Sunday, 11 August 2019

डूबते साहिल के दरमियां - -

अभी अभी उतरा है अरण्य नदी का सैलाब,
और छोड़ गया है दूर तक तबाही का
मंज़र, कुछ अधडूबे मकानों के
बीच लहराते हैं टूटे हुए मेरे
ख़्वाब। अभी अभी
दिगंत ने फिर
ली है
अंगड़ाई, उभरते हुए टीले से फिर मैंने देखा
है राहतों का सवेरा, उभरते - डूबते हुए
इन पलों में किनारे छूटते नहीं,
हर हाल में ज़िन्दगी ढूंढ़
ही लेती है कहीं न
कहीं उम्मीद
का डेरा।
अभी अभी तुमने थामा है मेरे काँपते हाथ - -
अब दोबारा डूब भी जाएं तो कोई ग़म
नहीं, माझी की भी हैं  अपनी
अलग मजबूरियां, मेरी
जां से उसकी जां
कुछ कम
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल


 

Saturday, 10 August 2019

पारदर्शी वक्षस्थल - -

उन निःस्तब्ध क्षणों में, कुछ अदृश्य
अश्रु कण भी, निश्चित झरे मेरी
आँखों से, आँचल की थी
अपनी ही अलग
परिसीमा,
यूँ तो न जाने कितने पुष्प झरे, उन -
नाज़ुक शाखों से। मेरी चाहतों
का हासिल जो भी हो,
लेकिन, मेरी
प्रीत का
कोई हिसाब नहीं, आँखों की लिपि से
लिखी, उस गहन अनुभूति की
शायद, कोई किताब नहीं।
ईशान कोणीय मेघ
थे या घनीभूत
झंझावर्त,
बरसे लेकिन अपने ही शर्तों पर, यूँ -
तो सारा जिस्म था ज़ंजीरों से
जकड़ा हुआ, फिर भी यूँ
लगा सावनिया बूंदें
गिरें शीशे के
परतों पर।

**
- शांतनु सान्याल   

Friday, 2 August 2019

चतुष्कोण - -

उस चतुष्कोण से निकलना इतना नहीं सरल,
हर एक मिलन बिंदु से निकलते हैं न
जाने कितने प्रतिबिंब, न कोई
बही खाता, न ही कुछ वहाँ
लिपिबद्ध, उस प्रश्न
का मुश्किल है
खोजना
हल, उस चतुष्कोण से निकलना इतना नहीं -
सरल। अनुप्रवाह के सभी सहचर, लेकिन
विपरीत स्रोत में एकाकी जीवन, न
कोई माझी, न कोई प्रकाश -
स्तम्भ, बहता जाए
अस्तित्व मेरा
स्वतः
अविरल, उस चतुष्कोण से निकलना इतना नहीं
सरल। उस पुरातन सत्य के नेपथ्य में नव
पल्लव खोजें नवीन प्राण वायु, यद्यपि
इस मायावी जगत में कोई नहीं
चिरायु, हर एक पग पर हैं
विद्यमान कोई न कोई
प्रतिस्थापन, रिक्त
स्थानों का होता
रहता है यूँ
ही अदल-बदल, उस चतुष्कोण से निकलना इतना
नहीं सरल।

* *
- शांतनु सान्याल

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