सोमवार, 31 अगस्त 2020

ज़िद्दी पल - -

मिलने को तेरे यूँ तो जां तड़पता है,
वही आँगन, वही नदी - पहाड़
का खेल, अब भी तुझे
छूने को जी मेरा
मचलता है,
वो
बारिश की बूंदे वक़्त के खपरैलों से
उतर कर, न जाने कब मेरी
उंगलियों के कोरों से
निकल कर ज़मीं
पे बिखर
गए,
सुदूर पहाड़ियों के वो साँझ बाती न
जाने किधर गए, कोलाहल में
भी रही, निरंतर एक
निभृत शून्यता,
हम जहाँ
गए
जिधर गए। स्मृतिओं का आखेट -
और प्रतिबिम्बों से लुकछुप,
जीवन भर चलता है,
कुछ पल होते
है बहुत
ही
ज़िद्दी, अनवरत रहते हैं साथ, फिर
न जाने क्यों, इन्हें खोने का
सदैव डर रहता है, खोने
पाने का सिलसिला
ताउम्र चलता
है।

* *
- - शांतनु सान्याल

राज -पथ से आधारशिला तक - -

उस हाईवे के किसी एक कच्चे मोड़
से बिछुड़ जाती है ज़िन्दगी,
कीचड़ भरे रास्तों से
हो कर हम वहां
तक पहुँचे
भी
अगर, रोक लेती है बिन पुलिया की
नदी। फाइलों में कहीं गुम है
इस गाँव का नाम यूँ
कह लीजिये
उसका
कोई
अस्तित्व ही नहीं, कालापानी की
सज़ा है यहाँ ज़िन्दगी, वैसे
तो यहाँ लोग आते हैं
कभी कभार,
लेकिन
हर
पांच साल में यहाँ लगता है मेला
अपार, टोपी पहनाने वाले
होते हैं बेशुमार, वही
घिसा पिटा
रिकार्ड,
आश्वासन के आकाशमुखी झूले -
कुछ रजिस्ट्रेड मदारी कुछ
स्थानीय जमूरे, और
तालियों के
बीच
गले में रस्सी बांध जाते हैं लोग,
राज - पथ और आधारशिला
के मध्य उम्र भर के लिए
अपना स्वार्थ साध
जाते है लोग,
गले में
रस्सी बांध जाते हैं लोग - - सिर्फ़
नाचते रहो उनकी डमरू की
आवाज़ पर - -

* *
- - शांतनु सान्याल
 

रविवार, 30 अगस्त 2020

समान्तराल के पथिक - -

सभी अभिशप्त पल जी उठे सहसा
जब हमने अंतर्मन से ख़ुद को
ऊपर उठाया, न कोई
फ़लसफ़ा न कोई
पुराण पोथी,
सिर्फ
स्नेह विग्रह को हमने मन मंदिर में
बिठाया। हर एक की थी अपनी
ही वरीयता सूची, ग़र वो
भूल जाएँ हमें तो
कोई बात
नहीं,
बेकार है इस पार, उस पार फिरना,
इस भटकाव से कभी निजात
नहीं, जो बुझा पाए चाहतों
के अंतहीन दावानल,
ऐसी कोई भी
बरसात
नहीं। न कोई सराय, न कोई पांथ -
शाला, उन्मुक्त आकाश और
नक्षत्रों की आलोक माला,
समान्तराल में सभी
प्रवाहित, क्या
राज मुकुट
और
क्या तुलसी की माला - - - - - - -

* *
- - शांतनु सान्याल

ज़िंदा रूह - -

हर एक मोड़ के फ़सील पे बैठे हुए
हैं लोग, लिए हाथ में अदृश्य
फंदा, गुज़रें भी तो किस
गली से हर तरफ
हैं छुपे हुए
फ़रेब
के ख़ूबसूरत जाल, अभी अभी उस
आश्रम का फीता काट गए हैं
विधायक जी, लिहाज़ा
चुप रहना ही है
बेहतर
बहरहाल। सुना है, गहराते रात में
आती हैं रुक रुक कर उस
आलिशान बंगले से
दर्द भरी चीखें,
शायद
कोई
ज़िंदा रूह भटकती है, हम ने भी -
पड़ोसी की तरह बंद कर ली हैं
खिड़कियां और किवाड़ें,
रूह हो या कोई
ज़िंदा इंसान,
अच्छा
नहीं कि किसी और के घर हम
झाँखें।

* *
- - शांतनु सान्याल

शनिवार, 29 अगस्त 2020

सुबह का नज़ारा - -

उस जुलूस में हम भी थे कभी
विजय ध्वज लिए हुए, ये
और बात है कि वक़्त
बदलते ही उसने
हमें प्रवासी
बना
दिया, न छत अपनी, न कोई
पता ठिकाना, यूँ तो कहने
को सारा देश है अपना,
अपने ही घर में
हमें अवैध
निवासी
बना दिया। न जाने कौन है
वो शख़्स, टी व्ही में कहीं
देखा है, न जाने क्या
कहता है, हमें तो
कुछ भी
नहीं
समझता है, कभी ज़मीं तो -
कभी अंतरिक्ष की बातें
करता है। हमें इस
पल की चिंता
से फ़ुरसत
नहीं
मिलती, वो दूरबीन से हमें -
ख़्वाबों के ताबीर दिखाना
चाहता है, कल तक
हम ज़िंदा रहें
या न रहें,
शायद,
इसलिए वो अपनी अपरिमेय
जागीर दिखाना चाहता
है।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

सब कुछ ठीक ही है - -

यूँ तो सब कुछ ठीक ही है फिर
भी उनकी आँखों में कहीं,
इक ख़ौफ़ सा है खो
जाने का, मैं
चाहता
हूँ
उन्हें छूना, रूह से महसूस - -
करना, शायद उन्हें डर
है मेरा हो जाने का।
यूँ तो सब कुछ
ठीक ही है
फिर
भी न जाने क्यूँ अंतरंग दोस्त
तकते हैं बड़ी पुरअसरार से,
असल में हर शख़्स है
यहाँ, शहद का
तलबगार,
लेकिन
चाहते हैं बचना मधुकोष के - -
शिकार से। यूँ तो सब कुछ
ठीक है लेकिन एक
मुद्दत से बैठा
हुआ हूँ
मैं,
परछती के नाज़ुक किनारे, वो
निःशब्द हटा ले गए सभी
निसेनी नज़र बचा के,
कह गए ऊपर ही
रहो ख़ुदा के
सहारे।
यूँ तो सब कुछ ठीक है फिर भी
टेलीविज़न बन चला है ख़ुद
मुख़्तार, न कोई चश्मदीद,
न ही कोई ज़िरह की
उम्मीद, सबूत
ही नहीं
फिर
भी ज़माने के नज़र में आप हैं
गुनाहगार, फिर भी यहाँ
सब कुछ ठीक है।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

असमाप्त यात्रा - -

उन निस्तब्ध क्षणों में जब मध्यरात्रि हो
मुखरित, निशिगंधा खोलें संवृत गंध
चक्र, और ईशान कोणीय मेघ
बरसे बूंद बूंद, उष्ण श्वास
के मरू प्रांतर तब हो
जाएँ अपने आप
सुरभित।
उन
अकृत्रिम क्षणों में जीवन चाहे शाश्वत - -
अनुबंधन, न नारी, न पुरुष, न
जन्म नहीं मृत्यु, न प्रेम न
कोई घृणा, न लौकिक
नहीं अलौकिक,
केवल
आलोक स्रोत में सुदूर द्वीपान्तर, - - -
परस्पर देह प्राण का सम्पूर्ण
विलयन, उन अकृत्रिम
क्षणों में जीवन
चाहे शाश्वत -
अनुबंधन।

* *
- - शांतनु सान्याल 
 

प्रभावहीन स्पर्श - -

पूर्णता जीवन को नष्ट कर जाता
है, यही वजह थी शायद सब
कुछ आधे अधूरे ही रहे,
तुम्हारे स्पर्श में
था कहीं
मालिन्य, या मेरी देह थी कोई
विस्मृत जीवाश्म, न तुम
बने पारस - मणि, न
मुझे ही मिला
कायांतरण,
सब कुछ था निरुद्देश्य चाहतों
का आरोहण। अरगनी की
तरह है मेरा वजूद,
रख दें जो भी
चाहें, मैंने
मूँद
लिए हैं अपनी आँखें, हाँ आईने
का ज़ामिन है बहुत मुश्किल,
वो आप जाने या आप
का ख़ुदा
जाने - -

* *
- - शांतनु सान्याल

रंग मशाल की तलाश -

शब्दों की अबूझ पहेलियों में अक्सर
मैं तुम्हें ढूंढता हूँ गुमशुदा कड़ी
पाने के लिए, इक मुद्दत
से है दिलों में तमस
घना, भटकता
हूँ रंग -
मशाल की लड़ी पाने के लिए। उस -
पार, कोहरे की वादियों में है
कहीं सुबह की प्रथम
रौशनी, उड़ान
पुल के
नीचे ढूंढता हूँ मैं अधखिली, निरीह
सी ज़िन्दगी, गुज़रते हैं मेट्रो
ट्रेन, विलासपूर्ण महंगी
कारें, सुरभित स्त्री -
पुरुष, मेरी
आँखों
में तो राख रंग के सिवा कुछ भी नहीं,
उम्र के उतरन में फिर वही हैं
धूसर ख़्वाब के पैबंद,
अनंत क्षुधित दिनों
के टांके, और
अशेष
जीने की अनबुझ तिश्नगी, पथराई
आँखों में धुंध की तरह तैरती
है ये ज़िन्दगी।

* *
- - शांतनु सान्याल

गुरुवार, 27 अगस्त 2020

किनारों के उस पार - -

घनीभूत हैं कुछ बूंद अभिमानी,
कुछ टूटे हुए रंगीन पेन्सिल,
कुछ अनकही बातों के
छायापथ, सर्पिल
आवेग के
मध्य
अहर्निश, वही प्रस्तर युगीन - -
एक ही कहानी। सभी
के लिए है केवल
वही एक
विस्तीर्ण नीलाभ छत, फिर - -
इतने स्तम्भ और दीवारें
किस लिए, जन्म -
मरण के
लेखाचित्र वही चिरंतन, एक - -
ही नदी के फिर इतने
सारे किनारे किस
लिए।

* *
- - शांतनु सान्याल


 

ताज़ा उच्छ्वास - -

छिन्न ह्रदय ले के यथापूर्व रात ढल -
गई, बहुत कुछ कहना था उसे,
ज्योत्स्ना के स्रोत में  यूँ
ही अविरल बहना
था उसे, शेष
प्रहर में
फिर मेघ गहराए, फिर एक मुलाक़ात
विफल गई, यथापूर्व रात ढल गई।
बिखरे हैं वीथि के गोद में कुछ
अनाम फूल, अनंत मेघदल
थमे से हैं नयन के कूल,
सुरभित वो सभी
प्रतिश्रुतियाँ
हैं अब
दीर्घ निःश्वास, अविरत शून्यता हैं -
आसपास, फिर भी है जीवन
अग्रसर अनायास, पुनः
समय का हिंडोला
घूमता हुआ,
फिर
फेंको कोई रेशमी रुमाल कहीं से, उठा
ले ये जीवन फिर एक ताज़ा
उच्छ्वास, अविरत
शून्यता में भी
रहो तुम
मेरे
पास, जीवन यूँ ही अग्रसर रहे - - - - -
अनायास।

* *
- - शांतनु सान्याल 

बुधवार, 26 अगस्त 2020

लौटना है असमंभव - -

उस गहन निशीथ से अब लौटना है
असमंभव, छूट गए न जाने
कितने सांध्य प्रदीप,
बिखरे हैं सागर
तट कुछ
पद -
चिन्ह हमारे और कुछ निष्प्राण सीप,
अब जहाँ हैं, वहां दूर तक है घना
छायावृत, शब्दहीन, लापता
हैं दुनिया के कलरव।
यहाँ से लौटना है
असमंभव।
निःशर्त
कुछ
भी नहीं होता हमें न समझाओ नई
परिभाषा, वही चिर विनिमय,
वही मौन अभिनय, वही
सुप्त अभिलाषा, न
जिलाओ हमें
दे कर,
पुनः शापमुक्ति का झांसा, न - -
समझाओ जीवन की नई
परिभाषा।

* *
- - शांतनु सान्याल

शायद सुन रहे हो तुम - -

तुम्हारे वादों में ख़ुदकुशी के सिवा कुछ
भी नहीं, मालूम है हमें मौत खड़ी
है दहलीज़ पे, फिर भी बाहर
तो निकलना ही पड़ेगा
जीने के लिए,
कोई नहीं
था
साथ, जब हम दर ब दर भटके, नहीं
चाहिए तुम्हारा मायावी हाथ
फिर ज़हर पीने के लिए।
वही टूटी चप्पलें,
वही बिखरे
हुए
जिस्म के टुकड़े, हमें याद है सभी फिर
भी हर हाल में जाना होगा, ज़िन्दगी
के लिए उन्हीं राहों में अपना
ख़ून,पानी की तरह
बहाना होगा।

* *
- - शांतनु सान्याल 



कहीं वृष्टि वनों के पार - -

उस अंतिम मोड़ पे कहीं था शायद
मेरे इक जां अज़ीज़ दोस्त का
घर, बहोत सीधा साधा,
जो खोजता था
स्कूल की
खिड़कियों के पार तितलियों का - -
शहर, बादलों का ठिकाना,
निझुम पर्वतों में
छुपे हुए
जुगनुओं का आशियाना, और इसी
खोज ने उसे छोड़ दिया बहुत
पीछे, वक़्त के साथ
लोग बदलते
गए, वो
आज भी न जाने क्या ढूंढता है - -
अतीत के पन्नों में अपना
पता पूछता है, वो कल
भी अकेला था वो
आज भी
तन्हां है, फिर भी ख़ुश है अपनी
दिल की गहराइयों में, क्या
हुआ ग़र ज़माना उस
से ना आशना
है, ये
ज़रूरी नहीं सिर्फ़ तुम्हारे पैमाने
से ज़िन्दगी संवारी जाए,
कभी कभार क्यों न
ज़मीर के लिए
जीत के
बाज़ी हारी जाए - -

* *
- - शांतनु सान्याल 

मंगलवार, 25 अगस्त 2020

सजल प्रतिबिम्ब - -

इस जहाँ में कोई शख़्स नहीं, जो न
करे ख़ुद की नुमाइश, हर कोई
चाहे आसानी से हर चीज़
को हासिल करना, ये
दौर है इंतहां,
ख़रीद -
फ़रोख़्त का, हर हाल में है कोशिश,
ख़ुद को अग्रता में शामिल
करना। बहोत मुश्किल
है चाहतों का जल -
रंग छवि होना,
मेरी
तुलिकाओं के तो रंग देहाती हैं - -
आसां नहीं बाज़ार में उसका
हावी होना, लिहाज़ा
मेरे हाथों में दो
बूंद शबनम
के सिवा
कुछ
भी नहीं, मेरा हासिल है तेरी आँखों
का प्रतिच्छवि होना।

* *
- - शांतनु सान्याल   


  

अंदर का आदमी - -

किस अदा से उसने भूख को
इक बिमारी में बदल
दिया, फिर एक
मौत का
कोई
दस्तावेज़ न रहा, मंदिर हो -
या मस्जिद यूँ ही उजड़ते
बसते रहे, जो उजड़
गए खिलने से
पहले उनका
कहीं
कोई उल्लेख न रहा। सिर्फ़
पोशाक के रंग बदल
गए, अंदर से वो
आज भी
बर्बर
से कम नहीं, हम आज भी
हैं अपने ही देश में एक
ख़ानाबदोश, वो
आज भी
किसी
विषाक्त तरुवर से कम -
नहीं, वही अंतहीन,
बेरंग है हमारी
ज़िन्दगी
का
सफ़र, हम जहाँ थे वहीँ -
रह गए खुले आसमां
के नीचे, न गाँव
कोई, न रहा
अपना
कोई रौशनी का शहर। - -

* *
- शांतनु सान्याल  


  

सोमवार, 24 अगस्त 2020

अल्बम के पृष्ठों में कहीं -

जनशून्य प्लेटफॉर्म, आखरी ट्रेन भी
जा चुकी, न किसी का इंतज़ार,
न ही कोई मिलन बिंदु की
तलाश, दूर तक कुछ
है तो सिर्फ़ यादों
की परछाइयां,
ज़िन्दगी
के धूप - छाँव, नोक - झोंक, हार -
मनुहार, कुछ पल जो होते हैं
सिर्फ़ एहसास के लिए,
तुम और मैं और
वो टूटी हुई
बेंच,
निःस्तब्ध रात्रि, धुंध भरी राहों में
जब तलाशते रहे हम कुछ
ख़ुशी की गहराइयाँ,
सुदूर ऊंघती सी
सघन  नील
पहाड़ियों
में टिमटिमाते थे कुछ चिराग़, या
उभर चली थीं जुगनुओं की
बस्तियां, सुरमयी अँधेरे
में, और भी ख़ूबसूरत
लगीं तुम्हारी
डूबी - डूबी
सी वो 
आँखें, जिन्हें देख जी उठे थे उस -
पल, सभी बेजान सी वादियां,
इक मख़मली छुअन की
तरह रहती है रूह के
बहोत अंदर
ख़ुश्बुओं
से
लबरेज़, हमारी मुद्दतों पुरानी वो
अप्रकाशित कहानियां, दूर तक
कुछ है तो सिर्फ़ यादों की
परछाइयां।

* *
- - शांतनु सान्याल

आकाशमुखी उड़ान - -

उन पिघलते पलों में कहीं खुलते हैं
पुष्पदल, और गहरी सांसों में
उठते हैं सहस्त्र गंधकोष,
उन्हीं अनाहूत क्षणों
में होता है कहीं
जीवन का
नव -
रूपांतरण, एक अभिनव उड़ान का
उद्घोष। जब टूट जाएँ सभी
दैहिक कांच के आवरण,
पिंजर से मुक्त
तभी हो
पंछी
निर्मेघ गगन की ओर, अट्टालिकाएं
न उसे रोक पाएं, न कोई वज्र
की ज़ंजीर, आकाशमुखी
जब हो आवाहन,
कोई न रोक
पाए तब
मुक्ति
युद्ध के आमंत्रण। उन पलों में मिट -
जाएँ सभी दिलों के फ़ासले, जब
हर कोई गाए एक ही सुर में
विजय गान, चाहे जिस
गली कूचे से कोई
निकले दिलों
में न रहे
कोई
शून्य स्थान।

* *
- - शांतनु सान्याल


 



पारदर्शी आसमान - -

उँगलियों के नोक से कभी भीगे
कांच की खिड़कियों में मेरा
नाम लिखना, उड़ते
बादलों को मेरा
सलाम
कहना, मैं अभी भी हूँ शून्य में
तैरता हुआ, तुम्हें ग़र मिल
जाए सितारों का जहाँ,
मेरे बिखरने की
कहानी
तमाम कहना। मैं जहाँ हूँ वहां
रौशनी आती नहीं उन्मुक्त
हो कर, ताहम ज़िन्दगी
को तलाश है एक
रोशनदान की,
ज़मीं को
तो बाँट लिया लोगों ने धर्म -
अधर्म की हदों में, जो न
देखे विभेदन की
दूरबीन से,
मुझे
तलाश है उस पारदर्शी - - -
आसमान
की।

* *
- - शांतनु सान्याल 

  

रविवार, 23 अगस्त 2020

बहुरूपियों का अधिनायक - -

हर एक मोड़ पर हैं बहुरूपी, कोई
हनुमान बने बैठा है और
कोई महा काली,
कोई चंदन
लिए
फिरता है कोई जनता को लगाए
चूना, सरकार की जेब करे
ख़ाली। दूर काँस वन
पार इक पहाड़ी
नदी बहती
है, मैं
वहां अक्सर उसे तलाश करता हूँ
जो मेरे अंतरतम में रहती है।
हर शख़्स है यहाँ मृग -
तृषा का शिकार,
मुखौटे और
चेहरे में
फ़र्क़ नहीं कर पाता, और फिरता
है उम्र भर यूँ ही निर्विकार।
हर एक रेड - सिग्नल
पर हूँ मैं शून्य
हाथ बढ़ाए
हुए,
शीशों के पार हो तुम, हर एक - -
हरित भूमि पे नज़र गड़ाए
हुए। जो दिन में ठाकुर
जी की डाली लिए
हुए फिरता
है, वही
सांझ ढले अंध गली से चल कर
ठेके में मुझसे मिलता है।
और वो चूना वाला,
असल में सभी
बहुरूपियों
का अधिनायक है,तिहत्तर  - -
सालों से वही एकमात्र
उन्नयन का बड़ा
परिचायक है।

* *
- - शांतनु सान्याल

,

अंतःनील अनुराग - -

उन्हीं अश्रु बूंदों में है छुपा कहीं जन्म -
रहस्य, उन्हीं आँखों के प्रतिबिम्ब
में है तैरता नग्न शैशव और
उन्हीं सुप्त आँखों में है
विश्रृंखल जीवन का
अंतःनील, उन्हीं
हाथों में है
परम
सुख, उसी अंचल में है समाया लुप्त
मरू सलिल। तुम हो चाहे कोई
महत पीठाधीश या अजेय
अधिपति, बन जाओ
क्यों न महा -
मानव
फिर
भी तुम हो उसी गर्भगृह के असहाय
भ्रूण, उसी अंधकार गुफा से है
तुम्हारी उत्पत्ति, उन्हीं
अश्रु बूंदों में है निहित
पृथ्वी की अशेष
ख़ूबसूरती,
जन्म -
मृत्यु की पुनरावृति - - - - - - - - - -
* *
- - शांतनु सान्याल 

हासिए से उभरते लोग - -

अशांत सागरों के जल समीर थे वो
जो मरू वक्षों में सिंचन करते
रहे, ख़ुद को उजाड़ कर
के, केवल देश हित
का चिंतन
करते
रहे। न जाने कहाँ गए वो लोग - -
जिन्होंने की थी समभाव की
परिकल्पना, नहीं देखा
था उन्होंने कभी
ऐसे मेरुदण्ड
विहीन
समाज का सपना। हर तरफ क्यों
आती है ज़ंजीर की आहट, क्यों
लोग लोग भूल चले हैं अब
ज़ुल्म के ख़िलाफ़ पुर -
ज़ोर सवाल
उठाना,
अब भी है हर तरफ़ गहरा अंधकार,
ये कैसा अदृश्य सम्मोहन है
हमारे आसपास, क्यों
भूल चले हैं लोग
हाथों में
नए सुबह के लिए मशाल उठाना।

* *
- - शांतनु सान्याल 

शनिवार, 22 अगस्त 2020

इबादत कर के देखेंगे - -

आज फिर तेरी इबादत कर के देखेंगे,
अब इल्ज़ामों से हमें ख़ौफ़ नहीं
होता, कि कौन है बुत और
कौन निराकार देवता,
तेरी निगाह में
है अगर
दो
बूंद ज़िन्दगी की, सारी  दुनिया से - -
हम अदावत कर के देखेंगे,
लोग कहते हैं कि दोनों
जहान मिल जाते हैं
सजल आँख के
अन्तःस्थल
में, चलो
फिर
आज तुमसे आख़री मुहोब्बत कर के
देखेंगे, फिर सजने को है इक
बार मजलिस ए आसमां,
आख़री पहर, तेरे
पहलू में, हम
भी गुले -
शबाना के मानिंद शिरकत कर के - -
देखेंगे, आज फिर तेरी इबादत
कर के देखेंगे।

* *
- शांतनु सान्याल


   

वापसी एक अग्रदूत की - -


अंतिम छोर तक पहुँचते पहुँचते
तथाकथित अग्रदूत ने दिखाए
अपने ख़ाली हाथ, इसमें
नया कुछ भी न था,
हम कल भी
अकेले
थे और आज भी नहीं कोई हमारे
साथ। उसने न जाने क्या
सोच कर दी थी हमें
दिल जीतने की
की किताब,
उम्र भर
हम उसे पढ़ते रहे लेकिन हो न
सके कभी कामयाब। उनका
हुनर तो देखिए लफ़्ज़ों
में ही ज़माने को
जीत लिया,
हमने
सिर्फ़ कुछ एक हर्फ़ों में दिखाया
था उन्हें आईना, देखते ही,
वो हम पर, शक्त पंजों
को अपना भींच
लिया,
बहोत मुश्किल है प्रतिकूल स्रोत
में बहना, लिहाज़ा दुनिया के
साथ हमने भी आसान
राहों से गुज़रना
सीख लिया।
लेकिन
हम चाह कर भी अपने ज़मीर -
को दफ़ना न सके, वो लाख
कोशिशों के बाद भी हमें
अपने मातहत ला 
न सके, शायद
यही वजह
थी कि
वो अंतिम छोर तक आ न सके।

* *
- शांतनु सान्याल

शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

मरहम का भरम - -

हर दौर में मरता है आम आदमी,
मीर ए कारवाँ चल देते हैं
बहारों के हमराह, पत्तों
की तरह बेमौसम
झरता है आम
आदमी ।
क़र्ज़
लेकर वो तो विदेशों में जा बसे
जो तरक़्क़ी का दम भरते थे,
ताउम्र भरपाई करता है
आम आदमी । मुझे
मालूम है तुम्हारे
अंदर का
चेहरा,
मरहम के भरम में सीने के ज़ख्म
भरता है आम आदमी, नई
सुबह की आस में हर
एक पल कड़ुए घूँट
निगलता है आम
आदमी ।
* *
- - शांतनु सान्याल




गुमशुदा दस्तावेज़ - -

आज़ादी के मानी ग़र तुम्हें
मिल जाए तो हमें भी
बताना, जो लोग
अपनी ज़मीं
से हैं बेघर,
अपने वतन में किसने
बनाया उन्हें प्रवासी,
ग़र उनका पता
मिल जाए
तो हमें
भी दिखाना, आज़ादी की -
कहानी हमें भी सुनाना।
तुमने बाँट दी हर
एक सांस को
दाएँ बाएँ,
लेकिन
उदर की आग ले कर लोग
जाएं तो कहां जाएं,
जो दिला सके
एक मुश्त
उम्मीद की किरण, उस
सुबह से हमें भी
मिलवाना,
फिर
आज़ादी के मानी हमें
 समझाना । तुम्हारे
सिवा कोई और
नहीं जां
निसार ये ग़लत फ़हमी
न ले डूबे तुम्हें एक
दिन, हमारी
नफ़स में
अभी तक है ज़िंदा बुज़ुर्गो
का दिया सुषुप्त
आतिशफिशां,
ज़रूरत
सिर्फ़ है उसे नींद से
जगाना, तुम्हारा नाम
ग़र है आज़ादी के
शहीदों में तो
वो
ऐतिहासिक दस्तावेज़ हमें
भी दिखाना, फिर घंटों
 बैठ कर आज़ादी
के मानी हमें
समझाना, जीने का हक़ - -
कम से कम हमें भी
दिलवाना ।
* *
- - शांतनु सान्याल

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

डूब के उभरना - -

धूसर नदी, एकाकी नील कंठ,
और झूलती बरगद की
जटाएं, लौह सेतु
और दूरगामी
रेल, एक
मौन थरथराहट, दूर तक है एक
अजीब सा सन्नाटा, जाना भी
चाहें तो आख़िर कहाँ जाएं ।
नदी अपने सीने में न
जाने कितने राज़
लिए बहती है,
जीवन -
मरण की इतिवृत्त
वो निःशब्द
हमसे कहती है । नील कंठ
को है डूब कर फिर सतह
पे उभरना, आसानी से
कुछ भी नहीं यहां
हासिल, जीने
के लिए
ज़रूरी है अक्सर मौत के कुएं
में उतरना ।
**
- - शांतनु सान्याल

पहचान की तलाश - -

तुमने जैसे चाहा वैसे ही लोगों ने पर्दे
पर दिखाया, तुमने जैसे चाहा वैसा
ही ताज़ा ख़बर आँखों के सामने
आया। ये और बात है कि
फाइलों में अब मैं -
ज़िंदा नहीं,
लोग
मुझे देख कर हैरां ज़रूर हैं, मैं आज
भी लिए फिरता हूँ अपनी
मौजूदगी का दलील,
वो आज भी मुझे
देख कर
परेशां
ज़रूर हैं। उनकी वादों का सितम तो
देखिये कि आईना भी पहचान ने
से कतराता है, इंतज़ार का
ये आलम है कि हम
ख़ुद से बेख़बर
हो चले,
इस शहर में अब हर गली, हर मोड़
पे ज़िन्दगी हमें मुंह चिढ़ाता है।
तुमने कहा था ब्रह्माण्ड
से आगे भी है एक
उज्जवल
संसार,
लाख चाहा लेकिन अंधेरों से हम -
निकल ही न पाए, अब तो
साँस लेना भी है यहाँ
दुश्वार। फिर भी
उम्मीद का
नशा
वजूद से उतरता है कहाँ, ये पोशीदा
ग़ुबार है ज़ख़्मी दिलों का साहब,
देखिए आख़िर ये पहुँचता
है कहाँ।

* *
- शांतनु सान्याल

बुधवार, 19 अगस्त 2020

विश्वास का दंश - -

तारीख़ बदलती है अपनी जगह, कैलेण्डर
के पृष्ठ चाहे तुम भूल जाओ बदलना,
शाहराहों से ले कर घुटन भरी
नुक्कड़ तक, ज़िन्दगी
को है यूँ ही नंगे
पाँव चलना।
अभी
तुम्हारे माथे में हैं जीत का मुकुट, ताज
ए अहंकार, नील नद के फैरोगण
से लेकर सिकंदर तक, सभी
खण्डहरों में जा मिले,
कोई नहीं यहाँ
अमरत्व
का
हक़दार। कौन है वो पुरोहित या त्रिकाल
दर्शी, जो उजड़े वेदिका पे चिराग़ ए
शाम जला गया, अभी तक हैं
ज़िंदा, गुमशुदा रूह की
सिसकियाँ, कौन
अभिशप्त
सांसों
को फिर से जिलाने का इश्तेहार दिखा
गया, हमारे हाथोँ, हमारी ही क़त्ल
का क़ुबूलनामा लिखा गया।

* *
- शांतनु सान्याल
 

 

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

थमी हुई बरसात - -

उस गुलमोहरी मोड़ पे कहीं तुमने बदला
था अपना रास्ता, सुदूर देवदारु के
अरण्य से तुम्हें शायद मिला
था मधुमास का निमंत्रण,
हम जहाँ थे वहीँ रह
गए, हमें था
सिर्फ़
बबूल वन का वास्ता। हमारे पास ऊसर -
ज़मीं के सिवाय, कुछ भी न था फिर
भी, हमने न मानी अपनी हार,
झोंक दिया सर्वस्व अपना
महराब ए ज़िन्दगी
के लिए, अपनी
अपनी
क़िस्मत है,कोई डूबे लब ए दरिया और
कोई, हर हाल में पहुंचे उस पार।
निर्मेघ आसमान में फिर
सजी है रौशनी की
महफ़िल,
फिर
आख़री पहर में झरेंगे पारिजात, फिर
आहत यामिनी होगी अनकही
बातों से बोझिल, फिर
निःशब्द, उनींदी,
आँखों के
तीर होगी एक मुद्दत से थमी हुई - -
बरसात।

* *
- शांतनु सान्याल   

  

अनंत अभिलाष - -

जाने  कहाँ से, उतरा है एक अजीब सा
अंधकार, पृथ्वी और आकाश के
मध्य है ख़ामोश संवाद,
परछाइयां यूँ तो
चल रही हैं
साथ साथ, फिर भी उसे नहीं जिस्म से
कोई सरोकार। नदी, पहाड़ और
विस्तीर्ण समुद्र का किनारा,
हर चीज़ है यथावत,
शब्दों के हरित
प्रदेश अब
सूख चले हैं, कुछ है बाक़ी तो वो है चिर
मौन हमारा। हर चेहरे में है जैसे
छुपा कौतुहल का फ़रेब,
हर कोई चाहता
है बनाना
केवल
ख़ुदग़र्ज़ सोपान, अगला दरवाज़ा हो या
दोस्त क़रीबी, वक़्त के आईने में
सभी अक्स हैं अभिन्न, एक
समान, हर कोई ठेल
कर छूना चाहे
अपने
हिस्से का आलोकित आसमान - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल



सोमवार, 17 अगस्त 2020

पड़ाव बिंदु - -

यूँ ही कुछ देर और, मेरी साँसों के साथ
चलते रहो, मोम की तरह मेरे सीने
में पिघलते रहो, न जाने
कितनी दुआओं के
बाद तुम्हें
पाया है
रूह ए शमा की तरह दिल की गहराइयों
में जलते रहो। किसे मालूम है
हवाओं का रुख़, सुबह से
पहले ख़्वाबों के
उनवान, न
बदल
जाएं, अभी तो हो तुम, मेरी जिस्म ओ -
जां के मुख़ातिब, देख कर नई
रौशनी, फिर कहीं तुम्हारे
दिल के अरमान, न
बदल जाएं।
ये सच
है कि मेरे हिस्से की धूप अक्सर आती
है क़िश्तों में, फिर भी खिलने की
ख़्वाहिश किसे नहीं होती,
ये और बात है कि
अब वो मिठास
ही न रही
रिश्तों
में। निशि पुष्पों की तरह बिखर जाते -
हैं सभी पल अनुरागी, इक भीगा
सा एहसास ख़ुश्बुओं में
डूबा हुआ, रूह के
हमराह बस
चलता
रहता है, जैसे चलता जाए कोई तनहा
वैरागी। तुम्हारी आँखों में कहीं
बसता है प्रवासी सपनों का
गाँव, मेरी झुलसी हुई
ज़िन्दगी को
अक्सर
जहाँ मिलता है इक पुरसुकून मरहमी
छाँव।

* *
- - शांतनु सान्याल

दहलीज़ पार तो आओ - -

अनकही बातों के बेल मुंढेर तक
चढ़ न पाए, कहाँ खिलने से
लेकर ख़ुश्बुओं की बात
थी, दहलीज़ से
आगे उनके
पाँव, दो
क़दम भी बढ़ न पाए। ज़िन्दगी
का सलीब जितना भी भारी
क्यूँ न हो, हर हाल में
उसे उठाना होगा,
उनकी
मसीहाई का तिलिस्म दो वक़्त
की रोटी नहीं देगा, शापित
जिस्म को बारम्बार
जिलाना होगा।
कुछ तो
क़ुदरत का कहर, कुछ अपनों की
मेहरबानी, सीने में है इक
आतिशफिशां और
आँखों में मंज़िल
अनजानी।

* *
- शांतनु सान्याल




रविवार, 16 अगस्त 2020

अंतिम बिंदु के उस पार - -

दरअसल, हर अंतिम बिंदु के बाद ही
होती है इक नयी शुरुआत, फूलों
को हर हाल में है खिलना
उम्र से लम्बी नहीं
ये काली रात।
सांप और
सीढ़ियों का खेल छुपा है माथे की - -
इन लकीरों में, कल तक था
जो सरबराह - क़ायदा,
आज वही है
जकड़ा
हुआ बेरहम वक़्त की ज़ंजीरों में। न
कुछ है मेरे वश में, न तू ही है कोई
आख़री इन्साफ़ का प्राधिकार,
माना कि आज मेरी गर्दन
है तेरे आगे झुकी
हुई, लेकिन
ये भी
सच है कि तेरे सर पे लटक रही, इक
अदृश्य तलवार।

* *
- शांतनु सान्याल

शनिवार, 15 अगस्त 2020

लौटतीं मूक प्रतिध्वनियां - -

दरख़्वास्त, आख़िर हम करते भी
किन से, जिन्होंने लगाई थी
आग हमारी छतों पे
वही निगह्बां -
क़ानून
थे, वही रईस ए शहर भी, हमारी -
बस्ती का उजड़ना शायद तै
था, कौन करे यक़ीं सुबह
की ख़ुशगवारी का,
उनके हाथों
में क्या
नहीं, चाहें तो अमृत, चाहे तो ज़हर
भी। अँधेरे और उजाले में फ़र्क़
हमारे लिए बेमानी है, जो
हर लम्हा बदलते हों
खुद का ज़मीर,
कपड़ों की
तरह,
शायद उन्हें आईने से भी परेशानी
है। तमाम प्रतिध्वनियां यूँ
ही लौटती रहीं वादियों
से टकरा कर, हमने
चाहा था, उनके
भीतर तक
पहुंचना,
उनकी रूह को जगाना, ग़लत तो
न था आवाज़ देना ख़ुद को
बिसरा कर, तमाम
प्रतिध्वनियां यूँ
ही लौटती
रहीं
वादियों से टकरा कर, निरुत्तर -
और निःशब्द, कोहरे में
गुम - -

* *
- शांतनु सान्याल 

शत शत नमन माँ भारती - -

तुम्हारी धरती, तुम्हारा है आसमान,
बनाओ इस तरह से आग्नेय -
सीमान्त कि हमलावर
का हो उदय से
पूर्व, पूर्ण
अवसान। तुम्हारी नदियां, तुम्हारे ये
मंदिर - घाट, तुम्ही हो विश्व
पुरोधा, तुम्हारे हाथों में
है उभरता हुआ
दिगंत,
तुम्ही हो कल के अजेय सम्राट। इस
मातृ धरा में जिसने जन्म लिया
उसे नहीं चाहिए कोई और
आलोकित वास स्थान,
तुम्ही हो अर्जुन
तुम्ही में
समाया त्रिलोक का मुक्ति - स्नान। -
केसर के बागों से लेकर नील -
पर्वतों तक, हिमगिरि से
उठकर सोमनाथ के
शीर्ष तक. सिर्फ
तुम्हारी हो
वंदना,
माँ भारती ! केवल तुम्हारा हो अखंड
यशोगान, तुम्हारे चरणों में ही हो
पुनर्जन्म, तुम्हारे लिए ही
निकले देह से मेरे
प्राण।

* *
- शांतनु सान्याल 
चित्रांकन - - अबनीन्द्र नाथ ठाकुर (निर्माण १९०५ )

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

हमें भी ज़रा याद रखना - -

सभी नाव लौट आए उजान स्रोत से
अपने अपने लंगर ज़मीं की ओर,
अंधकार बुलाता है हर शै को
हर हाल में अपनी ओर।
तुम्हारी चाँद रात
की बातें,
अक्सर मुझे ले जाती हैं दुनिया से
बहोत दूर, मैं इन स्वप्नमय
बातों से बहोत घबराता
हूँ, दरअसल
सीलन
भरे कमरों में ही उम्र गुज़र गई अब
हर एक ज़ख्म लगे है मुझे दिल
के क़रीब, बहोत मधुर।
किसे आवाज़ दें
यहाँ, हर
शख़्स है गोया स्वयं तक सिमटा हुआ,
लिहाज़ा चुप रहना ही लाज़िम
है, न कोई सम्बोधन, न
चेहरे में उसके उभरे
कोई हाव भाव,
बहोत
नज़दीक से वो आज गुज़रा कहने को
यूँ तो बरसों का मरासिम है।
ये शहर, ये घुमावदार
उड़ान पुल के
रास्ते,
सब थक हार के सो गए, सुबह ग़र - -
मुलाक़ात हो तो पिछले सलाम
का जवाब देना, सीढ़ियाँ
सिर्फ़ चढ़ने के लिए
नहीं बनती,
कभी
उतरते वक़्त हमें भी ज़रा याद रखना।

* *
- शांतनु सान्याल



गुरुवार, 13 अगस्त 2020

आग्नेय परिधि से बाहर - -

इसी घाट पर मैंने उतार फेंकी है सभी
दांभिक आवरण, इन्हीं सीढ़ियों
से उतर कर मैंने देखा है
जल दर्पण, इसी
अश्वत्थ के
निचे
तुमने सर्वस्व किया था मुझे अर्पण ।
उन पलों में मैंने क्या पाया और
क्या कुछ खोया, अब कुछ
भी याद न रहा, निवृत
हैं तमाम चाहतें,
तुम्हें पा कर
जीवन
में अब कोई अवसाद न रहा। - - -
मुहाने की भूमि और समुद्र
का किनारा, लहरों के
मध्य कदाचित
झूलता रहा
मौन,
धुंधमय, अवर्णित प्रणय हमारा।
धुआं सा उठता रहा दोनों
किनारे, और मझधार
में रहे देह हमारे,
डूबते -
उभरते उन्हीं क्षणों में, अधिक - -
मुखर हुए नेह हमारे। इन्हीं
सीढ़ियों से चढ़ कर
सजल शरीर,
हमने
छुए देवालय के बंद कपाट, अब
पाप - पुण्य से मुक्त हैं सभी
मन की ग्रंथियाँ, दूर तक
रास्ता अब लगे
सीधा और
सपाट।

* *
- शांतनु सान्याल





  

बुधवार, 12 अगस्त 2020

नेह का समीकरण - -

मायावी कौन नहीं इस जहाँ में,
रेशमी कोशों में छुपे हों
कोई या बेझिझक
चल रहे हों
तेरे -
मेरे साथ अविरल कारवां में, -
गंध विहीन फूलों की
तरह थे सभी
छायामय,
फिर
भी जीते रहे हम उम्र के बियाबां
में, मैं और मेरा इतिहास
कुछ भी नहीं, कभी
फ़ुर्सत मिले
तो
पढ़ लेना अदृश्य लिपि नियति
के आसमां में, ये रास्ता
जाता है आदि और
अंत के उस
पार,
न मैं कोई परिपूर्ण पुरुष न ही
तुम्हारी है कोई गणना,
किसी निःस्वार्थ
मेहरबां में,
सब
कुछ है पारदर्शी क्या तमस -
और क्या रुपहली चाहत, इस
परिपूरक समीकरण से
कोई नहीं मुक्त
इस क्षणिक
जहाँ में।

* *
- शांतनु सान्याल





मंगलवार, 11 अगस्त 2020

कुछ और वक़्त चाहिए - -


रात को गुज़रना है हर हाल में, चाहे दूर तक 
हों कोहरे के साए, कोई  नहीं सुनेगा 
तुम्हारी मेरी ख़ामोशियों की 
बातें, किसे फ़र्क़ पड़ता 
है यहाँ, ये तो पता 
विहीन शहर 
है, कोई 
आये या कोई अजनबी की तरह चुपचाप - -
निकल जाए। हमारे अस्तित्व का 
बना रहना भी अपने आप 
में किसी युद्ध से कम  
नहीं, किसे 
दिखाएं 
टूटे ख़्वाब के महीन टुकड़े, इन्हें फिर जोड़ने 
का अब कोई भरम नहीं। सांवली रात के  
आंचल से सितारों के गोट झर 
चले, बहोत मुश्किल है 
उम्र भर का साथ 
निभाना, 
लिहाज़ा सुबह से पहले दुआओं से अपनी सूनी 
गोद भर चले। कौन बैठा है यूँ एकाकी, 
निस्तब्ध, उम्र दराज़ पीपल के 
निचे, न जाने कितने 
लहर उभर कर 
डूब गए, 
उन निगाह ए झील के निचे। न करो फिर कोई 
नया वादा, कि वक़्त चाहिए कुछ और 
उभरने के लिए, अभी अभी तो 
लूटा है शहर को किसी ने,
न जाने कितनी 
सदी, और 
चाहिए, गली कूचों को दोबारा संवरने के लिए। 

* * 
- शांतनु सान्याल  

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

ठहराव के बाद - -

बूंदों के मोती चिर चंचल, पत्तों के
वक्ष सदा ख़ाली, नेह - तृषा
न बुझे, सजल ऑंखें
अनंत सवाली।
जीवन -
पथ अशेष, उम्र का सफ़र फिर भी
अधूरा, बेशुमार वादे और
असंख्य इंतज़ार,
हथेलियों
में आए सिर्फ़ बादलों का चूरा। ये
कौन है जो आख़री पहर देता
है दस्तक, न ज़मीं, न
कोई आसमां मेरा,
फिर भी वो
हर हाल
में पहुँचता है मुझ तक। ये कैसी
तड़प है मेरे दिल की, दौड़ता
है बेतहाशा दिगंत की
ओर, दीवानगी
हो गोया
उसे इक नयी मंज़िल की। तुम हो
सामने या मेरा अक्स है
रूबरू, ये कैसा है
तिलिस्म
तेरी
आँखों का, इक ठहराव जो न हो
ख़त्म और न ही शुरू।

* *
- शांतनु सान्याल

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