धूप का उत्तरीय उतरने में,
ज़रा भी समय नहीं
लगता, जो
आँधियों
में
पला हो, उसे बिखराव से - -
भय नहीं लगता,
हमारे पास
कुछ भी
नहीं,
सिवा कुछ शब्दों के झुरमुट,
अंतर्तम खोलें, जीवन में
कुछ भी अनिश्चय
नहीं लगता,
इक
गहरा सुकून है, दिल को - -
जब से चाहतों से
तौबा की,
अपने
पराए चेहरों के बीच, अब
कोई संशय नहीं लगता,
पतझर हो या
मधुमास,
खिलना
बिखरना दोनों हैं आसपास,
सजग मन को किसी
और शब्दों का
परिचय
नहीं
लगता, वो मिठास जो ख़ुद
के अंदर रहता है,
सदियों से
विस्मृत,
उसे
शोध कर पाएं, तो कोई - - -
और मधु संचय
नहीं लगता।
* *
- - शांतनु सान्याल
18 जनवरी, 2021
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past
-
नेपथ्य में कहीं खो गए सभी उन्मुक्त कंठ, अब तो क़दमबोसी का ज़माना है, कौन सुनेगा तेरी मेरी फ़रियाद - - मंचस्थ है द्रौपदी, हाथ जोड़े हुए, कौन उठेग...
-
मृत नदी के दोनों तट पर खड़े हैं निशाचर, सुदूर बांस वन में अग्नि रेखा सुलगती सी, कोई नहीं रखता यहाँ दीवार पार की ख़बर, नगर कीर्तन चलता रहता है ...
-
कुछ भी नहीं बदला हमारे दरमियां, वही कनखियों से देखने की अदा, वही इशारों की ज़बां, हाथ मिलाने की गर्मियां, बस दिलों में वो मिठास न रही, बिछुड़ ...
-
जिसे लोग बरगद समझते रहे, वो बहुत ही बौना निकला, दूर से देखो तो लगे हक़ीक़ी, छू के देखा तो खिलौना निकला, उसके तहरीरों - से बुझे जंगल की आग, दोब...
-
उम्र भर जिनसे की बातें वो आख़िर में पत्थर के दीवार निकले, ज़रा सी चोट से वो घबरा गए, इस देह से हम कई बार निकले, किसे दिखाते ज़ख़्मों के निशां, क...
-
तुम्हें संवारने की चाह में हज़ार बार उजड़ा है मेरे अंदर का उपवन, न जाने किन रास्तों से हो कर गुज़री है ज़िन्दगी, कभी वक़्त मिले तो देख लेना प्रणय...
-
शेष प्रहर के स्वप्न होते हैं बहुत - ही प्रवाही, मंत्रमुग्ध सीढ़ियों से ले जाते हैं पाताल में, कुछ अंतरंग माया, कुछ सम्मोहित छाया, प्रेम, ग्ला...
-
दो चाय की प्यालियां रखी हैं मेज़ के दो किनारे, पड़ी सी है बेसुध कोई मरू नदी दरमियां हमारे, तुम्हारे - ओंठों पे आ कर रुक जाती हैं मृगतृष्णा, पल...
-
ये हथेलियों की है ज्यामिति इसे समझना आसां नहीं, चाहता है दिल बहुत कुछ, कहने को बाक़ी अरमां नहीं। लब ए बाम पर, कई चिराग़ ए शाम लोग जलाए बैठे है...
-
चला जा रहा हूँ निस्र्द्देश्य रास्तों से अंतहीन है समुद्र का किनारा, उतरे तो सही वो एक बार घने बादलों के हमराह, उभर जाए कदाचित डूबा हुआ साँझ ...

सुन्दर रचना।
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंबहुत सुन्दर और सारगर्भित रचना।
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंसत्य लिखा है ... सुन्दर रचना ...
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंसादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (19-1-21) को "जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि"(चर्चा अंक-3951) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
--
कामिनी सिन्हा
ह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत सुन्दर सारगर्भित रचना
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंवो मिठास जो ख़ुद
जवाब देंहटाएंके अंदर रहता है,
सदियों से
विस्मृत,
उसे
शोध कर पाएं, तो कोई - - -
और मधु संचय
नहीं लगता।..सच्चाई का सटीक विश्लेषण करती पंक्तियों के साथ साथ ..एक बेहतरीन कृति पढ़ने का अवसर देने के लिए शान्तनु जी,बहुत बहुत धन्यवाद..।
ह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएं