गुरुवार, 30 जनवरी 2020

बहरहाल - -

न जाने कितने लम्हों ने देखा
है हमें बहोत क़रीब से,
कभी मुस्कुराहटों
के बेलबूटे और
कभी रफ़ू से
झाँकती
ज़िन्दगी की रुमाल, अब नहीं
पूछता आईना भी हमारा
हालचाल । दालान की
धूप भी अब नहीं
मय्यसर, हर
जानिब
हैं कंक्रीट के जंगल, न कोई
शिकायत किसी से न
खोने पाने का
मलाल,
इक तुम्हारी निगाह के अलावा
हमारा ठिकाना कोई नहीं,
कल की कल सोचेंगे
आज तुमसे हैं
मुख़ातिब
हम बहरहाल - -
- - शांतनु सान्याल

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

पुनःच - -

छाया - आलोक के बीच कहीं
ज़िन्दगी उभरती है ले कर
नई संभावनाएं, दहलीज़
पे मेरे न जाने कौन,
सुबह - सवेरे रख
गया अदृश्य
शुभ -
कामनाएं। फिर कच्ची धूप में
उड़ चली हैं तितलियां, फिर
किसी ने दी है मुझे एक
मुस्त महकती हुईं
तसल्लियां,
फिर
तुम्हारी आँखों में उभर चले हैं
सजल अनुरागी भावनाएं।
- शांतनु सान्याल

हमेशा की तरह - -

पत्ते गिरने का मौसम नहीं रुकता,
वक़्त की रेल गुज़रती है
निःशब्द अपने गंतव्य
की ओर, पार्क
के बेंच
पर पड़े सूखे पत्तों में कहीं खो
जाते हैं यादों के तहरीर,
कुछ मौन संबोधन,
कुछ नेह स्पर्श,
कोहरे की
तरह
जिस्म ओ जाँ को छूते ही
अदृश्य हो जाते हैं
धीरे - धीरे,
रहता है
क़रीब सिर्फ़ एक अहसास
निगाहों के कोरों में
कुछ लवणीय
जल बिंदु
और
विलीन होती वृक्षों की विराट
परछाइयां, उतरती है शाम
रोज़ बोगनवेलिया के
झुरमुटों से लेकर
मायावी
रूप।
- - शांतनु सान्याल

रविवार, 12 जनवरी 2020

अनंत नग़मा - -

हथेली में कहीं आज भी है
रौशनदान से उतरती एक
बूंद रौशनी की दुनिया,
अलस दुपहरी में
जैसे उतरती
हों नीम
से निःशब्द परछाइयां । यूँ
तो ज़िन्दगी के आसपास
खंडहरों की कमी नहीं,
फिर भी न जाने क्यूं
दिल के आईने में
धूल जमी नहीं।
सब कुछ
बदल
जाता है, चाहे चेहरा हो या
चश्मा, एक मीठा सा
एहसास वक़्त के
साथ हो जाता
है अनंत
नग़मा।
- शांतनु सान्याल






रविवार, 5 जनवरी 2020

यथावत रिक्त - -

महासमुद्र है प्रतीक्षारत अपनी जगह अटल, -
दीर्घ जीवन की यात्रा हो या नदी कोई
विश्रृंखल, विसर्जन है निश्चित,
न जाने कौन रह रह कर,
देता है दस्तक मेरे 
अंतःकरण के
कपाट पर,
किसे
ख़बर की वो है अजनबी या मेरा चिर परिचित।
कोई स्मृति गुच्छ है या अनौपचारिक फूल
उसके हाथ, दहलीज़ और अंतःगृह के
मध्य रहा यूँ तो लुकछुप का साथ,
फिर भी जी चाहता खुली
सांस लूँ हो उन्मुक्त -
चित्त, न तुम
हो कोई
परिपूर्ण यामिनी, न मैं ही हूँ कोई अनंत गंध,
तुम्हारा आँचल भी है अधूरा, मेरा देह -
पिंजर भी रहा यथावत रिक्त।

* *
- शांतनु सान्याल



  

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