17 अगस्त, 2020

दहलीज़ पार तो आओ - -

अनकही बातों के बेल मुंढेर तक
चढ़ न पाए, कहाँ खिलने से
लेकर ख़ुश्बुओं की बात
थी, दहलीज़ से
आगे उनके
पाँव, दो
क़दम भी बढ़ न पाए। ज़िन्दगी
का सलीब जितना भी भारी
क्यूँ न हो, हर हाल में
उसे उठाना होगा,
उनकी
मसीहाई का तिलिस्म दो वक़्त
की रोटी नहीं देगा, शापित
जिस्म को बारम्बार
जिलाना होगा।
कुछ तो
क़ुदरत का कहर, कुछ अपनों की
मेहरबानी, सीने में है इक
आतिशफिशां और
आँखों में मंज़िल
अनजानी।

* *
- शांतनु सान्याल




8 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (18 -8 -2020 ) को "बस एक मुठ्ठी आसमां "(चर्चा अंक-3797) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

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  2. बहुत सुंदर सृजन
    सार्थक और सटीक।

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