मिज़ाज ए मौसम, परदेशी परिंदे,
और चेहरे में उभरती अदृश्य
लकीरें, यक़ीन मानो
बहोत कठिन
है वक़्त
को गिरफ़्तार करना। सुलगते दिन,
सिमटती नदी, उड़ते हुए ज़र्द
पत्ते और उनकी झुकी
निगाहों के साए,
इस हाल
में, कौन न चाहेगा ज़िन्दगी का यूँ
इंतज़ार करना।
* *
- शांतनु सान्याल
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