मंगलवार, 30 जून 2020

असमाप्त - -

शब्द पहेलियों की तरह थे
उसके चेहरे के उतार
चढ़ाव, मुझसे
मिलने के
बाद
वो शख़्स सो न पाया तमाम
रात, हिसाब किताब की
फेहरिस्त शायद थी
बहोत ही लम्बी,
होंठ हिले,
आंखों
में उभरे कुछ अतीत के साए, - -
फिर भी वो खुल के रख
न पाया अपनी बात ।
दरअसल बहुत
कुछ ज़िन्दगी
में यूँ ही
रहती
हैं बेज़ुबान, ज़ख्म भर जाते हैं
वक़्त गुज़रते, छोड़ जाते हैं
तहे दिल खुरदरे निशान,
मिटते नहीं लेकिन
घात प्रतिघात ।
कुछ लम्हों
की उम्र
कभी
ख़त्म होती नहीं, ये दौड़ती हैं
उम्र भर सांसों के हमराह,
पल भर भी ये सोती
नहीं, चाहे दिन
हो या रात ।
- - शांतनु सान्याल





मंगलवार, 16 जून 2020

पिघलते लम्हात -

उन वाष्पित पलों में कहीं तुमने
उकेरा था मेरा नाम बड़ी
गर्मजोशी से, वही हैं
खिड़कियां, वही
शीशों वाला
दरवाज़ा,
वादियों में अक्सर उभरते हैं - -
बादल, लेकिन बरसते नहीं,
तकता हूँ मैं सुनसान
राहों को बड़ी
ख़ामोशी
से । गुलमोहर झर चले हैं, और
अमलतास बेरंग, फिर भी
ज़िन्दगी नहीं रुकती
किसी के लिए,
नाज़ुक हैं
बहोत ये पल नजदीकियों के,
न तोड़ इन्हें यूँ मायूसी से।
कुछ बूंद मेरी आँखों
के तेरी हथेली पे
पनाह चाहें,
पत्थर
हूँ या कोई गौहर नादिर, बिखरे
जज़्बात मेरे पारखी निगाह
चाहें ।
- - शांतनु सान्याल








सोमवार, 8 जून 2020

आवाज़ जो लौट आए - -

ये सही है कि निगाहों से दूरी
रिश्तों को कमज़ोर कर
जाए, लेकिन ये भी
भी ग़लत नहीं
कि कोई
और
ज़ख्म मेरा भर जाए । किताबों
से निकल कर, कभी तू आ
इन बंजर ज़मीं के रास्ते,
मुमकिन है गहरी
नींद से ज़रा
उबर
जाए । अभी तो है हर तरफ़
नदी का भरपूर किनारा,
कुछ देर रहो दिल के
क़रीब अदृश्य
उफान की
तरह, किसे ख़बर कि कब ये
दिल से उतर जाए । सभी
को है कुछ न कुछ
शिकायत यूं
तो इस
ज़िन्दगी से, रास्तों की कमी
नहीं है लेकिन ज़रूरी
नहीं वो हमदर्द
सिर्फ़ मेरे
घर आए । तन्हा आवाज़ की
प्रतिध्वनि असरदार नहीं
होती, आओ मिल के
सभी दें आवाज़,
कि बेदर्द
ज़माना
हर हाल में वहीं ठहर जाए - -
* *
- - शांतनु सान्याल









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