बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

एकात्म पलों में कहीं - -

निःस्तब्ध रात्रि, अवाक पृथ्वी, आकाश तब
आलोक मुखर, एकात्म तुम और मैं,
उन पलों में केवल भासमान।
सुन्दर या असुंदर, तिक्त
या मिष्ठ सब कुछ
तब शून्य -
मात्र,
ऊर्ध्वमुखी तब देह प्राण, धूम्रवलय सम
महाप्रस्थान। जब खुलें फूलों के गंध -
कोष, तब खुल जाएँ बंद वातायन
अपने आप, सुरभित अंतर्मन
तब करे मुक्तिस्नान।
वैध अवैध सब
मानव रचना,
सृष्टि की
है अपनी अलग प्राकृत सुंदरता, उन्मुक्त
यहाँ सभी एक समान। 

* *
- शांतनु सान्याल


सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

रहस्यमय प्याला - -

शेष पहर जब झर जाएँ निशिपुष्प और
चाँद हो चले मद्धिम तुम पाओगे
उसे दिगंत में कहीं, तुम्हारे
हिस्से का उजाला है
है अपनी जगह
मौजूद।
जीवन स्रोत अविरल बहता जाए, न
आदि, न कोई अंत, निःश्वास के
डोरों से नित नए स्वप्न सजाए,
नियति ही जाने क्या है
उसमें, अंत या
उत्स,लेकिन
ये सच है
तुम्हारे हिस्से का प्याला है अपनी
जगह मौजूद।
* *
- शांतनु सान्याल 

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

मुहाने की ओर - -

कुछ भी रिक्त रहता नहीं वक़्त भर
जाता है हर एक ख़ालीपन,
पतझड़ के पीछे दबे
पांव चलता है
मधुमास,
सुदूर
महुवा वन के बीच, झांकता है - - -
रक्तिम पलाश। संकरी
नदी अपना अस्तित्व
बचाए सागर -
संगम
की आस लगाए, अनवरत महातट
की ओर बहती जाए। क्या
पाया, क्या खोया, अर्थ -
हीन हैं सारे गणित,
बंद मुट्ठी में
मेरे अब
 कुछ
भी नहीं, मायावी जुगनू उड़ गए कब
मुझे उसकी ख़बर नहीं, अब
जीवन लगे बहुत सहज।
* *
- शांतनु सान्याल

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

गहराइयों के ख़ातिर - -

लहरों की नियति में था आख़िर बिखर जाना,
कुछ दूर दिगंत से आए कुछ उठे ख़ामोश
मेरे अधर किनारे, कुछ छलके, कुछ
थम कर रह गए, मेरी आँखों के
अरमान सारे। कभी हम
रहे तुम से बेख़बर,
और कभी
तुम ने
ख़ुद को खुलने न दिया, कुछ अनकही - -
बातों को तुमने चाह कर भी कभी
सुलगने न दिया। कोई शीशी
बंद इत्र के मानिंद था
तुम्हारा प्रणय -
निवेदन,
ह्रदय संदूक में रहा एकाकी, न जाने क्यों
तुमने उसे उन्मुक्त बिखरने न दिया।
शायद गहराई न हो जाए कम,
इसी डर से जीवन तट को
तुमने असमय यूँ ही
सिमटने न
दिया।

* *
- शांतनु सान्याल


 

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

ये शहर कभी आबाद था - -

वो सभी लोग अचानक मूक
ओ बधिर बन गए, भरी
सभा में जब मैंने,
राज़ ए गिरह
खोल दी,
रहनुमाई करने वाले तब पा
ए ज़ंजीर बन गए झूठे
वादों पे हमने हर
पल यूँ जां
निसार
किया,हर बात उनकी आख़िर
ज़हर बुझे तीर बन गए। बंद
आँखों का ईमान हमें
कहीं का न छोड़ा,
अपनों के बीच
देखिये
गुमशुदा तस्वीर बन गए। इश्तहारों
के भीड़ में सच्चा ताबीज़
बेमानी है,खोटे सिक्के
ही शहर में बुलंद
तक़दीर बन
गए।

* *
- शांतनु सान्याल

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