Wednesday, 30 May 2018

निःशब्द समझौता - -

काग़ज़ के फूलों की तरह कुछ आवेग
अपने आप झर जाते हैं, रह जाती
हैं अगर कुछ तो, वो है काँटों
के नोंक पर ठहरी हुई
एक बूँद की तरह
चाहत की
नमी,
कुछ नज़दीकियाँ मौन रह कर मुँह - 
चिढ़ाती हैं और धूसर स्मृति को
बेवजह साफ़ करती हैं, अब
कौन इन्हें समझाए कि
अलबम बदलने से
तस्वीर रंगीन
नहीं होते,
बस
एक मीठी टीस दे जाते हैं। तुम और
मैं आज भी उतने ही क़रीब हैं
जितने कि कभी हुआ
करते थे, पहले
शायद हम
एक
दूसरे की ज़रूरत थे या मजबूरियों के
तहत कोई मैत्री पुल, जो भी हो
उन्ही स्तम्भों के सहारे
हमने जीवन की
लम्बी यात्रा
की, और
आज
हमारे बीच छुपने छुपाने की कोई भी
वजह न रही, अब बिन संवाद ही
हम बन गए हैं पारदर्शी,
शायद यही है रूह से
रूह तक का एकल
रास्ता, जहाँ
से लौटना
नहीं
मुमकिन, अंतहीन सहयात्रा या कोई
सह मुक्ति अभियान का सूत्रपात,
जो भी हो अब हम बढ़  चले
हैं सुदूर धुंधभरी लेकिन
ख़ूबसूरत वादियों
की ओर - -

* *
- शांतनु सान्याल