Sunday, 11 August 2019

डूबते साहिल के दरमियां - -

अभी अभी उतरा है अरण्य नदी का सैलाब,
और छोड़ गया है दूर तक तबाही का
मंज़र, कुछ अधडूबे मकानों के
बीच लहराते हैं टूटे हुए मेरे
ख़्वाब। अभी अभी
दिगंत ने फिर
ली है
अंगड़ाई, उभरते हुए टीले से फिर मैंने देखा
है राहतों का सवेरा, उभरते - डूबते हुए
इन पलों में किनारे छूटते नहीं,
हर हाल में ज़िन्दगी ढूंढ़
ही लेती है कहीं न
कहीं उम्मीद
का डेरा।
अभी अभी तुमने थामा है मेरे काँपते हाथ - -
अब दोबारा डूब भी जाएं तो कोई ग़म
नहीं, माझी की भी हैं  अपनी
अलग मजबूरियां, मेरी
जां से उसकी जां
कुछ कम
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल


 

2 comments:

  1. शान्तनु दा, बहुत खूबसूरत शब्द चित्र और उसके माध्यम से जीवन और निजता को जिस प्रकार आपने जोड़ा है, वो सचमुच बहुत सुन्दर है।

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  2. असंख्य धन्यवाद आदरणीय मित्र - - नमन सह।

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