Saturday, 4 August 2018

मेरे घर का पता - -

लज्जित था दर्पण जब -
मुखौटे उतरने लगे,
उस महासभा
में थे
सभी मस्तक झुके हुए, -
घावों के निशान
जब देह से
यूँ उभरने
लगे।
दोहराते रहे मन्त्र, ''मातृ - -
रूपेण संस्थिता '' की,
नमस्तस्यै के
पूर्व, छद्म
पलस्तर उखड़ने लगे। - - -
रहस्य कूपों के जाल
 से हैं सभी आश्रय
स्थल, कहाँ
जाएं
लोग जब रक्षक ही निगलने
लगे। यूँ तो बात थी हर
एक चेहरे पे हंसी
लौटने की,
दांत
भी नहीं निकले और वो विष
उगलने लगे। तथाकथित
मानव तालिका में
नाम मेरा भी
हो, डर
सा
लगता है जब पड़ौसी बेवजह
घूरने लगे। मालूम है
अच्छी तरह
तुम्हारे
न आने की वजह, अब तो ख़ुद
हम भी अपने घर का पता
भूलने लगे।   

* *
- शांतनु सान्याल   
 

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