शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

तारुफ़ नामा - -

मुड़ कर भी उसने देखा नहीं इक बार,
मुन्तज़िर रही मेरी आँखें, यूँ तो
उम्र भर, कि फिर दोबारा
बस न पायी उजड़ी
हुई दिल की
दुनिया,
कहने को यूँ तो दस्तक आते रहे बहार
के, अपने ही घर में रहे गुमसुम
किसी मुहाजिर की तरह,
कि उनसे बिछड़
कर, वाक़िफ़
आईना भी मुझसे पूछता रहा तारुफ़ -
नामा ! कैसे बताएं उसको कि
अब हमें ख़ुद का चेहरा
भी याद नहीं - -

* *
- शांतनु सान्याल

 

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wild rose

उड़ते बादलों का साया - -

उड़ते बादलों का साया है वो कोई, -
या मृगजल का साकार होना,
न कोई आहट, न ही
निशानदेही,
बहोत
ही ख़तरनाक था, उस इक नज़र का
यूँ ख़मोश, जिगर के पार होना !
वो तमाम जादू - टोने, या थे
निगाहों के खिलौने !
कहना है बहोत
मुश्किल,
किसी हसीं क़ातिल का यूँ खुल के -
तलबगार होना, न जाने क्या
राज़ ए कशिश है, उसके
नाज़ुक ओंठों के
आसपास,
क्यूँ न चाहे दिल, क़ुर्बान उसपे, एक
नहीं हज़ार बार होना - -

* *
- शांतनु सान्याल


 

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गुरुवार, 23 अक्तूबर 2014

चाँद तारों की महफ़िल - -

 जब उठी रात ढलते, चाँद तारों की
महफ़िल, जब झरे शाख़ों से
आख़री गुल ए शबाना,
तब तलक जलते
रहे दिल में
नूर अज़
दरिया के मानिंद, इश्क़ ए फ़ानूस,
न पूछ ऐ दोस्त, कैसे गुज़रे
वो महलक लम्हात !
हर सांस में हो
गोया इक
नया अहसास ए ज़िन्दगी, हर इक
नज़र को हो जैसे सदियों की
प्यास ! ये सच है कि
तुम न थे कल
रात यूँ तो
मेरे साथ, फिर भी न जाने क्यूँ, यूँ
लगता है तुम, ज़रूर थे मेरे
आसपास चाँदनी में
तहलील, जब
उठी रात
ढलते, चाँद तारों की महफ़िल - - -

* *
- शांतनु सान्याल


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शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

ख़ूबसूरत वजह - -

बहोत मुश्किल है ज़िन्दगी में,
मन माफ़िक़ चीज़ का
मय्यसर होना,
ज़मीं ओ
आसमां उम्र भर मिलते नहीं,
फिर भी, इक अहसास
रखती है ज़िंदा
उफ़क़ की
लकीर
को, कि तू ख़्वाब ही सही फिर
भी है, इक ख़ूबसूरत वजह !
ज़िन्दगी जीने के लिए,
लहूलुहान है जिस्म
मेरा, तो क्या
हुआ,
रूह की कोई इंतहा नहीं कि -
डूबती सांसों को भी होती
है आख़री लम्हे
तक, उभरते
किनारों
की ख़्वाहिश, ये दीगर बात है
कि फ़रेब ए क़िस्मत
मेहरबां न हो !

* *
- शांतनु सान्याल

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रविवार, 5 अक्तूबर 2014

कोहरे में कहीं - -

वो बार बार यक़ीं दिलाता है मुझे,
कि उसके और मेरे दरमियां
अभी तक है, कुछ न
कुछ बाक़ी !
जबकि
ज़माना हुआ उसकी दी हुई, वो -
ख़ूबसूरत रेशमी रुमाल
गुमाए हुए, कि
वो इक
मीठा अहसास है कोई, या टीस
ऊँगली की नोक का, इक
सिहरन सी होती
है जब कभी
खिलते
हैं, गुलाब नज़र के सामने, फिर
भी काँटों की है, अपनी ही
ख़ूबसूरती, ख़ामोश
करते हैं बयां,
की इक
दूरी बहोत है ज़रूरी, हद पार - -
करने से पहले।

* *
- शांतनु सान्याल
 
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