Sunday, 27 January 2019

रौशनी के उस पार - -

रौशनी में डूबा हुआ सारा शहर -
लगता है बेहद ख़ूबसूरत,
उड़ान पुल हो, या
आकाश पथ
से झाँकते
मग़रूर निगाहें, काश देख पाते,
अंधकार में विलीन कुछ
जीवन की राहें। डरा -
डरा सा संकरी
गलियों से
गुज़रता वो कोई ख़्वाब नहीं, मेरा
हमसाया,जो चीखता है ख़ामोश,
फैलाए अपनी बाँहें। वो सभी
मायावी मोड़ अक्सर
निकलते हैं इसी
राजपथ से,
अय्यारों
से बचना है बहोत मुश्किल, आप
चाहें या न चाहें। हर एक मुखौटे
के पीछे, न जाने कितने,
चेहरे हैं छुपे हुए,
गोल तख़्ती
पे घूमता हुआ मेरा वजूद, खंजर
उनके हाथ, वही हाक़िम, वही
सरबराह क़ौम, जी चाहे
जो भी कर
जाएं। 

* *
- शांतनु सान्याल 






 

Saturday, 26 January 2019

राज़ ए तलाश - -

आईना भी वही, अक्स भी वही,
फिर हैरानगी कैसी, वो कोई
गुमशुदा ख़्वाब है, या
ढलती धूप की
तपन,
अहाता भी वही, घर भी वही, -
फिर आवारगी कैसी।
ताउम्र का
अहदनामा शायद अब तुम्हारे
पास नहीं, रास्ता वही,
ठिकाना भी वही,
फिर
नाराज़गी कैसी। अक्सर मैं, -
ख़ुद से सवाल करता हूँ
लाजवाब हो कर,
जो वजूद
में नहीं,
उसके लिए फिर दीवानगी कैसी।

* *
- शांतनु सान्याल
 

Wednesday, 23 January 2019

प्रथम स्पर्श - -


वो कच्ची उम्र की छुअन या निस्तब्ध पलों
में पीपल पात का हिलना, एक मख़मली
एहसास के साथ तुम्हारा वो बेबाक
हो के मिलना । काश लौट आएं
फिर वही सुबह शाम, मुन्तज़िर
निगाहों से हर पल मीठी
आग में सुलगना ।
वो कशिश
जो जीने की चाहत बढ़ा जाए, वो अंदाज़ ए
निगाह, जो ख़ुश्बू ए जज़्बात बढ़ा जाए,
दबे क़दमों से जैसे मौसम ए बहार,
उजड़ा शहर दोबारा, फूलों से
यूँ सजा जाए।
* *
- - शांतनु सान्याल
https://sanyalsduniya2.blogspot.com/

Thursday, 17 January 2019

सुबह से पहले - -

हर एक अट्टहास के बाद, कुछ देर ज़रूर
ख़ामोशी करती है राज, और इसी
दौरान पैदा होते हैं अकल्पित
इन्क़लाब। धर्म - अधर्म
की दुहाई देने वाले
अचानक जब
साध जाएं
भीष्म -
नीरवता, समझ लीजिये भविष्य का - 
अप्रत्याशित जवाब। दहशत में था
अचानक सारा शाही परिवार,
देख सामने एक जुट
जंगली भैसों का
भावी संहार,
सुप्त -
प्रलय की अपनी ही है, एक असामान्य
प्रवृत्ति, कब, और कैसे, कर जाए
विध्वस्त, पृथ्वी और आकाश
हो जाएं पल में आख़री
पहर के टूटे
ख़्वाब।

* *
- शांतनु सान्याल

Wednesday, 2 January 2019

इस पल के बाद - -

उस अनंत अनुबंध के तहत हैं सभी अंगभूत,
न कोई कम, न कोई अधिक, बीज और
धरा के मध्य हैं सिमटे सभी जीवन,
वो आजतक निकल न पाए
गर्भगृह के तम से बाहर, 
न जाने किस देवता
के हैं वो दम्भी
अग्रदूत।
उस अनंत अनुबंध के तहत हैं सभी अंगभूत।
प्रकृति और पुरुष के मुहाने पर लहराए
महासिंधु अपार, कदाचित उस
दिव्य दिगंत में उभरे जग
के खेवनहार, न तुम,
तुम हो, न मैं,
मैं हूँ,
जो कुछ भी है बस इसी पल में सिमित, इस
पल के बाद है जगत मिथ्या हे मम् अवधूत।
उस अनंत अनुबंध के तहत हैं
सभी अंगभूत।
* *
- शांतनु सान्याल 

अतीत के पृष्ठों से - -