शनिवार, 29 अगस्त 2020

सब कुछ ठीक ही है - -

यूँ तो सब कुछ ठीक ही है फिर
भी उनकी आँखों में कहीं,
इक ख़ौफ़ सा है खो
जाने का, मैं
चाहता
हूँ
उन्हें छूना, रूह से महसूस - -
करना, शायद उन्हें डर
है मेरा हो जाने का।
यूँ तो सब कुछ
ठीक ही है
फिर
भी न जाने क्यूँ अंतरंग दोस्त
तकते हैं बड़ी पुरअसरार से,
असल में हर शख़्स है
यहाँ, शहद का
तलबगार,
लेकिन
चाहते हैं बचना मधुकोष के - -
शिकार से। यूँ तो सब कुछ
ठीक है लेकिन एक
मुद्दत से बैठा
हुआ हूँ
मैं,
परछती के नाज़ुक किनारे, वो
निःशब्द हटा ले गए सभी
निसेनी नज़र बचा के,
कह गए ऊपर ही
रहो ख़ुदा के
सहारे।
यूँ तो सब कुछ ठीक है फिर भी
टेलीविज़न बन चला है ख़ुद
मुख़्तार, न कोई चश्मदीद,
न ही कोई ज़िरह की
उम्मीद, सबूत
ही नहीं
फिर
भी ज़माने के नज़र में आप हैं
गुनाहगार, फिर भी यहाँ
सब कुछ ठीक है।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

8 टिप्‍पणियां:


  1. जय मां हाटेशवरी.......

    आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
    आप की इस रचना का लिंक भी......
    30/08/2020 रविवार को......
    पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
    शामिल किया गया है.....
    आप भी इस हलचल में. .....
    सादर आमंत्रित है......

    अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
    https://www.halchalwith5links.blogspot.com
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. शहद चाहते हैं मधुकोष से बचकर
    वाह!!!
    लाजवाब सृजन।

    जवाब देंहटाएं

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past