30 अगस्त, 2020

समान्तराल के पथिक - -

सभी अभिशप्त पल जी उठे सहसा
जब हमने अंतर्मन से ख़ुद को
ऊपर उठाया, न कोई
फ़लसफ़ा न कोई
पुराण पोथी,
सिर्फ
स्नेह विग्रह को हमने मन मंदिर में
बिठाया। हर एक की थी अपनी
ही वरीयता सूची, ग़र वो
भूल जाएँ हमें तो
कोई बात
नहीं,
बेकार है इस पार, उस पार फिरना,
इस भटकाव से कभी निजात
नहीं, जो बुझा पाए चाहतों
के अंतहीन दावानल,
ऐसी कोई भी
बरसात
नहीं। न कोई सराय, न कोई पांथ -
शाला, उन्मुक्त आकाश और
नक्षत्रों की आलोक माला,
समान्तराल में सभी
प्रवाहित, क्या
राज मुकुट
और
क्या तुलसी की माला - - - - - - -

* *
- - शांतनु सान्याल

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