बुधवार, 28 दिसंबर 2016

रस्म ए ख़ुदा हाफ़िज़ - -

कभी कभी शून्यता बहोत
क़रीब होता है। तमाम
झाड़ फ़ानूस क्यूं
न हों रौशन -
दिल का
कोना फिर भी बेतरतीब
होता है। कभी बिन
मांगे ही मिल
जाए बहुत
कुछ,
कभी इक चाहत पे हो
हज़ार जवाब तलब,
पाने और खोने
के इस
खेल में यक़ीनन सिर्फ़
अपना अपना नसीब
होता है। उनकी
महफ़िल
से हैं
हम बहोत आश्ना,
शमुलियत की
अपनी
अलग है ख़ूबसूरती
लेकिन रस्म ए
ख़ुदा हाफ़िज़
कुछ
अज़ीबोग़रीब होता है।
न कोई दूर, नहीं
कोई दिल के
क़रीब
होता है इस खेल में
यक़ीनन सिर्फ़
अपना अपना
नसीब
होता है।

* *
- शांतनु सान्याल




बुधवार, 14 दिसंबर 2016

অন্তহীন ভাসান - -

 অবশেষে সে ছুঁয়েছে গভীরতম বিন্দু -
 যেন শীতের শেষে ঋতুরাজের
উড়ো চিঠি, অরণ্য গন্ধে
মাখা গোপন হৃদয়ের
লিপি। অন্তত সে
ভুলে নি সেই
উত্তর
দিকের জানালা, হারানো কোন শিহরণ
জড়িয়ে বুকে, সে  রেখে গেছে
অনুরাগের ছোঁয়া উড়ন্ত -
পর্দার গায়ে।তার
পরশে ছিল
অদ্ভুত
কুহকের ছায়া, যেন দেহ ও প্রাণে, ঘিরে 
আছে অদৃশ্য জগতের মায়া। জানি
না তার মুক্ত স্রোতের উৎস,
শুধুই ভেসে চলেছি
সুদূর অজানা
ভাসন্ত
দ্বীপের সমান্তরালে।চার দিকে শুধুই অথৈ
জলরাশি - -  !

* *
- শান্তনু সান্যাল

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

फिर भी अच्छा लगता है - -

वो मिले इक ज़माने के बाद, ये सच है 
लेकिन, आज भी कहीं उनकी
आँखों में है इक मुन्तज़िर 
तिश्नगी।  वक़्त
उतार देता
है हर
इक  मुलम्मा मेरे दोस्त, आईने से - 
शिकायत है बेमानी, न जाने
किस जानिब बह गए वो
तमाम दावा - ए -
वाबस्तगी।
फिर भी
अच्छा
लगता है, इक ज़माने के बाद तुमसे
मिलना ऐ लापता ज़िन्दगी।

* *
- शांतनु सान्याल



सोमवार, 7 नवंबर 2016

पिछले पहर की बरसात - -

न रोक अपने निगाहों के अक्स पलकों
के दायरे में, बिखरने दे रौशनी के
बूंद,  यूँ ही मद्धम - मद्धम,
बे - तरतीब, किसी 
ख़ूबसूरत
जज़्बात की तरह। उठ रहे हैं कोहरे के -
बादल, दूर पहाड़ों के बदन से, या
बोझिल सांसों में है रात ढलने
की थकन, एक  छुअन 
घेरे हुए है ज़िन्दगी
को गहराइयों
तक, किसी
पोशीदा तिलिस्मात की तरह। कोई -
बात तो ज़रूर है कि महकने से
लगे हैं बंजर ज़मीं के रास्ते,
तुमने शायद छुआ है
दिल की परतों को
आहिस्ता - -
पिछले
पहरवाली बरसात की तरह। बिखरने दे
रौशनी के बूंद,  यूँ ही मद्धम - मद्धम,
बे - तरतीब, किसी  ख़ूबसूरत
जज़्बात की तरह।

* *
- शांतनु सान्याल      







 

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

मुमकिन नहीं ज़र्द पत्तों का सदाबहार
होना, फिर भी दिल की तसल्ली के
लिए बुरा नहीं बे मौसम यूँ
बेक़रार होना। मुझे
मालूम है उम्र
का तक़ाज़ा,
फिर भी हर्ज़ भला क्या है ख़्वाबों का - -
तलबगार होना। मुरझाए चेहरों
का दर्द यहाँ कोई नहीं
समझता, बेहतर
है ख़ुद - ब -
ख़ुद ज़िन्दगी के आईने से दो चार होना।

* *
- शांतनु सान्याल


 


मंगलवार, 1 नवंबर 2016

रंगीन कारवां - -

ऐ दोस्त, कुछ भी तैशुदा नहीं पहले से यहाँ,
इक वादी  ए  पुरअसरार है ये ज़िन्दगी,
और धुंध में डूबे हुए हैं नफ़्स के
कहकशां। न जाने क्या
क्या मन्सूबे थे उस
शख़्स के पास,
लेकिन
ढह गए सभी रफ़्ता रफ़्ता ख़्वाबों के मकां।
इतना भी ग़ुरूर ठीक नहीं कि आईना
भी पराया सा नज़र आने लगे,
मजाज ए क़िस्मत किसे
ख़बर, कब खिसक
जाए ये ज़मीं
और कब
दे जाए दग़ा ख़ामोश आसमां। ऐ दोस्त,
कुछ भी तैशुदा नहीं पहले से यहाँ,
है दूर - दूर तक वीरानी का
आलम, जहाँ कभी
रुकते थे दुनिया
के रंगीन
कारवां।

* *
- शांतनु सान्याल 





गुरुवार, 27 अक्तूबर 2016

सांध्य प्रदीप - -

वो एकाकी सांध्य प्रदीप हूँ जिसे
जला के किसी ने यूँ ही भूला
दिया। मुद्दतों से, इक
अदृश्य आग लिए
सीने में, जल
रहा हूँ मैं
किसी
अनबुझ प्यास की तरह आठ - -
पहर, ये और बात है कि
ज़माने ने, श्रेय सारा
पुरोहित को दे
दिया। और
मेरा
अस्तित्व रहा यथावत ऊसर भूमि
की तरह उपेक्षित, पतझर के
पत्तों से आच्छादित,
लेकिन इन्हीं मृत
पत्तों से होता
है सृष्टि
का
नव सृजन। जलना है मुझे यूँ ही -
अंतहीन अंधकार में सतत,
जब तक है मौजूद ये
पृथ्वी और गहन
आकाश।

* *
- शांतनु सान्याल




 

रविवार, 9 अक्तूबर 2016

लुप्तप्रायः - -

आज भी उभरते हैं ईशान कोणीय मेघ, आज
भी गौरैया रौशनदान पर बनाते हैं नीड़,
आज भी दालान पर बिखरती है
चाँदनी और खिलते हैं
चंद्रमल्लिका भी,
हमेशा की
तरह।
किसी के रहने या न रहने से, कुछ फ़र्क़ नहीं
पड़ता, रंगमंच, यथावत वहीँ रहता है
अपनी जगह, केवल बदल जाते
हैं चरित्र और  परिदृश्य।
नेपथ्य में कहीं
उपेक्षित
पड़ी
होती हैं स्मृतियाँ, कुछ आईने पर पसरती - -
धूल। पुरातन पृष्ठों की गंध सोख लेती
हैं अभिलाष की सजलता, और
अहसास, क्रमशः बन जाते
हैं सूखे गुलाब के फूल,
किताबों के मध्य
लुप्तप्रायः।

* *
- शांतनु सान्याल


गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

बेइंतहा - -

कहीं कोई ख़्वाब बिखरते बूंदों की तरह,
रात ढलने से पहले बस ज़रा, कुछ
एक लम्हों के लिए ही सही,
भिगो जाए रूह की
गहराइयाँ।
तुम हो मेरी सांसों में जज़्ब या ज़िन्दगी
में लौट आई है गुमशुदा, मौसम ए
बहार की इनायतें, साया है
तुम्हारा मेरे वजूद को
घेरे हुए, या खिलें
हैं आख़री -
पहर,
हरसिंगार की डालियाँ। मद्धम मद्धम - -
तुम्हारे निगाहों की रौशनी, और
वादियों में घुलता हुआ इक
संदली अहसास, तुम
हो मेरे पहलू में
या जिस्म
ओ जां
में छाए हुए हैं चाँद सितारों की सुरमयी
परछाइयाँ।

* *
- शांतनु सान्याल

 

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

अस्थिर बिंदु - -

अस्थिर शिशिर बिंदु है अनुराग तुम्हारा
उन्मुक्त कमल पत्र सा हृदय हमारा,
बिहान और सूरज का अनुबंध
है चिरस्थायी, रहने दे
अन्तर्निहित कुछ
शेष प्रहर के
पल यूँ
ही अपरिभाषित, किसे ख़बर कब हो जाए
विलीन ये क्षण भंगुर जीवन।

* *
- शांतनु सान्याल

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

श्रृंखल विहीन - -

अदृश्य मेघ की तरह कोई छुअन हो
भीगा सा, जो छू जाए अंतर्मन
का मीलों लंबा सूखापन।
कहने को यूँ तो
जीवन के
दोनों
तट में  हैं, चिरहरित पेड़ की कतारें,
सृष्टि का विधान समझना नहीं
आसान, कहीं दूर दूर तक
हैं बिखरे मरू प्रांतर,
और कहीं वृष्टि
का अति
अपनापन। दिल के अहाते खिले हैं
हरसिंगार उन्मुक्त, महक चले
फिर प्रतिबिंबित  भावनाएं,
दर्पण के नेपथ्य में है
कहीं गुम, मेरा
अबोध
बचपन, फिर अलमस्त हो बिखरना
चाहे श्रृंखलित जीवन।

* *
- शांतनु सान्याल

बुधवार, 7 सितंबर 2016

उन्मुक्त जहान - -

रेशमी कोषों में बंद तितलियों को
उड़ान मिले, हर कोई है
यहाँ स्वप्नील राहों
का मुसाफ़िर,
मुट्ठी में
बंद जुगनुओं को खुला आसमान
मिले। निज परिधियों में रह
यूँ ही न घुट जाए कहीं
दम, इन सांसों को
उन्मुक्त फिर
कोई जहान
मिले।
इन सांप सीढ़ियों के  खेल
का कोई यक़ीन नहीं,
कब, किसे और
कहाँ, नाज़ुक
ताश के
मकान मिले। बेशक़, तुम
मुमताज महल से
ज़रा भी कम
नहीं, ये
ज़रूरी
नहीं कि तुम्हें असल कोई
शाहजहान मिले। यूँ
 तो उम्मीद पे
क़ायम है
ये तमाम रंगीन कायनात,
खिलते मुस्कुराते गुलों
को इक सच्चा
 बाग़बान
मिले।
रेशमी कोषों में बंद तितलियों
को उड़ान मिले।

* *
- शांतनु सान्याल

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

चलते चलते - -

यूँ तो बदलते रहे रंग ओ
नूर ज़िन्दगी के,
बेअसर रहा
लेकिन
दिल ए किताब मेरा।
अंधेरों के खेल में
कहीं सहमा
सा है
उजाला, हर हाल में है
ताज़ा, वो पोशीदा
गुलाब मेरा।
मेरी
चाहतों का पैमाना
नहीं किसी के
पास, कहने
को
सिफ़र है उम्रभर का
दस्तयाब मेरा।
लिबास ओ
किरदार
से न
आँक वजूद, ऐ दोस्त,
रहने दे अपने पास
ये मुहोब्बत
बेहिसाब
मेरा।
चाहे कोई ख़ास हो
या आम, ये राह
 है यक़ीनी,
कहीं न
कहीं मिल जायेगा वो
 इश्क़ नायाब
मेरा।

* *
- शांतनु सान्याल

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

वसीयतनामा - -

जीवन के ये चार अध्याय हैं
अनंत चिरस्थायी, हर
हाल में है हमें
गुज़रना
इन
झूलते सोपानों से, अंतहीन
यात्रा से क्या किसी ने
है मुक्ति पायी। 
उभरते
सूरज का अपना अलग ही
है समयाकलन, शाम
ढलते ही, देह से
अधिक
बढ़ जाए परछाई। अंकुरित
बीज और शाखा -
प्रशाखाओं का
विस्तार,
कभी
प्रातः की कच्ची धूप और
कभी साँझ अलसाई।
हर तरफ हैं
टंगे हुए
नए
पुराने बेशुमार मुख़ौटे, - -
दर्पण का नग्न
वसीयतनामा
ही है मेरी
सच्चाई।
जीवन के ये चार अध्याय
हैं अनंत चिरस्थायी।

* *
- शांतनु सान्याल

बुधवार, 10 अगस्त 2016

अनजान आदमी - -

यूँ तो नाम की तख़्ती है अपनी
जगह उभरी हुई बंद दरवाज़े
के पार मगर दस्तक
पहुँचती नहीं,
दरअसल,
इन लेज़र किरणों से तरंगित -
राहों में कहीं, गुमशुदा सा
है आम आदमी।
अंतिम
मंज़िल छू चले हैं पीपल की - -
टहनियां, लेकिन हम
आज भी हैं अनजान
भू - तल की
माटी से।
पुरअसरार चेहरे लिए घूरते हैं
लोग एक दूजे को, ये और
बात है कि औपचारिकता
की मुस्कान होती है
उनकी ओंठों
पर। दरअसल, सारी दुनिया ही
अपने आप में है सिमटी हुई,
बहोत एकाकी, यूँ तो
कहने को ज़मीं से
आसमां तक है
छाया हुआ
आदमी।
* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/

बुधवार, 3 अगस्त 2016

कोई तुझसा नहीं - -

गुज़िश्ता रात की बारिश,
और आख़री पहर में
यूँ नींद का टूट
जाना,
कोई दस्तक गुमशुदा
अक्सर हमें सोने
नहीं देता।
हमारे
इतराफ़ है हर इक चीज़
यूँ तो ख़ूबसूरत और
दिलकश, फिर
भी न
जाने क्यूँ दिल है कि
किसी और का
होने नहीं
देता।
ये तुम्हारे चाहत का
जुनून है, या
परवाने
की आख़री उड़ान, हर
हाल में हमें यूँ धुंध
में खोने नहीं
देता।
अक्सर मैं लौट आता
हूँ यूँ ही ख़ाली हाथ
बाग़ ए अर्श से,
तेरा इश्क़
बेनज़ीर,
कोई और फूल, दिल
की धड़कनों में
पिरोने नहीं
देता। 

* *
- शांतनु सान्याल

सोमवार, 1 अगस्त 2016

हम और आप - -

हर शख़्स कहीं न कहीं होता
है ज़रा सा वादा ख़िलाफ़,
अपने अंदर से बाहर
निकल आना,
इतना भी
नहीं आसां, हर इक वजूद - -
रखता है अपना ही
पोशीदा लिहाफ़ !
न दोहराओ,
फिर वही
उम्र भर जीने मरने की बातें,
पल भर की मुलाक़ातों
से नहीं मुमकिन,
यूँ रूहों का
मिलाप।
ये नेह के नाज़ुक  बंधन हैं या
रस्म ए दुनिया की जंज़ीरें,
इक अनजाने
रस्साकसी
में जकड़े हुए से हैं हम और - -
आप।

* *
- शांतनु सान्याल 


शनिवार, 30 जुलाई 2016

सिफ़र से ज़ियादा - -

इस मोड़ से आगे है सिर्फ़ अंतहीन ख़ामोशी,
और दूर तक बिखरे हुए सूखे पत्तों के
ढेर, फिर भी कहीं न कहीं तू
आज भी है शामिल इस
तन्हाइयों के सफ़र
में। इक बूंद
जो कभी
तेरी आँखों से टूट कर गिरा था मेरे सुलगते
सीने पर, यक़ीन जानो, उस पल से
आज तक आतिशफिशाँ से कुछ
कम नहीं मेरी ज़िन्दगी।
ये सही है कि  हर
इक ख्वाब का
इख़्तताम
है मुक़र्रर, फिर भी मेरी निगाहों को है सिर्फ़
तेरी दीदार ए आरज़ू। ये और बात है कि
पल भर में दुनिया ही बदल जाए,
होंठ तक पहुँचते ही कहीं
इज़हार ए जाम न
छलक जाए।
फिर भी
उम्मीद से ही है आबाद, चाँद सितारों की - -
दुनिया, वरना ये आसमान इक
सिफ़र से ज़ियादा कुछ भी
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल

 

शनिवार, 23 जुलाई 2016

कभी हो सके तो आओ -

ज़िन्दगी की ज्यामिति
इतनी भी मुश्किल
नहीं कि जिसे
ढूंढे हम,
हाथ
की लकीरों में। तुम्हारे
शहर में यूँ तो हर
चीज़ है ग़ैर
मामूली,
मगर
अपना दिल लगता है
सिर्फ फ़क़ीरों में।
कभी हो सके
तो आओ
यूँ ही
नंगे पांव चलके मेरी
दुनिया है बसी,
बिन पाँव के
शहतीरों
में।

* *
- शांतनु सान्याल

शनिवार, 16 जुलाई 2016

क़दम दर क़दम - -

अंततः सुबह के साथ ही वन्य नदी का
उफान भी उतर गया, सपनों की
थी रहगुज़र या दीवानापन
मेरा, छू कर अंतरतम,
वो जलतरंग सा
अहसास, न
जाने किधर गया। उनकी नज़दीकियां
यूँ तो चाँद रातों से कम न थीं,  बूँद
बूँद आँखों से नूर, यूँ रूह की
गहराइयों में उतरती
रही, ज़िन्दगी
हर पल
किसी की चाहत में यूँ डूबती उभरती - -
रही। कोई ख़ुश्बू पुरनम या कोई
छुअन शबनमी, न जाने
क्या था उसका राज़
ए तब्बसुम !
दूर तक
जैसे महके चन्दन वन और खिलते रहे
गुलाब क़दम दर क़दम।

* *
- शांतनु सान्याल

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

अपना ख़ुदा - -

आँखों का खारापन रहा अपनी जगह
मुसलसल, कहने को यूँ थी बारिश
रात भर। न जाने कौन था वो
हमदर्द, छू कर रूह मेरी
ओझल हुआ यूँ
अकस्मात,
जैसे उड़
जाए अचानक नूर की बूंद एक साथ।
कभी उसने बनाया मेरा वजूद
इक माटी का खिलौना,
और कभी मैंने ख़ुद
ही तलाशा इक
कांच का
बिछौना। किस आख़री पहर में वो रहे
मेरी सांसों में शामिल, कहना है
बहोत मुश्किल, आसां नहीं
लहरों से लहरों को यूँ
जुदा करना, इतनी
मुहोब्बत
ठीक नहीं, कि ज़हर भी लगे अमृत - -
कहीं लग न जाए संगीन जुर्म
तुम पे, यूँ सरे महफ़िल 
बेनक़ाब हो, किसी
को अपना ख़ुदा
कहना।

* *
- शांतनु सान्याल
 

सोमवार, 4 जुलाई 2016

जो उड़ गए तो उड़ गए - -

कुछ रास्ते कभी भुलाए नहीं जाते, चाहे
जितने भी सुख क्यों न हों आज के
सफ़र में, कुछ दर्द किसी के
वास्ते भुलाए नहीं जाते।
हमें ज़रा भी ख़बर
न थी कि
छीन
लेंगे वो हमसे हमारा वजूद, चलो ठीक
ही है जिस्म का तलबगार होना,
रूह आलूद ख़ुश्बू मगर
मिटाने से भी
मिटाए
नहीं जाते। वही दालान है फूलों की - -
क्यारियों वाला, वही अहाते में
झूलता हुआ  ख़ाली पिंजरा,
वो लम्हा था या कोई
सुनहरा परिंदा,
किसे
मालूम ? जो उड़ गया मौसमी हवाओं
के हमराह, लाख चाहें मगर कुछ
ख़्वाहिश लौटाए नहीं जाते।
कुछ दर्द किसी के वास्ते
भुलाए नहीं
जाते। 

* *
- शांतनु सान्याल

शनिवार, 25 जून 2016

अनजान सी कसक - -

न उसकी ख़ता, न कोई जुर्म था मेरा,
आग की फ़ितरत है लपकना, सो
जिस्म ओ जां सुलगा गया।
यूँ तो ज़िन्दगी थी
अपने आप में
ख़ुशहाल
बहोत, दीन दुनिया से बेख़बर, न जाने
क्यूँ कोई, इक अनजान सी कसक
सीने में यूँ बसा गया। हम
भी थे कभी रंगीन
ख़्वाबों के
मरकज़, चिराग़ ए महफ़िल, ये बात - -
और है कि किसी ने, रात ढलने से
बहोत पहले, यूँ  वजूद मेरा
इक फूँक से मिटा
दिया । वो
तमाम गुल शबाना महकते रहे रात भर,
चाँद सितारों की मजलिस रही
आबाद रात भर, सब कुछ
थे अपने आप में
अपनी जगह,
सिर्फ़
निगाहों में किसी ने इक अजीब सा - -
ख़ालीपन बसा दिया।

* *
- शांतनु सान्याल




रविवार, 12 जून 2016

लहरों से उभरते हुए - -

वो ख़ुश्बुओं में लबरेज़, उभरते हर्फ़ों में
लिखा जवाबी ख़त, आज भी मुझे
आधी रात, गहरी नींद से यूँ
जगा जाता है, गोया
बीच समंदर है
मेरा वजूद
और तू है कहीं बहोत दूर, संगे साहिल
पे लिखी कोई गुमनाम ग़ज़ल,
लहरों से खेलती हुई अपने
आप में गुमशुदा !
अक्सर
आख़री पहर जब झर जाते हैं नाज़ुक -
हरसिंगार, और हवाओं में होती है
सुबह की मख़मली दस्तक,
उफ़क़ की लकीर में
कहीं तेरा अक्स,
मुझे फिर
ज़िन्दगी की जानिब बरबस खींचे लिए
जाता है - -

* *
- शांतनु सान्याल




शुक्रवार, 10 जून 2016

इक बूँद का अफ़साना - -

वो नाज़ुक सा रेशमी अहसास
शबनमी बूंदों की तरह,
किसी नरगिसी
नज़र  में
ठहरा हुआ, इक ख़्वाब में यूँ
तब्दील हुआ। सीप की
मानिंद सीने में
छुपाए किसी
की वो बेइंतहा मुहोब्बत ! या
ज़िन्दगी भर की अंतहीन
चाहत, किसे ख़बर,
कब और कैसे,
ये सहरा
ए दिल यूँ लहरदार इक झील
हुआ।

* *
- शांतनु सान्याल




गुरुवार, 2 जून 2016

ख़बर कोई - -

बहोत दूर छूट गए वो तमाम
अतीत की वादियां, निगाहे
हद तक हैं बिखरे
बादलों की
परछाइयाँ ।
नया सफ़र है उभरता हुआ
धुंध भरी राहों में कहीं,
फिर तुमने सजा
दी है मेरी
बेजान सी तन्हाइयाँ। हवाओं
में फिर है मद्धम, सजल -
मानसूनी ख़बर ,
पीपल पातों
में है छुपी
फिर सावन की सरगोशियाँ।

* *
- शांतनु सान्याल
 

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

अवकाश - -

वो तमाम ख़ूबसूरत पल, रहने दो यूँही
जज़्ब मुक्कमल, अभी बहुत दूर
हैं सावन के मेघ सजल।
ठहरो कुछ देर और
ज़रा कि तपते
जज़्बात
को संदली अहसास मिले, भटका हूँ मैं
अनवरत, न जाने कहाँ - कहाँ उम्र
भर, अब जाके तुम मिले हो
किसी ग़ुमशुदा मंज़िल
की तरह, चलो
फिर उड़ें
तितलियों के हमराह, और पहुँचे किसी
वर्षा वन में, सुलगते जीवन को
इसी बहाने कुछ पलों का
अवकाश मिले।

* *
- शांतनु सान्याल

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

रेशमी अहसास - -

नहीं रुकते रौशनी के बहाव, आसमां
चाहे जितना उदास हो, ज़िन्दगी
और अनगिनत ख़्वाबों के
सिलसिले यूँ ही रहते
हैं रवां इक छोर
से दूसरे
किनारे। ये आईने का शहर है लेकिन
राहों में कोई प्रतिबिम्ब नहीं, वो
तमाम मरहमी चेहरे क़रीब
पहुँचते ही लगे बेहद
ख़ौफ़नाक, जो
दूर से नज़र
आए थे हमदर्द सारे। इक मैं ही न था
यहाँ लुटा मुसाफ़िर, आँख खुलते
ही देखा कि सारा आसमान
है ख़ाली, और दूर तक
बिखरे पड़े हैं कुछ
टूटे हुए तारे।
चलो, फिर इक बार बुने वही ख़्वाबों
की दुनिया, कुछ रंगीन धागे
हो तुम्हारे, कुछ रेशमी
अहसास रहें
हमारे।

**
- शांतनु सान्याल 

रविवार, 10 अप्रैल 2016

ख़्वाबों के परे कहीं - -

इक अनबुझ तिश्नगी है वो,
जो उठे सुलगते सीने से,
चाँद रात हो या कोई
अमावस का
अंधेरा,
हर लम्हा ज़िन्दगी चाहे उसे
और सिर्फ़ उसे महसूस
करना, अपनी
सांसों की
असीम
गहराइयों में। न कोई कश्ती
न ही कोई किनारा नज़र
आए दूर तक, इक
अजीब सी
ख़मोशी
जोड़ती है मेरी रूह को तुझसे,
बहुत मुश्किल है कुछ
अहसासों को यूँ
लफ़्ज़ों का
पैरहन
देना, कुछ पिघलते जज़्बातों
का यूँ हक़ीक़त में ढलना,
ख़्वाबों के परे किसी
का, यूँ उजाड़
हो कर
अंतहीन मुहोब्बत करना - - -

* *
- शांतनु सान्याल

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

निगाहों के परे - -

अभी हल्का सा अंधेरा है दूर तक, ज़रा रात
को और गहराने दे, मुझे बेशक़ यक़ीं है
तेरी सदाक़त पे ऐ दोस्त, फिर भी
चाँद सितारों को ज़रा, और
उभर आने दे। अभी
मेरे लब पे आ
ठहरे हैं
तेरे सांसों के कुछ उड़ते हुए बादल, कुछ देर
यूँ ही बेख़ुदी में, ज़िंदगी को और बहक
जाने दे। वो नशा जो रूह तक
उतर जाए दम - ब - दम,
कुछ इस अंदाज़ में
मेरे मेहबूब,
दिल की
ज़मीं पे, नीम सुलगता आसमां उतर आने
दे। न सोच अभी से तक़दीर ए शमा,
अभी तो बहुत दूर है सुबह की
दस्तक, मेरी निगाहों
के परे कोई नहीं
इस पल
इक तेरे सिवा, इसी पल में मुझे मुकम्मल
पिघल जाने दे।

* *
- शांतनु सान्याल

बुधवार, 30 मार्च 2016

कटुसत्य - -

इस हक़ीक़त को झुठलाना नहीं आसां,
कि हर एक शख़्स है, चार दीवारों
के बीच कहीं न कहीं खुला
बदन, या और खुल
के यूँ कहें कि
बिलकुल
नंगा।
दरअसल, हम भी ऑक्टोपस से कुछ
कम नहीं, बदलते हैं लिबास और
नियत दोनों ही, ज़रुरत
के मुताबिक़, कभी
उथले किनारों
में छुप के
और कभी गहरी खाइयों में गुम होकर।
वही अंतहीन, शिकार और शिकारी
के बीच का चिर - परिचित
मायावी खेल, सिर्फ़
बदलते हैं
मंज़र।
क्रमशः अरण्य, समुद्र, पहाड़, जनमंच,
ख़्वाबगाह, भीड़ भरी नुक्कड़ या
टूटे घुंघरुओं के स्वर। घूमता
रहता है यूँ ही वक़्त के
आईने का झूमर।
और हर
तरफ बिखरे होते है रंग बिरंगे असली
नक़ली उतरन।

* *
- शांतनु सान्याल


शनिवार, 26 मार्च 2016

अदना सा - -

हर तरफ है इक अजीब सी -
रक़ाबत, इक अजीब सी
फ़र्क़ गुज़ारी, ज़ेर ए
ज़मीं हो जैसे
नीम
सुलगता आग कोई, ये शहर
अब न रहा मिशाल ए
बिरादरी,कि डर सा
लगता है मुझे
शाम ढलते,
अपनी
ही गली में बेख़ौफ़ हो के - - -
निकलना, कहीं लूट
न ले कोई दस्त
ए आशना
मुझको।
वैसे ऊँची मीनारों से झिरती हैं
कुछ सब्ज़ रौशनी, कुछ
झाँकते  हैं शामे
चिराग़ मंदिरों
से भी,
फिर भी न जाने क्यों, इन -
मनहूस राहों से दहशत
सी होती है, कहीं
कोई न पूछ
ले मुझसे
सबूत ए मज़हब, कैसे बताऊँ
कि मैं सिर्फ़ इक अदना
सा इंसान हूँ।

* *
- शांतनु सान्याल

रविवार, 13 मार्च 2016

सुदूर कहीं - -

तलहटी में फिर खिले हैं टेसू
और लद चली हैं महुए
की डालियाँ।
क्रमशः
जुड़ से चले हैं टूटे हुए स्लेट,
फिर खोजता है दिल
टूटे हुए कुछ
रंगीन
कलम, न जाने कौन चुपके
चुपके फिर सजा चला है
पतझर की तन्हाइयां।
दूर टेरती है
टिटहरी
शायद कहीं आज भी है मौजूद,
उसके सजल आँखों के
सोते, फिर बुलाती
हैं मुझे सुदूर
गुमशुदा
यादों की गहराइयां। तलहटी में
फिर खिले हैं टेसू और लद
चली हैं महुए की
डालियाँ।

* *
- शांतनु सान्याल 

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

मायावी रात - -

हर कोई यहाँ है एक ही मंज़िल का मुसाफ़िर,
ये दिगर बात है कि फ़रेब सोच बना दे
तुम्हें मोमिन और मुझे काफ़िर !
तमाम तफ़ावत घुलमिल
से जाएंगे ग़र दिल
की गहराई
बने
शीशे की तरह पारदर्शी, ज़िन्दगी भर वो यूँ -
ही दौड़ता रहा अविराम, मृगतृष्णा के
पीछे, फिर भी न जाने क्यूँ
अंतरतम उसका हो न
सका अनुरूप
आरशी !
इक मौन अट्टहास और इक निःशब्द गूँज, वो
शख़्स आख़िर लौट आया हमेशा की
तरह ख़ाली हाथ, फिर वही दूर
तक अंतहीन ख़ामोशी,
फिर वही ख़्वाबों
के इंद्रजाल,
फिर वही उसे छूने की अभिलाष, फिर वही - -
मायावी रात !

* *
- शांतनु सान्याल 
 

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

इंतज़ार - -

मिज़ाज ए मौसम, परदेशी परिंदे,
और चेहरे में उभरती अदृश्य
लकीरें, यक़ीन मानो
बहोत कठिन
है वक़्त
को गिरफ़्तार करना। सुलगते दिन,
सिमटती नदी, उड़ते हुए ज़र्द
पत्ते और उनकी झुकी
निगाहों के साए,
इस हाल
में, कौन न चाहेगा ज़िन्दगी का यूँ
इंतज़ार करना।

* *
- शांतनु सान्याल

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

 ख़ुद से मुलाक़ात हुई - -

कितने दिनों के बाद यूँ आईने से बात हुई
कितने दिनों के बाद ख़ुद से मुलाक़ात हुई,

उम्र तो बीत गई यूँ दरख़्तों की देखभाल में
आख़री ढलान पे जा कहीं परछाई साथ हुई,

किसे याद रहता है बचपन की नादानियां,
ख़्वाबों के सफ़र में यूँ तमाम मेरी रात हुई,

हर कोई था बेबश हर कोई जां छुड़ाता सा,
रात ढलते ज़िन्दगी, तवायफ़ी जज़्बात हुई,

तुम भी चाहो तो आख़री ठहाका लगा जाओ,
बहुत दिनों बाद शहर में आज बरसात हुई,

* *
- शांतनु सान्याल 



बुधवार, 20 जनवरी 2016

* हमआहंगी - -

राहरू में मुद्दतों बाद खिले हैं
गुल ए शबाना फिर कोई
याद महकी है दर
गोशा ए
ज़िन्दगी। वरगलाने से लगे
हैं बाद ए मअतर रात
गहराते फिर रास
आने लगी है
मुझको
पुरानी आवारगी। लोग चाहे
जो भी कहें अब लौटना
नहीं मुमकिन,
बहुत
मुश्किल है छोड़ना अब रंग
ज़ाफ़रानी ! नफ़स दर
नफ़स में है यूँ 
समायी
उसकी हमआहंगी।

* *
- शांतनु सान्याल
अर्थ :
राहरू - अहाता
गुल ए शबाना - रातरानी फूल
गोशा ए ज़िन्दगी - जीवन का कोना
बाद ए मअतर - ख़ुशबूदार हवा
नफ़स - सांस, आत्मा
*हमआहंगी - समरसता

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

वक़्त से पहले - -

स्याह ख़ामोश रात की अपनी ही थी
मजबूरी, यूँ तो आसमान था
लाख सितारों से भरा।
दरअसल बहुत
कुछ की
चाह में कई बार निगाहों से फ़िसल -
जाते हैं रंगीन ख़्वाब और हम
ऊंघते हुए गुज़ार आते हैं
ख़ूबसूरत लम्हात।
हम भटकते
रहते हैँ
यूँ ही उम्रभर न जाने कहाँ कहाँ, जबकि
अंतहीन ख़ुश्बुओं का अम्बार
रहता है बिखरा हुआ,
हमारे पहलू के
आसपास।
दरअसल हम बढ़ती उम्र के साथ ख़ुद
को आईने में देखना भूल जाते हैं
और यहीं से भावनाओं पर
जंग की परत उभरने
लगती है, जो
वक़्त से
पहले हमें बूढ़ा जाती है, और हम दूर
छूटते चले जाते हैं - - -

* *
- शांतनु सान्याल

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past