बुधवार, 30 मई 2018

निःशब्द समझौता - -

काग़ज़ के फूलों की तरह कुछ आवेग
अपने आप झर जाते हैं, रह जाती
हैं अगर कुछ तो, वो है काँटों
के नोंक पर ठहरी हुई
एक बूँद की तरह
चाहत की
नमी,
कुछ नज़दीकियाँ मौन रह कर मुँह - 
चिढ़ाती हैं और धूसर स्मृति को
बेवजह साफ़ करती हैं, अब
कौन इन्हें समझाए कि
अलबम बदलने से
तस्वीर रंगीन
नहीं होते,
बस
एक मीठी टीस दे जाते हैं। तुम और
मैं आज भी उतने ही क़रीब हैं
जितने कि कभी हुआ
करते थे, पहले
शायद हम
एक
दूसरे की ज़रूरत थे या मजबूरियों के
तहत कोई मैत्री पुल, जो भी हो
उन्ही स्तम्भों के सहारे
हमने जीवन की
लम्बी यात्रा
की, और
आज
हमारे बीच छुपने छुपाने की कोई भी
वजह न रही, अब बिन संवाद ही
हम बन गए हैं पारदर्शी,
शायद यही है रूह से
रूह तक का एकल
रास्ता, जहाँ
से लौटना
नहीं
मुमकिन, अंतहीन सहयात्रा या कोई
सह मुक्ति अभियान का सूत्रपात,
जो भी हो अब हम बढ़  चले
हैं सुदूर धुंधभरी लेकिन
ख़ूबसूरत वादियों
की ओर - -

* *
- शांतनु सान्याल 

  

गुरुवार, 24 मई 2018

कोई रहगुज़र नहीं - -

तलाश ए सुकूं थी उम्र से
कहीं ज़ियादा तवील,
तीर सीने के पार
कब हुआ
कुछ
भी ख़बर नहीं। दर्द ओ
मुस्कान के बीच थी
इक छुअन नादीद,
फ़रमान ए
हाक़िम
का
हम पे अब कोई असर
नहीं। खुले दिल
मिलें जहाँ
राजा

रंक दोस्तों की तरह, ये
जगह यूँ तो है बेहद
हसीं लेकिन मेरा
शहर नहीं।
तूफ़ान
 की
 है अपनी अलग ही
मजबूरियां शाम
से,रहने दें
अभी
तो है आधी रात आख़री
पहर नहीं। अब तुम
भी चाहो तो
आज़मा
लो 
ईमान हमारा, हर सिम्त
है धुंध और दूर तक
कोई रहगुज़र
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल



 

मंगलवार, 8 मई 2018

अनुबंध के तहत - -

हम जहाँ से चले थे वहां कोई सायादार -
दरख़्त न था, लिहाज़ा हमने मौसम
से निःशर्त अनुबंध कर लिया,
पतझर हो या मधुऋतु
अनुभूति का रहस्य
अपनी जगह,
हमने
अपनी साँसों में सदाबहार सुगंध भर लिया।
हमें मालूम है तपते राहों पर, नंगे पाँव
चलने का दर्द, अतः जीवन के
सभी धूसर कैनवासों को,
अपनी तरह से हमने
जलरंग कर
 लिया।
तुम्हारे दहलीज़ में शायद आज भी उतरते
हैं वही धूप - छाँव के स्वरलिपि, हालांकि
हमने अपनी भावनाओं को बहोत
पहले से ही बेरंग कर लिया।
वो ख़त जो तुम तक न
पहुँच पाए कभी,
दिल के
सन्दूक में हमने उन्हें तह करके रख दिया,
उम्र की सिलवटों को रोकना नहीं
आसान इसलिए मुस्कुराहटों
से हमने सभी कमज़ोर
तटबंध भर लिया।
अपनी साँसों
में सदाबहार सुगंध भर लिया। - - - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल






बुधवार, 2 मई 2018

स्वप्न मंजरी - -

उन गहन अवशोषित क्षणों में तुम हो
कोअनाम गंध कोष, बिखरने को
चिर व्याकुल, उन उन्मुक्त पलों
में जीवन जैसे पुनर्जन्म को
हो आकुल। दिवा -
निशि के सेतु
पर झूले
सारी सृष्टि, कहीं बहे अविराम  मरू -
समीरण, कहीं झरे अंतहीन वृष्टि।
कुछ स्वप्न मंजरी मेरी आँखों
के, जाएँ तुम्हारे पलकों
के तीर, रात ढले ले
आएँ कुछ राहत
के नीर।

* *
- शांतनु सान्याल


मंगलवार, 1 मई 2018

जीवन स्रोत - -

न जाने कौन कहाँ उतरे सभी तो हैं
एक ही कश्ती के मुसाफ़िर,
किसी घाट पर दीपमाला
बहे संग जलधार,
और किसी
तट पर
जा लगे सपनों का चन्द्रहार, कहीं से
निकले संकरी पगडण्डी और
पहुंचे किसी मीनाबाज़ार,
कहीं जीवन मूल्यों में
अपर्ण और कहीं
मूल्यों का
व्यापार,
न जाने कौन कहाँ से आ मिले इस -
पथ के मिलन बिंदु अनेक, कुछ
चाहें मिलना लहरों की तरह
निःशर्त, कुछ मिल कर
गुपचुप कर जाएँ
अंदरख़ाने
गर्त,
फिर भी जीवन स्रोत बहे अनवरत।
* *
- शांतनु सान्याल







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