रविवार, 31 जनवरी 2021

उम्मीद के मेहराब - -

वो सभी शामे चिराग़, भटके
हुए रहनुमा निकले, बुझ
गए उम्मीद से पहले,
बड़े ही बदगुमां
निकले,
ज़ीस्त से कहीं लम्बे थे, ज़ेरे
नफ़स चाहतों के सुरंग,
परछाइयों की तरह
अंधेरे में सभी
नाआश्ना
निकले,
यूँ तो कई बार, दौड़ कर - -
दहलीज़ से लौटी है
ज़िन्दगी, चेहरा
कहता रहा
बारहा,
अक्स लेकिन बेसदा निकले,
सभी बाज़गश्त वादियों
से टकरा कर बिखरते
गए, तन्हा रहा
मुसाफ़िर,
उम्र
भर के अहद बेवफ़ा निकले, -
मन्नतों के मेहराब में,
इक गुलाब हमने
भी है रक्खा,
उजालों
का
पता न मिला, उस गली से
कई दफ़ा निकले।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

 
 
 
 

शनिवार, 30 जनवरी 2021

देख के अनजान - -

गुज़रो यहाँ से यूँ जैसे सब
कुछ देख के, कुछ भी
देखा नहीं, सत्य
सुन्दर है
बहुत,
लेकिन उसमें छुपा है विष
का प्याला, ज़रा सा
ऐतराज़ पलक
झपकते
तुम्हें
सुक़रात बना जाएगा, ये
वही तमाशबीन हैं
जो, इंद्रप्रस्थ के
अट्टहास में
थे मौजूद,
ये वही
खिलाड़ी हैं, जो बिछाते हैं
साज़िशों की रंगीन
बिसात, यही
साफ़गोई
इक दिन, दम घुटने के
हालात बना जाएगा,
ज़रा सा ऐतराज़
पलक झपकते
तुम्हें
सुक़रात बना जाएगा,
असली नक़ली सब
एक समान,
झिलमिल
उतरन
का बाज़ार,
कोई आए छुपके, कोई
रूप बदल के, लेकिन
सब हैं ख़रीददार,
चेहरों में हैं
रंग
बदलती परतें, मौक़ा
मिलते घात बना
जाएगा, यही
साफ़गोई
इक
दिन, दम घुटने के - -
हालात बना
जाएगा।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

श्वास विनिमय - -

रेशमी कोशों के मध्य चलता रहता
है निःशब्द जीवन का रूपांतरण,
विशाल वृक्ष हों या कोई
सूक्ष्म खरपतवार,
हर एक पल
में होता
है
कहीं न कहीं जीवन का अवतरण -
निःशब्द जीवन का रूपांतरण।
उन भू गर्भस्थ क्षणों में,
चलते हैं दीर्घ सांसों
के विनिमय,
सोखते
हैं
आवेग बीज, शीतोष्ण अनुभूति तब
जा कर कहीं होते हैं, प्राणों का
अंकुरण, निःशब्द जीवन
का रूपांतरण। युग -
युगान्तरों से
है ये चक्र
सदा
गतिशील, कितनी सभ्यताएं बसी -
और उजड़ी भी, नील नद से ले
कर तुंगभद्रा तक, शहर के
अट्टालिकाओं से ले
कर पर्ण कुटीर 
तक, वही
अनंत
पथ
के सभी यात्री, दौड़ते हुए कभी सहज
उतराई, और कभी दीर्घ निःश्वास,
आग्नेय चट्टानों का आरोहण,
निःशब्द जीवन का
रूपांतरण।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

शून्य स्तूप - -

एक से बढ़ एक ख़ूबसूरत -
हवेलियों का है ये
शहर, झूलते
बरामदों
में खेलते हैं, धूप छाँव के -
मंज़र, ठहर लूँ घड़ी
भर कहीं, ऐसा
कोई सायबाँ
न मिला,
जिसका जितना दामन  - -
था, उतना ही धूप
समाया, यक्ष
का संदूक
रिक्त
था,
भाग्य में शून्य स्तूप आया,
बदल दे हाथ के लकीरों
को, ऐसा कोई
मेहरबाँ न
मिला,
ज़िन्दगी जीने के लिए, सभी
दौड़े जा रहे हैं बेतहाशा,
नए दिन के साथ
नए षड्यंत्र,
वही
मंसूबों का तमाशा, बातचीत
ताउम्र चली, फिर भी
कोई हमज़बाँ
न मिला,
सुना
था मिलता है दिल को बड़ा
सुकूं उसके साए में,
लिहाज़ा हम
तलाशते
रहे उम्र
भर
उस दरख़्त का पता, जिसका
अक्स उतर आए दिल में
वो आसमाँ न
मिला।

* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

 

















 

बुधवार, 27 जनवरी 2021

सम्मोह का दर्पण - -

ज़िन्दगी कोई तयशुदा निसाब नहीं,  
हर क़दम पे थीं इम्तहां की
सीढ़ियां, हर मोड़ पे थे
कई घुमावदार
वादियां,
मिलने बिछड़ने का कोई हिसाब नहीं,
गुलमोहर की शाख़ों पे कहीं
लिखा रहता है, गुमशुदा
बहार का ठिकाना,
कायाकल्प
होने की
यूँ तो कोई किताब नहीं, सभी लिए
फिरते हैं, अपने अपने हाथों
में सम्मोह का दर्पण,
लेकिन ख़ुद के
प्रतिबिम्बों
का उन्हें
पता नहीं, दूसरों को देते हैं उपदेश,
स्व - प्रश्नों का जिनके पास
कोई भी जवाब नहीं, ये
वही शाही मजलिस
है जहां युगों से
तौहीन किए
जाते हैं
इंसाफ़ के निगहबाँ, इस धधकती
हुई आग को जो बुझा सके
ऐसा कोई हयातबख़्श
इन्क़लाब नहीं,
न जाने
कहाँ
दौड़े जा रहे सभी कुम्हलाए चेहरे, -
सुदूर नील दिगंत में फिर डूब
गया आज नाउम्मीद का
एक दिन, ज़िन्दगी के
पास समझौतों
के सिवा
कुछ
बचा नहीं, वक़्त के बटुए में अब नया
कोई और ख़्वाब नहीं।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
   
 







मंगलवार, 26 जनवरी 2021

दूसरे किनारे कहीं - -

कुछ अलग से जीने की हसरत
लिए बैठा हूँ, ख़ाली हाथों
में एक बूंद मसर्रत
लिए बैठा हूँ,
अब मुड़
के
देखें तो किसे, हदे नज़र है अंधेरा,
सीने में कहीं उजालों के
जीनत लिए बैठा हूँ,
वक़्त बदल देता
है ज़िन्दगी
के सभी
नक़्शे,
उजड़े अल्बम का कोई वसीयत
लिए बैठा हूँ, न जाने कहाँ
गए शतरंज के वो
लाव लश्कर,
टूटे हुए
शीशों
का कोई सल्तनत लिए बैठा हूँ,
अहाते में हूँ एक मुश्त
गुनगुने धूप की
तरह, मालूम
नहीं
रास्ता, बस हिजरत लिए बैठा
हूँ, दूर तक है नीला समंदर,
खुला हुआ बंदरगाह,
उफ़क़ पोशीदा,
उड़ने की
नियत
लिए बैठा हूँ, कुछ अलग से - -
जीने की हसरत लिए
बैठा हूँ।

* *
- - शांतनु सान्याल

सोमवार, 25 जनवरी 2021

एहसास के ख़ुश्बू - -

ख़ामोशी की वजह, सिर्फ़
बियाबां को है मालूम,
आईने को कैसे
बताएं, कब
सूख
गए मरुद्यान, अक्स - -
देखना चाहता है
जिन्हें, वो
दिन
रात न रहे, वादियों में फिर
दूर तक बिखरी है
जाफ़रानी धूप,
शाख़ों में
खिले
हैं छितरा कर असंख्य
चेरी के फूल, सब
कुछ दोहराता
हुआ है
लेकिन, वो हालात न रहे,
अक्स देखना चाहता
है जिन्हें, वो दिन
रात न रहे,
कभी
मुद्दतों तक रहते थे ताज़ा,
एहसास के गंध,
बोगनवेलिया
की तरह
अब
रह गए सभी आशनाई, - -
जो रूह को कर जाएं
मुअत्तर, वो हसीं
लम्हात न रहे,
सब कुछ
दोहराता हुआ है लेकिन, -
वो हालात न रहे, वो
ख़ाली हाथ लौट
गया, सीने
का
ज़मीर ज़िंदा है अभी तक,
फ़र्श पर बिखरे पड़े हैं
सभी क़ीमती
पेशकश,
जिसे
दिल के अलमीरा में सजाएं,
वो सौग़ात न रहे, जो
रूह को कर जाएं
मुअत्तर, वो
हसीं
लम्हात न रहे  - - - - - - - -

* *
- - शांतनु सान्याल
 

रविवार, 24 जनवरी 2021

अनुबंध के परे - -

आँखों के तटबंध तक सिमटे होते हैं सभी
अपने या पराए रिश्ते, अपनापन तो
है बहता हुआ जलधार, रात
गुज़रते ही पलकों के
नीचे तक उतर
आएगा, वो
कोई
उड़ता सा आवेग था, भोर के धुंधलके में -
न जाने किधर जाएगा। किसी गुप्त
संधि की तरह रहते हैं, देह से
लिपटे हुए अनगिनत
सुरभित क्षणों के
आलेख, कुछ
आयु से
दीर्घ
सम्मोहन, टूटे हुए मकड़जालों में ओस के
झूलते आरोहण, आँखों से ओझल होते
ही ये मायावी संसार अपने आप
ही बिखर जाएगा, अनबुझ
सदा रहती है जीवन की
तृष्णा, हथेली के
ऊपर गिरता
अनुरागी
बूंदों का
जलप्रपात है बहुत चंचल, ओंठों को छूने
से पहले ही कहीं और ठहर जाएगा,
रात गुज़रते ही पलकों के
नीचे तक उतर
आएगा।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

 
 

शनिवार, 23 जनवरी 2021

आदान प्रदान - -

कोई ज़रूरी नहीं कि हर चीज़
का विनिमय हो, उधार ले
जाने वाले शख़्स से
पूर्व परिचय हो,
उसने जाते
हुए
मुझे कुछ यूँ देखा कि उसे मैं,
हद ए नज़र तक ख़ामोश
देखता ही रह गया,  
आवश्यक
नहीं,
इस हार में उसकी विजय हो,
प्रयोजन जो भी हो उसने
मुझे इस्तेमाल
किया, सच
ये भी
है, कि मेरे बग़ैर जीना मुहाल
किया, वक़्त ही बताएगा
उसके दिल में जो भी
आशय हो, समय
का घिसाव
उतार
देता है गहनतम कलई, लाख
कोशिश कर ले कोई, चेहरा
ठीक होता नहीं, ज़रूरी
नहीं हर पतझड़  के
बाद मौसम
मधुमय
हो।
कोई ज़रूरी नहीं कि हर चीज़
का विनिमय
हो।

* *
- - शांतनु सान्याल



शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

कांच का संसार - -

मायावी प्रकाश, बनावटी समंदर
की तल भूमि, ऊपर उठते
नन्हें बुलबुले, नक़ली
प्रवाल भित्ति,
फ़िरोज़ा
लहरों मे कहीं, कुछ ढूंढती सी है -
ज़िन्दगी, सुदूर रेत के टीलों
पर रात ढले, गिरते हैं
ओस कण, छोड़
जाते हैं, कुछ
ख़्वाब के
निशां टूटते हुए तारे, यूँ ही बारम्बार
उजड़ कर संवरती सी है ज़िन्दगी,
जाने क्या तिलिस्म है
उस अप्रत्याशित
छुअन में,
देह
प्राण जी उठते हैं सहसा एक लंबे -
शीत निद्रा से, गर्म सांसों से
लम्हा लम्हा पिघलती
सी है ज़िन्दगी,
बहुरंगी
मीनपंखों से तैरती हैं हसीं लफ़्ज़ों
की कश्तियाँ, कांच के
दीवारों से टकरा
कर लौट
आती
हैं परछाइयां, चाँद के अक्स को -
छूने के लिए मचलती सी
है ज़िन्दगी, रात की
आख़री ट्रेन जा
चुकी पटरियां
धुंध में खो
गए, दूर तक है अंतहीन सन्नाटा,
हर शै मद्धम से हो गए,
सुनसान स्टेशन से
कुछ मिलती
जुलती -
सी है
ज़िन्दगी।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

मंत्रमुग्ध सीढ़ियां - -

शेष प्रहर के स्वप्न होते हैं बहुत -
ही प्रवाही, मंत्रमुग्ध सीढ़ियों
से ले जाते हैं पाताल में,
कुछ अंतरंग माया,
कुछ सम्मोहित
छाया, प्रेम,
ग्लानि
ढके रहते हैं धुंध के इंद्रजाल में, ये
घर, दीवार, छत, कांच से जड़ी
आलमारी, सब कुछ हो
कर भी है ख़ालीपन
हर हाल में,
अभिमुख
चेहरे
ज़रूरी नहीं कि हों पूर्व विदित, स्पर्श
है बेमानी देह कहीं, मन दूसरे
ख़्याल में, रंग बिरंगी
मछलियों की
दुनिया है
तरंग
विहीन, धुआं ही धुआं है इस जिस्म
के रंग मशाल में, बुझ चले हैं
झाड़फानूस, शमा को
बुझे देर हुई, फ़र्श
पे बिखरे हैं
पतंग,
वक़्त है रवां उसी चाल में, मंत्रमुग्ध
सीढ़ियों से ले जाते हैं अनदेखे
सभी ख़्वाब, शून्यता के
पाताल में।

* *
- - शांतनु सान्याल
   
 
 

बुधवार, 20 जनवरी 2021

तरजीह के पैमाने - -

हर एक को ख़ुश करना बहुत
ही है मुश्किल, कहीं ख़्याल
मिल भी जाएँ, तो
आसां नहीं
तबियत
का
मिलना, इस मीनाबाज़ार में हैं,
हर चीज़ की आमद, चंद
सिक्कों के एवज
जिस्म ओ जां
है यहाँ
मय्यसर, लेकिन मुश्किल है -
बहोत, सिर्फ़ मुहोब्बत
का मिलना, वक़्त
नहीं रुकता
बहे
जाता है, सुदूर ढलानों से होकर
मुहानों के सिम्त, बड़ी
देर से हूँ मुख़ातिब,
क्यूँ आईना की
तरह देखते
हो मुझे
तुम,
कैसे समझाऊं, बहुत ही कठिन -
है, पुराने सूरत का मिलना,
हासिए की सीमाएं,
अब ढलते धूप
में बढ़ाने से
क्या
फ़ायदा, ज्वार के साथ भाटे का
रहना है स्वाभाविक, हर
शख़्स के फ़ेहरिस्त
में, तरजीह के
पैमाने एक
नहीं
होते, मुश्किल है हर एक दिल से
अहमियत का
मिलना।

* *
- - शांतनु सान्याल  





मंगलवार, 19 जनवरी 2021

ख़ुद से परास्त राजा - -

कुछ उपेक्षित मलिन प्रदेश, हमेशा की
तरह रहते हैं ओझल, दीवार उठा
दिए जाते हैं रातों रात, नाले
के दोनों किनारे, लेकिन
सत्य को छुपाना
इतना भी
सहज
नहीं, सभी सीमाएं तोड़ जाते हैं दुर्गन्ध
के कोलाहल, कुछ उपेक्षित मलिन
प्रदेश, हमेशा की तरह, रहते हैं
ओझल। हर बात पर जो
लोग दिया करते हैं
अभिव्यक्ति की
दुहाई, वक़्त
लगता
नहीं उन्हें, लोगों की आवाज़ कुचलने
के लिए, साधु का स्वांग रचने से,
हर कोई माया मुक्त जोगी
नहीं बन जाता, एक
दीर्घ साधना
चाहिए
स्वयं
को महा राजर्षि के रूप में बदलने के -
लिए, वक़्त लगता नहीं उन्हें,
बेरहमी से लोगों की ज़बां
कुचलने के लिए।
दिग्विजय की
चाह में
छूट
जाता है, अंतरतम का कठिन प्रदेश,
दुनिया की नज़र में वो चाहे
बन जाए विश्व पुरोधा,
अवगाहन के नग्न
क्षणों में वो ख़ुद  
को पाता है
आधा,
इतिहास के पृष्ठों में नहीं होता उसका
कोई उल्लेख, माथे पर प्रश्नचिन्ह
लिए वो भटकता है अतृप्त
आत्मा की तरह जन्म
जन्मांतर तक, न
कोई आरम्भ
न कोई
शेष,
दिग्विजय की चाह में छूट जाता है, -
अंतरतम का कठिन
प्रदेश।

* *
- - शांतनु सान्याल

सोमवार, 18 जनवरी 2021

अंदर का मिठास - -

धूप का उत्तरीय उतरने में,
ज़रा भी समय नहीं
लगता, जो
आँधियों
में
पला हो, उसे बिखराव से - -
भय नहीं लगता,
हमारे पास
कुछ भी
नहीं,
सिवा कुछ शब्दों के झुरमुट,
अंतर्तम खोलें, जीवन में
कुछ भी अनिश्चय
नहीं लगता,
इक
गहरा सुकून है, दिल को - -
जब से चाहतों से
तौबा की,
अपने
पराए चेहरों के बीच, अब
कोई संशय नहीं लगता,
पतझर हो या
मधुमास,
खिलना
बिखरना दोनों हैं आसपास,
सजग मन को किसी
और शब्दों का
परिचय
नहीं
लगता, वो मिठास जो ख़ुद
के अंदर रहता है,
सदियों से
विस्मृत,
उसे
शोध कर पाएं, तो कोई - - -
और मधु संचय
नहीं लगता।

* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

रविवार, 17 जनवरी 2021

अलोना स्वाद - -

जिसे लोग बरगद समझते रहे, वो
बहुत ही बौना निकला,
दूर से देखो तो लगे
हक़ीक़ी, छू के
देखा तो
खिलौना निकला, उसके तहरीरों -
से बुझे जंगल की आग,
दोबारा सुलग जाए,
जिसे अनमोल
सिक्का
समझे, वही नक़ली सोना निकला,
कुछ लोग हैं माहिर, सरे आम
फ़रेबे हुनर अपना दिखा
गए, उड़ते रहे सिफ़र
में, जाने कहाँ
से कहाँ
तक
हमें याद नहीं, सब कुछ था सफ़ाफ़,
जहाँ थे पड़े, वो घर का कोना
निकला, न जाने कितना
कुछ, ख़्यालों से परे
हम ग़ज़ल कह
गए, उतरे
जब
ज़मीं पर, तो जीवन का स्वाद बेहद
अलोना निकला, जिसे लोग
बरगद समझते रहे,
वो बहुत ही बौना
निकला।
* *
- - शांतनु सान्याल  

 

शनिवार, 16 जनवरी 2021

परख हीनता - -

उन नितांत संधि पलों में, हम बहुत
कुछ रख आते हैं बंधक, अदृश्य
भस्म लपेटे सारे अंग में,
निरंतर भटकते हैं
किसी मृग -
सार की
तरह
बदहवास, आईना क्रमशः उतार देता
है, परत दर परत जिस्म से सभी  
दिखावटी रंजक, उन नितांत
संधि पलों में, हम बहुत
कुछ रख आते हैं
बंधक। वो
चेहरा
जो कभी तितलियों के स्पर्श से सहम
जाता रहा, वही आज मुरझाया
सा नज़र आया, दरअसल
समय से बड़ा मौसम
कोई दूसरा नहीं,
जतन चाहे
कोई
कितना भी कर ले, जंग लगे अस्तित्व
को खींच नहीं पाता, आंख का
चुम्बक, दर्पण क्रमशः
उतार देता है, धीरे
धीरे, जिस्म
से सभी
दिखावटी रंजक। उन गहरे कृत्रिम रंगों
के मध्य उभरते हैं, वास्तविकता
के लकीर, हमारे पास कुछ
नहीं बचता समझौते
के अतिरिक्त,
हम छोड़
देते हैं
उन संधि पलों में, सभी शीशीबंद जुगनू,
उत्तरोत्तर प्लावित द्वीप में, रात
ढले तक रहती है, कोई मायावी
चमक, फिर भी जंग लगे
अस्तित्व को खींच
नहीं पाता, आंख
का चुम्बक,
अंतर का
मोती
फेंक, हम उठाते हैं, धूसर पथ के अभ्रक।

* *
- - शांतनु सान्याल 

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

मायाबाज़ार - -

उम्र भर जिनसे की बातें वो आख़िर
में पत्थर के दीवार निकले,
ज़रा सी चोट से वो
घबरा गए,
इस देह
से
हम कई बार निकले, किसे दिखाते
ज़ख़्मों के निशां, क्यूँ कर
कोई बेवजह हो
परेशां, वो
हमारे
हिस्से के भंवर थे, लिहाज़ा हम डूब
के उस पार निकले, वो फ़क़त
अभिनय था, या
असलियत,
फ़र्क़
करना नहीं आसान, उजालों के - -
नेपथ्य में वो अपना
ज़मीर तक
बेचने
को
तैयार निकले, लोग गुज़रते रहे, -
अपने हाथों में लिए,
रंगीन ख़्वाबों
के परचम,
कुछ
आत्मीयता शिलालेख हुए, कुछ -
चेहरे भूले हुए इक़रार
निकले, हमने
सोचा कि
जब
दवा बेअसर है, तो क्यूँ न राहे - -
दुआ का रुख़ करें, नंगे
पांव चल कर
हम पहुंचे,
वो
तो महज फ़रेब का बाज़ार निकले।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

अंदर कुछ और बाहर कुछ - -

मृत नदी के दोनों तट पर खड़े हैं
निशाचर, सुदूर बांस वन में
अग्नि रेखा सुलगती सी,
कोई नहीं रखता
यहाँ दीवार
पार की
ख़बर,
नगर कीर्तन चलता रहता है - -
अपनी जगह, शब्दों में हैं
तथागत, उत्पीड़न
घर के अंदर,
छींके पर
रखे हैं,
सभी ख़्वाबों के खिलौने, बिल्ली
की तरह लोग देखा किए
आठों पहर, सोचने
से कहीं गिरता
है, नीचे
नीला
आकाश, ज़रा सी हलचल में,थम
सा गया सारा शहर, मैं छोड़
आया था, सब कुछ
समुद्र के किनारे,
बिन छुए ही
लौट गई
तेज़
वो मझधार की लहर, कोई किसी
का सर दर्द नहीं लेता,
मेरे दोस्त, बाहर
से हर कोई
है सजल,
अंदर
से लेकिन बेअसर, मृत नदी के
दोनों तट पर खड़े हैं -
निशाचर।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

 

बुधवार, 13 जनवरी 2021

उच्छ्वास के उस पार - -

न धुआँ है कहीं, न आग का कोई
सुराग़, बिखरा है राख़, लेकिन
आसमान तक, ज़िन्दगी
का महोत्सव, यूँ तो
है सीमाहीन,
लेकिन
डूबा -
जाते हैं उच्छ्वास महा जलयान
तक, न जाने कौन है खड़ा
नेपथ्य के उस पार, जो
खेलता है, अनवरत
जन्म से ले कर
मसान
तक,
चाहे जितना भी हाथ पैर पटक लें
हम, वो खींचे लिए जाता है,
भोर से अवसान तक,
श्वेत - श्याम
में गुथी
हुई
है, ये नियति पटल, मिटा देती है
सभी इतिवृत्त के निशान -
तक, काल चक्र के
गिरफ़्त से कोई
नहीं बचता,
सभी
समान हैं, रंक से राजा महान तक।

* *
- - शांतनु सान्याल

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

दूर जाने के बाद - -

वो झिलमिलाती सी नदी रात ढले,
सितारों का लिबास ओढ़े
उतरती है, निःशब्द
सीने की अतल
गहराइयों
में।
वो कोई यादों की है गुमनाम बस्ती,
ज़ख्मों के गिरह खोलती है
धीरे धीरे, रूह जागती है
दर्द की परछाइयों
में। वो सभी
हसीं
लम्हात बिखरे पड़े हैं कांच के फ़र्श
पर, बहुत बेतरतीब से, ढूंढते
हैं हम गूंगी सदा
तन्हाइयों
में।
खुले पड़े हैं, सभी मख़मली संदूक,
जिन्हें जो चाहिए था वो साथ
ले गए, बहुत लुफ़्त आता
है लापरवाहियों
में।
कुछ अहदनामें जो अभी तक हैं कोरे,
कुछ अपनापन आज भी डालते
हैं डोरे, सुकूं ज़रूर था
बेवजह की लड़ाइयों
में। पास रहने
से पहाड़
का
नीलापन घुल जाता है, बहुत ही जल्दी,
दूर जाने पर, हर नुख़्स लगती
अज़ीज, किसी की चंद
अच्छाइयों में। वो
शीर्षक विहीन
चेहरा,
ज़िल्द की तरह, वक़्त से कहीं पहले ही
उतर गया, कितने हाथों से
गुज़र कर, आख़िर
पुरानी किताब
की दुकां पे
ठहर
गया, उस का ज़िक्र भी अब नहीं होता
ज़िन्दगी की
कहानियों
में।
* *
- - शांतनु सान्याल

सोमवार, 11 जनवरी 2021

शबनमी पयाम - -

कोई सुबह बंद लिफ़ाफ़े में शबनमी
पयाम ले के आए, तितलियों
के पर, जो खो गए कोहरे
में कहीं, ख़ुश्बुओं में
ढल कर रात का
सलाम ले के
आए।
मैं आज भी मुंतज़िर हूँ उसी डूबते
दिन के किनारे, जो उबार ले
मुझ को गुम होने से
पहले, कहीं से  
एक मुश्त
उजला
सा शाम ले के आए। अनगिनत बार
नीलाम होता रहा है मेरा जिस्म,
रूह तो रहे ज़िंदा, कोई तो
हो, जो आख़री दाम
ले के आए।
अजीब
सा
नशा है ये ज़िन्दगी, ख़त्म होती नहीं
चाहतों की हिचकियाँ, मौत की
दस्तक से पहले कोई जाए,
ख़्वाबों का छलकता
जाम ले के
आए।
उतार लाओ मजलिस ए रौशनी को
कि अभी तक है दिलों में अंधेरा,
दिल से दिल तो मिले, कहीं
से कोई, वो जोड़ने के
नुस्ख़े, तमाम
ले के
आए। कोई सुबह बंद लिफ़ाफ़े में - -
शबनमी पयाम ले के आए।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

शनिवार, 9 जनवरी 2021

अंतर्यात्रा - -

सभी हैं सवार, एक ही नैया, एक ही
खेवैया, उन्मुक्त है नीला पाल,
दोनों तरफ खेलते हैं, सुख
दुःख के उठते गिरते
तरंग, बहे जा रहे
हैं सभी समय
स्रोत में,
दूर  
बहुत दूर, माथे की उलझी लकीरों के
संग, दोनों तरफ खेलते हैं, सुख
दुःख के उठते गिरते तरंग।
आम्र मुकुल खिल चले हैं
मधुमास के कगार,
कितने झरेंगे
असमय,
और
कितने पहुंचेंगे वयःसंधि पार, कहना
है बहुत कठिन, सभी मुस्कुराते
दिन, दरअसल होते नहीं
रंगीन, जो हाथ आए
पल, वही है सब
से मधुर,
क्यों
न ढाल लें उसे, हम अपने ही अनुसार,
किंशुक रंगी बनाए जीवन किनार।
एक ही नैया, एक ही खेवैया,
उन्मुक्त है नीला पाल,
एक ही में हैं, बैठे
अनेक सवार,
न छत
न ही
स्तम्भों की क़तार, फिर भी सुन्दर है
यहाँ सब कुछ, सदा पारदर्शी स्व -
अंतरतम का
संसार।

 * *
- - शांतनु सान्याल   


पल भर का ठिकाना - -

नीरवता की उस निःशब्द भाषा में नदी
खोजती है, मुहाने तक पहुँचने का
रास्ता, विशाल लवणीय समुद्र
को छूते ही छूट जाते हैं
बहुत पीछे, गाँव,
देवल, घाट
की टूटी
सीढ़ियां, दूर तक किसी से नहीं रहता - -
है कोई वास्ता, उन निमग्न पलों
में नदी खोजती है, गहराइयों
में उतरने का रास्ता।
अधूरे सपनों की
तरह तकते
हैं दोनों
पार के तटबंध, किनारे खड़े अर्ध नग्न
बच्चों की आँखों में उभरते हैं, कुछ
रंगीन गुब्बारे, न जाने क्या
तलाशते हैं, वो मेरे वक्ष
के अंदर, धूसर
आईने में
नहीं
उतरते हैं सुबह के सितारे, वो डूब जाते
हैं वहीँ अपने उसी जन्म स्थान के
किनारे, निर्ममता से समय
उड़ा देता है उन मासूम
हाथों से सभी रंग
बिरंगे गुब्बारे।
उस निर्जन
द्वीप
में नदी करती है उस प्रकाश स्तम्भ से
बातें, जो खंडित हो कर भी दिखाता
है, न जाने किस जहाज को
बंदरगाह का ठिकाना,
सुदूर ईशान कोण
में उड़ चले हैं
सारस के
झुंड,
मेरी नियति में है, सिर्फ़ पहाड़ से उतर
कर, गहन नील स्रोत में विलीन
हो जाना, सहस्त्र बिंदुओं में
है कहीं मेरा क्षण भर
का ठिकाना।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

ख़ुश्बू के निशां नहीं मिलते - -

कंक्रीट के जंगल में, राहतों के आसमां नहीं मिलते,
अनचाहे संधियों में, ज़िन्दगी के निशां नहीं मिलते।

इस शहर में यूँ तो, हर सिम्त हैं, इमारतों के अंबार,
हर शै है मयस्सर, ताहम स्थायी मकां नहीं मिलते।

इक गंधहीन रुमाल, अपनी जेब में लिए फिरता हूँ,
जो खो गए भीड़ में, वो ख़ुश्बू के निशां नहीं मिलते।

छोड़ कर इस माया नगर को, जाएं भी तो कहाँ जाएं,
जो झुंड में मिला लें वो दिलवाले कारवां नहीं मिलते।

हर बार आख़री पहर में आ कर, रात जाती है बिखर,
हर रात की तरह ख़ामोशी को कोई ज़बां नहीं मिलते।

उम्र भर जो बांधे रखे, ख़्वाहिशों की ख़ानाबदोशी को,
अफ़सोस कि वो इत्मीनान वाले घर यहाँ नहीं मिलते।

* *
- - शांतनु सान्याल  
 
 

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

कुछ देर ठहर के देखेंगे - -

कहते हैं कि उस के पास है, कोई कल्प तरु,
उस के साए में हम कुछ देर ठहर के देखेंगे।

इक बार जो देख ले, दोनों जहाँ से तर जाए,
समुद्र से भी गहन, आँखों में उतर के देखेंगे।

उसके हाथों से बहते हैं, दुआओं के जलधार,
विस्तीर्ण बबूल वन से, हम गुज़र के देखेंगे।

ये सच है, कि मंज़िल का पता नहीं जानते,
अकेले ही सही, अनंत सफ़र कर के देखेंगे।

कब तक आईना, यूँ चुराएगा हम से नज़र,
हम अक्स अपना फिर बन संवर के देखेंगे।

अंदर तक हैं सब्ज़, क़दीम दरख़्त की शाख़ें,
मंदिर की सीढ़ियों में यूँ ही बिखर के देखेंगे।

वक़्त जितना भी उभारे, माथे की लकीरों को,
हम उतना ही टूट फूट कर, निखर के देखेंगे।  

* *
- - शांतनु सान्याल  
 

 

बुधवार, 6 जनवरी 2021

दिवास्वप्न के झोली वाले - -

वही बेरंग दरो दीवार, बालकनी के
रेलिंग से झूलते हुए पुराने
रंग बिरंगे कपड़ों का
संसार, वही जंग
लगी कील
पर है
लटकता हुआ तिथि, नक्षत्र, मुहूर्तों
का क्रमबद्ध व्यापार। हर मोड़
पर हैं, न जाने कितने ही
अगोचर मसीहाई
की दुकान,
किस
तरह से बचाएं, इन अदृश्य फंदों से
अपनी जान, राजपथ के दोनों
तरफ बैठे हैं, लोग लेकर
पिंजरे में बंद मिट्ठू,
सभी हैं, लूटने
की कला
में एक
से बढ़ कर एक महा विद्वान। एक
से छूटो, तो दूसरा होता है पहले
से मौजूद, इन अंधी गलियों
में मुखौटों को उतारना
नहीं आसां, न जाने
कितने जमूरे
होते हैं
इन
तमाशबीनों में शामिल, ये राख की
तावीज़ को, ख़ुदा के नाम पर
जाते हैं बेच, इन फ़रेबी
रहनुमाओं को, इन
भीड़ भरी राहों से
यूँ ही निकाल
फेंकना
नहीं
आसां, इन अंधी गलियों में मुखौटों
को उतारना नहीं आसां।

* *
- - शांतनु सान्याल
     
 

  

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

अस्तित्व परिधि - -

दावा रहित उस सीमान्त रेखा में कहीं,
गिरते हैं टूटे हुए तारे, मुंडेर से
उतरती चाँदनी, कुछ पल
के लिए रूकती है, यूँ
ही, उस बोगन -
वेलिया के
किनारे,
एक
गहरा स्पर्श, जो उतरता है आहिस्ता-
आहिस्ता, सुप्त चेतना के भीतर,
सहसा जागते हैं, अनगिनत
ऊसर प्रदेश, सुदूर कहीं
आदिम घड़ी के घंटे
करते हैं, मध्य -
रात्रि का
ऐलान,
उस रहस्यमय नीरवता की गहराई में,
असंख्य तिर्यक समीकरण करते
हैं प्रवेश। दिगंत रेखा में कहीं
उभरते हैं, रंग मशालों के
धूम्र वलय, अशांत
रात ढलने से
पूर्व रख
जाती
है, कुछ चाँदनी के कण, कुछ शबनमी -
अहसास, कुछ बूंद परकीय गंध,
कुछ गहरा अंतरंग मिठास,
एक असमाप्त जीवन -
बोध, अस्तित्व
वृत्त के
आसपास।

* *
- - शांतनु सान्याल
     



सोमवार, 4 जनवरी 2021

विस्मित पल - -

अंधकार के गर्भ में ही छुपा होता है
जीवन का उत्स, चाहे जितनी
गहरी हो मायावी रात्रि,
कुहासा चीर कर
निकल ही
आते
हैं, हर हाल में आलोक पथ के यात्री।
इस एकसुरा जीवन के बाहर भी
है एक भिन्न जगत, कुछ
सुरभित भावों की
वीथिका, कुछ
अंतरतम
की
गहराई, सब मिला कर वो अनाविल
सुंदरता, हालांकि सीने की तृषा
रहती है अतृप्त हमेशा,
अन्तःदहन के बाद
ही नव सृजन
करती है
मुलायम मृत्तिका, इस विषम पथ
में ही हैं, कुछ मुकुलित भावों
की वीथिका। अधूरेपन में
ही है जीने की अदम्य
अभिलाषा, जो
जोड़े रखती
है रूहों
को
इस किनारे से उस किनारे तक, उस
अदृश्य सेतु बंधन में हैं शामिल,
कम्पित अधरों के तिर्यक
सुख, व्यथित देह -
प्राण में राहत
का मरहम
ज़रा सा,
अधूरेपन में ही है, जीने की अदम्य
अभिलाषा।

* *
- - शांतनु सान्याल


   



अन्तःकोलाहल का अंत - -

सभी कुछ है वृथा तुलसी फूल चंदन,
सभी रंग फीके, सभी लोग थे
एक सरीखे, केवल सत्य
था मणिकर्णिका
आकाश,
मेरे
सीने से लिपटने का अर्थ केवल प्रेम
ही हो ज़रूरी नहीं, वो कदाचित
छूना चाहते हैं शेष स्पंदन,
सभी कुछ है वृथा
तुलसी, फूल,
चंदन।
स्तव, स्त्रोत, श्लोक, सभी हैं सिर्फ़
सौजन्य मूलक, वो अपनी
जगह से हिल भी न
पाएगा प्रस्तर
खण्ड की
तरह,
देह का अब कोई मूल्य नहीं, फिर
भी क्यों इतना सारा ढोंग,
चक्षु लज्जा के भय से
निरंतर मिथ्या -
वंदन, सभी
कुछ है
वृथा
तुलसी, फूल, चंदन। झूले से हो -
कर अग्निशय्या तक,
रिक्त पृष्ठों से
निकल कर
शब्दों के
उस
भस्मीभूत नैया तक, अविश्रान्त
पुनर्दहन, सभी कुछ है वृथा
तुलसी, फूल, चंदन।
समय चक्र के
अंकों में न
जाने
क्या ढूंढती हैं मेरी निस्तेज दृष्टि,
अपूर्ण ही रहती है प्राण ग्रन्थ
के अज्ञात पृष्ठों में कहीं,
जीवन की लुप्तप्राय
दिव्य वृष्टि,
क्रमशः
नेह
कपाट के बंद होते ही रुक जाते हैं
लोलक के सभी छायामय नर्तन,
अंदर का शोर थम जाता है
सहसा, तोड़ के सभी
भावपूर्ण बंधन,
सभी कुछ
है वृथा
तुलसी, फूल, चंदन। - - - - - - -

* *
- - शांतनु सान्याल
 
   

रविवार, 3 जनवरी 2021

आकाश विहीन पृथ्वी - -

एक सर्पिल रेखा की तरह, अतीत
की नदी, छोड़ गई है विस्तृत
बंजर अहसास, जिसके
दोनों किनारे हैं
खड़े रेत के
पहाड़,
समय मुझ से कहता है, कि मैंने
खो दिया है बहुत कुछ, अब
रिक्त हस्त के सिवा
कुछ भी नहीं
मेरे पास।
किंतु
ये पूर्ण सत्य नहीं हैं, बहुत कुछ
खो के भी लोग पा जाते हैं
मन की मुराद, कितना
कुछ उठा लाते हैं
लोग यूँ ही
राह
चलते, किसे मालूम, यूँ ही कोई
एक दिन लौटा जाए, मेरी
सभी गुमशुदा याद।
उस विलुप्त
नदी के
तट
पर हैं कतारबद्ध, कुछ खेजड़ी के
दरख़्त, कुछ बंधनों के धागे
लिपटे रहते हैं जड़ों तक,
चाहे दिशाहीन हो
मौसम, अथवा
नक्षत्र वृन्द
भूल जाएं
अपना
रास्ता, कुछ लोग रहते हैं दिल -
की गहराइयों तक जुड़े हुए
हर पल हर वक़्त। मैं
जानता हूँ, तुम
नहीं लौटा
सकोगे
मेरे
खोए हुए दिन, किसी तरह ग़र
ढूंढ भी लाए, उस विलुप्त
स्रोत को, तो मैं चाह
कर भी, उस पर
काग़ज़ की
नाव
न बहा पाऊंगा, कुछ ख़्वाहिशों
के आकाश होते हैं बहुत
ही सिमित, घुट के
रह जाते हैं, बस
चार दीवारों
के मध्य,
तुम
उन स्वप्निल विमानों को अपने
पास ही रख लो, ग़र वो मिले
भी तो उन्हें दहलीज़ के
पार न उड़ा पाऊंगा,
काग़ज़ की वो
नाव चाह
कर भी
न बहा पाऊंगा।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
  

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

पारदर्शी शब्द - -

तृष्णा पार की अनुभूतियों में, अब
भी बाक़ी हैं कुछ मृग मरीचिका,
खिड़की पार की दुनिया में
तैरते हैं, कुछ पारदर्शी
शब्द, धुंध की
गहराइयों
में वो
खोजते हैं गिरते हुए बूंदों की भाषा,
सहसा, वो सभी अधूरी चाहतें
हो जाती हैं, गहन रात की
निर्भीक नायिका, अब
भी बाक़ी हैं जीवन
में, कुछ मृग -
मरीचिका।
सारे देह
में
उभरते हैं, तित्तिभ के नील रंगी
आलोक, कोई रख जाता है
चुपचाप, नीम के कुछ
पत्ते, मृत तितली
के सिरहाने,
जीवन
के
प्रयोगशाला में अचानक जागती है
अंतिम पहर की, अदृश्य कोई
अभिसारिका, अब भी
बाक़ी हैं, रात के
मरू वक्षस्थल
में, कुछ
रंगीन
मृग मरीचिका। मैं दोनों हाथ बढ़ाता
हूँ की छू सकूँ, अभिशाप मुक्त
अनुभूति को, पुनः उड़ा पाऊं
झरित पंखों की स्मृति
को, लेकिन जैसा
हम चाहते हैं
वैसा कहाँ
होता है,
बहुत जल्दी खिड़की के उस पार गिर
जाते हैं धुंध के यवनिका, अब
पहले से कहीं अधिक गाढ़
हो चले हैं, अंधकार
पलों के मृग -
मरीचिका।

* *
- - शांतनु सान्याल  

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past