गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

खिलौनों का घर - -

जीवनोत्सव रुकता नहीं, केवल
बुझ जाते हैं, देह से लिपटे
हुए रंग मशाल, इस
अस्ताचल से
आगामी
डूब
तक कोई नहीं होता राख के पास।
समय बना देता है बेहद दुरूह
विगत सभी स्मृति को,
उत्तरोत्तर लोग
भुला देते हैं,
रेत में
दबे
हुए सभी शिलालिपि को, क्रमशः
दीर्घ होता जाता है, रूह का
अज्ञातवास।  इस जन्म
से लेकर पुनर्जन्म
तक कोई भी
नहीं होता
हमारे
साथ, गुम हो जाते हैं शब्द किसी
प्रस्तर अरण्य में, हम ढूंढते
हैं, अपनी प्रतिध्वनि टूटे
हुए दर्पण में कहीं,
अनावर्तित
पलों का
दर्द
समेटे, हम पाना चाहते हैं केवल
एक अणु सुख, उम्र भर के उस
नीरव, समर्पण में कहीं।
हम सजाते हैं, उन
अबोध क्षणों
में एक
घर
खिलौने वाला, जोड़ते हैं ख़ुद को
किसी और से इस तरह कि
सदियों से हों अंतरंग,
उन मासूम पलों
के परिपक्व
होते ही
टूट
जाते हैं सभी भरम, खेल के अंत
में पता चलता है कि हम
सभी हैं सिर्फ अतिथि
कलाकार, परदा
गिरते ही,
कोई
नहीं होता, नेपथ्य के अंधकार में
दूर तक, साथ निभाने वाला,
हम सजाते हैं, उन अबोध
क्षणों में, एक घर
खिलौने
वाला।

* *
- - शांतनु सान्याल
       
 
 
 
 
 
 



बुधवार, 30 दिसंबर 2020

नव वर्ष का अभिवादन - -

इस रात की गहराइयों में डूबे पड़े
हैं न जाने कितने ही विरल
मोती, ढूंढ के जो लाए
वो मरजिए ही न
रहे, सिक्कों
को फेंक
कर
अक्सर लोग देखते हैं यहाँ मौत
का तमाशा। ज़िन्दगी की
धरातल, दिन ब दिन
घटती हुई, अंधे -
कुएं में घूमती
है सतत
दीर्घ
जीने की प्रत्याशा। वाहवाही का
झुनझुना दिखा कर लोग
लूट ले जाते हैं, हमसे
हमारा ही वजूद,
हम ख़ुद को
देखते हैं
यूँ ही
लुटते हुए, होश में रहने के बावजूद,
जिन्हें हम समझते हैं अपना
ख़ैरख़ाह, वही एक दिन
मौक़ा मिलते ही दे
जाते हैं, बड़ी ही
ख़ूबसूरती से
हम को
झांसा। गुज़िश्ता साल ने ज़ख्म देने
में यूँ तो कोई कंजूसी नहीं की,
उम्मीद है, नए साल की
भोर दे, ज़िन्दगी को
एक नए अंदाज़
में, जीने की
दिलासा।

* *
- - शांतनु सान्याल     
 

नग्न सारांश - -

वृद्ध आँखों का सूनापन, सर्द रातों में
ढूंढता है, परित्यक्त कोई कोना,
उतरती धूप की वसीयत
में अंधकार के सिवा
कुछ नहीं होता,
सिमटती
नींद के
लिए
ज़रूरी नहीं है कोई चन्दन काठ का
बिछौना। झिलमिलाते शहर की
तरफ बढ़ गए, सभी जाने
पहचाने चेहरे, किसी
ने भी रुक के
टूटे हुए
मील
के पत्थर नहीं देखे, सरसरी निगाह
तक आ कर बिखर गए सभी
रिश्ते, वो बढ़ाता रहा
अपना हाथ बार
बार, लोगों
ने उसे
दो
पल रुक कर भी नहीं देखे। रौशनी
के हमराह, अफ़साने के सभी
किरदार बदलते रहे अपने
अपने लिबास, कुछ
ग़र नहीं बदला
तो वो था,
उनके
अंदर तक प्रसारित नग्न सारांश।

* *
- - शांतनु सान्याल     

 

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

गृहपालित पाखी - -

उंगलियों के दाग़, अभी तक हैं - -
लिपटे हुए मृदु पंख में,
मुक्त हो कर भी
मन, सुदूर
उड़
नहीं पाता, बारम्बार लौट आता
है मायावी जाल में, घना
कोहरा झपटने को है
आतुर, आलोक
स्वयं को
बचाना
चाहता है हर हाल में, दीर्घ है ये
अरण्यमय रात्रि, यात्रा भी
नहीं आसान, हाथों
से छूटता जाए
धीरता का
लगाम,
तुम
अभी तक बैठे हुए हो न जाने
किस आवारा ख़्याल में,
बिहान रखता है,
फूल खिलने
के सभी
रहस्य
अपने ही देखभाल में, रुमाल के
सीने में उभरे हैं, अनगिनत
ख़्वाब के बेल बूटे, अब
ये न पूछिए कि
कितनी बार
उन
उंगलियों के नोक पर सुइयां हैं
टूटे, ज़िन्दगी हर बार
उभरनी चाहिए इक
नए अंदाज़ के
साथ, एक
मोहक
चाल ढाल में, कुछ अदृश्य स्पर्श
देह में रहते हैं कोशिकाओं तक
अवशोषित, वो भूल जाते
हैं मुक्त उड़ान, बस
रहना चाहते
हैं अपनों
के
नज़दीक यथावत शिकस्ता हाल
में - -

* *
- - शांतनु सान्याल   

 
 

 

रविवार, 27 दिसंबर 2020

संदूक बंद स्मृतियां - -

हमेशा की तरह, ये साल भी आख़िर
गुज़र ही गया, अंजुरी से बह कर
एक सजल अहसास, कोहनी
के रास्ते, स्मृति स्रोत
में कहीं, निःशब्द
सा उतर ही
गया,
ये साल भी आख़िर गुज़र ही गया।
हाथों की मुट्ठियां खुली ही रहीं,
हमेशा की तरह, आकाश
इठलाता रहा शाही -
अभिमान से,
असमय
के
प्रहार से बदल गए सभी धर्म कर्म
के पैमाने, सर्वव्यापी सत्य का
धुआं उठता रहा शमशान
से, अहंकार का घट
अंततः, टूट कर
बिखर ही
गया,
ये साल भी आख़िर गुज़र ही गया।
अपने अक्ष में अनवरत घूमता
रहा, समय का अदृश्य
दर्पण, कोलाहल
हो या गहरा
अमन,
संघर्ष का दूसरा नाम ही है जीवन,
जीने की अंतहीन चाह थी
मेरी परछाई, मेरे साथ
ही रही, मैं चाहे
जिधर भी
गया,
ये साल भी आख़िर गुज़र ही गया।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
 


उजाले के कगार - -

अंतिम पहर में थम गए सभी कायिक
उफान, बहुत अनिश्चित होता है
चाहतों का निद्राचलन, देह
और प्राण के मध्य
निरंतर चलता
रहता है
एक
असमाप्त खींचतान, अंतिम पहर में
थम गए सभी कायिक उफान।  
बिखरे पड़े होते हैं, छिन्न -
भिन्न नीतिशास्त्र के
किताब, उन
एकांत
पलों
का साक्ष्य होता है सघन नील अंधकार,
उजाले के महीन परदे, क्रमशः खोल
देते हैं, पिछले पहर के सभी
गुप्त अभियान, अंतिम
पहर में थम गए
सभी कायिक
उफान।
वो
पल जो जन्म देते हैं भावी संभावना
को, स्पर्श जो गढ़ते हैं अजस्र
चेतना को, उन निशब्द
संवाद के नेपथ्य में
होती है स्निग्ध  
शांति, बहुधा  
दिशा बदल
जातें हैं
सभी
विक्षिप्त तूफ़ान, अंतिम पहर में - -
थम गए सभी कायिक
उफान।

* *    
- - शांतनु सान्याल

 

शनिवार, 26 दिसंबर 2020

बिला उन्वान - -

चेहरा आसां नहीं बदलना दूसरों के मुताबिक़,
भीतर का सच, हर हाल में ज़ाहिर हो जाएगा,

वो खेल चुका सभी दांव शातिराना अंदाज़ के,
सुबह से पहले वो बिसात से बाहर हो जाएगा,

चाहे कोई कितनी बार बदल ले लिबास अपना,
हदे अक्स को छूते ही वो मुहाजिर हो जाएगा,

न लूटो मासूम बचपन को कटी पतंग की तरह,
उम्र बढ़ते ही बारूद उड़ाने में माहिर हो जाएगा,

इबादतों को रहने दो ज़ाती दायरे तक ही महदूद,
नशा बना तो नस्ले आदम ही काफ़िर हो जाएगा,

इज़हारे आज़ादी क्या सिर्फ़ उनकी है मिल्कियत,
ज़ुल्म हद से बढ़ा तो हर लब शमशीर हो जाएगा,

बिखरे दिलों को जोड़ने में, सदियां लग जाएंगी,
शीशमहल कहीं टूटा, फिर से तामीर हो जाएगा,

बड़ी मुद्दतों बाद पाया है, कुछ सुकून के लम्हात,
रूह को छेड़ा तो फिर प्यासा राहगीर हो जाएगा।

* *
- - शांतनु सान्याल



 
 
   
 
 


शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

तृतीय जगत - -

आंख मूँद कर, तुम निगल रहे हो
खाद्य अखाद्य सब कुछ,
लेकिन, मैं नीलकंठ
नहीं हूँ, कि कर
जाऊं हर
चीज़
को हज़म, मेरी अंतःचेतना अभी
तक है जीवित, वो तमाम
लाल, नील, हरे, गेरु
रंगों से नहीं बुझेगी
ये जठराग्नि,
मुझे ज़रा
ध्यान
से देखो, शैशव से लेकर वार्धक्य
तक है अनवरत मंथर दहन,
अधजले काठ से कुछ
कम नहीं है मेरे
बचे रहने
का
भरम, मैं नीलकंठ नहीं हूँ, कि कर
जाऊं हर चीज़ को हज़म। न
जाने किस हरित प्रदेश
की तुम बात करते
हो, मेरे सीने
से निकल
कर
दूर तक जाती है, एक धूसर सड़क,
जिसके दोनों तरफ हैं सूखे हुए
दरख़्त, जिन के शीर्ष पर
उड़ रहे हैं बहु रंगी
परचम, मैं
नीलकंठ
नहीं
हूँ, कि कर जाऊं हर चीज़ को हज़म।
इस पार और उस पार के मध्य
झूल रहा है, सितारों का
सेतु, ठीक उसके
नीचे है, गाढ़
अंधकार,
जहाँ
बसते हैं, तृतीय जगत के उपेक्षित
लोग, विस्मृत देवताओं का
पुरातन घर, उनका
अपना अलग
है ईमान -
धरम,
मैं
नीलकंठ नहीं हूँ, कि कर जाऊं हर
चीज़ को
हज़म।

* *
- - शांतनु सान्याल


 



 

 
 
 

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

मौनाभिनय - -

समय के अंगविक्षेप में दंभ रहता
है भरा, निःशब्द मंचित हो
कर छोड़ जाता है सब
कुछ जहां के तहां,
मुड़ कर वो
देखता
भी
नहीं कि कौन हो तुम, दिग्विजयी
सम्राट या कोई रमता जोगी,
उसे परवाह नहीं, चलता
रहा, या दिगंत से
पूर्व थम गया
ज़िन्दगी
का
कारवां, समय छोड़ जाता है सब
कुछ जहां के तहां। हर सांस
है बंधी प्रयोजन की
डोर से, सघन
अंधकार
में पड़े
रहते हैं सभी रिक्त मधुकोष, बिखरे
पड़े होते हैं, टूटे हुए संचय पात्र
पृथ्वी पर, मुस्कुराता सा
लगता है, उन पलों में
विस्तीर्ण नीला
आसमां,
समय
छोड़ जाता है सब कुछ जहां के
तहां। गतिहीन इतिहास
खोजता है, छाया
चित्रों में,
किसी
निर्बोध शिशु की तरह समय का
मूल स्रोत, समय कर जाता
है, उसे अनगनित
मिथकों से
ओतप्रोत,
समय
जा
चुका है बहुत दूर, वो नहीं लौटेगा
दोबारा यहां - -


* *
- - शांतनु सान्याल




 
 

बुधवार, 23 दिसंबर 2020

शून्य समुद्र - -

हर एक विध्वंस के पश्चात, खुलते
हैं सङ्घ के कपाट, नील नद
से कलिंग तक, उत्थान
पतन है सृष्टि का
अवदान, मृत्यु
तट से ही
होता
है
जन्मोदय, हर एक रात के गर्भ में
है अवस्थित, उस आलोकमय
संस्कृति का मूल स्थान।
असंख्य भूमिगत
नगर प्रांतर
समय के
सीने
में
हैं निमग्न, बहु बार टूटे साम्राज्य
असंख्य, अनेकों बार पुनः
नवीन विस्मय हुए
आविर्भूत, नहीं
बुझती कभी
जीवन
की
प्यास, शताब्दियों से, अंदर बाहर
निरंतर चलता रहता है, गहरा
उत्खनन। बुज़ुर्ग पृथ्वी का
प्रदाह सीना, कभी नहीं
बुझता, चिरंतन
यहाँ नहीं
किसी
का
भी निवास, प्रेम घृणा, हिंसा करुणा,
व्यय संचय, अपने पराए सब
हो जाएंगे एक दिन स्मृति
जीवाश्म, संघ बिखर
कर रचेगा फिर
एक अभिनव
इतिहास,
हम
कहाँ, किस जगह, किस रूप में होंगे
किसी को कुछ भी नहीं पता,
कदाचित, सिर्फ़ शून्य ही
शून्य हो, तब हमारे
आसपास।

* *
- - शांतनु सान्याल

 
     
 
 

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

अंकों का खेल - -

गुज़र रहा है शहर के वक्ष से होकर
विस्तीर्ण विजय जुलूस, सहस्त्र
घुड़सवार, ढोल ताशे, शंख
तुरही, आकाश से झर
रही है मोनालिसा
की वही  
चिर
परिचित रहस्यभरी मुस्कान, राज
पथ के दोनों तरफ खड़े हैं
लोग बैसाखियों के
सहारे, ख़ामोश
विस्फारित
नज़रों
से
देखते हैं शाही रथ का महाप्रस्थान।
खोजते हैं लोग पिछले पहर के
कुछ चिल्लर ख़्वाब, रास्ते
के बीचों -बीच बिखरे
पड़े हैं, केवल कुछ
बलैयां और
कुछ
निछावर के अभिमान, अपाहिज
रात देख रही है, मोनालिसा
की वही, चिर परिचित
तिलस्मी मुस्कान।
नगर सीमान्त
पर रोके
गए
हैं, ज़मीन से उठने वाले आवाज़,
इस मुल्क का क़ानून बदलता
है अंकों के खेल से, सुबह
कुछ और ही था मेरा
परिचय उनकी
नज़र में,
साँझ
ढलते ही मुझ पर है अब क़त्ल
का फ़रमान, विस्फारित
नज़रों से मैं देखता
रहा, शाही रथ
का महा -
प्रस्थान।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
 



 



 


 

सोमवार, 21 दिसंबर 2020

अन्तःस्थल में कहीं - -

धुंध ही धुंध है जिधर नज़र जाए,
निःशब्द सा है, अदृश्य बहता
हुआ आदिम झरना,
मीठी धूप की
यादें यूँ
तो
हैं काइयों में ढकी छुपी, कुछ ऊँचे
चिनारों की तरह चाहती हैं
बादलों से दिल की
बात कहना,
मौन
सा है, अदृश्य बहता हुआ आदिम
झरना। समय के कोहरे में
सभी एक दिन, इसी
तरह से ही खो
जातें
हैं, हिमयुगीन किस्से कहानियां,
टूटे चश्मे का कांच, रुकी
हुई ग्रामाफोन की
सुई पर कोई
पुराना
गीत, मद्धम, मद्धम सुरों में रूह
को छूती हुई, किसी की गर्म
साँसों की, हलकी हलकी
सी आंच, खुली इन
हथेलियों में
सिर्फ़ रह
जाते हैं
शून्यता के अहसास दूर उड़े जा
रहीं न जाने कहाँ, रेशमी
परों की तितलियाँ,
इसी तरह से
ही खो
जातें हैं, सभी हिमयुगीन किस्से
कहानियां। झूलते बरामदों
में क्या अभी तक हैं
विगत मधुऋतु
की छुअन,
छू रही
है अंतरतम को झुक कर गुलमोहर
की टहनियां, इतना कुछ मिलने
के बाद भी अधूरा ही रहता
है ये जीवन, दरअसल
चाहतों की सूचि
में हम भूल
जाते हैं
बहुत कुछ लिखना, यही वजह है
कि सूना रहता है अन्तःस्थल
का वृन्दावन, अधूरा ही
रहता है अंततः ये
जीवन - -

* *
- - शांतनु सान्याल  

 
 
 

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

अस्तित्व के भीतर - -

अंतरस्थ मेरे है, एक मुलायम सा
प्रदेश, जो बिखरने नहीं देता
मुझे, समेट के रखता
है, अपने सीने
के अदृश्य
नीड़
में, उन असमय के लड़खड़ाहटों
में, वो मेरा स्वागत करता है,
अक्षय संवेदनाओं से,
अंदर के राग -
अनुराग
को,
वो कर जाता है संतुलित, मैं पुनः
बढ़ जाता हूँ अंतहीन भीड़
में, वो समेट के रखता
है, अपने सीने
के अदृश्य
नीड़
में।
वो मुझे स्वीकारता है, जैसा भी हूँ
मैं, वही उबारता है, मुझे सभी
टूट फूट से, ताकि मैं
दुनिया का पुनः
उन्मुक्त
रूप
से
अभिवादन कर सकूँ, बिखराव के
उस पार निर्माण की सुबह
देख सकूँ, वो श्वास
तन्तुओं से बह
कर रहता है
अंतर्लीन,  
शास्वत सत्य की तरह, उर्ध्वमुखी
मेरे रीढ़ में, वो समेट के रखता
है, अपने सीने के अदृश्य
नीड़ में। आज और
कल के संधि
क्षणों में
वो
रचता है दिव्य सेतु, दुःख - सुख के
दो सन्मुख स्तम्भों के मध्य,
सभी विकलांग पथ हो
जाते हैं, सरल सुगम,
सभी चेहरे तब
लगते हैं
ख़ुद
जैसे, हम खो जाते हैं तब अपनी ही
भीड़ में, वो समेट के रखता है,
अपने सीने के अदृश्य
नीड़ में।

* *
- - शांतनु सान्याल



 
 
 

 

 


शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

खिड़की के उस पार - -

भू तल में अभी तक है मेरा निवास,
एक खिड़की, टूटी हुई आराम -
कुर्सी, माटी की सुराही,
बेरंग, कांसे का
एक पैतृक
गिलास,
गली के उस मोड़ से उभरती है उस
फेरीवाले की आवाज़, खिड़की
के समीप रूकती है कुछ
देर, क्रमशः किसी
दूरगामी रेल
की तरह,
हाथों
पर जल्दी से कोई रख जाता है कटे
हुए अमरुद की डलियां, मिर्च
और काले नमक के साथ,
उस पार की दुनिया
अब धुंधली हो
चली हैं,
वैसे
भी अब कुछ रहा ही नहीं देखने के
लिए अपने आसपास, भू तल
में अभी तक है, मेरा
निवास। कहने
को मेरा घर
यूँ तो है
तीन
मंज़िला, पसंदीदा छत ही पहले -
पहल मुझसे छूटा, संभवतः
बचपन भी किसी कोने
में हो दुबका पड़ा,
कुछ यादें
छत पर

गिरती हैं, उड़ते हुए जीर्ण पल्लवों
की तरह, ये सीढ़ियां काश पुल
होतीं, ताकि मैं ख़ुद को
उस कोने में ढूंढ
पाता, प्रथम -
तल और
द्वितीय तल, कब मुझसे दूर सरक
गए, याद नहीं, बस, आते जाते
सदर दरवाज़े की मुलाक़ात
अभी तक है बाक़ी,
जन्म से ले
कर मृत्यु
तक,
कहीं न कहीं, हर एक आदमी होता
है अंदर तक एकाकी, फिर भी
वो जीना चाहता है, एक
नई सुबह की ख़ातिर,
वो प्रतीक्षा करता
है रोज़ उस
फेरीवाले
का,
उसका चेहरा है ताज़ातरीन सुबह
का अख़बार, जिसे वो शुरू से
अंत तक पढ़ना चाहता
है अनेकों बार ,वो
जानना चाहता
है, मोड़ के
उस
पार की दुनिया का रहस्य अनायास,
भू तल में अभी तक है, मेरा
निवास। दरअसल, इन
मंज़िलों में पौधों
को पालते
पोसते  
हम ख़ुद को ही सिंचना जाते हैं भूल,
जब अपना ख़्याल आता है, तब
तक सूख चुका होता है,
सारा दरख़्त, और
टहनियों में
लिपटी
होती
हैं समय की धूल, कुछ रहता है साथ
तो राख रंगी उन्मुक्त आकाश,  
मैं ऊपरी मंज़िलों में जाना
भी नहीं चाहता, क्योंकि
वहां से उतरने और
उतारने, दोनों
में  होगी
मुश्किल,  
न करो मेरा स्थानांतरण जब तक
न निकले मेरी अंतिम सांस,
भू तल में ही रहने दो
मेरा निवास।

* *
- - शांतनु सान्याल


 
 

पतझर के बाद - -

अपना अपना है सुख, कुछ जागते  
रहे सारी रात, बिखरे सिक्कों
को चुनते हुए, कुछ मेरी
तरह जीते रहे
लापरवाह,
सुदूर
आकाश पार, बंद आँखों से, यूँ ही
बेतरतीब से, तारों को गिनते
हुए।  हर तरफ़ हैं न जाने
कितने ही तरह के
हाट - बाज़ार,
फिर भी
लोग
थकते नहीं, उम्र भर किये जाते
हैं, मोल - भाव का व्यापार,
चाहे आप, हमें जो जी
में आए, नाम दे
दें, हमने
तो कई
रातें गुज़ारी हैं, उनकी पलकों से
टपकते, ओस कणों को
सहेजते हुए, यूँ ही,
बेतरतीब से,
तारों को
गिनते
हुए। धन और ऋण का खेल, - -
अंततः बराबर शून्य ही
निकला, कितने
ही सितारों
को देखा
है -
हमने मुख पृष्ठ से, सीधे तृतीय
पृष्ठ पर उतरते हुए, हमारा
ठिकाना यूँ तो कहीं भी
नहीं, उड़ा ले जाए
हवा, जहाँ जी
चाहे, यूँ
तो  
कई बार हमने देखा है दरख्तों को
पोशाक बदलते हुए, मौसम
को अपने वादे से सरे -
आम मुकरते
हुए, कुछ
जागते  
रहे सारी रात, बिखरे सिक्कों को
चुनते हुए।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
 
 
 

गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

आंतरिक क्षरण - -

निर्वाक पृथ्वी, निस्तेज बुझा सा
आकाश, कांधे में लिए
जन्मों का ऋण,
रात को
फिर
है गुज़रना, बियाबां के उस पार,
निष्ठुर, नियति के नाट्य -
मंच पर उठने को है
सौभिक यवनिका,
वही अमोघ
खेल
कुछ प्रच्छन्न, कुछ प्रकाशित -
वही हास्य क्रंदन बारम्बार,
रात को फिर है गुज़रना,
बियाबां के उस पार।
कुछ स्मृतियाँ
अमर्त्य
होती
हैं, परछाइयों की तरह करती हैं
पीछा, कुछ अभिमान, घावों
को कभी भरने नहीं देते,
अदृश्य निःश्वास
की तरह
सहसा
छू
जाते हैं ग्रीवा प्रदेश, फिर सारी
रात, जागे बैठा रहता है
हमारे अभ्यंतर का
अचल अहंकार,
रात को
फिर
है गुज़रना, बियाबां के उस पार।
ये ज्ञात है, सभी को अच्छी
तरह, कि ज़िन्दगी का
भरोसा, कुछ भी
नहीं, न
जाने
क्यूँ, कई बार मुख़ातिब हो कर
भी बने रहते हैं, हम एक
दूसरे से अजनबी,
हर चीज़ को,
एक न
एक
दिन, जब ख़त्म होना है, फिर
किस लिए इतना घात -
प्रतिघात, अनवरत
अंदर - बाहर,
प्राणों पर
प्रहार, रात को फिर है गुज़रना,
बियाबां के उस पार।

* *
- - शांतनु सान्याल


बुधवार, 16 दिसंबर 2020

बातचीत - -

संवाद शेष होते ही, संपर्क भी
क्रमशः कपूर की तरह
हो जाते हैं विलीन,
निष्प्राण पड़े
रहते हैं
फ़र्श
पर अनुभूतियों के कुछ धूम्र
वलय गंधहीन, उम्र भर
न जाने कितने लोगों
से हम जुड़ते हैं,
नए संपर्क
गढ़ते
हैं,
वरीयता की सूचि में अविराम
फेरबदल चलता रहता है
अंतहीन, धीरे धीरे
बातचीत की
की ज़मीं
हो
जाती है लोप, गुरुत्वाकर्षण का
नियम हो जाता है निष्क्रिय,
जीवन खोजता है अंध -
कुएँ के बहुत नीचे,
संपर्क की
जंग
लगी मशीन, फेरबदल चलता
रहता है अंतहीन, कुछ
लोग जितनी तेज़ी
से क़रीब आते
हैं, उतनी
ही
शीघ्रता से बहुत दूर चले जाते
हैं, कुछ संपर्क समय के
साथ, पंख निकलते
ही नीड़ को छोड़
जाते हैं, पड़े
रहते हैं,
कुछ
टूटे हुए डिम्ब खोल, कुछ - -
तिनके, धूसर रंगविहीन,
संपर्क भी क्रमशः
कपूर की तरह
हो जाते हैं
विलीन,
यही
वजह है कि आदमी मृत्यु पूर्व
तक चाहता है कुछ न कुछ
बात करना, संपर्क को
पकड़ के रखना
बस यही तो
है जीवन,
सारा
जग है शून्य अगर हम हो जाएँ
शब्दहीन - -

* *
- - शांतनु सान्याल   
 

 

   

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

महाकाय वृक्ष - -

अक्सर, इस ऊँचे दरख़्त के नीचे
बैठ कर मैं, उसे क़रीब से
महसूस करना
चाहता
हूँ
उसकी फुसफुसाहट से ज़िन्दगी
का तत्व ज्ञान समझना
चाहता हूँ, उसकी
ऊर्ध्वमुखी
शाखा

प्रशाखाओं के आचार संहिता को
जानना चाहता हूँ, क्या वो
हर किसी को अपनी
फैलती हुई बाँहों
में, किसी
भी
भेद भाव के आश्रय देते हैं चाहे
वो कोई विक्षिप्त झंझावात
हो, या झुलसी हुई
बेघर रात हो,
मैं उसके
साए
से हो कर उसकी आन्तरभौम
दुनिया में जाना चाहता
हूँ, उसे अहसास
हो कि हम
उसके
आगे, बौने पौधों से अधिक -
कुछ भी नहीं, हम आज
भी अपनी मिट्टी से
हैं जुड़े हुए, ठीक
उसी की
तरह,  
आसमान की तलाश में हाथ
बढ़ाए हुए, उभरने दो हमें
भी सूर्य की प्रथम
किरण के
साथ,
ऊपर और ऊपर, ताकि हम भी
प्रबल प्रलय काल में खड़े
रहें अडिग अपनी
जगह, फिर भी
हे ! महत
वृक्ष,
हम तुम्हारे उपकार भुला न
पाएंगे, ये दृढ़ विश्वास
मैं तुम्हें दिलाना
चाहता
हूँ।

* *

- - शांतनु सान्याल 

सोमवार, 14 दिसंबर 2020

अंतहीन भटकाव - -

न जाने कितने जन्म - मृत्यु, सुख -
दुःख, योग - वियोग,  मान -
अपमान, अशेष ही रहे,
फिर भी चाहतों
के असंख्य
शून्य
स्थान, जो कुछ मिलता है उसे हम,
एक तरफ हटाए रखते हैं, उम्र
ख़त्म हो जाती है लेकिन
नहीं भरता संचय
का संदूक,
तहों
की रेखाएं आख़िरकार छोड़ जातें हैं
वृद्ध निशान, अशेष ही रहे फिर
भी चाहतों के असंख्य
शून्य स्थान, कुछ
मुहूर्त न थे
आकर्षक
लिहाज़ा मैंने दहलीज़ से उन्हें लौटा
दिया, वो अक्स थे मेरे नक़ाब -
विहीन अंतःसौंदर्य के,
उम्र की अंतिम
पड़ाव तक
ढूंढा
उसे, पा न सका दोबारा उनका कोई
अवस्थान, अशेष ही रहे फिर भी
चाहतों के असंख्य शून्य
स्थान, कितनी ही
बार एक
सुबह
से दूसरी सुबह तक करता रहा मैं
परछाइयों का पीछा, कभी
स्तम्भ विहीन उड़ान
पुल से हो कर,
कभी
कटी पतंग की डोर बन कर, उड़ता
रहा अविराम, कहीं ज़मीन
पर न गिर जाऊं
अचेत हो
कर,
इस भय से मैंने देखा नहीं मेरे पांव
की ज़मीं, धंसता गया अपने ही
अंदर, मुझे पता ही न चला
जीवन का अवसान,
अशेष ही रहे  
फिर भी
चाहतों
के असंख्य शून्य स्थान - - - - - -

* *
- - शांतनु सान्याल





रविवार, 13 दिसंबर 2020

गंधहीन आत्मीयता - -

ज्यामिति बॉक्स और ज़िन्दगी
मिलते हैं किसी परिपूरक
समीकरण की
तरह, वो
शख़्स
यूँ
तो रहता है मेरी उँगलियों के
बेहद क़रीब, फिर भी
खो जाता है नन्हें
किसी रबर
की तरह,
उसके
खो जाने और पुनः हाथ आने
के दरमियान, मैं खंगाल
जाता हूँ अंदर बाहर
सब तरफ, कुछ
पल उसके
बग़ैर
लगते हैं, किसी अधूरे सफ़र -
की तरह, कुछ लोग मिटा
कर भी दे जाते हैं,
बहुत कुछ
किसी
लौटते हुए परिश्रांत लहर की
तरह। ख़्वाबों के अंकन -
कागज़, अक्सर
ही कोरे
रह
जाते हैं, वास्तविकता की - -
खुरदरी धरातल पर,
रंगीन पेंसिलों
के नोक
टूट
जाते हैं, गोधूलि से पहले बढ़
जाती हैं परछाइयों की
दुनिया, मध्य रात
तक पहुँचते -
पहुँचते
सभी
वशीकरण के जाले अपने आप
टूट जाते हैं, तमाल पात
थे, कुछ तथाकथित
आत्मीयता !
प्रयोजन
के बाद
बड़ी
ख़ूबसूरती से फेंक दिए गए, -
उतरती धूप की मंज़िल थी
घाट की सीढ़ियों तक,
कुछ देर के लिए,
ज़िन्दगी के
पल
दीवार के सहारे यूँ ही टेक दिए
गए, सुगंध तक रहा रिश्ता
मुरझाते ही सभी फूल
नदी में फेंक दिए
गए - -

* *
- - शांतनु सान्याल 

शनिवार, 12 दिसंबर 2020

छत विहीन प्रासाद - -

मेरे चारों तरफ़ था बहुत कुछ,
उखड़े हुए वयोवृद्ध दरख़्त,
प्राचीन मंदिर के भग्न
स्तम्भ, तट
बदलती
हुई
नदी, बिखरे हुए मौन शंख,
मेरे आगे था बहुत कुछ,
खुला आसमान,
निर्वासन
का
छत विहीन चौखट। मेरे
आसपास थे असंख्य
चेहरे कुछ
उजागर
कुछ
भस्म लपेटे अघोर, मेरे
सामने था रेलगाड़ी
का आख़री
डब्बा,
अज्ञात गंतव्य, अंतहीन
जीवन पथ । मेरे पीछे
छूट गईं रहस्यमयी  
नील पोखर
की शुभ्र  
कमलिनी, खजूर गुड़ की
मिठास, सूखे धान की
अपरिभाषित
सुवास,
दौड़ता रहा बेतहाशा समय
का रथ। मेरे हाथों में
बहुत कुछ था,
फिर भी
वो
शून्य ही रहा, मेरे इर्दगिर्द
थे बहुत सारे गणितज्ञ,
उम्र भर हिसाब
किताब में
लगे
रहे, फिर भी अंत्यमिल - -
ग़लत ही रहा, जिन्हें
हमने, जी जान
से चाहा, वही
लोग  
आख़िर में रहे हमसे मीलों
विरक्त, मेरे चारों
तरफ़ क्या न
था फिर
भी
ज़िन्दगी थी, हज़ार टुकड़ों में
विभक्त - -

* *
- - शांतनु सान्याल
 

 

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

सुख नामी चिड़िया - -

झींगुर न जाने क्या गीत गाते हैं,
कुछ नए गीत लिख कर रखना,
जाते जाते श्वेतपर्णी
मेघ दल का है
ये कहना,  
खुली आँखों के ख़्वाब भरी दुपहरी
में आवारा घूमते हैं, बेवजह  
सारा मोहल्ला, कभी
कभी अच्छा
लगता
है
सहज बात को यूँ ही घुमा फिरा
के कहना, न जाने कौन
आवाज़ दिए जाता
है छत की
सीमा
से,
कटी पतंग उलझी हुई है कबूतर
की टांग से, दिल चाहता
अपने हाथों से हटा
दिए जाएं, नभ
के सीने
पर
तैरते हुए, बेमौसम के सघन मेघ,
धीरे से खोलें बंद दरवाज़े और
दौड़ जाएं, घुटनों भरी
अरण्य नदी की
गोद में, फ़र्श
पर उकेरें
कुल पच्चीस बंद घर, कौड़ियों से
जीतें ज़िन्दगी का सफ़र,
हर वक़्त नहीं होता
सुरीला, फिर
भी चलो
एक
बार पुनः जाएं, सुख नामी पखेरू
की खोज में, कभी कभी
अध खुले दरवाज़े
की ओट में
जल्दी
से
पोशाक बदलना अच्छा लगता है,
शैशव व पूर्णवयस्क के मध्य
सेतु की तरह बेवजह
जुड़ना अच्छा
लगता
है।

* *
- - शांतनु सान्याल

 

तरलीकरण - -

उस गाढ़ अंधकार में जब स्मृतियां
उतरती हैं जुगनुओं की तरह,
उन अर्ध निमग्न पलों
में, मैं हाथ बढ़ाता
हूँ, सभी दुःख -
दर्द से
उभरने के लिए, उड़ा देना चाहता हूँ
मैं सीने में बंद चातक को,
हर एक भावनाओं
को, हम चाह
कर भी,
पालतू बना नहीं सकते, खोल देता
हूँ, मैं सभी रुद्ध कपाट, कुछ
वक़्त और चाहिए कटे
हुए पंखों को, पुनः
पूर्ववत बढ़ने
के लिए,
सभी दुःख - दर्द से उभरने के लिए।
क्रमशः जीवन सिमट चला है,
समय के ताबूत में बून्द
बून्द, किसी प्रस्तर -
युगीन शंबूक
की तरह,
फिर
भी मुझे देखना है भोर का हरिद्ररंगी
वेश, तुम दिगंत में मेरी प्रतीक्षा
ज़रूर करना, कुछ देर और
लगेगी, इन उलझी
हुई पहेलियों
से पूरी
तरह
बाहर निकलने के लिए, कुछ वक़्त
और चाहिए कटे हुए पंखों को,
पुनः, पूर्ववत बढ़ने
के लिए। कुछ
पल अभी
तक,
जल बिंदुओं की तरह झूल रहे हैं - -
मायावी जाल में, कुछ उत्तर,
अभी तक, ढूँढना है बाक़ी  
समय के सवाल में,
कोहरे में डूबे
से हैं
सभी रास्ते, फिर भी ज़िन्दगी को
बढ़ना है आगे, हर हाल में,
हिमशैल को चाहिए
अदृश्य ऊष्मा
परिपूर्ण
रूप से
पिघलने के लिए, प्लावित जीवन
से उबरने के लिए - -

* *
- - शांतनु सान्याल
   
 



द्विचारिता - -

पांच उंगलियां बराबर नहीं होती,
ताकि मुट्ठी को आसानी से
बंद किया जा सके,
बस यहीं पे
आकर
समाजतंत्र, साबुन की तरह हाथ
से जाता है फिसल, श्रेणी -
भेद का प्रारम्भ जन्म
से ही शुरू हो जाता  
है, उत्तरोत्तर
शाखा -
प्रशाखाओं से कहीं बहुत आगे -
वो जाता है निकल। बस
हम दिवार पर लिखे
स्लोगन की
तरह,
बड़ी ख़ामोशी से देखते रहते हैं
सभी हादसे, वास्तव में
हम सब कुछ जान
कर भी अनजान
सा भान
करते
हैं, नर नवजात के पैदा होने पर
समानता का मुखौटा उतार
कर, ऊपर वाले का
शुक्रिया अदा
करते
हैं, इसी तरह से हर एक मोड़ पर
पौरुष का मिथ्या बखान
करते हैं, सब कुछ
जान कर भी
अनजान
सा  
भान करते हैं। जीवन बेल की है
अपनी ही अलग कहानी,
सूखे पत्तों को ख़ुद
वो चाहता है
कि झर
जाए,
ताकि वो नए पत्तों को जन्म
दे पाए, आज के कृष्ण को
देखा है मैंने, बहुत
ही नज़दीक से,
रौशनी
से
झिलमिलाते हुए सभागार में,
कोई सुदामा, भूले से भी
उसके क़रीब न
जाए - -
* *
- - शांतनु सान्याल  
 

गुरुवार, 10 दिसंबर 2020

अंतःस्तर - -

इस शहर के अंदर हैं न जाने कितने
ही शहर, प्याज के परतों में हैं
बंद कुछ अश्रु जल, देखना
है इसे तो चलना होगा
मीलों पैदल, सब
कुछ बयां
नहीं
कर सकती दूरबीन की नज़र, मेरी
मातृभाषा है केवल नीरवता, मैं
सुन्दर शब्दों में लिख नहीं
सकता, अंधकार
में बसने वालों
की आत्म -
कथा,
रात है एक उग्र नदी, न जाने किस
की खोज में, हर पल उन्माद
सी है भटकती, दुर्ग के
अन्दर हैं, अगणित
अणु दुर्ग, देह के
अंतःपुर
में हैं
असंख्य देहांतरण, पुनरपि जननं -
पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी
जठरे शयनम् - - शेष -
प्रहर अपनी धुन
में मंत्रोच्चार
के साथ
दूर
दिगंत की ओर एकाकी बढ़ा जा रहा
है, घने कोहरे में प्रेम - घृणा,
अपने - पराये, हिसाब -
किताब के परत
दर परत
सभी
बिखर चले हैं, समय, अस्फुट लहज़े
में बड़बड़ाते हुए कहता है, "तुम
कापुरुष से कालपुरुष बनों,
जीवन के इन अवशिष्ट
पृष्ठों को मुखरित
करो, भाषाहीन
अस्तित्व
को
पुनरुच्चारित करो; अंधकार से ही
उदय होता है उजालों का शहर,
तुम्हें लौट आना होगा
हर हाल में इसी
रहगुज़र"
इस
शहर के अंदर हैं न जाने कितने ही
शहर - -

* *
- - शांतनु सान्याल


 
 


 


 





शून्य की महत्ता - -

उस अलिंद से उतरती, दूधिया रौशनी
में, कितनी ही परछाइयों ने दम
तोड़ दिया, समारोह के अंत
में, ख़ाली कुर्सियों की
मौन पंक्तियों
में, जीवन
पाता
है, कुछ ख़ुश्बुओं के उतरन, जिन्हें -
लोगों ने भरपूर उपयोग किया,
और बेतरतीब से छोड़
दिया, कितनी ही
परछाइयों ने
दम तोड़
दिया।
कुछ भावनाएं थे अस्तर, जिन्हें ओढ़ा
गया, बहुत कुछ छुपाने के लिए,
ताकि वास्तविकता कहीं
प्रकाशित न हो जाए,
कितने रिश्तों
में छुपे
होते
हैं अति सूक्ष्म गाँठ, जिन्हें लोग बड़ी
ख़ूबसूरती से, सभ्यता की गठरी
में छुपा रखते हैं, उजाले -
अंधेरे के मध्य कहीं,
वो गोपन लेन
देन खुल के
यूँ ही
उद्भासित न हो जाए, वास्तविकता
कहीं प्रकाशित न हो जाए।
रात के स्थिर जल में
डूबते और उभरते
रहे न जाने
कितने
ही
घावों के बहते हुए द्वीप, शून्य की
है अपनी जगह अलग विशेषता,
गुणन विधि में शून्यता
का विस्तार भूला
देता है सब -
व्यथा,
उस खोखले समय में ख़ुद के सिवा
कोई नहीं होता जीवन के
समीप, डूबते और
उभरते रहे न
जाने
कितने ही घावों के बहते हुए द्वीप।

* *
- - शांतनु सान्याल

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

अनंत अभिलाष - -

कुछ अनकही बातें जमे रहने दो
अधर कोनों में, ईशानी मेघ
की तरह, निरुद्ध चाहतों
की साँझ, चाहती है
अप्रत्याशित
उष्णता,
कुछ
और अंधकार को होने दो निरंध्र  
अपारदर्शी, सजल भावनाओं
को रहने दो, यूँ ही अर्ध -
सुप्त रजनीगंधा
के वृन्तों
में
आबद्ध, ये पल चाहते हैं कुछ
अधिक पूर्णता, निरुद्ध
चाहतों की साँझ,
चाहती है कुछ
और
अंतहीन उष्णता, अभी तक
है आलोक विहीन, रात -
रानी का मंच, दूर
से आने को है
जुगनुओं
के
जुलूस, जलने को हैं अंतर की
अनंत आवेग शिखा, चाँद
को बिखेरने दो कुछ
और अधिक
मोहनी
माया,
जागने दो ज़िन्दगी को किसी
देवदूत की रूह से, रहने
दो मेरे सीने में कल
तक जीने की
मुग्धता,
ये पल
चाहते हैं कुछ अशेष पूर्णता - -

* *
- - शांतनु सान्याल




भीड़ में भी एकांतवास - -

बिहान और साँझ के दरमियान
बह चुका है एक अजस्र जल -
धार, अब शब्दहीनता  
के साथ बातें
करता है
गाढ़
अंधकार। प्रस्रव मर्मघातों पर
रात्रि रख चली है, ओस में
भीगे हुए कुछ सजल
अनुकंपाओं के
कपास,
मौन
उड़ान सेतु के नीचे शीतकातर
ख़्वाब खोजते हैं, अज्ञात
सीने के सराय किसी
निद्रालु आँखों के
आसपास।
अंतिम
प्रहर खड़ा है सामने लेकर कुछ
कोरे काग़ज़, मूल्यवान
विनिमय, कुछ बंधक
की सामग्री,
असल
में
बिना मूल्य के कोई नहीं यहाँ
किसी का जमानतदार,
दिगंत के अदृश्य
रौशनी के
लिए
जीवन कर देता है शून्य पन्ने
में हस्ताक्षर, निष्प्राण
देह पड़ा रहता है
वसुधा की
गोद
में,
प्राणों का पलायन है बदस्तूर
कभी इस पार, कभी उस
पार, मैं समय से बार
बार कहता हूँ मुझे
जीना है कुछ
दिन
और, लौटाना है मुझे वापसी के
असंख्य उपहार, मुश्किल
है यहाँ वलय पाश
से बचाने
वाला,
कोई नहीं यहाँ निःस्वार्थ किसी
का मददगार - -

* *
- - शांतनु सान्याल  


मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

शहरतलीय लोग - -

युगों युगों से परिभाषाओं का जारी है
बदलना, अस्पृश्य से हरिजन
तक वही पेंचदार वर्ग-
पहेली, अचानक
एक दिन
तुम
ने कहा - ग़रीब शब्द अभिशापित, -
लाचार सा लगता है, लिहाज़ा
ख़ुद को ग़रीब न समझो,
अब उन्हें कौन ये
समझाए कि
ग़रीब
कोई
शौक़ से तो नहीं होता, चलो ठीक है,
शब्दों के हेर फेर से ज़िन्दगी
बदल जाए तो ख़राब
क्या है, ये सोचते
समझते, हम
इस स्तर
पर आ
गए जहाँ मेरुदंड टूट कर रिक्त उदर
से बाहर निकलता है, वो फिर
एक दिन तमाम लाव
लश्कर के साथ
आ पहुंचे,
और
शून्य में संविधान की एक आदम क़द
श्याम पट टांग दी, हाथों में एक
खड़िया देते हुए कहा - इस
पर एक लम्बी सरल
रेखा खींचिए
हम ने
हाँपते हुए किसी तरह से उस रेखा को
आगे बढ़ाया, वो बहुत दयावान
थे हमारी हालत पर ग़ौर
करते हुए कहा -
आप बैठ
जाएं,
वैसे हम खड़े ही कब थे, उन्होंने ठीक
सरल रेखा के नीचे एक बिंदु
डालते हुए कहा आप
लोग ग़रीब नहीं
हैं, बल्कि
इस
दारिद्र्य रेखा के उपनगरीय लोग हैं,
शहर से जुड़ने में कुछ और
वक़्त लगेगा - -

* *
- - शांतनु सान्याल
 

अभ्यंतर कस्तूरी - -

किस मोह में है धावित माया मृग,
खोजता है जीवन, स्वयं के
अंदर स्वयं की ही
प्रतिच्छाया,
किस
लिए इतनी पिपासा, किस मरुधरा
में हैं घनीभूत, सभी भ्रामक
मृग तृष्णा, सहसा
उठें रेत के
झंझा,
सांध्य आकाश में बुझ जाए ध्रुव - -
तारा, किस लिए अमरत्व
की चाह, माटी से है
उद्गम, माटी में
ही मिल
जाए
तथाकथित स्वर्णिम काया, किस
लिए ढूंढता है जीवन, स्वयं
के अंदर स्वयं की ही
प्रतिच्छाया।
पश्चिम
की
ओर विलीन हुए भ्रमणकारी दल  
लेकर नील आकाश का
शामियाना, सांद्र
तिमिर के
अंदर,
मैं
खोजता हूँ उसकी प्राणदायिनी -
मृदु स्मित में, केवल एक
रात का ठिकाना,
नभ विहीन
सृष्टि
में
भरना चाहता हूँ, उसके आँखों से
टपकते आलोक पुञ्ज,
अधर के कुछ
अमिय
बिंदु,
सीने का पवित्र दहन, सृजनकारी
आलिंगन, निःश्वासों के मधु
गंध कोष, सिक्त माटी
का शरीर लिए महा
समर्पण, उस
अदृश्य
चाक
के भीतर पुनर्प्रवेश, उस प्राणेश
के हाथों पुनर्गठन, फिर
जागृत हों सुप्त
जीवन के
कुछ
निष्क्रिय मुहूर्त, जिनमें जीवन का
अर्थ है समाया, तलाश करे
जीवन, कुछ विस्मृत
दिगंत की नव
प्रतिच्छाया।

* *
- - शांतनु सान्याल



सोमवार, 7 दिसंबर 2020

उपांतरण - -

सब कुछ समाप्त कभी नहीं होता,
आदमी टूटे हुए दर्पण के
आगे फिर खड़ा
रहता है
हाथ
में लिए हुए गीली माटी का प्रलेप,  
बिखरे हुए ख़्वाबों को इकट्ठा
करता है एक के बाद
एक, फिर गढ़ता
है प्रतिमा
नए
रूप रंग में, जनशून्य बन्दरगाह  
में खड़ा है, आधीरात से
जलयान, लेकर
अपने वक्ष -
स्थल
में
उजालों की खेप, समुद्र को छूना
चाहता है आदमी, हाथ में
लिए हुए गीली माटी
का प्रलेप। अंध -
पलों से वो
रचता
है
भोर की लालिमा, दिगंत पार के
अनछुए प्रदेश, वो समय के
आगे फिर खड़ा होता
है पूरी तन्मयता
से, वो कहना
चाहता
है
वो विसर्जित नहीं हुआ, उसमें -
अभी तक बहुत कुछ है बाक़ी,
बार बार पराजित होने
का उसे ज़रा भी
नहीं है कोई
झेंप,
आदमी
नील
आकाश को उतारना चाहता है
अपने अंतरतम के
भीतर, हाथ में
लिए हुए
गीली
माटी का प्रलेप।

* *
- - शांतनु सान्याल


सुदूर आत्म प्रदेश - -

शीतकाल के अंत में, जब महुआ पेड़
के पल्लव विहीन टहनियों में
उभरते हैं पुष्प शंकु, उस
पतझर के मौसम
में अरण्य -
नदी
ख़ुद को अपने ही में समेट कर बहे
जाती है, सुदूर प्रिय मिलन
की चाह में, उन्हीं मंथर
धाराओं में जीवन
खोजता है,
उसके
सीने के गुप्त जलस्रोत, शिलाखंडों
के नीचे लुप्तप्राय द्वीप,
उतरती धूप रहना
चाहती है कुछ
पलों के
लिए
उसके अंतरतम की पनाह में, सुदूर
प्रिय मिलन की चाह में। कुछ
सिक्त भावनाओं के अर्घ्य
उभर आते हैं, उसके
नयन कोरों में,
कोई भग्न
मंदिर
चाहता है पुनरुद्धार, चाहते हैं प्राण
प्रतिष्ठा कुछ शून्य विग्रह -
स्थान, कुछ दिव्य
प्रणय करते हैं,
नव जीवन
का
आह्वान, शनैः शनैः नदी बढ़ती -
जाती है मुहाने की ओर,
अंततः उसे मिलती
है मुक्ति महा -
सागर के
अथाह
में,
सुदूर प्रिय मिलन की चाह में - - -

* *
- - शांतनु सान्याल
     


 





रविवार, 6 दिसंबर 2020

अनंत सुख - -

वो स्वर्ण मृग जिसे मैं खोजता
रहा न जाने कहाँ कहाँ,
गिरि कंदराओं से
सघन अरण्य
तक,
वो था अंतःशील मेरे ह्रदय के
अंदर, वो कुछ और नहीं,
उन्मुक्त प्राणों से
हंसने का है
सुख, हर
हाल
में आनंदित रहने का अनंत
सुख, मैं भटकता रहा
बेवजह कोहरे के
देश में, सुख
की धूप
थी
चिरस्थायी मेरे अभ्यंतर,वो
था अंतःशील मेरे ह्रदय
के अंदर। दरअसल
मैं देखता रहा
दुनिया
को
एक प्रचलित बाह्य दृष्टि से,
भीतर मेरे गहराता गया
अभिलाषों का अशेष
अंधकार, क्रमशः
मैं गढ़ता
गया
कल्पित सुख का संसार, जब
कि मेरे अंतर्मन में था,
आलोकमय लहरों
का समंदर,   
वो था
अंतःशील मेरे ह्रदय के अंदर।

* *
- - शांतनु सान्याल
 



आकलन के परे - -

जीवन की कहानियां, सभी एक
दूसरे से मिलती जुलती सी
रहीं, सिर्फ़ बदलते गए
हर एक मोड़ पर
किरदार,
हम
ने चाहा कि पृथ्वी का रंग रूप
रहे, हमारी कल्पनाओं के
आधार, जिस में हर
एक पौधे  को
मिले
सके उसके हिस्से का प्रकाश,
लेकिन स्वप्न तो स्वप्न
थे, उतर आए धूसर
ज़मीं पर अंततः
थक हार,
क्या
हेमंत और क्या बसंत, नहीं
कोई जीवन में अंतराल,
अरण्य बेल का
आरोहण,
कभी
नहीं रुकता, वो अनसुना कर  
जाता है, ऊँचे पहाड़ों के 
ललकार, उसका
योग - वियोग
सब कुछ
है
बराबर, वो न कोई योगी, न ही
महत शख़्सियत, वो इंसान
है केवल आत्मकेंद्रित,
उसे ख़ुद के सिवा
नहीं किसी से
कोई भी
सरोकार, कुछ लोग जूझते रहे
उम्र भर ख़ुद को कुछ
साबित करने के
लिए, कुछ
लोग
येन प्रकारेण, सत्य असत्य के
परे पहुँच गए वृष्टि छाया
के पार, सिर्फ़ बदलते
गए हर एक मोड़
पर किरदार,
कदापि
तालियों से नहीं साबित होता
कौन कितना है -
असरदार।

* *
- - शांतनु सान्याल



 

शनिवार, 5 दिसंबर 2020

सत्य ही शाश्वत है - -

सत्य की परिभाषा अक्षय है वो
कभी नहीं बदलती, चाहे
कोई भी, उस पर
विश्वास न
करे,
झूठ आख़िर झूठ रहता है चाहे
सारी दुनिया, उस पर
आँख मूँद कर
यक़ीं करे,
गुरु
द्रोण हर युग में होते हैं असत्य
का शिकार, कुछ लोग
जीत कर भी हार
जाते हैं, ये
और
बात है, कि वो न करें उसे पूर्ण
स्वीकार, लेकिन एकांत
क्षणों में, मौन दर्पण
करता है, अंग
प्रत्यंग
में
नग्न सत्य से प्रहार, भीतर का
महाभारत झूठ के साए
में कभी समाप्त
नहीं होता,
सत्य
का
रथ है कालजयी, चुपचाप कर
जाता है त्रिलोक पार, वो
नहीं करता है, किसी
अश्वत्थामा का
इंतज़ार।

* *
- - शांतनु सान्याल     

 

एकाकी बेंच - -

समय स्रोत निरंतर बहता जाए,
जिन लहरों को अभी अभी
हमने छुआ है फिर
दोबारा वो
हाथ
न आए, कितने ख़्वाब किनारे
आ लगे, कितने बैठे रहे
अपनी जगह, काग़ज़
की नाव बहती
जाए, कुछ
यादें
हैं बहुत ही हठीले, अल्बम से -
निकल, नदी घाटों में हैं
जा बैठे, विगत पलों
की धूनी रमाए,
वो सभी
हैं
नाज़ुक शीशमहल की बहुरंगी
मछलियां, जल कुंड टूटते
ही, ख़्वाहिशों के सांस
फ़र्श पर दूर तक
बिखर जाए,
पार्क का
बेंच
राह तकता है न जाने किसका,
ढलते धूप के साथ, बैठा
हुआ तो है सूखा
पत्ता, धीरे -
धीरे लोग
फिर
निकलेंगे अपने अपने असमय
के बंदी गृह से, मुँह में लपेटे
दूरत्व का मुखौटा !
इंसान जाए
भी तो
आख़िर कहाँ जाए - -

* *
- - शांतनु सान्याल


 
 




 

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

नैतिक चरित्र - -

उबड़-खाबड़ रास्ते बहुधा ले जाते
हैं, अनछुए, ख़ूबसूरत निसर्ग
की ओर, शर्त सिर्फ़
इतनी है कि
हमें उन
विषम
राहों से गुज़रना है, यूँ तो हर मोड़
पर मिल जाएंगे, कितने ही
छद्म रहनुमाओं के
ठिकाने, ये
हमें
स्वयं ही तय करना है किस जगह
पर ठहरना है। छलावरण की
इस दुनिया में चेहरों को
पढ़ना, इतना भी
आसान
नहीं,
हर तरफ़ हैं बिखरे हुए कितने ही
अदृश्य नागपाश, हर हाल
में बचते बचाते, इस
भीड़ भरे शहर में
आगे की
ओर
हमें निकलना है, नैतिक किताबों
का ठिकाना, सिर्फ़ उस रद्दी -
वाले को है मालूम, किस
गली में है वो कबाड़ -
ख़ाना, किस
दुकान में
है उन
नैतिक चरित्रों का आना - जाना, -
हम तो ठहरे अप्रसिद्ध लोग,
हमें बहरहाल, वक़्त के
हमराह यूँ ही जीना
मरना है, हमें
हर विषम
राहों से
सुबह शाम गुज़रना है - - - -

* *
- - शांतनु सान्याल
 

 

अविरत प्रयाण - -

गले लगाने की कला जिसे आ जाए,
वही बंजर ज़मीन पर जीवन
बीज उगाए, दुःख - दर्द
के झंझा आते
जाते रहे,
साथ
अपने अक्सर बरसात को भी लाते
रहे। वो प्रतिरोध पत्थर था
जिसे हटाना आसान
न था, मैंने उसे
लांघना
ही
उचित समझा, बस उसी जगह से
मेरा सफ़र शुरू हुआ, राह में न
जाने कितने, कुछ पक्के,
कुछ कच्चे, मक़ाम
आते - जाते
रहे,
समय की भट्ठी में, भीगे सपनों के
असंख्य सुराही, हम पकाते
रहे। गंतव्य बिंदु अपना
परिचय पत्र अक्सर
छुपाती रही, मृग
जल की
तरह
अक्सर, रास्ता भटकाती रही - -
लेकिन न रुका ज़िन्दगी का
कारवां, चंद्र विहीन
रात में भी तारे,
उजालों
की
दिशा दिखलाते रहे, दुःख - दर्द के
झंझा आते जाते रहे।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

अनुत्तरित पल - -

 

अनेकों बार हम, ग़लत नहीं होते,
हमें जो सही, साबित कर
सके, बस, वो शब्द  
नहीं होते, इसी
बिंदु पर

कर रुक जाती है ज़िन्दगी, कैसे
समझाएं तुम्हें, हर इम्तहान
के नतीजे, शत प्रतिशत
नहीं होते। सुबह
और शाम
के
दरमियां, समय के हाथों सूरज
था महज एक खिलौना,
कुछ अंतरतम के
आधी रात
वाले
सूर्य कभी अस्त नहीं होते। सब
खेल है हथेली के रेखागणित
का, बहुत कुछ मिलने
के बाद भी कुछ
लोग हाथ
फैलाते
रहे
शून्य के सामने, काल निर्णय है
अपनी जगह चिरस्थायी,
कुछ फ़ैसले, लाख
कोशिशों के
बाद भी
कभी
निरस्त नहीं होते। फिरकी वाले
की तलाश असमाप्त ही रही,
चेहरे में उभर आए
असंख्य झुर्रियों
के निशान,
वो थमा
के
मोह माया की फिरकी हो चुका
है जाने कब अंतर्ध्यान,
समय नहीं थमता,
हर एक दिवार
घड़ी, बंद
होने
पर दुरुस्त नहीं होते, अनेकों बार
हम ग़लत नहीं होते - -

* *
- - शांतनु सान्याल
    

गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

एक और मौक़ा - -

कमज़ोरी ग़र ज़ाहिर हो जाए तो
ज़माने को खिलौना मिल
जाएगा, लाज़िम था
अंधेरे से निकल
कर उजाले
में खुल
के
सांस लेना, उसकी हँसी में तंज़
था, मधु में नीम घुली हुई,
धीरे - धीरे हमने भी
आख़िर सीख ही
लिया, मीठी
ज़बान को
बोलने
की
अदा, चाँदनी में धुली हुई, न
इस में कोई जीत है न
ही कोई हार, हर
एक का है ये
पैदाइश
हक़
कि उसे जीने का मौक़ा मिले,
कौन नहीं चाहेगा खुली
हवाओं में पुरसुकूं
जीवन जीना,
ज़रूरी है
उसे
एक मुश्त रौशनी के लिए एक
अदद झरोखा मिले,
दोबारा उसे जीने
का मौक़ा
मिले।

* *
- - शांतनु सान्याल  

 

आर्द्र तृष्णा - -

उलझी हुई है ज़िन्दगी कई अदृश्य
कोणों में, बेहतर है इसी में
कि कोई जवाब न
मांगा जाए,
जब
कभी चाहा उसे समझना, हर एक
मोड़ पर, वो सवाल बदलती
चली गई, कोई भी पल
परिपूर्ण नहीं, न
जाने किस
बात
की है दिल में दहशत, अबेकस पे
थी मेरी उंगलियां, रंगीन
मनकों को गिनते -
गिनते मायावी
रात ढलती
चली
गई, हर एक मोड़ पर, वो सवाल
बदलती चली गई। सर्दियों
की धूप की तरह पहलू
बदलती रही, मेरे
अंदर की
नदी,
सागर की प्यास सिर्फ़ पृथ्वी को
है पता, मुहाने पर आ कर
नदी, करवट बदलती
चली गई, हर
एक मोड़
पर,
वो सवाल बदलती चली गई। - -

* *
- - शांतनु सान्याल


बुधवार, 2 दिसंबर 2020

अंतहीन खोह - -

लहरों की भाषा बहुत गूढ़ हैं फिर
भी समुद्र पढ़ना चाहता है
उसे गहराई तक, हर
बार विफल होता
है, लेकिन
उसका
ये प्रयास, साहिल की झाग मिटा
देती है हर बार, शब्दों के
सजल विन्यास, वो
कोई प्रेम था या
कोई कायिक  
सम्मोह,
वक्ष -
स्थल पर छोड़ गया कोई आदिम
मौन विद्रोह, किनारे में बिखरे
पड़े हैं, कितने ही मृत शंख,
सीप, प्रवाल, समय
छीन लेता है यूँ  
ही अपना
शुल्क,
व छोड़ जाता हैै आईने के अंदर
अंतहीन खोह, धृतराष्ट्र की
तरह हम करते हैं मृत
दुर्योधन की अथक
तलाश, बिम्ब
मोह जाता
नहीं
अनायास, साहिल की झाग - -
मिटा देती है हर बार,
शब्दों के सजल
विन्यास।

* *
- - शांतनु सान्याल   
 
 

प्रकृत शिल्पकार - -

जीवन की यात्रा छोटी ही सही जीने
का ख़ुमार न उतर पाए, हर
शख़्स के दिल में कहीं
न कहीं एक सोया
सा चित्रकार
होता है,
कुछ
भावनाएं, जल बिंदुओं में खोजती हैं
स्वरलिपि, कुछ मौन पलों में
जीवन एक बेहतरीन सा
गीतकार होता है,
कभी देखो
तो ज़रा
उन उदास आँखों के कैनवास में, हर
एक बच्चा कुछ रंगीन पेंसिलों
का तलबगार होता है,
किस के भीतर
क्या है ये
सिर्फ़
समय बता सकता है, वो मासूम जो
अभी अभी, नज़र के सामने से
गुज़रा है, साइकल की
जंग लगी रिंग
घुमाते
हुए,
किसे ख़बर, कल वो ख़्वाबों को यूँ
ही अपनी उंगलियों से घुमायेगा,
हर चेहरे में कहीं न कहीं
छुपा हुआ कलाकार
होता है, कुछ
लोग नहीं
लिख
पाते अपनी दिल की बातें कोरे - -
पृष्ठों में, लेकिन उन्हीं के
हाथों में कहीं, शिल्प
गढ़ने का अदृश्य
सृजनहार
होता
है।

* *
- - शांतनु सान्याल  
 
 

आकाशरंगी समुद्र - -

ह्रदय मुहाने की ज़मीं रहती है सदा
बालुओं से भरी, ज्वार-भाटा
आते जाते रहे, ज़िन्दगी
को यूँ ही दूर से
समुद्र हम
दिखाते
रहे,
हमें ज्ञात है समय का जलोच्छास,
बहाने से पहले देता नहीं वो
ज़रा भी अवकाश, फिर
भी ज़िन्दगी भर
हम उससे
हाथ
मिलाते रहे,  ज़िन्दगी को यूँ ही -
दूर से, समुद्र हम दिखाते
रहे। हर उजली चीज़
हो, सौ फ़ीसदी
ख़ालिस,
ये
हर बार ज़रूरी तो नहीं, उस सफ़ेद
गिरेबान के अंदर क्या है,
कमीज़ उतारने वाले
को है अच्छी
तरह पता,
वो
चेहरा था अपने आप में कोहरे से
कम नहीं, अंदर न जाने,
कितनी ही छुपी हुई
हैं अंध गलियां,
फिर भी
लोग
उसे उजाले का अवतार बताते रहे,
ज़िन्दगी को यूँ ही दूर से,
समुद्र हम दिखाते
रहे।

* *
- - शांतनु सान्याल   
 
 
 

मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

दूर दराज की ख़ुशियाँ - -

वृन्त चाह कर भी नहीं रोक पाता,
पंखुड़ियों का झरना, सूर्य के
अश्व रुकते हैं नदी के
पश्चिमी उपकूल
में, समय
का
पहिया उड़ा जाता है सभी कल्पित
चरित्र, गोधूलि की धूल में।
संध्या उतरती है, सधे
पांव, टिमटिमाती
हुई, डिबरी के
अहाते,
छूना
चाहता हूँ मैं, गिरते हुए सूखे पत्ते
की रूह को नज़दीक से, कैंची
मारता हुआ अंधकार, धीरे
धीरे रात को गति दे
चुका है, पीपल
के पात हिल
रहे हैं
या
स्थिर हैं, कहना मुश्किल है ये
छायावृत्त दिखते हैं, बड़ी
ही अजीब से। चूल्हे का
धुआं है उठता हुआ,
या सिलबट्टे
में पिसी
हुई
ज़िन्दगी केवल स्वादों में ढल कर
रह गई, कुछ सुख थे पहुँच के
बाहर, चलो अच्छा ही
हुआ जेब थी फटी
हुई, झूलने
दो यूँ
ही
शून्य में ख़्वाबों को, देख कर मेले
की वास्तविकता, बची कुचि
दिल की हसरत भी
निकल कर
रह गई।

* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

शून्यता की गहराई - -

उन निःस्तब्ध पलों में हमने बोया
था कुछ सपनों के बीज, कुछ
असमय ही कुम्हलाए,
कुछ रहे सीने के
अंदर आंशिक
अंकुरित,
उन्ही
बीजों से शून्य में उभरते हैं छाया -
पथ, मध्य रात्रि में होती हैं
असंख्य उल्कापात,
पिरामिड के
शीर्ष में
जीवन
पुनः गढ़ता है, शून्यता का निर्भूल
रेखा गणित, कुछ स्वप्न रहे
सीने के अंदर आंशिक
अंकुरित। मेघ के
नेपथ्य से
उड़
चला है किसी और अज्ञात नगर
की ओर, रास पूर्णिमा का चाँद,
देह कदम्ब से झर चले हैं,
पीत वर्णीं पात, सब
साज - श्रृंगार
बिखरे
हुए
हैं बेतरतीब, न जाने कौन चला
गया एक शून्यता छोड़ कर,
अंतिम प्रहर भी है कुछ
सहमा हुआ और
स्तम्भित,
जीवन
पुनः
गढ़ता है, शून्यता का निर्भूल - -
रेखा गणित - -

* *
- - शांतनु सान्याल

अंदरूनी सौंदर्य - -

उजान स्रोत के सभी थे सहयात्री,
प्रतिकूल बहाव में दूर तक
कोई न था, दोनों तट -
बंधों से फिर भी
आती रही
शंख -
ध्वनि, ग्रह नक्षत्रों की भूल भुलैया
में विज्ञान चाहे, जितना भी
गोता लगाए, डूबते पलों
में कोई अमूर्त सत्ता
अदृश्य हाथों
से हमें
उबार लाए, अंतरतम से निकली
प्रार्थना, कभी होती नहीं
अनसुनी, दोनों तट -
बंधों से फिर भी
आती रही
शंख -
ध्वनि। न कोई सेतु न कोई घाट
न कोई दिशा यंत्र, अंतर्मन
की पूजा चिरंतन न
कोई पोथी न
ही पुराण
कुछ
है तो सिर्फ़ जिओ और जीने दो
का अमूल्य मन्त्र, बाह्य
सौन्दर्य नहीं अनंत,
प्रकृत सुंदरता
होती है
सिर्फ़
अंदरूनी, अंतरतम से निकली
प्रार्थना, कभी होती नहीं
अनसुनी। एकाकी
दरअसल मैं
कभी न
रहा,
हालांकि, बहुधा मेरे आसपास
कोई न था, आवश्यकता
से अधिक वर्चस्व
की चाहत ही
कर जाती
है मन
को
बोझिल, वो निराकार रह कर
भी होता है शामिल हमारे
अस्तित्व के अंदर,
फिर क्यों
इतनी
व्याकुलता, जो कुछ इस पल
में पा लिया, वही मेरी है
नियति, इस जीवन
का हूँ मैं अनंत
ऋणी,
अंतरतम से निकली प्रार्थना,
कभी होती नहीं
अनसुनी।

* *
- - शांतनु सान्याल

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past