रविवार, 17 नवंबर 2019

काश लौट आए - -


मुसलसल ख़ामोशी थी हद ए नज़र तक,
स्टेशन रहा मुन्तज़िर लेकिन नहीं
लौटा मेरा बचपन, न जाने
किस सिम्त मुड़ गई
तमाम पटरियां,
उम्र भर
लेकिन दौड़ता रहा, मेरे रग़ों में इक मीठा
सा कंपन। जब कभी शाम हुई बोझिल,
बहोत याद आए तालाब के छूटते
किनारे, कच्चे  सिंघाड़ों की
उम्र थी मुख़्तसर, शाम
ढलते, नीले थोथों
में डूब गए
सारे।
न जाने क्या बात थी उस सोंधी ख़ुश्बू की,
जो आज तक है ज़िंदा, रूह में हमारे।

* *
- शांतनु सान्याल

painting by Alexandros-Christofias-boy-reading

बुधवार, 6 नवंबर 2019

रात्रिशेष के पथिक - -

जब शून्यता में डूब जाए शहरी कोलाहल,
और निशि पुष्प तलाशें अपना वजूद,
उड़ान सेतुओं की ख़ामोशी जब
कोहरे में हो जाएँ कहीं गुम,
मन विनिमय का खेल,
चलो पुनः खेलें
हम। इस
आख़री
पहर के आगे भी है एक नया दिगंत, जहाँ
कदाचित हो ख़ुश्बुओं का संसार, न
कोई चाहत, न कोई राहत, एक
अनंत नीरवता के मध्य
जहाँ उभरे हमारा
निःस्वार्थ -
प्यार।
जुगनुओं से सजे किनारे पर कहीं है खड़ी -
वो मयूर पंखी नाव, एक स्रोत अविरल
तुम्हारे निगाहों के आरपार, सिर्फ़
बहते है जाना मुहाने की ओर,
न कोई मंदिर, न कोई
मस्जिद, पल भर
भी नहीं अब
ठहराव,
हे, महा रात्रि ! हम तो हैं उजाले के पथिक, -
निरंतर बढ़ें सुबह की ओर, न कोई
पांथशाला, न कोई अचल पड़ाव,
न कोई ठिकाना अपना, न
कोई अन्तर्निहित
अपना गांव।

* *
- शांतनु सान्याल   






 

मंगलवार, 5 नवंबर 2019

उड़ते पत्तों के दरमियां कहीं - -

जिस गर्भगृह से हैं आलोकित पृथ्वी और
आकाश, वही अंतरतम करे स्वयं की
तलाश, सारा कुछ उजाड़ कर
जैसे कोई विलुप्त अरण्य,
ठूंठों के मध्य करे
अपनों की
आस।
वो तमाम घरौंदों का कहीं कोई निशान न
रहा, कुछ डूब गए, कुछ डूबा दिए गए,
देशांतरी पक्षियों की तरह मेरा
भी, अब यहाँ कोई जान
पहचान न रहा,
चलो अच्छा
ही हुआ,
तथाकथित आत्मीय स्वजनों का मुझ  पर
अब कोई एहसान न रहा, मैंने भी लौट
कर न देखा खिसकते हुए किनारे
को, मेरे डूबने के बाद वो
भी परेशान न रहा।
 
* *
- शांतनु सान्याल 






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