीछे  
है आबाद मृगतृष्णा के मायावी प्रदेश, -
हर एक मोड़ पर लगेगा, हम ने बस
पा लिया है मंज़िल, छूट गए हैं
बहोत पीछे वेदना के सभी
अवशेष, लेकिन जैसा
सोचो वैसा नहीं
होता, लौट
आती है
वो
सभी अनसुनी सदा अपने घर तक, वो
मौन पीछा करते हैं अंतिम पहर
तक। चतुरंग दरी बिछी है
यथावत हमारे मध्य,
अनमोल माणभ
पासे बिखरे
पड़े हैं
हर तरफ बेतरतीब, अंतहीन स्तब्धता
में जीवन पाता है, गहन शून्यता
अपने क़रीब, तमाम रात
चलता है ऊपर नीचे
अंकों का खेल,
ढूंढता हूँ
मैं
उसे सघन कोहरे में कहीं, तारों के भीड़
से लेकर अंतर्मन के सिफ़र तक,  
वो मौन पीछा करते हैं
अंतिम पहर
तक।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

मंगलवार, 16 मार्च 2021

ज़रा ज़रा है याद बाक़ी - -

किसे ढूंढती हैं नज़रें, ये किस की कोहरे में,
ज़रा ज़रा है याद बाक़ी, कहाँ हम मिले
थे, कहाँ सब कुछ भूल आए, शाम
ए चिराग़ बुझने की थोड़ी सी
है मियाद बाक़ी, कोई
स्पर्श गंध है जो
अभी तक
तैरती
सी
इन हवाओं में, कुछ कांच के टुकड़े बिखरे -
पड़े हैं बालकनी के नीचे, शून्य
खिड़कियों में कहीं, हलकी
सी है बरसात बाक़ी,
किसे ढूंढती हैं
नज़रें, ये
किस
की
कोहरे में, ज़रा ज़रा है याद बाक़ी, नहीं - -
सिमटता है जीवन का नीला कैनवास,
जिसे जो उकेरना है उकेर जाए,
मेघ के सरकते ही फ़ीके
रह जाते हैं कुछ
अनुभूति,
कुछ
शब्द हथेलियों में हो जाते हैं निराकार जल
छवि, कितना भी फड़फड़ा लें अपने
सप्तरंगी डैने, उस अदृश्य
मोहपाश से अभी है
निजात बाक़ी,
किसे ढूंढती
हैं नज़रें,
ये
किस की कोहरे में, ज़रा ज़रा है याद बाक़ी।

* *
- - शांतनु सान्याल





रविवार, 14 मार्च 2021

फिरकी की तरह - -

 

कांटों का देह लिए सेमल की तरह हर हाल में
खिलती है ज़िन्दगी, बहोत लम्बा होता
है ख़्वाहिशों का मौसम, हर एक
चाहत के लिए फिरकी की
तरह बहोत ऊपर से
नीचे की ओर
घूमती सी
गिरती
है ज़िन्दगी, कांटों का देह लिए सेमल की तरह
हर हाल में खिलती है ज़िन्दगी। उपयोग
करें और फेंकें, ये ज़माना है त्वरित
इश्तेमाल का, टिकाऊपन की
परिभाषा बदल चुकी
है ज़माना हुआ,
कभी नम
पलकों
में बूंद बन कर, कभी फुटपाथों में तनहा रूह - -
सी भटकती है ज़िन्दगी, कांटों का देह
लिए सेमल की तरह हर हाल में
खिलती है ज़िन्दगी। सुख
की सूचि समेटे मन
पाखी, देखता
है नील -
नभ
को, स्वर्ण पिंजर का कपाट लेकिन नहीं खुलता,
सिर्फ़ उँगलियों के शीर्ष छू कर गुज़र जाते
हैं सजल सपनों के मेघ, आकाश पथ
के सफ़र में, कोई किसी के लिए
नहीं रुकता, सांध्य प्रदीप
की तरह सिहरित,
कभी जलती
और कभी
बुझती
सी है
ज़िन्दगी, कांटों का देह लिए सेमल की तरह - -
हर हाल में खिलती है ज़िन्दगी।

* *
- - शांतनु सान्याल













 

शनिवार, 13 मार्च 2021

सहरा की सदा - -

हर सू है ख़मोशी, इक परिंदा ए शब
का है रतजगा, उतरती है चांदनी,
यूँ सांसों के किनारे रफ़्ता
रफ़्ता, बदलते हैं
तख़्त ओ
ताज,
दुनिया के रस्मो रिवाज, बदलती -
नहीं है हज़ार कांटों में मुहोब्बत
की फ़िज़ा, इस रास्ते से
निकलते हैं, बहोत
सारे कोहरे के
ग़ार, कुछ
गूँज
बन के लौटे, कुछ राह में हो गए
लापता, ये ज़रूरी नहीं कि
हर एक का ताउम्र
बावफ़ा होना,
कभी
कभी सितारे भी भूल जाते हैं, - -
डूबने का पता, फ़ैज़ ए
नूर की मजलिस
होती है सिर्फ़
इक रात
की,
क़ब्ल सुबह कुछ भी नहीं रहता -
सूखे पत्तों के सिवा, कौन
किस के लिए है वफ़ादार
कहना नहीं आसान,
नज़र से दूर
होते ही,
सभी
रिश्ते हैं सहरा की सदा।

* *
- - शांतनु सान्याल

   















शुक्रवार, 12 मार्च 2021

रेत का शहर - -

वक़्त के साथ उतर जाते हैं सभी जश्न के
लहर, वो शख़्स था दिल के बहुत ही
क़रीब, कहने को शिकायतें
उससे कम न थी, मुड़
के काश देखता वो
इक नज़र,
दिल
में हमारी मुहोब्बतें कम न थी, म'यार ए
वफ़ा फिर भी रह गई बेअसर, वक़्त
के साथ उतर जाते हैं सभी जश्न
के लहर। वो नज़दीक आया
तो दिल में चाहतें न
रही, दूर जाते
ही जीस्त
में बढ़
गयीं
ज़रूरतें बहुत, कुछ ज़माने ने छिना, कुछ
तक़दीर का था तक़ाज़ा, यूँ तो कहने
को थीं हसरतें बहुत, अब है इक
ख़ामोश सा, रेत का शहर,
सीने के बहुत अंदर,
वक़्त के साथ,
उतर जाते
हैं सभी
जश्न के लहर।

- - शांतनु सान्याल










गुरुवार, 11 मार्च 2021

अदृश्य सुराख़ - -

न जाने कितनी बार झुलसी
हुई रातें गुज़री, बंजर
ज़मीं से हो कर
बूंदों की
बरसातें गुज़री, इक तिश्नगी
जो रूह को बियाबां करता
रहा, कहने को
आसमां से
तारों
की बारातें गुज़री, ज़ंजीर की
सदा थी वो या सांसों का
गुज़रना, कोई क्या
जाने, हम पर
कैसी
हालातें गुज़री, वक़्त के निशां
हैं, अभी तक उस बूढ़े
पीठ पर, बारहा
उस सीने
के पार
अपनों की घातें गुज़री, बेतरतीब
ज़िन्दगी कभी मुहासिब
न बन सकी, जलसा
ए नूर अक्सर
मुझे, मुंह
चिढ़ाते गुज़री, अदृश्य सुराख़
वाला वजूद कभी नहीं
ठहरता, बेलगाम
दरिया मुझ
से हो
कर इठलाते गुज़री।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

 
       
 
















बुधवार, 10 मार्च 2021

अक्स अदाकारी - -

अपने पंख खोले बिना कोई
कैसे उड़ान देखेगा, ख़ुद
में बंद हो कर, कोई
कैसे आसमान
देखेगा,  
चार
दीवार तक सिमट कर रह
न जाए ज़िन्दगी, ख़ुद
से बाहर निकलो,
तभी सारा
जहान
देखेगा, तुम्हारे अंदर की -
ख़ूबसूरती से, किसे
क्या लेना, चेहरे
की नक़ली
रंगत
को हर एक इंसान देखेगा,
मा'शरा कभी जिस की
बातों पर यक़ीं
करता था,
वक़्त
बदलते ही, उसी शख़्स -
की ज़बान देखेगा,
काज़ी ए शहर
है, दुनिया
में मा'रूफ़

मशहूर, सब से पहले -
तुम्हारी,जात ओ
ख़ानदान
देखेगा,
उन
सभी चेहरों में कहीं छुपे
हैं, अक्स अदाकारी,
ज़माना बहुत
ख़ुश होगा
जब
तुम्हें परेशान देखेगा - -

* *
- - शांतनु सान्याल



 
 

 



मंगलवार, 9 मार्च 2021

भासमान वर्णमाला - -

पत्थर के साथ बाँध कर भी, ग़र
डुबो आओ, किसी अगाध
जल में, अनुभूतियों
के पाण्डुलिपि,
हर हाल में
आते हैं
उभर, उसके चेहरे में था लिखा -
जीवन का सारांश, उसके
आँखों की गहराइयों
में थे, तैरते हुए
शब्दों के
तिनके,
वो मेरा ही बिम्ब था जिसे ढूंढा
किया उम्रभर, अनुभूतियों
के पाण्डुलिपि, हर हाल
में आते हैं उभर।
वो अधजला
अभिमान
ही था
यातना भार, हर कोई जानता है
दूरत्व विधि का ज्ञान, क्यों
कर बनता कोई, मेरे दर्द
का भागीदार, अपना
जिसे सोचता रहा
वो कभी न
था मेरा
अपना घर, वो मेरा ही बिम्ब था
जिसे ढूंढा किया उम्रभर।   
एक संदूक प्रेम हो
या वटवृक्ष के
नीचे का
ध्वंस -
स्तूप, झर जाते हैं सभी एक दिन
जैसे हेमवर्ण कृष्णचूड़, झीं झीं
शब्दों में कहीं घुल जाती
है चाँदनी, कंटक वन
की ओर बढ़
जाते हैं
तब
दीर्घ निःश्वास, रात बढ़ती जाती
है निरंतर, हिय से तब लेते
हैं जन्म, अपरिभाषित
अक्षर - -

* *
- - शांतनु सान्याल



सोमवार, 8 मार्च 2021

तैरता हुआ उम्मीद - -

सीमाहीन नीरवता में कहीं गुम है
अश्वमेध का घोड़ा, यज्ञ के
अंगार कब से हो चुके
राख, निःशब्द हैं
सभी विजय
शंख -
ध्वनि, पताकाओं के रंग हो चुके -
हैं धूसर, दिग्विजय की चाह
ने उजाड़ दी है आबाद
जनपद, ज़मीन
भी हो
चले हैं ऊसर, मृत पड़े बीजों को - -
चाहिए विलुप्त संजीवनी,
निःशब्द हैं सभी
विजय शंख -
ध्वनि।
श्रृंखलों में आबद्ध हैं सभी तारीख़
और सन, ढोना पड़ेगा इस
ऋण को आजीवन, न
जाने वो कौन सी
रूपकथाओं
की बात
करते
हैं, यहाँ हर पल जीने की चाह -  
में हम मरते हैं, न शुक्र है
मेहरबां न ही दयावान
कोई शनि, निःशब्द
हैं सभी विजय
शंख ध्वनि।
वृक्ष भी
वही,
फूल भी चिरंतन, लेकिन फल -
नहीं हो पाते पूर्णांग, जलते
ही बुझ जाते हैं सभी
प्रदीप शिखा, फिर
भी न जाने
कौन
है जो अंधकार के माथे लगा जाता
है चाँद का टीका, लगा जाता
है शेष प्रहर, क्षितिज के
किनारे उजालों से
भरी आशा की
तरणि,
निःशब्द हैं सभी विजय शंख ध्वनि।  

* *
- - शांतनु सान्याल

रविवार, 7 मार्च 2021

अविरत बहाव - -

बात थी दूर तक, नदी के हमराह बहते
जाना, बिना रुके, बिना थके, अनंत
स्रोत में, देह - प्राण को प्लावित
करना, लेकिन सहज
कहाँ, हर एक
सोच के
अनुकूल जीवन गुज़ारना, बात थी दूर
तक, नदी के हमराह बहते जाना।
नदी के दोनों तटबंधों की
है, अपनी ही अलग
कहानी, कुछ  
घाटों में
थे, सजे हुए मंदिर के दीप स्तम्भ -  
कुछ किनारों से उठता हुआ
धुआं आकाशमुखी,
जीवन को है
हर हाल
में थोड़ा रुकना, थोड़ा चलते जाना,
बात थी दूर तक, नदी के हमराह
बहते जाना। बात थी नदी
के अनुप्रवाह में खो
जाना, जैसे
सभी
रास्ते, अंततः किसी एक बिंदु में आ
कर, लहरों की तरह एक दूजे में
समा जाते हैं, बात थी सभी
विषमताओं को मिल
के लांघना, और
मुहाने की
ओर
बढ़ते जाना, बात थी दूर तक, नदी के
हमराह बहते जाना। समय हो, या
नदी दोनों बात नहीं रखते,
निःशब्द अपने तटों
को बदल जाते
हैं, बात
थी
हमारे मध्य होगा सांसों का सेतु बंधन,
बहुत कुछ तुम ने था कहा, बहुत
कुछ मैंने भी उसमें था जोड़ा,
उत्तरोत्तर वो सभी
बातें, गोखुर -
झील
की
तरह, एक मोड़ पर आ कर सिमट गई,
अब दोनों छोर पर है कोई रेतीला
साम्राज्य, फिर भी सीने के
अंदर कहीं, आज भी हैं
मौजूद, कुछ गीली
मिट्टी के सुरंग -
पथ, बस
इन्हीं  
एहसासों के साथ, ज़िन्दगी को है साहिल
तक निकलते जाना, बात थी
दूर तक, नदी के हमराह
बहते जाना।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
 


  

शनिवार, 6 मार्च 2021

अंदर का कैनवास - -

कोई कितना भी चढ़ा ले रंग जाफ़रानी,
अदृश्य वहशीपन को रंगना नहीं
है सरल, वो सभी आदिम
पल जो हम गुज़ार
आए, दुनिया
की सोच
जो भी
हो,
अपनी नज़र से बचना है बहुत विरल,
अदृश्य वहशीपन को रंगना नहीं है
सरल। आख़री प्रहर तक वो
जागता है, मेरे शरीर के
बहुत अंदर, निर्वस्त्र
मेरा अस्तित्व
समेटता है
ख़ुद को
ख़ुद
से बाहर, रात जाते जाते, गिरा जाती
है सभी रेत के महल, अदृश्य
वहशीपन को रंगना नहीं
है सरल। सुबह से
पहले उतर
जाती हैं
सभी
पूरबेला, सुदूर क्षितिज में कहीं होता
है नीलाकाश तब बहुत ही अकेला,
सागर सैकत में प्रथम किरण
ढूंढते हैं मुक्तामणि,
टूटे हुए सीपों
के बिखरे
हुए
खोल, नहीं दे पाते गुमशुदा मोतियों
के ठिकाने, कुछ पहेलियों का
नहीं होता है शाब्दिक हल,
अदृश्य वहशीपन को
रंगना नहीं है
सरल।

* *
- - शांतनु सान्याल

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

असमाप्त यात्रा - -

स्मृतियों के भित्ति चित्र, धीरे धीरे घुप्प
अंधेरे में कहीं खो जाएंगे, रह जाएंगी
शेष, कुछ अनुभूति की उड़ती हुई
चिंगारियां, सभी विष
अपने आप एक
दिन हो
जाएंगे निस्तेज, सुख दुःख हो जाएंगे - -
जब एकाकार, भय मुक्त ह्रदय
को मिल जाएगी उस पल
कल्पतरु की परछाइयां,
रह जाएंगी शेष,
कुछ अनुभूति
की उड़ती
हुई
चिंगारियां। उन कोहरे की वादियों में, -
कोई भी न साथ होगा, कुछ दूर
तक आ कर, कहीं और बरस
जाएंगे मोह के बादल, न
कोई पास, न ही कोई
दूर तक आएगा
नज़र, शब्द
सहसा  
हो
जाएंगे मौन, लम्हा - लम्हा दूर होते - -
चली जाएंगी, अंतर की सभी
परेशानियां, रह जाएंगी
शेष, कुछ अनुभूति
की उड़ती हुई
चिंगारियां।
बर्फ़ की
उस
गतिहीन नदी के नीचे रह जाएंगे नेह
के जीवाश्म, कुछ अर्धांकुरित
रिश्तों के बीज, कुछ
चाहतों की अंध
मछलियां,
सृष्टि
का
निर्माण चक्र निरंतर है चलायमान - -
बर्फ़ पिघलते ही जाग उठेंगे
यथारीति सभी प्रसुप्त
तन्हाइयां, रह
जाएंगी शेष,
कुछ
अनुभूति की उड़ती हुई चिंगारियां। - -

- - शांतनु सान्याल  
 
 
    












गुरुवार, 4 मार्च 2021

जंग खाए हुए शब्द - -

सभी चरित्र थे परिकल्पित, उस पार
से सभी दृश्य एक ही थे, क्या  
बिहान की उर्वर भूमि और
क्या अस्ताचल के
मरू प्रांतर,
सत्य
को उजागर करने के लिए हाथ बढ़ा
कर मुखौटों को उतारो तो जाने,
अख़बारों के मुख पृष्ठों
में जो रहते हैं हर
रोज़ मौजूद,
दिखाते
हैं
ख़्वाबों के झूठे बॉयोस्कोप, किसी -
दिन उन्हें नंगे पांव, बंजर
ज़मीं पे उतारो तो
जाने, सत्य
को
उजागर करने के लिए हाथ बढ़ा कर
मुखौटों को उतारो तो जाने।
वो सभी चेहरे जो ख़ुद
को पथ प्रदर्शक
कहा करते
थे उन्हें
अक्सर अंधी गलियों में टहलते हुए
है देखा, सब मिथ्या, सब कुछ
सजाए हुए रंगमंच थे,
भांडों की तरह
सभी चहेरों
को,
रंगीन परदों के पीछे उछलते हुए है
देखा, उनके जिस्म पर असली
पैरहन उभारो तो जाने,
किसी दिन उन्हें
नंगे पांव,
बंजर
ज़मीं पे उतारो तो जाने। दरअसल -
कुछ पीठ हो जाते हैं चाबुक के
अभ्यस्त, और कुछ मुट्ठी
वक़्त के साथ बहुत
ही सख़्त, फिर
भी जंग
लगे
शब्दों को सान पत्थर से निखारो तो
जाने, सत्य को उजागर करने के
लिए हाथ बढ़ा कर मुखौटों
को उतारो तो
जाने।

* *
- - शांतनु सान्याल

बुधवार, 3 मार्च 2021

अपनी तरह से - -

जो जहाँ भी हों, अपनी तरह से हर हाल
में सुख को गढ़ें, ज़रूरी नहीं हर एक
ख़्वाब को आकार मिले, अशांत
पृथ्वी का आवर्तन खोजता
है, अंधकार रातों में
एक शांति
स्तूप,
हज़ार मूक क्रंदन के मध्य छुपी रहती -
है निरीह सुबह की धूप। जो जहाँ
भी रहें, अपनी तरह से जीवन
को रचें, ज़रूरी नहीं हर
पत्थर का पारस
होना, फिर भी
कोशिश
हो,
किसी को अनजाने में कोई चोट न
लगे, बहुत कठिन है दिलों को
जीतना, उम्र भर पढ़ने के
बाद भी, ये किताब
रहती है अबूझ,
तारों की
भीड़
में
कब कौन कहाँ, निःशब्द टपक पड़े
किसे ख़बर, अभी तो जी लें
अपनी तरह, आकाश
पार
 उमड़ रहा है
उजाले का
जुलूस।
अशांत पृथ्वी का आवर्तन खोजता
है, अंधकार रातों में
एक शांति
स्तूप - -

* *
- - शांतनु सान्याल







मंगलवार, 2 मार्च 2021

आलोक वर्षों के बाद - -

न जाने कितने आलोक वर्ष पार हुए,
तब जा के कहीं, मैंने तुम्हें है
पाया, न जाने कितने
जन्म - जन्मांतर
के बाद नियति
ने हमें
फिर से है मिलाया, रहने दो खड़े -
अतीत के ठूंठ अपनी जगह,
अर्ध निमग्न पेड़ों की
तरह ऊर्ध्वमुखी,
हर कोई
होना
चाहे इस दुनिया में ज़रा सा सुखी,
तुम्हारे नेह स्पर्श ने ही, उजाड़
धरा के बीच कोमल पुष्प
है खिलाया, न जाने
कितने जन्म -
जन्मांतर
के बाद
 नियति ने हमें फिर से है मिलाया।
महाकाश के उस छाया पथ में,
जहाँ बहते हैं, अविरल
आलोक स्रोत,
उसी तट
पर
कहीं मिले हैं हम परस्पर जिस तरह
से मिलते हों, ज्योत से अनंत
ज्योत, उसी मिलन बिंदु
में कहीं हमने, युगल
कंठों से प्रणय
गीत है
गाया,
न जाने कितने जन्म - जन्मांतर - -
के बाद नियति ने हमें फिर
से है मिलाया।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
 
 



सोमवार, 1 मार्च 2021

शाम से पहले - -

सूखते किनार, एक बारीक से धार,
सुदूर है सजल पारापार, पत्थरों
के मध्य कहीं खो गए हैं
हमारे पैरों के छाप,
अधझरे कुछ
पलाश,
लौटने को है बस कुछ ही दिनों में
मधुमास, अभी तक हैं उभरे
हुए दरख़्त के तनों में
कुछ नाम, करते
हैं बयां बहुत
कुछ यूँ
ही
चुपचाप, पत्थरों के मध्य कहीं खो
गए हैं हमारे पैरों के छाप। न
जाने किसे पुकारता हुआ
उड़ चला है टिटहरी
एक तनहा, या
दे गया हो
हमें
विलुप्त नदी का पता, काश जान
पाते उसकी ज़बां, कुछ श्वेत
मेघ उतर चले हैं संकीर्ण
सरोवर के कगार,
सुदूर अरण्य
सीमान्त
की
ओर उड़ चले हैं सारस युगल, - -
कुछ अनुराग के कण
झिलमिला चले
हैं तुम्हारे
आँखों
की
गहराइयों में, फिर डूब चले हैं हम
न जाने कहाँ अपने आप,
पत्थरों के मध्य कहीं
खो गए हैं हमारे
पैरों के
छाप।

* *
- - शांतनु सान्याल



 
 
 

 

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