शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

धुएं की लकीर - -

पथराई आँखों से ज़िन्दगी तकती है दूर
तक धुएं की लकीर, एक अंतहीन
नीरवता के आगे सभी हैं
मजबूर, क्या राजा
और क्या फ़क़ीर,
इस पार्थिव
देह को
ले कर कितना कुछ रहा हिंसा प्रतिहिंसा,
प्रेम घृणा, अपना पराया, ताउम्र कभी
साथ रहने की कल्पना, सांस
रुकते ही दूर तक बिखरा
पड़ा था अंतिम प्रहर
का मायावी सपना,
कौन किसे रोक
पाए, हर
एक पांव पड़े यहां ज़ंजीर, पथराई आँखों
से, ज़िन्दगी तकती है दूर तक धुएं
की लकीर - -

* *
- - शांतनु सान्याल

    

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

कहीं किसी रूप में - -

आकाश है वही पूर्वकालीन, हाशिए में
कहीं छूट गए उजालों के ठिकाने,
पत्थरों के मध्य राह तलाशते
हैं छूटे हुए जल स्रोत,
दहकता हुआ सा
लगे है बांस
वन,
वैनगंगा के किनारे, किस क्षितिज डोर
पर जा बैठा है मुनिया का झुण्ड,
गाए जाएं गीत बेगाने,
आकाश है वही
पूर्वकालीन,
हाशिए
में कहीं छूट गए उजालों के ठिकाने। -
महादेव की पहाड़ियों में बसते हैं
कुछ बचपन के उजड़े गांव,
कुछ अरण्य लकीरों
में आज भी
भटकती
हैं
कितनी कहानियां अनसुने अनजाने,
फिर लौट आएंगे पलाशरंगी दिन,
फिर सजेगी नदी किनारे
जलज पक्षियों की
महफ़िल, हम
भी कहीं
आस -
पास मिल जाएंगे किसी और रूप में
कदाचित, पुनः लिखे जाएंगे पूर्व
जन्म के अफ़साने, आकाश
है वही पूर्वकालीन,
हाशिए में कहीं
छूट गए
उजालों के ठिकाने।

* *
- - शांतनु सान्याल   







सोमवार, 26 अप्रैल 2021

लवणीय नीरवता - -

सभी मुख़ातिब चेहरे पहलू बदल गए,
बिखरे पड़े हैं कटानों में टूटे हुए
नाव, दूर तक पसरा हुआ
है लवणीय ख़ामोशी,
उतरते लहरों
के साथ
बह
चुका है किनारे का गांव, जिन्हें था - -
एहसास उजड़ने का, सुबह से
पहले वो सभी लोग न
जाने किस ओर
निकल गए,
सभी
मुख़ातिब चेहरे पहलू बदल गए। - -
बंजर ज़मीं पर उग आएंगे
एक दिन विस्तृत झाऊ
वन, प्रकृति अपने
भीतर रखती
है असंख्य
निर्मिति,
एक
अदृश्य ताना - बाना रचता है सदा
हरित प्रदेश, सब कुछ कभी
नहीं होता है यहाँ शेष,
अनगिनत दिन
आए और
आ कर
ढल
गए, सभी मुख़ातिब चेहरे पहलू - -
बदल गए।

* *
- - शांतनु सान्याल




रविवार, 25 अप्रैल 2021

शून्य दृष्टि - -

अंतरतम को बेध जाती है जीवन की
शून्य दृष्टि, निर्मम नियति के
आगे सभी हैं आज बहुत
ही लाचार, चारों
तरफ टूटते
सांसों
के मध्य मानवता करती है हाहाकार,
कोई मिटाए चला हो जैसे अपने
ही हाथों, अपनी बनाई हुई
ख़ूबसूरत सृष्टि,
अंतरतम
को
बेध जाती है जीवन की शून्य दृष्टि।
आज मुस्कराहट में भी, दर्द का
है एक अदृश्य समावेश,
आज हैं हम आमने
सामने, चाहते
हैं कुछ
पल
का कथोपकथन, कल नीरवता के
सिवाय कुछ भी न रहे हमारे
मध्य अवशेष, फिर भी
सब कुछ ख़त्म
नहीं होगा,
मरू -
धरा अपनी जगह है अडिग, इस
जीवन की प्यास है अंतहीन,
कहीं न कहीं से खोज ही
लाएगा वो एक दिन,
अविरत धाराओं
में टूट कर
बरसती
 हुई
महा वृष्टि, अंतरतम को बेध
जाती है जीवन की
शून्य दृष्टि।

* *
- - शांतनु सान्याल  


 

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

पतझर का अवसान - -

शून्य आंगन में बिखरे पड़े हैं सूखे पत्ते,
टूटे पड़े हैं बांस के घेरे, असमय का
पतझर कर चला है दूर तक
अरण्य को सुनसान,
धूम्रवत सा छाया
हुआ है हर
तरफ,
जीवन खोजता है एक टुकड़ा आसमान,
इस दहन काल में भी सिंहासन का
खेल है जारी, हाहाकार करती
हुई जनता की कौन यहाँ
सुध लेगा, औषधि
से लेकर प्राण -
वायु की
हो
जहाँ काला बाज़ारी, शहर गांव सभी की
समान सी है लाचारी, फिर भी जीने
की अदम्य अभिलाष, बुझने
नहीं देती अंतिम आस,
इस मृत्युकाल का
एक दिन ज़रूर
होगा परिपूर्ण
अवसान,  
असमय का पतझर कर चला है दूर तक
अरण्य को सुनसान - -

* *
- - शांतनु सान्याल

   
 

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

काया विहीन - -

वो कौन था, कहाँ से आया, कुछ भी मालूम
नहीं, महत रूप में वो कोई काया विहीन
था, मनुष्य था या कोई परग्रही दूत,
सभी तर्क-वितर्क के उस पार
कदाचित कोई अवधूत,
एक हथेली में थी
अग्नि शिखा,
दूसरे
पर
थामे हुए समस्त ब्रह्माण्ड की व्यथा, वो
सब कुछ उजाड़ कर जैसे आत्म सुख में
अंतर्लीन था, वो कौन था, कहाँ से
आया, कुछ भी मालूम नहीं,
महत रूप में वो कोई
काया विहीन
था। उस
की
बंद आँखों में थी एक अजीब सी मुस्कान,
ओंठों के किनारे अंतहीन नीरवता,
वक्षस्थल पर दूर तक प्रसारित  
कोई भस्मरंगी आसमान,
रेत के घर पैरों से
बिखरा कर
जैसे
कोई शिशु पाता है एक अपरिभाषित ख़ुशी,
ठीक उसी तरह ये कौन है जो जलगृह
बनाकर डुबाता है बारम्बार, इस
दहन काल में जो अदृश्य
परछाइयों से ढकता है
देह प्राण, कहने
को वो छाया -
हीन
था, वो कौन था, कहाँ से आया, कुछ भी
मालूम नहीं, महत रूप में वो कोई
काया विहीन
था।

* *
- - शांतनु सान्याल

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

जलशब्द के अवशेष - -

भीगे पृष्ठतल पर सिर्फ रह जाते हैं कुछ
जलशब्द, लौट जाते हैं प्रवासी हंस,
सुदूर अपने देश, कुछ धूसर
मेघ के अतिरिक्त महा
शून्य सा रह जाता
है आकाश पथ,
उभरता है
रोज़
की तरह आदिम ध्रुव तारा, झुलसे हुए
दिन के पास, नहीं होता कहने के
लिए कुछ भी विशेष, केवल
रह जाते हैं कुछ जलशब्द,
लौट जाते हैं प्रवासी
हंस, सुदूर अपने
देश। रात
आती
है
कराहती हुई, सुनसान रास्तों में कोई
नहीं होता जो बढ़ा सके दुआओं
वाले हाथ, वटवृक्ष के नीचे
अब नहीं जलता कोई
भी चिराग़, सूने
पड़े हैं दूर तक
सभी मठ
और
मज़ार, चुप हैं पृथ्वी और चन्द्रविहीन
आकाश, गहन निशीथ स्थिर है
अपनी जगह ले के अंतिम
निःश्वास, सुदूर हार्न
बजाता हुआ
गुज़रा
है
अभी अभी एम्बुलेंस, भीगे पृष्ठतल पर
सिर्फ रह जाते हैं कुछ जलशब्द,
लौट जाते हैं प्रवासी हंस,
सुदूर अपने
देश।

* *
- - शांतनु सान्याल  








शनिवार, 17 अप्रैल 2021

हवाओं के हमराह - -

सभी चेहरे हैं ऋतु अनुचर, बदल जाएंगे
अपना रास्ता हवाओं के अभिमुख,
फिर भी सांझ उतरेगी हमेशा की
तरह, और खींच जाएगी
तुम्हारी पलकों में
कहीं महीन सी
एक सुरमयी
रेखा,
जीवन बटोर लेगा अपने हिस्से का बचा
खुचा सुख, सभी चेहरे हैं ऋतु अनुचर,
बदल जाएंगे अपना रास्ता
हवाओं के अभिमुख।
एक ही जीवन
में नहीं है
संभव
सभी
प्रश्नों का समाधान, चिर दहन के मध्य
ही छुपे रहते हैं वृष्टि वन के अभियान,
सुख दुःख के स्रोत यूँ ही बहते
रहेंगे अनंतकाल तक,
कभी ख़त्म न
होगा, ये
धूप
छांव का लुकछुप, सभी चेहरे हैं ऋतु
अनुचर, बदल जाएंगे अपना
रास्ता हवाओं के
अभिमुख।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

अनुच्चारित शिलालिपि - -

इस गहन नील अंधकार के बाद भी,
बहुत कुछ है निःशेष, कुछ बातें
हैं मौन, पत्थरों के सीने पर
लिपिबद्ध, उन अदृष्ट
शब्दों में हैं छुपे
हुए आगामी
कल के
कुछ
अवशेष, इस गहन नील अंधकार के
बाद भी, बहुत कुछ है निःशेष।
अनगिनत प्रकाश वर्षों से
जो बह रहा है हमारे
दरमियां उस
अगोचर
स्रोत
में कहीं गूंजती है भविष्य की ध्वनि,
उन अश्रुत, अनुच्चारित शब्दों से
ही उभरती है नई ज़िन्दगी,
क्रंदनमय इस महा -
निशा के शेष
प्रहर में हैं
खड़े
कुछ उजानमुखी नाव, सुदूर कहीं
तैरते दिखाई पड़ते हैं, कतिपय
टिमटिमाते हुए बंदरगाह,
कुछ नींद से जागे हुए
हरित प्रदेश,
इस गहन
नील
अंधकार के बाद भी, बहुत कुछ है
निःशेष - -

* *
- - शांतनु सान्याल 

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

सेतु विहीन नदी - -

कहने को हमारे अंदर बहती हैं सहस्त्र
स्रोतस्विनी, फिर भी बहुत अकेली
होती है ये ज़िन्दगी, दरअसल
हम कई हिस्से में ख़ुद
को यूँ बांट जाते
हैं कि स्वयं
को देने
के
लिए कुछ भी बचा रहता नहीं, कहने
को हमारे अंदर बहती हैं सहस्त्र
स्रोतस्विनी। अनगिनत
तरंगों में बहते बहते,
फिर भी सूखती
नहीं हमारे
अंदर
की नदी, हाट बाज़ार, घाट किनार,
आकाश को छूते हुए, घूमते हैं
चाहतों के उड़न खटोले,
हर तरफ होता है
एक अंतहीन
शोर, मगर
भीड़
में भी हम होते हैं बेहद अकेले, लेन
देन थमता नहीं उम्रभर, कुछ
पलों के सुख के लिए सब
कुछ लगा आते हैं हम
दांव पर, जीत हार
का लेखा जोखा
पड़ा रहता
है वक़्त
के रेत पर, दोनों किनारों के दरमियां
लेकिन दूर तक कोई सेतु बंध,
कहीं नज़र आता नहीं,  
कहने को हमारे
अंदर बहती
हैं सहस्त्र
स्रोतस्विनी। फिर भी बहुत अकेली
होती है ये ज़िन्दगी।

* *
- - शांतनु सान्याल



रविवार, 11 अप्रैल 2021

ये अंतिम बिंदु नहीं है - -

हर तरफ है उदासियों का दृश्यांतर,
आख़री सांसों में तैरते हैं कहीं
कुछ दिन और जीने की
एक अदम्य उत्कंठा,
प्रकृति अपना
महसूल
हर
हाल में करती है वसूल, पड़े रहते
हैं भस्म में लिपटे हुए सभी
अधजले उम्मीद, कुछ
बांझ महत्वाकांक्षा,
चिंगारियों में
उड़ जाते
हैं न
जाने कहाँ सभी जन्म जन्मांतर
साथ रहने की अंतहीन मंशा,
आख़री सांसों में तैरते
हैं, कहीं कुछ दिन
और जीने की
एक अदम्य
उत्कंठा।
सभी
पर्वतारोही नहीं पहुँच पाते हैं उस
अलौकिक बिंदु पर, फिर भी
जीवन यात्रा नहीं रूकती,
नदी, अरण्य, प्रस्तर -
खंड, झूलते हुए
सेतु बंध,
सभी
अपनी जगह हैं यथावत मौजूद, -
विलीन पदचिन्हों पर फिर
चलते जाएंगे अनाहूत
निर्भीक आरोही,
फिर उभरेंगे
सभी
डूबे हुए चेहरे, पुनः पृथ्वी में गूंजेगा
एक दिन हर्षोल्लास का अंतहीन
डंका - -

* *
- - शांतनु सान्याल
   
 

 

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

कंटक सीमांत के अतिक्रम - -

इक अजीब सा खिंचाव है ज़िन्दगी,
दूर जितना भी जाना चाहें, हम
उतना ही ख़ुद को मोह
जाल में उलझता
पाएं, मुक्त
करने
की
चाह में क्रमशः डूबता जाए, गहन
से गहनतम अतल की ओर
ये अस्तित्व हमारा,
अदृश्य गोंद
की तरह
हैं
लिपटे हुए स्पृहा के घोल, जितना
ख़ुद को छुड़ाएं हम, उतना ही
उस से लिपटता जाएं,
दूर जितना भी
जाना चाहें,
हम
उतना ही ख़ुद को मोह जाल में - -
उलझता पाएं। वो प्रेम है या
जीने की अनबुझ कोई
तृषाग्नि, जितना
भूलना चाहें
उतना
ही
हम स्वयं को उस के क़रीब पाएं,
उन अंतरंग पलों में करने को
कुछ होता नहीं, घुटनों
के बल तब रेंगता
है अंदर का
आदिम
सरीसृप, समुद्र, आकाश, आलोक
सम्मेलन के अतिक्रम, तब
तुम्हारा अस्तित्व कर
जाता है मुझे पूर्ण
छायाच्छन्न,
हर तरफ
होती
है
अदृश्य कांटेदार सीमान्त, जीवन
उन भूमिगत पलों में आख़िर
जाए भी तो कहाँ जाए,
अदृश्य रस्साकशी
में उलझ के
रह जाए
सभी
उन्मुक्त भावनाएं, दूर जितना - -
भी जाना चाहें, हम उतना
ही ख़ुद को मोह जाल
में उलझता
पाएं।

* *
- - शांतनु सान्याल
    

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

खंडित परकोटा -

ऊँचे खम्बों में लटकते हैं कहीं सपनों
के विज्ञापन, बिखरा हूँ मैं उसी
के नीचे कहीं, उपभुक्त
किताबों की तरह,
तुम्हारा दर्द
है गहरा,
सोम -
रस से बुझ जाए शायद, जीर्ण पृष्ठों
में तलाशता हूँ मैं दिनयापन,
ऊँचे खम्बों में लटकते हैं
कहीं सपनों के
विज्ञापन।
पास
तुम्हारे खोने को कुछ भी नहीं, तुम
पा चुके समयोपरि, तुम्हारा
मन बहता है मुहाने
की ओर समुद्र
को पाने,
हम
खोजते हैं बैठ किनारे, डूबे हुए कुछ
रौशनी के दर्पण, ऊँचे खम्बों में
लटकते हैं कहीं सपनों के
विज्ञापन। तुम्हारी
रातें, करती हैं
अनगिनत
ग्रह -
नक्षत्र से बातें, मैं तह करता हूँ - -
क्रमशः घातें - प्रतिघातें, शेष
प्रहर जोगी है कोई, उतार
फेंकता है सभी छद्म -
अपनापन, ऊँचे
खम्बों में
लटकते हैं कहीं सपनों के विज्ञापन।
इस शहर के अंतिम छोर में
कहीं आज भी है मौजूद,
समय का एक टूटा
हुआ परकोटा,
जहाँ से
हो
कर जाती है एक पगडण्डी, सुदूर - -
खंडित तारों के देश, कदाचित
जहाँ कोई नहीं चाहेगा
अस्तित्व का
सत्यापन,
ऊँचे
खम्बों में लटकते हैं कहीं सपनों के
विज्ञापन।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

अदल-बदल का खेल - -

कैसे छोड़ दूँ सपनों के पीछे दौड़ना, अंदर
का रिले रेस, हर हाल में चाहता है,
तुम तक पहुंचना, मैंने बांध
ली है, ज़ख्मों के ऊपर
स्मृति रुमाल,
हाथों में हैं
कुछ
रंगीन पताका, हर एक जनम में लेकिन
तुम उसी दिगंत बिंदु पर रुकना,
अंदर का रिले रेस, हर हाल
में चाहता है, तुम तक
पहुंचना। कुछ
तितलियों
के मृदु
स्पर्श, कुछ सुबह की कच्ची धूप, कुछ
रंगीन पेंसिलों के उपहार, कहानियों
की किताब, कुछ मुस्कान भरे
उम्मीदों का हाथ बदल,
तुम उड़ान पल के
नीचे किसी
मासूम
शिशु
के आसपास कहीं ठहरना, अंदर का रिले
रेस, हर हाल में चाहता है, तुम तक
पहुंचना। उस कांच की दीवार
के उस पार, बसते हैं कुछ
रेशमी लिबास वाले,
काश, वो भी
जान पाते
ये ख़ुशियों का खेल, भावनाओं का अदल -
बदल, जो बंद है उनकी सोच में कहीं,
वो अक्सर चाहते हैं अन्तःस्थल
से बाहर छलकना, अंदर का
रिले रेस, हर हाल में
चाहता है, तुम
तक
पहुंचना।
 
* *
- - शांतनु सान्याल   
 

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

मायावी बंद संदूक - -

खोल न पाएंगे दुर्ग द्वार किसी तरह,
चाहे जितना भी बढ़ा लें हम क़द
अपना, नियति ने फेंक दी
है चाबियों का गुच्छा,
पोखर में कहीं,
तैरता है
टूटा
हुआ बिहान का सपना, चाहे जितना
भी बढ़ा लें हम क़द अपना। उम्र
भर हम ने छीनी है ग़र हक़
पराया, चौक पर कुत्तों
को बिस्कुट खिलाने
से अब क्या
फ़ायदा,
चाहे
दाने चुगाओ कबूतरों को, या चीटियों
को कराओ मधु पान, अतीत के
पृष्ठ नहीं बदलते, वो सभी
बंद हैं दराज़ में, मुद्दतों
से बाक़ायदा, जो
कुछ लिखा
जा चुका
है उसे
मुश्किल है अब बदलना, चाहे जितना
भी बढ़ा लें हम क़द अपना। उस बंद
दिव्य द्वार के अन्तःस्थल
में क्या है, किसे मालूम,
फिर भी हर कोई
चाहता है उसे
खोलना,
कोई
कोहरे की है वो ज़मीं, या शून्य के सिवा
कुछ भी नहीं, आलोक स्रोत का है
कोई उद्गम स्थल या स्वयं
को अंधकार में है अविरत
टटोलना, उस परम
सत्य के आगे
हर हाल
में है
हमें झुकना, चाहे जितना भी बढ़ा लें - -
हम क़द अपना।

* *
- - शांतनु सान्याल    

 

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

स्तुतिपाठकों के बीच - -

किस से कहें अपनी व्यथा, खड़े हैं सामने
कुछ प्रणम्य चेहरे और कुछ पुरातन
पत्थर के स्तम्भ, सिंहासन पर
हैं पसरे हुए बिसात और
पासा, हलक पार
नहीं निकलते
उपालम्भ,
ख़ुद
ही उठा लो बिखरा हुआ अस्तित्व अपना,
कोई नहीं है आसपास, जो कर सके
युद्धारम्भ, खड़े हैं सामने कुछ
प्रणम्य चेहरे, और कुछ
पुरातन पत्थर के
स्तम्भ। छंद
विहीन हैं
सभी
अंग प्रत्यंग, उतरता जाए सुबह से शाम
ख़्वाबों का अंगरखा, स्तुतिपाठक
हैं खड़े पंक्तिबद्ध, इस जनपद
का जीवन है, अपने आप
में अनोखा, सवाल
से पहले हैं सभी
जवाब यहाँ
हाजिर,
काश, कोई तोड़ पाता महाधिराज का
विश्व विजयी दम्भ, ख़ुद ही उठा
लो बिखरा हुआ अस्तित्व
अपना, कोई नहीं है
आसपास, जो
कर सके
युद्धारम्भ - -

* *
- - शांतनु सान्याल

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

विलुप्त प्रतिबिम्ब - -

काग़ज़ी फूलों की भीड़ में मुरझाने का
सबब नहीं होता, इत्र में डूबो कर
जितना चाहे बिखेरो, शब्दों
के बूंद, हर हाल में वो
लेकिन, ख़ुश्बुओं
का अदब
नहीं होता, काग़ज़ी फूलों की भीड़ में
मुरझाने का सबब नहीं होता।
जिस्म का फ्रेम टूट ही
जाएगा एक दिन,
कांच के पृष्ठ
पर चाहे
जितनी ख़ूबसूरत तुम ग़ज़ल लिखो,
हर एक आह लेकिन असली
शलभ नहीं होता, काग़ज़ी
फूलों की भीड़ में
मुरझाने का
सबब
नहीं होता। हाड़ मांस का चौखट है
अपनी जगह, दहलीज़ पार
की दुनिया में हैं बहुत
कुछ अनछुआ,
कुछ दर्द
बूढ़ा
देते हैं उम्र ढलने से पहले, लौटा दे
वही बिम्ब पुराना हज़ार चाहतों
वाला, समय के पास रंग
बदलने का मौलिक
कलप नहीं
होता,
हर एक आह, लेकिन असली - -
शलभ नहीं
होता।

* *
- - शांतनु सान्याल

रविवार, 4 अप्रैल 2021

वर्णमाला के नेपथ्य में - -

कुछ शब्दों की सुंदरता से, जीवन की
वास्तविकता बदल नहीं सकती,
यौन कर्मी कहो या नगरवधु,
जो परंपरागत शब्द है
उसका अर्थ नहीं
बदलता,
केवल  
छद्म कुलीनता के मिथ्यावरण ओढ़े,
हज़ारों साल तक, जीवित रहते
हैं ये दलाल, एक ही जीवन
में मरती है कोई वेश्या
हज़ार बार, खादी
पहन लेने भर
से गलित
मानसिकता बदल नहीं सकती, कुछ
शब्दों की सुंदरता से, जीवन की
वास्तविकता बदल नहीं
सकती। इस रंगमंच
के पीछे बसते
हैं अनेक
पात्र,
कुछ अंध चरित्र, कुछ उजालों के हैं -
पैरोकार, इस मंच से उतर कर
सभी दौड़े जा रहे हैं, ले के
हाथ में पत्थर, इक
चुप्पी सी है हर
तरफ, किसी
रुके हुए
इन्साफ़ की तरह, ख़याबान ए हरम
हो, या कोई मंदिर का रास्ता,
सभी चेहरे हैं तमाशबीन,  
गणिका हो या कोई
लहूलुहान रूह,
किसी को
नहीं
यहाँ किसी से, कोई भी सरोकार, इस
रंगमंच के पीछे बसते हैं अनेक
पात्र, कुछ अंध चरित्र, कुछ
उजालों के हैं पैरोकार।
कुछ विषाक्त जड़ें
होती हैं गहरी
ज़मीं के
बहुत
अंदर जिन्हें उखाड़ फेंकना सहज नहीं,
ये भी सच नहीं कि कुछ विकृत
अनुवांशिकता बदल नहीं
सकती, कुछ शब्दों
की सुंदरता से,
जीवन की
वास्तविकता बदल नहीं सकती - - -

* *
- - शांतनु सान्याल

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

विहंगम दृश्य - -

सभी दौड़े जा रहे हैं बेतहाशा, जंगल की ओर,
वृद्ध युवा, स्त्री पुरुष और शिशु, बढ़ रहे हैं
संकरी घुमावदार पगडंडियों से, पहाड़ी
शीर्ष की ओर, देखना है उन्हें
सुदूर तलहटी में बसा
हुआ सुनहरा
शहर !
या रूपकथाओं का स्वर्ण मृग, या बढ़ रहे हैं
सभी किसी अज्ञात दलदल की ओर,
सभी दौड़े जा रहे हैं बेतहाशा,
जंगल की ओर। स्लेटी
देह पर कोई गोद
गया है महुवा
का पेड़ !
उठा
रही है ज़िन्दगी, आंगन में बिखरे हुए सूखे
पत्तियों के ढेर, शून्य में तकते हैं सभी
तुमड़ी, टंगिया और झुलसी हुई
समय की बेल, चलो फिर
चलें, मृगजल की
तलाश में
उसी
सुलगती हुई मंज़िल की ओर, सभी दौड़े -
जा रहे हैं बेतहाशा, जंगल की ओर।
ये किस तरह का है निर्वासन,
कैसी है बेबसी, कोई नहीं
जानता, खुल के
हँसने की
चाह
में बस गुज़र गई, जैसे तैसे तथाकथित ये
ज़िन्दगी, नंगे पाँव, डामर की तपती
सड़क, रेल की पटरियों में बिखरे
हुए फटे चप्पल, चादर की
छोर खींचता हुआ वो
मासूम बचपन,
सभी कुछ,
सभी
को, कहाँ याद रहता है, लोग भूलते नहीं
दिखाना लेकिन सोने का हिरण,
लोग चले जा रहे हैं फिर भी
उसी रास्ते, जहाँ हर
किसी ने है लूटा
उन्हें चंद -
रोटियों  
के
वास्ते, कहाँ राहत है जिस्म ओ जां को, -
गुज़रना है उसे एक अभिशाप से
दूसरे गरल की ओर, सभी
दौड़े जा रहे हैं बेतहाशा,
जंगल की
ओर।

* *
- - शांतनु सान्याल
 



 

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

सेहन की धूप - -

सेहन की धूप की तरह, कांच की खिड़कियों
से, धूसर ज़मीं पे, अभी अभी उतरा हूँ,
किसी और को तुमने देखा होगा,
उजालों में कहीं दूर बहते हुए,
या शाम के धुंधलके में
कहीं उभरता हुआ
पश्चिमस्थ
सितारा,
मैं
ख़ुद के ता'रूफ़ से हूँ बेख़बर, सोचता हूँ कौन
हूँ, क्या हूँ, कांच की खिड़कियों से, धूसर
ज़मीं पे, अभी अभी उतरा हूँ। चेहरे
और मुखौटे के दरमियां, ख़्वाब
और हक़ीक़त के बीच, एक
अमूर्त सा रेखा हूँ, जिसे
कोई क़ैद कर न
सका अपने
मोह के
क़फ़स में, अपने आसमां का कोई उन्मुक्त
परिंदा हूँ, मैं ख़ुद के ता'रूफ़ से हूँ बेख़बर,
सोचता हूँ कौन हूँ, क्या हूँ। इस स्रोत
को बांधने की कोशिशें हैं बेकार,
न जाने किस, साहिल जा
लगे, हंगामाख़ेज़
लहरें, मुझे
मालूम
ही
नहीं, कोई गहरी नदी हूँ, या बेलगाम कोई
दरिया हूँ, न बनाओ मुझे, उम्र की
लम्बी लकीर अपने हथेलियों
में कहीं, अफ़सोस न हो
तुम्हें कि ख़्यालों
में अभी तक
मैं ज़िंदा
हूँ,
जिसे कोई क़ैद कर न सका अपने मोह के
क़फ़स में, अपने आसमां का कोई
उन्मुक्त सा परिंदा हूँ।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

निःसंग पथिक - -

बख़िया उधेड़ जाए मौन आरसी, सीने से
फिसलता जाए सभी गेरुआ रंग, वो
कहीं मिला भी या नहीं जिसे
तुम ढूंढते रहे आजीवन,
काश, उसे छू पाते
जो हमेशा
रहा
तुम्हारे अंतरंग, सीने से फिसलता जाए
सभी गेरुआ रंग। उतर गए सभी
लबादे, बिम्ब करता रहा दीर्घ
अट्टहास, बुझ गए सभी
धूप - धूनी, निःशब्द
लौट आए सभी
मंत्रोच्चार,
बजता
रहा
एकतारा, अपनी जगह एकाकी, एक -
शून्य दराज़ के सिवा, कुछ न था
हमारे पास, उतर गए सभी
लबादे, बिम्ब करता रहा
दीर्घ अट्टहास। कौन
किसे ले डूबा
या तो
नदी
जाने, या फिर सूरज को हो उसका पता,
पुनः सी रहा हूँ मैं स्मृति चादर,
जबकि घिस चुके हैं सभी
किनार, कुछ अमूल्य
क्षण उभर आते
हैं पैबंदों के
पार, जा
चुके सभी अपने अपने घर, जा चुकी - -
द्रुतगामी रेल, सुनसान पटरियों
में जीवन चला जा रहा है
सुदूर अरण्य अंधकार
की ओर, कोई भी
नहीं है उसके
संग, काश,
उसे
छू पाते जो हमेशा रहा तुम्हारे अंतरंग !

* *
- - शांतनु सान्याल


 

 
 

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