Thursday, 11 June 2015

असमाप्त अन्तर्यात्रा - -

 उस अंतिम छोर में, कोई प्रतीक्षारत
नहीं और इस मोड़ में भी, मैं
रहा सदैव एकाकी, बूढ़ा
बरगद, सिमटती
नदी, विलीन
हुए सब
सांध्य कोलाहल, उड़ गए सुदूर सभी
प्रवासी पाखी। पिघली है बर्फ़
वादियों में, या फिर दिल
में जगी है कोई
आस पुरानी,
गोधूलि
बेला, सिंदूरी आकाश, तुलसी तले - -
माटी - प्रदीप, वही अनवरत
झुर्रियों से उभरती हुई
तेरी मेरी जीवन
कहानी।
वो तमाम स्मृति कपाट अपने आप
जब हो चलें बंद, तब अंतर पट
खोले नव दिगंत द्वार,
निरंतर असमाप्त
अन्तर्यात्रा !
कोई न
था एक मेरे अलावा उस भूल - भुलैया
के उस पार।

* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/

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