शनिवार, 25 जून 2016

अनजान सी कसक - -

न उसकी ख़ता, न कोई जुर्म था मेरा,
आग की फ़ितरत है लपकना, सो
जिस्म ओ जां सुलगा गया।
यूँ तो ज़िन्दगी थी
अपने आप में
ख़ुशहाल
बहोत, दीन दुनिया से बेख़बर, न जाने
क्यूँ कोई, इक अनजान सी कसक
सीने में यूँ बसा गया। हम
भी थे कभी रंगीन
ख़्वाबों के
मरकज़, चिराग़ ए महफ़िल, ये बात - -
और है कि किसी ने, रात ढलने से
बहोत पहले, यूँ  वजूद मेरा
इक फूँक से मिटा
दिया । वो
तमाम गुल शबाना महकते रहे रात भर,
चाँद सितारों की मजलिस रही
आबाद रात भर, सब कुछ
थे अपने आप में
अपनी जगह,
सिर्फ़
निगाहों में किसी ने इक अजीब सा - -
ख़ालीपन बसा दिया।

* *
- शांतनु सान्याल




रविवार, 12 जून 2016

लहरों से उभरते हुए - -

वो ख़ुश्बुओं में लबरेज़, उभरते हर्फ़ों में
लिखा जवाबी ख़त, आज भी मुझे
आधी रात, गहरी नींद से यूँ
जगा जाता है, गोया
बीच समंदर है
मेरा वजूद
और तू है कहीं बहोत दूर, संगे साहिल
पे लिखी कोई गुमनाम ग़ज़ल,
लहरों से खेलती हुई अपने
आप में गुमशुदा !
अक्सर
आख़री पहर जब झर जाते हैं नाज़ुक -
हरसिंगार, और हवाओं में होती है
सुबह की मख़मली दस्तक,
उफ़क़ की लकीर में
कहीं तेरा अक्स,
मुझे फिर
ज़िन्दगी की जानिब बरबस खींचे लिए
जाता है - -

* *
- शांतनु सान्याल




शुक्रवार, 10 जून 2016

इक बूँद का अफ़साना - -

वो नाज़ुक सा रेशमी अहसास
शबनमी बूंदों की तरह,
किसी नरगिसी
नज़र  में
ठहरा हुआ, इक ख़्वाब में यूँ
तब्दील हुआ। सीप की
मानिंद सीने में
छुपाए किसी
की वो बेइंतहा मुहोब्बत ! या
ज़िन्दगी भर की अंतहीन
चाहत, किसे ख़बर,
कब और कैसे,
ये सहरा
ए दिल यूँ लहरदार इक झील
हुआ।

* *
- शांतनु सान्याल




गुरुवार, 2 जून 2016

ख़बर कोई - -

बहोत दूर छूट गए वो तमाम
अतीत की वादियां, निगाहे
हद तक हैं बिखरे
बादलों की
परछाइयाँ ।
नया सफ़र है उभरता हुआ
धुंध भरी राहों में कहीं,
फिर तुमने सजा
दी है मेरी
बेजान सी तन्हाइयाँ। हवाओं
में फिर है मद्धम, सजल -
मानसूनी ख़बर ,
पीपल पातों
में है छुपी
फिर सावन की सरगोशियाँ।

* *
- शांतनु सान्याल
 

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