09 जनवरी, 2021

अंतर्यात्रा - -

सभी हैं सवार, एक ही नैया, एक ही
खेवैया, उन्मुक्त है नीला पाल,
दोनों तरफ खेलते हैं, सुख
दुःख के उठते गिरते
तरंग, बहे जा रहे
हैं सभी समय
स्रोत में,
दूर  
बहुत दूर, माथे की उलझी लकीरों के
संग, दोनों तरफ खेलते हैं, सुख
दुःख के उठते गिरते तरंग।
आम्र मुकुल खिल चले हैं
मधुमास के कगार,
कितने झरेंगे
असमय,
और
कितने पहुंचेंगे वयःसंधि पार, कहना
है बहुत कठिन, सभी मुस्कुराते
दिन, दरअसल होते नहीं
रंगीन, जो हाथ आए
पल, वही है सब
से मधुर,
क्यों
न ढाल लें उसे, हम अपने ही अनुसार,
किंशुक रंगी बनाए जीवन किनार।
एक ही नैया, एक ही खेवैया,
उन्मुक्त है नीला पाल,
एक ही में हैं, बैठे
अनेक सवार,
न छत
न ही
स्तम्भों की क़तार, फिर भी सुन्दर है
यहाँ सब कुछ, सदा पारदर्शी स्व -
अंतरतम का
संसार।

 * *
- - शांतनु सान्याल   


15 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 11 जनवरी 2021 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. कविता का भाव और रूप...दोनों अप्रतिम।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    विश्व हिन्दी दिवस की बधाई हो।

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  4. सुन्दर सृजन। विश्व हिन्दी दिवस पर शुभकामनाएं।

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