31 जुलाई, 2023

स्व - प्रतिबिम्ब !

उभरते हैं हृदय कमल से कुछ मौन - -

पंखुड़ियां, लिए अंतर में नव 
मंजरियाँ, खिलते हैं 
बड़ी मुश्किल 
से अश्रु 
जल में डूबे सुरभित भावनाएं, जिनमें 
होती हैं अनंत गंध मिश्रित कुछ 
कोमल अभिलाषाएं, एक 
ऐसी अनुभूति जो 
जग में फैलाए 
मानवता 
की असीम शीतलता, जो कर जाए - -
भाव विभोर हर एक वक्षस्थल,
जागे आलिंगन की पावन 
भावना, मिट जाएँ 
जहाँ अपने 
पराए 
का चिरकालीन द्वंद, दिव्य सेतु जो 
बांधे नेह बंध, जागे हर मन में 
विनम्रता की सुरभि, हर 
चेहरा लगे स्व -
प्रतिबिम्ब !
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/


29 जुलाई, 2023

जीवन अनुवाद - -

कुछ और भी
हैं बांध्य भूमि, अधखिले जीवन,
बबूल से बिंधे कई झूलते पतंग, तुम्हारे 
व मेरे मध्य छुपा हुआ सामीप्य -
जो आवधिक है शायद जिसे 
अनुभव तो किया जा
सके देखना हो 
कठिन, 
देह से निकल कर सोच कहीं गुम न हो जाए, -
जीवन चाहता है बहुत कुछ जानना, 
महसूस करना, तुम वो गंतव्य 
नहीं जहाँ आवाज़ तो जाए 
मगर दस्तख़त कर, 
यूँ ही लौट आए 
सहसा, 
चाहता है मन सजल मेघ अणु बनना, उन 
कुम्हलाये पंखुड़ियों से है पुरानी
प्रतिबद्धता, भावनाओं का 
अनुबंध, मानवीय -
संधि, मैं नहीं 
चाहता 
किसी तरह भी प्रेम में संधिविग्रह, ये सच है 
की मेरी साँसें अब भी उठती हैं किसी 
के लिए बेचैन हो कर किन्तु वो 
तुम ही हो ये कोई ज़रूरी नहीं,
आँखों के परे जो दर्पण 
है खड़ा एकटक, वो 
कोई नहीं मेरा 
ज़मीर है,
जो दिलाता है याद, करता है हर पल 
जीवन अनुवाद।

--- शांतनु सान्याल  





25 जुलाई, 2023

ख़ूबसूरत भरम - -


मिलो कुछ इस तरह खुल के, कि देर
तक महके दिलों के दरीचे, वो
अपनापन, जिसमें हो
अथाह पवित्र
गहराई !
खिलो कुछ इस तरह दिल से, कि - -
मुरझा के भी रहे ख़ुश्बूदार,
नाज़ुक जज़्बात !
तमाम रास्ते
यकसां
ही नज़र आए जब कभी देखा दिल की
नज़र से, ये बात और थी, कि
ज़माने ने लटकाए रखी
थी मुख़्तलिफ़
तख़्ती !
लेकिन, हमने भी दर किनार किया वो
सभी ख़्याल ए ईमान, इक
इंसानियत के सिवा,
तुम मानो या
न मानो,
इक यही सच्चा धरम है, बाक़ी कुछ भी
नहीं ये जहां, इक ख़ूबसूरत भरम
के सिवा।

* *
- शांतनु सान्याल




http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
painting  by Ann Mortimer

23 जुलाई, 2023

निर्लज्ज सभासद - -

वही चिर परिचित द्युतसभा, वीभत्स अट्टहास,
पश्चिमान्त से ले कर उत्तर पूर्वान्त,
अंधत्व रहता है यहाँ बारह मास,
भीड़ के चेहरे भिन्न रंगों में
हैं सरोबार, कभी गेरुआ
कभी तीन रंगों में
है वो एकाकार,
भीष्म हो
या धृतराष्ट्र, हर युग में द्रौपदी का ही होता है - -
निर्मम शिकार, अंधत्व और नीरवता के
मध्य मेरुदंड विहीन समाज में
अथक जीने का प्रयास,
वही चिर परिचित
द्युतसभा,
वीभत्स
अट्टहास। इस साम्राज्य की अपनी अलग ही है
विशेषता, कहने को सारा विश्व है अपना
लेकिन पांवों तले कोई ज़मीं नहीं,
दीवारों पर लिखे उपदेश
पलस्तर के संग
उतर गए,
आईना
दूसरों को दिखाने वाले ख़ुद अपना अक्स भूल
गए, वक़्त के साथ विशाल बरगद की
टहनियों से सभी पत्ते निःशब्द
झर गए, बाक़ी रहा सिर्फ़
दोषारोपण का
बकवास,
वही चिर परिचित द्युतसभा, वीभत्स अट्टहास।
- शांतनु सान्याल  

21 जुलाई, 2023

शबनमी अहसास - -

मबहम तीरगी से निकल फिर जिस्म ओ जां
चाहती है, इक चश्म मुसाफ़िरख़ाना,
ख़ुदा के वास्ते न करो यूँ बंद
ज़िन्दगी के रास्ते, कि
मुद्दतों बाद देखी
है हमने
नूर ए आशियाना, कुछ देर सही, रहे रौशन -
चाहतों के बेक़रार जरयां, कुछ पल
और खुला रहे, ख़्वाबों का
शामियाना, फिर
सराब ए
जज़्बात को मिले शबनमी अहसास, फिर - -
ज़िन्दगी में खिले गुल नादिर कि
ज़माना हुआ ख़ुशबू छुपाए
हम बैठे हैं दिल की
गहराइयों में !
* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

मबहम तीरगी - सघन अँधेरा
चश्म मुसाफ़िरख़ाना - आँखों का सराय
जरयां - बहाव
सराब - मृगजल
नादिर - दुर्लभ


20 जुलाई, 2023

शाप मुक्त - -

वो अहसास जिसमें तू है शामिल
किसी चिरस्थायी ख़ुश्बू की
तरह, वो दग्ध भावना
जिसे तू कर जाए
सजल एक
बूँद -
ओस की तरह, वो अनुभूति काश
पा जाए जीवन, जिसमें हों
तेरी आँखों से झरती
आलोक सुधा
की -
शीतलता, वो अंतर्मन की गहराई
जिसमें हो तेरे प्रणय की
अथाह गहनता, हो
जाएँ जिसके
स्पर्श
से शाप मुक्त, जीवन की समस्त
अज्ञानता - -

* *
- शांतनु सान्याल  



18 जुलाई, 2023

अक्स ए ज़िन्दगी - -

मुख़ातिब हो के भी था वो बहोत दूर, 
दरअसल वक़्त के पास ढलान
नहीं होता, नज़दीकियां
गिरह बन जाती हैं
अपने आप,
जिन्हें
खोलना आसान नहीं होता। चले जा
रहे हैं हम दो सीधी लकीरों में
दूर किसी अज्ञात क्षितिज
रेखा की ओर, हर एक
ख़्वाब की है
अपनी
ही
बेबसी कहीं ज़मीं और कहीं आसमान
नहीं होता। इक सुबह से, दूसरे
सुबह तक, अनगिनत
कहानियों का होता
आया है उदयांत,
कई बार
चाहा
भुला दें गुज़रा हुआ कल लेकिन हर
एक याद मेहमान नहीं होता। 
हज़ार बार टूटा ख़्वाहिशों
का शीशमहल, हर
एक टुकड़े में
थी अक्स
ए ज़िन्दगी,
ज़माना
गुज़र जाए शीशा ए दिल में उतरने
के लिए यूँ ही इश्क़ मेहरबान
नहीं होता।
- शांतनु सान्याल 

16 जुलाई, 2023

भीगा सा एहसास - -

 अपनापन के सिवा कुछ भी नहीं -
हृदि गंधकोषों में, वो सिर्फ़ बिखरना है जाने,

अनाम वो अहसास है लाजवाब
वृन्तों से टूटकर ज़मींन से मिलना है जाने,

क्षण भंगुर है ये ज़िन्दगी, इक बूंद
अनजान  दर्द में, पलकों से गिरना है जाने,

मुंह फेर कर तन्हां जी न सकोगे,
ज़िद्द ठीक नहीं, वक़्त यूँ भी बिसरना है जाने,

मौसम का क्या, बदल जाएगा -
नादाँ दिल ओ मोम, सिर्फ़ पिघलना है जाने,

सीड़ियाँ ग़र हटाली किसी ने तो क्या -
आसमानी नूर, स्वयं यूँ भी उतरना है जाने,

बादलों को है जल्दी, उड़ जाये कहीं भी
आज़ाद निगाहें, हर हाल में बरसना है जाने,

ये आशिक़ी एक दायरे में  महदूद नहीं
मंज़िल दर मज़िल, रात दिन फैलना है जाने।

- - शांतनु सान्याल



  


 
  

12 जुलाई, 2023

निराकार सत्ता - -

तृष्णा व मृगजल के मध्य जीवन, कदाचित 
खोजे शीतल तरु छाया, कुछ प्रणय बूंदें, 
कुछ वास्तविक, कुछ स्वप्निल
माया, उन तुहिन कणों में 
थे छुपे व्यथा कितने 
खिलते पुष्पों को 
ज्ञात नहीं, 
गंध कोषों में भरे फिर भी उसने सुरभित -
भावनाएं, वक्षस्थल में सजाये नभ 
ने अनगिनत ज्योति पुंज;
तमस घन रात्रि ने 
किंचित कहा 
हो धन्यवाद या नहीं, कहना है कठिन, फिर 
भी पुनः पुनः आकाश फैलाये अपनी 
बाहें, वृष्टि वन हों या धू धू 
मरू प्रांतर, उसकी 
प्रतिछाया 
अदृश्य 
होकर भी करे प्रतिपल आलिंगनबद्ध !

- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

मृगजल - -


तुम चाहे जितना भी चाहने का दम भरो,
मरने मिटने की क़सम खाओ,
सरीसृप से विहग बन न 
पाओगे, ये अंतर्मन 
की बात है,
रंगीन शल्कों से चाहे जितना भी ढक लो तन 
अपना, वो नैसर्गिक आभा ला न 
पाओगे, छद्म आवरण से 
मुक्ति न पा सकोगे,  
मुझे पाने की तुम्हारी चाहतें रुक जाती हैं 
मांस पेशियों, रक्त कणिकाओं तक 
आ कर, वृष्टि छाया के उस पार 
बहती है शुष्क अतृप्त नदी 
कोई, ह्रदय तंतुओं में 
बसते हैं, 
पलाश वन लिए शताब्दियों के प्रज्वलन 
तुम चाहे अनचाहे अनंत मेघ 
बन बरस न पाओगे, थक 
हार के एक दिन, प्रति -
ध्वनि के पथ हो 
निशब्द, सुदूर शून्य में लौट जाओगे, चाह कर 
मुझे अपना न पाओगे, तृषित थे यूँ  भी 
युगों युगों से, मृगतृष्णा में पुनः 
खो जाओगे, लाख कोशिश 
करो लेकिन मुझ से न 
कभी मिल 
पाओगे।
-- शांतनु सान्याल  

11 जुलाई, 2023

शीर्षक विहीन

वो नज़दीकियाँ जो रिश्ते में ढल न सकी,
दोस्ती जो हाथ मिलाने से आगे बढ़
न सकी, वही चेहरे अक्सर
सवाल करते हैं जो
ख़ुद को जवाब
दे न सके,
वो नशा जो वक़्त के पहले ही उतर गया,
मुझे पता ही न चला, ज़िन्दगी की
उधेड़ बुन में यूँ उलझा रहा
मेरा वजूद, और कब
मैं बना एक
सीढ़ी,
और कोई मुझ से होकर ख़ामोश बड़ी -
आसानी से मौसम की तरह
गुज़र गया, वो शख्स
जो करता था
कभी
दावा हमदर्दी या मुहोब्बत का, दरअसल
वही आदमी मुझे पहचान ने से
बड़ी खूबसूरती से मुकर
गया, क़रीब
बहोत
क़रीब, आ कर देखा मेरा शक्ल ज़रूर उसने,
सर हिला कर आगे बढ़ गया - - 
- शांतनु सान्याल   
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/




09 जुलाई, 2023

शीत दहन - -

सीने के बहोत अंदर उतरती है सघन बरसात,
सुदूर क्षितिज रेखा तक फैला हुआ है एक
हरित प्रदेश, बिंदुओं की तरह बिखरे
पड़े है नन्हें नन्हें पठार, तृण
शीर्ष पर हैं प्रतिबिंबित
कुछ इंद्रधनुषी
बूंद, कुछ
शब्द
विहीन पल हैं सम्मुखीन, तितलियों के परों को
छूना चाहे मन अकस्मात, सीने के बहोत
अंदर उतरती है सघन बरसात। उस
पगडण्डी से हो कर अक्सर
गुज़रती है ज़िन्दगी
जहाँ मेघ छाया
घेर लेती है
माटी
की काया, हज़ार बार जन्म लेता हूँ मैं तुम्हारे
आँख की गहराइयों में, हज़ार बार चाहता
हूँ मृत्यु तुम्हारे पलक की परछाइयों
में, इस अंतहीन मोह की यात्रा
कभी रूकती नहीं, शीत अगन
लिए अंतरतम, जलती
रहती है युगों युगों
तक प्रणय
अगर
की काठ, सीने के बहोत अंदर उतरती है सघन
बरसात।
- शांतनु सान्याल
अगर की लकड़ी - सुगन्धित लकड़ी का नाम

08 जुलाई, 2023

ख़ुश्बूओं की मानिंद - -

फिर तेरी निगाह ए गिरफ़्त है ज़िन्दगी,
फिर चाहता है दिल ख़ुश्बूओं की
मानिंद दूर तलक बिखर
जाना, थक से
चले हैं -
जिस्म ओ जां, इक बेइंतहा भटकाव - -
और लामहदूद ख़्वाहिशें, दिल
चाहता फिर तेरी पलकों
के साए ठहर जाना,
न पूछ मुझ से
किस
तरह से गुज़री है शब तारीक का सफ़र !
हर सांस इक सदी, हर लम्हा
गोया उम्र क़ैद, तुझे खो
कर बहोत मुश्किल
था ज़िन्दगी
का फिर
उभर पाना, फिर चाहता है दिल ख़ुश्बू की
मानिंद दूर तलक बिखर जाना - -
* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
Danhui-Nai-amazing-summer-flowers-paintings

07 जुलाई, 2023

इब्तदा तो याद नहीं

बदलियाँ बरस कर खो गयीं जाने कहाँ,
अब पुरसुकूं आराम लगे, वादियों
से उठता धुआं गहराए, अब
दिल में थम सा गया
कोहराम लगे,
तिश्नगी-ए-दिल बड़ा बेचैन था, आँखों
के बरसने से पहले ऐ दोस्त भीगी
पलकें, उठतीं गिरतीं बूंदें,
आज ख़ूबसूरत फिर
मखमली ये
शाम लगे,
सूखे फूलों के निशाँ बाक़ी हैं, ज़िन्दगी
बेदाग़ नहीं साहिब, हूँ अजनबी ये
निगाहों का फर्क़ है, वैसे जाना
पहचाना ये गाम लगे ,
चिराग़ों के शहर
में गुम सा
गया कहीं, वो अंधेरों का दोस्त मेरा,
आइना भी सबूत चाहे ये और
बात है,शायद चेहरा मेरा
भी गुमनाम
लगे,
वो ख़त अब तलक है मौजूद, क्या
हुआ तहरीरें मिट गईं जिसकी,
छू लूँ उसे, अहसास मीठा
मीठा, दिल के क़रीब
अब तक वो नाम
लगे, उस
बज़्म में तन्हा बचाता रहा, अपने
साए को बार बार, सनम
परस्तिश, न जाने
और क्या,
बहोत प्यारे वो सभी इलज़ाम
लगे, दीवानगी इतनी की
मरना भी चाहूं, और
कभी जीने की
आरज़ू जागे
इब्तदा
तो याद नहीं, बेखौफ़, बेअसर एक
शिद्दत-ए-अंजाम
लगे।
- शांतनु सान्याल

06 जुलाई, 2023

आख़री किनारा - -

न ज़मीं हद ए नज़र, न दूर तक
कोई आसमां, न कहीं लहरों
का ही निशां, ये कौन
उभरा है मेरी
बंजर
निगाहों से यकायक, ये कौन है
जो मुझे कर चला है, मुझ
से ही जुदा, ये कैसा
अहसास है
जो -
ले जाना चाहे मुझे, बा हमराह -
न जाने किन मंज़िलों की
ओर, कि छूट चले
हैं तमाम
चेहरे
आश्ना ओ ग़ैर, इक अजीब सी
तासीर ए इतराफ़ है मेरे
इर्दगिर्द, ये मसीहाई
कोई लम्स
का है
असर या उसकी मुहोब्बत में - -
ज़िन्दगी ने पा लिया
आख़री किनारा !

* *
- शांतनु सान्याल


05 जुलाई, 2023

बेकरां चाहत - -

अभी तलक, मेरी आँखों में हैं 
तेरी परछाइयाँ, झुलसते 
सहरा में भी है सुकूं 
ओ राहत मुझ 
को, नुक़ता 
नज़र के 
असूल जो भी हों जहान के, 
उजड़ने नहीं देती, यूँ तेरी 
बेकरां चाहत मुझ को,
गिरफ़्त ए गर्दबार 
से भी उभरता 
है जीस्त 
यूँ बार 
बार,
बिखरने नहीं देती हर पल 
तेरी नज़ाकत मुझ को, 
अक्स ए आस्मां 
की तरह है 
मेरी 
वफ़ा, हज़ार धुंध में भी मिटने 
नहीं देती तेरी सदाक़त 
मुझ को। 

* * 
- शांतनु सान्याल 

02 जुलाई, 2023

अन्दाज़ ए महलक - -

न देख फिर मुझे फिर वही 
अन्दाज़ ए महलक 
की नज़र से,
अभी 
अभी उभरा हूँ मैं तबाहकुन 
तूफां के असर से,
दूर तलक हैं 
बिखरे हुए 
दर्द ओ ग़म के क़तरे, फिर 
भी हैं तेरी आंखे न 
जाने क्यूँ इस 
क़दर 
बेख़बर से, ज़रा कुछ देर तो 
सही, सजने दे मजलिस 
ए  सितारा, जिस्म 
ओ जां अभी 
तक हैं 
कुछ तर बतर से - - - - -
* * 
- शांतनु सान्याल  
अन्दाज़ ए महलक - घातक अन्दाज़ 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/



01 जुलाई, 2023

अह्तराक़ मुसलसल - -

अपलक देखते 
रहे, न लब ही खुले, न ही 
साँस को कोई राहत, इक ख़ामोश 
लहर बहती रही दरमियां 
साहिल ओ समंदर, 
वो सिफ़र 
था या 
दर तमाम कायनात, वजूद मेरा उस - - 
निगाह में डूबता गया, न जाने 
कहाँ है वो आख़री नुक़ता,
जहाँ हो मुकम्मल 
मेरी चाहत, 
मंज़िल 
दर मंज़िल, इक तलाश बेपायां, लम्हा 
दर लम्हा अह्तराक़ मुसलसल,
बेअसर हैं सभी बारिशें 
आसमां की - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

सिफ़र - शून्य 
कायनात - ब्रह्माण्ड
नुक़ता - बिंदु  
बेपायां - अंतहीन 
अह्तराक़ मुसलसल - लगातार दहन 

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past