सोमवार, 29 जून 2015

रात की ढलान में कहीं - -

आख़री पहर, जब झर
गए सभी पारिजात,
लापता चाँद
था रात
की ढलान में कहीं,
उन्हीं पलों में
ले गए
तुम सुरभित रूह मेरी,
अब प्यासा
जिस्म
भटके है बियाबां में
कहीं, यूँ तो
चलना
था मुझे भी उजालों
के हमराह,
लेकिन
खो गए अक्स, वक़्त
ए कारवां में कहीं,
वो चेहरे जो
घूमते
रहे मेरे अतराफ़ - - -
उम्रभर, कोहरे
के साथ
घुल से गए बिहान में
कहीं, आख़री पहर,
जब झर गए
सभी
पारिजात, लापता चाँद
था रात की ढलान
में कहीं।

* *
- शांतनु सान्याल

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christina nguyen art

शनिवार, 27 जून 2015

राह ए हक़ में - -

हर इक नज़र को
है किसी न
किसी
की तलाश,कभी
कोई भटके है
धुंधभरी
वादियों में दर
बदर, कभी
कोई
मिल जाए यूँ ही
दहलीज़ के
आसपास।
फ़रेब ए नज़र है
बाशक्ल ओ
बेशक्ल
के दरमियां, राह
ए हक़ में
लेकिन
न कोई आम, न
कोई ख़ास।

* *
- शांतनु सान्याल
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art of paul landry

रविवार, 21 जून 2015

अल्बम ए ज़िन्दगी - -

अल्बम ए ज़िन्दगी, चाहे जितना छुपाना
चाहो, गाहे - बगाहे यादों के कतरन
फ़िसल जाते हैं अपने आप।
उन धुंध भरी राहों को
बारहा मैंने भूलना
चाहा लेकिन,
ख़ुशियों
में भी, ये नामुराद अश्क, निकल आते हैं
अपने आप। कुछ लिफ़ाफ़े बाहर से
होते हैं बहोत दिलकश, ये और
बात है, कि खोलते ही उसे
गुमशुदा दर्द मिल
जाते हैं
अपने आप। सही परवरिश या हवा, पानी
ओ धूप का रोना है बेमानी, जिन्हें
खिलना हो, हर हाल में वो
खिल जाते हैं अपने
आप।

* *
- शांतनु सान्याल
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Albert Handell Paintings

शनिवार, 20 जून 2015

बिखर जाने दे - -

कांच के बूंदों की तरह टूट
कर मुझे बिखर जाने
दे, कोई अधूरी
ख़्वाहिश
न लगे चुभता सा किनारा,
उफनती नदी की
मानिंद फिर
मुझे निखर
जाने दे,
इस ख़ानाबदोश बारिश का
कोई अपना वतन नहीं,
रातभर के लिए ही
सही मेरी
आँखों
में ठहर जाने दे, न जाने -
ज़माने में है क्यूँ,
इतनी सारी
छटपटाहट,
चाँद को
ज़रा और मेरे सीने में हौले
से उतर जाने दे,आईना
है मुन्तज़िर इक
मुद्दत से मुझे
देखने के
लिए,रात के अंधेरों से ज़रा
ज़िन्दगी को और उभर
जाने दे, कांच के
बूंदों की तरह
टूट
कर मुझे बिखर जाने दे - -

* *
- शांतनु सान्याल
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dae chun kim painting

गुरुवार, 18 जून 2015

उसने कहा था - -

उसने कहा था, मेरी वजह -
से है लुत्फ़ ए सावन,
वरना इस
दहकते
बियाबां में कुछ भी नहीं। -
उसने कहा था, मुझ
से है तमाम
आरज़ूओं
के चिराग़ रौशन, वरना इस
बुझते जहां में कुछ
भी नहीं। यूँ
तो हर शै
आज  भी  है अपनी जगह -
मौजूद, सही सलामत,
वही आसमान
वही चाँद
सितारे, फूलों में वही रंग सारे,
सावन में आज भी है वही
बरसने की दीवानगी,
नदियों में वही
अंतहीन
किनारों को जज़्ब करने की -
तिश्नगी, फिर भी  न
जाने क्यूँ उसने
कहा था
मेरे बग़ैर इस गुलिस्तां में कुछ
 भी नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल
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art by david chefitz

मंगलवार, 16 जून 2015

धूप संदली - -

यहाँ उम्मीद के मानी कुछ भी
नहीं ये सिर्फ़ नाज़रीं हैं,
देख शहर कोतवाल
हौले से निकल
ही जाएंगे।
तनहा ही सही गुज़रने दे मुझे
बेख़ौफ़ यूँ ही वस्त राह,
कहीं न कहीं, किसी
मोड़ पे गुमनाम
इन्क़लाबी
मिल ही जाएंगे। मज़मा ए शहर
मुबारक हो तुझ को बहोत
दूर है कहीं मेरी नन्ही
सी इक दुनिया,
जुगनू ओ
तितलियाँ बसते हैं जहाँ, आज -
नहीं तो कल बर्फ़ीले चादर
वादियों के पिघल ही
जाएंगे। फिर
खिलेगी
धूप संदली, माँ की दुआओं वाली,
फिर रूठे हुए बच्चे चाँद का
अक्स थाली में देख,
मासूमियत
हँसी के
साथ बहल ही जाएंगे।  - -

* *
- शांतनु सान्याल
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art by david cheifetz

उजाड़ हो कर - -

सिर्फ़ लब  छू लेने भर से
रूह नहीं भीग जाते,
उजाड़ हो कर
तुम्हें और
बरसना होगा, हर इक बूंद
की अपनी ही अहमियत
होती है, बादल
बनने से
पहले तुम्हें और दहकना
होगा। अभी तो कश्ती
है मझधार में
कहीं, न
जाने कितनी देर साहिल
पे तुम्हें और ठहरना
होगा, इतना
आसां भी
नहीं जीस्त का शीशी ए
अतर हो जाना, हर
हाल में तुम्हें
देर तक
और महकना होगा। इस
शहर के अपने अलग
हैं दस्तूर, सूरज
निकलने से
पहले
यूँ ही काँटों की सेज पे - -
तुम्हें और तड़पना
होगा। सिर्फ़
लब  छू
लेने भर से रूह नहीं भीग
जाते, उजाड़ हो कर
तुम्हें और
बरसना होगा।

* *
- शांतनु सान्याल
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art by richard schmid

रविवार, 14 जून 2015

कोई पैग़ाम मिले - -

कुछ इस तरह से छलकें मेरी
आँखें कि किसी को कुछ
पता भी न चले और
दर्द ए दिल को
आराम
मिले। कहाँ से लाएं वो यक़ीं,
जो तुझे ले आए, फिर
मेरी बज़्म की
जानिब,
ख़ानाबदोश ज़िंदगी को इस
बहाने ही सही, जीने का
अहतराम मिले।
यूँ तो हर
कोई था मेरा तलबगार इस
शहर में, लेकिन मेरी
सांसों पे इक
तेरे सिवा
कोई और मुस्तहक़ न था -
चले भी आओ किसी
बहाने कि डूबती
सांसों को
पल दो पल ही सही, उभरने
का कोई पैग़ाम मिले।

* *
- शांतनु सान्याल
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karen mathison schmidt painting.jpg

गुरुवार, 11 जून 2015

असमाप्त अन्तर्यात्रा - -

 उस अंतिम छोर में, कोई प्रतीक्षारत
नहीं और इस मोड़ में भी, मैं
रहा सदैव एकाकी, बूढ़ा
बरगद, सिमटती
नदी, विलीन
हुए सब
सांध्य कोलाहल, उड़ गए सुदूर सभी
प्रवासी पाखी। पिघली है बर्फ़
वादियों में, या फिर दिल
में जगी है कोई
आस पुरानी,
गोधूलि
बेला, सिंदूरी आकाश, तुलसी तले - -
माटी - प्रदीप, वही अनवरत
झुर्रियों से उभरती हुई
तेरी मेरी जीवन
कहानी।
वो तमाम स्मृति कपाट अपने आप
जब हो चलें बंद, तब अंतर पट
खोले नव दिगंत द्वार,
निरंतर असमाप्त
अन्तर्यात्रा !
कोई न
था एक मेरे अलावा उस भूल - भुलैया
के उस पार।

* *
- शांतनु सान्याल
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dusan djukaric art

मंगलवार, 9 जून 2015

वीरान रहगुज़र - -

न कर इतनी मुहोब्बत कि पंछी भूल
जाए उड़ान भरना, कर ले ख़ुद
को ख़ुद तक ही मनहसर,*
और बन जाए ये
जिस्म महज़
एक
ख़ूबसूरत पिंजर। सामने हो खुला - -
आसमान, चाँद, सितारे, और
आकाशगंगा, बेबस रूह
तलाशे लेकिन टूटे
पंख अपना।
रंगीन
सपनों के शल्क लिए ज़िन्दगी न बन
जाए कहीं बंजर। ज़रूरत से
ज़्यादा की चाहत न
कर दे उजाड़
कहीं
दिलों की बस्ती,  दूर तक न रह जाएँ
कहीं वीरान रहगुज़र। न कर
इतनी मुहोब्बत कि पंछी
भूल जाए उड़ान
भरना, कर
ले ख़ुद
को ख़ुद तक ही मनहसर, - - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल
* सिमित
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रविवार, 7 जून 2015

इक अजनबी - -

न उजाड़ यूँ लम्हों में जज़्बात ए शहर,
इक ज़िन्दगी भी कम है इसे
जगमगाने के लिए।
क़दमों में जड़े
हों ज़ंजीर
और
नंगी पीठ पे उभरे दाग़ ए चाबुक, ये -
सौगात भी कम हैं मुहोब्बत में,
यूँ हद से गुज़र जाने के
लिए। वो कोई
इंतहाई
दीवाना था या ख़ालिस रूह, यूँ उठाए
फिरता रहा काँधे पे, पोशीदा
सलीब अपना, किसी
ने उसे नहीं
देखा,
न किसी ने पहचाना ही, लहूलुहान वो
गुज़रता रहा भीड़ में तनहा,
इंसानियत की सज़ा
पाने के लिए।
न उजाड़
यूँ लम्हों में जज़्बात ए शहर, इक - -
ज़िन्दगी भी कम है इसे
जगमगाने के लिए।
* *
- शांतनु सान्याल
 http://sanyalsduniya2.blogspot.in/

गुरुवार, 4 जून 2015

गुमशुदा नदी - -

चलो फिर आज, सजल खिड़कियों
में कुछ जलरंग तसवीर उकेरें,
कुछ रंग जो छूट गए
अतीत के पन्नों
में कहीं,
चलो फिर आज, धूसर आकाश में
यूँ ही स्मृति अबीर बिखेरें।
कुछ काग़ज़ के नाव
रुके रुके से हैं,
हलकी
बारिश की चाह लिए, कुछ नन्हें -
नन्हें, गगन - धूलि फिर हैं
उभरने को बेक़रार,
चलों फिर खेलें
नदी -पहाड़
या लुक - छुप की वो छोटी छोटी -
मासूम अय्यारियां, फिर
सदियों से गुमशुदा
नदी है छलकने
को तैयार ।

* *
- शांतनु सान्याल
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