Thursday, 23 August 2018

मुक्ति स्नान - -

सभी रंग थे फीके, सभी अक्स अधूरे,
उस छुअन में था न जाने कैसा
जादू, इक बार जो तन से
लगा, उम्र भर न मन
से छूटे। बग़ैर
लब  छुए
वो
हलक़ के पार हुआ, हाँ जान बूझ कर
ही मैंने विषपान किया। अब सभी
जीवन मरण के पैमाने लगे
बहोत हलके, निगाहों
में दूर तक सिर्फ़
उसी का
नूर है
झलके, मैंने अपने आप ही सभी दुःख -
दर्द का अवसान किया। न जाने
किसने कहा था कि मोक्ष
मिलता है नदियों के
किनारे, मैंने
अपने
भीतर जा कर बारहा मुक्ति स्नान किया।

* *
- शांतनु सान्याल

Wednesday, 22 August 2018

उम्र भर - -

कुछ एहसास होते हैं सोंधी ख़ुश्बू
की तरह मिटते नहीं उम्र भर,
अगरचे बारिश आती
जाती रही मौसमी
हवाओं के
साथ
 अक्सर, कुछ मोह सूत  होते हैं
अमरबेल की तरह, सिमटते
नहीं उम्र भर। कौन सा
अहद था जो दिल
से उतर कर
रूह तक
दख़ल
कर गया, इस मोम के दहन हैं - -
अनंत, ये हर हाल में पिघलते
नहीं उम्र भर। पिंजरे
की नियति में है
शून्यता,चाहे
मायावी
तंतु से कसो जितना, सीने के कुछ
अदृश्य अनल हैं चिरकालीन,
सुलगते नहीं उम्र भर।
इस जीवन
उत्सव
का,
अपना ही है अलग आलोकमय - - -
शामियाना, उभरते टूटते
तारों की रौशनी ग़र
खो जाएं तो
मिलते
नहीं
उम्र भर।

* *
- शांतनु सान्याल 




 

Sunday, 5 August 2018

जाने कौन है वो - -

एक दिन अचानक गुलाब की -
तरह खिले बिहान ! हर
चेहरे पर हो ताज़गी
और जीने का
इत्मीनान।
एक
सुबह हो यूँ दुआओं वाली शबनम
से तरबतर, आईना छुपा ले
अपने सीने में झुर्रियों के
निशान। कौतूहल
मेरा फिर ढूंढ
लाए वो
 गुमशुदा लड़कपन, दरवाज़ा
खोलते ही नज़र आए
सपनों की दूकान।
दौड़ा ले जाए
मुझे,
फिर किसी फेरीवाले की पुकार,
ख़रीद लाऊँ कोई मीठा
अहसास,छोटे
मोटे सामान।
मीठी
झिड़कियां सुने हुए यूँ तो एक
उम्र गुज़र गई, वही मासूम
नादानियाँ फिर सर पे
उठाए आसमान।
इतनी भी
दूरी
ठीक नहीं ये सच है कि मशीन
 हैं सभी, किसी बहाने ही
सही ग़लत नहीं
रखनी जान
पहचान।
अगरचे वक़्त की बेरहमी ने - -
मुझे कहीं का न छोड़ा,
न जाने कौन है
जो अक्सर
मुश्किल
कर
जाए आसान।
* *
- शांतनु सान्याल 

Saturday, 4 August 2018

मेरे घर का पता - -

लज्जित था दर्पण जब -
मुखौटे उतरने लगे,
उस महासभा
में थे
सभी मस्तक झुके हुए, -
घावों के निशान
जब देह से
यूँ उभरने
लगे।
दोहराते रहे मन्त्र, ''मातृ - -
रूपेण संस्थिता '' की,
नमस्तस्यै के
पूर्व, छद्म
पलस्तर उखड़ने लगे। - - -
रहस्य कूपों के जाल
 से हैं सभी आश्रय
स्थल, कहाँ
जाएं
लोग जब रक्षक ही निगलने
लगे। यूँ तो बात थी हर
एक चेहरे पे हंसी
लौटने की,
दांत
भी नहीं निकले और वो विष
उगलने लगे। तथाकथित
मानव तालिका में
नाम मेरा भी
हो, डर
सा
लगता है जब पड़ौसी बेवजह
घूरने लगे। मालूम है
अच्छी तरह
तुम्हारे
न आने की वजह, अब तो ख़ुद
हम भी अपने घर का पता
भूलने लगे।   

* *
- शांतनु सान्याल   
 

Friday, 3 August 2018

इस तरफ से - -

इस राजपथ से कभी,
पाँव बंधे ज़ंजीर
लिए गुज़रो
तो जाने,
हर
एक भीड़ में कहीं - - -
भटकती है
मेरी
ही
गुमशुदा परछाई, - - -
झुलसे हुए
चेहरों
की
ज़मीं पे, नंगे पाँव - -
कभी ठहरो तो
माने। न
जाने
कौन है जो अभिशाप
दे गया मेरे पुरसुकूं 
शहर को, कभी
इन वीरान
बस्तियों
के दरमियान हो के -
गुज़रो तो जाने।
एक मुद्दत
से आस
लगाए, लोग बैठे हैं -
खंडित घाट के
किनारे,
आसमानी कश्ती से,
अंधकारमय
गली
कूचों पे उतरो तो माने।

* *
- शांतनु सान्याल

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