शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

नया आभास

नव आभास / नव वर्ष की अनेकों शुभकामनाएँ
नेह रेखाएं कुछ अर्थ छुपाएँ
कह गए निश्पलक मन की बातें
थमी थमी सी घटायें पर्वत पर्वत
बिंदु बिंदु फिर बरसना चाहें
इस सघन रात में
 विगत रहस्य न खोलें
अधर रहें मौन नयन बने सेतु
उन्मुक्त करो अतीत पिंजर
बोझिल साँसें हैं व्याकुल उड़ जाने को
मनुहार ह्रदय का मानो
कुछ मुस्कान बिखरे, निशि पुष्प
हैं आतुर खिल जाने को
दूर बिहान प्रतीक्षारत है लिए
कोमल धूप तन मन में
इस क्षण में तुम यूँ निश्तब्ध रहो न
नव प्रणय स्वीकार करो
जीवन प्रवाह अविरल गतिमय
इस सरल पथ को वक्र रेखाओं
से मुक्त करो
जो कल था वो आज नहीं
आज न कल न होने दो
इस पल में फिर स्वप्न मधुर
बो लेने दो ---
इतना भी न सोचो की चाँद ही
ढल जाये प्राची में
क्षणिक ही सही चंद्रिमा के कुछ
कण चुन लें, महकती सांसों को
घुल जाने दो
अभिनव  आभास जीवन में
आने दो ---
----- शांतनु सान्याल

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

ज़िन्दगी कितनी ख़ूबसूरत है,

शेष प्रहर रात्रि, अभी अभी एक द्रुतगामी रेल,
विक्षिप्त की तरह काँस फूलों के बीच,
शुभ्र ज्योत्स्ना को चीरती हुई सुदूर किसी,
वन्य नदी के जलधाराओं को पृथक करती,
धड धडाती हुई, निष्ठुरता के साथ क्षितिज को
भेदती, कमलिनी के आलिंगनबद्ध वृन्तों को
थरथराती, झील के स्थिरता को झकझोरती,
नीलाभ्र आलोकित स्वप्नों को चूर करती, न
जाने कहाँ किस गंतव्य की ओर यूँ दौड़ गई

जैसे कोई महाकाय सरिसर्प समुद्र से सहसा
विकराल अग्निमुखी बन अम्बर को निगल
जाना चाहे, और चन्द्र तारक अन्तरिक्ष में
एक दूसरे से यूँ जा मिलें जैसे मालती लताएँ
सहस्त्र प्रसूनों को श्रृंखलित करना चाहें,
एकाकी व्यक्तित्व सहमा सहमा कई बार
खिडकियों से उस रेल के गुज़रने को देखता,
और फिर फर्श में बिखरे हुए टूटे तारों को
इकठ्ठा करता, गुनगुनाता है - ज़िन्दगी कितनी
ख़ूबसूरत है, आइये आपकी ज़रूरत है ------
---- शांतनु सान्याल
 स्वरचित चित्र

रविवार, 26 दिसंबर 2010

ख़ुदा हाफिज़

सलीब तो उठाली है,
 ज़िन्दगी न जाने और क्या चाहे 
मुझे बिंधते हैं वो तीर व् भालों से 
बेअसर हैं तमाम सज़ाएँ , मैं बहुत पहले 
दर्द को निज़ात दे चुका, पत्थर से मिलो 
ज़रूर मगर फ़ासला रखा करो, 
न जाने किस मोड़ पे क़दम  डगमगा जाएँ,
वो ख़्वाबों की बस्तियां उठ गईं 
मुद्दतों पहले, हीरों के  खदान हैं 
ख़ाली, सौदागर लौट चुके ज़माना हुआ 
दूर तलक है मुसलसल  ख़ामोशी 
बारिश ने भर दिए वो तमाम खदानों को 
वक़्त ने ढक दिए, धूल व् रेत से 
वो टूटे बिखरे मकानात, कहाँ है 
तुम्हारा वो गुलाबी रुमाल, फूल व् 
बेल बूटों से कढ़ा हुआ मेरा नाम ,
कभी मिले ग़र तो लौटा जाना 
आज भी हम खड़े हैं वहीँ, जहाँ  
पे तुमने ख़ुदा हाफिज़ कहा था इकदिन, 
---- शांतनु सान्याल 













गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

नज़्म

नज़्म
ये माना कि ज़िन्दगी में हर ख़ुशी नहीं
 मिलती, हर्ज़ क्या हैं आखिर मुस्कराने में,
हासिये में थे हम  ये सच है, बावजूद
वक़्त लगता है ज़रा, तूफ़ान गुज़र जाने में,
किसी ने नहीं देखा हवाओं का दम घुटना
भीगी ख़ुश्बू का बहाना बना गए हम,
छलकते आँखों में थे ज़ख्म बेक़रां
सिसकतीं साँसों का तराना बना गए हम,
रिश्तों की बारीकियां हमसे न पूछो
टूटतीं हैं साँसें हर बार साहिल से लौट कर,
चाँद की रौशनी हरगिज़ कम न थी
बिखरे हैं दर्द लेकिन बारहा दिल से लौट कर /
-- शांतनु सान्याल 

रविवार, 19 दिसंबर 2010

लकीरें

आकाश पार बहती हैं अदृश्य
कुछ सप्तरंगीय प्रवाहें,
एक स्वप्नमयी पृथ्वी शायद
है कहीं अन्तरिक्ष में,
सुप्त शिशु के मंद मंद मुस्कान
में देखा है उसे कभी,

नदी के बिखरे रेत में
किसी ने लिखा था पता उसका
बहुत कोशिश की, पढ़ पायें!
लकीरें जो वक़्त ने
मिटा दिए, चेहरें में उभर आयीं
काश ! उठते ज्वार की
लहरें इन्हें भी बहा लेतीं,

अर्घ्य में थे कुछ शब्द
जो कभी वाक्य न बन पाए
कुछ बूंदें पद चिन्हों में
सिमट कर खो गए वो
कभी मेघ न बन पाए
सुना है ये नदी गर्मियों में
कगार बदल जाती है फिर
कभी मधुमास में मिलेंगे तुमसे !
--- शांतनु सान्याल

रविवार, 12 दिसंबर 2010

जो हमें चाहे टूट कर

गिरते पत्तों ने हमारी अहमियत बयां की है 
हमें इसका ज़रा भी अफ़सोस नहीं होता,
चेहरे में हमने भी जड़ ली है रंगीन मुखौटे 
लहरें थमीं सी लगे, हर शै ख़ामोश नहीं होता 

तुम्हारीनिगाह से ज़माने को है, क्या लेना 
हर शख्स की अपनी मुख्तलीफ़ है दुनिया,
तुम चाहो जियो हर लम्हा ख़ुद के तस्सवुर से 
हमारी नज़र में कुछ बेतरतीब  है दुनिया,  

हमारी मंज़िल सिर्फ तुम तक आ नहीं रूकती 
ज़ेहन में हैं न जाने अनगिनत ख़्वाब कितने,
तुम इश्क़ में ज़िन्दगी को मुकम्मल समझे 
सवालात तो हैं बहुत लेकिन लाजवाब कितने, 

जो दिखाई दे नज़र के सामने रूबरू जाने जाँ
हम तो सिर्फ उस नाचीज़ की बंदगी करेंगे,
तुम चाहो तो कोई और फ़लसफ़ा इज़ाद करो
जो हमें चाहे टूट कर,उसके नाम ज़िन्दगी करेंगे, 

---- शांतनु सान्याल 


शनिवार, 11 दिसंबर 2010

सीने में डूबता कोई माहताब देखा होगा

१. नीचे है, अथाह खाई लो मैं खड़ा हूँ
किनारे, क्या है दिल मेंतुम्हारे ख़ुदा जाने,
बेपरवाह ये  ज़िन्दगी यूँ ही गुज़र जाये
सामने हो तुम, उम्र है कितनी  ख़ुदा जाने /


२. ओष की बूंदें थीं या दर्द के क़तरे
पंखुडियां गुलाब की क्यूँ झुक सी गयीं,
कोई जिस्म पे चला है दहकते पांव
देखते ही उनको सांसें क्यूँ रुक सी गयीं /

३. हमने तो उम्र का बिछौना दे दिया
सर्दियाँ थीं सदीद, चादर नाकाम रही,
तुमने ओढ़ ली ऊनी तश्मीना कम्बल
 यहाँ सिहरन भरी सुबहो शाम रही

४. मुस्क्रुराने के लिए कोई तो सबब होता
क्या करें बेवजह ही मुस्करा गए,
अश्क छुपाना भी इक सलाहियत है
जान करभी हम दरवाज़े से टकरा गए

५. लोग जो हँस पड़े हमने भी साथ दिया
किसलिए इतनी ख़ुशी थी मालूम नहीं,
हम ख़ुद को तलाशते रहे या उनको
ज़िन्दगी थी या ख़ुदकुशी मालूम नहीं

६.  भीड़ में भी थे सहमे सहमें तन्हां तन्हां
किसी ने  पुकारा ज़रूर,पहचान न पाए,
कब तन्हाईयाँ घिर आयीं घटा बन कर
भीगते गए लेकिन हम उन्हें जान न पाए

७. लबों को किसी ने छुआ ज़रूर था
बंद पलकों ने कोई ख़्वाब देखा होगा
गर्म सांसों में नमी  घोल गया कोई
सीने में डूबता कोई माहताब देखा होगा /
---- शांतनु सान्याल

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

इक बूंद

पिछले पहर हमने भीगे गुलों में
कोई अनजान सी छुअन देखी है,
न जाने कौन छू सा गया दिल को
सीने में मीठी सी चुभन देखी है,
अधखुली किताब में  बिखरे आंसू
हर लफ्ज़ में हमने अगन देखी है,
 भरम कि तुम हो हमारे,रहने दो
खंडहर में हमने  मधुबन देखी है,
ढल गया चाँद कब पता न चला
ख़ामोश शब,होलीसीदहन देखी है,
वजूद अपना हम कहीं भूल सेगए   
इक बूंद की तरह यहाँ जीवन देखी है,
--- शांतनु सान्याल

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

अभी अभी,

इस अहसास में कितने दिए जल उठे
गुज़रे हैं वो बहुत  क़रीब से अभी अभी,
देखा है टूटते तारों को बहुत दूर से
मिले हैं वो बड़े  नसीब से अभी अभी,
महके हैं क़फ़स के दरो दीवार
 आये कोई पार, दहलीज़ से अभी अभी,
फिर सजाएँ कोई ख़्वाब  आँखों में
देखा है उसने, नज़दीक से अभी अभी,
बहुत मुश्किल था आह भरना मेरा
मिले है हम ज़िन्दगी से अभी अभी,
हर फूल लगे ख़ूबसूरत दिल की तरह
भरा है जिस्म ताज़गी से अभी अभी,
लबरेज़ हैं ख्वाहिशात छलकने को
राहतमिली है तिश्नगी से अभी अभी ,
बहकते हैं क़दम होश न हो जाय गुम
मिले हैं जाने अज़ीज़ से अभी अभी //
-- शांतनु सान्याल

रविवार, 5 दिसंबर 2010

जिस्म को हमने जला दिया

१.जिस्म को हमने जला दिया
मुक़दस आग की तरह,
तुमने ग़र न देखा धुआं
अक़ीदत का  क्या कसूर
हमने ख़ुद को मिटा दिया
अनचाहे  बैराग की तरह,

२.कहाँ से लायें वो यकीं
जो ख़ुदा को लाये सामने
हमने ख़ुशियाँ मिटा दी
उजड़े सुहाग की तरह,

३.तुम्हारे इश्क़ में खो सी
 गयीं,हमारी पहचान
दिल में छुपाये रखा
तगाफुल अनमिट दाग़ की तरह

४.इस जुस्तज़ू में उम्र कट गई
के लौटेंगे बहारें एक दिन
हैं सदियों से बिखरे अरमां
सूखे वीरां किसी बाग़ की तरह

५.फूलों के मौसम आये गए
आसमां रंग बदलता रहा
हमने ख़ुद को भुला दिया
पुराने नगमा-ऐ-राग की तरह
जिस्म को हमने जला दिया
 मुक़दस आग की तरह //
-- शांतनु सान्याल

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

भूमिगत ग्रंथियां

भूमिगत ग्रंथियां भित्तियों को पार
कर गईं, नीड़ की दरारें पूछती हैं
कहाँ व् कैसे तिनकों में परकीय
भावों ने घर किया, हमें तो  पता
ही न चला, हमने तो प्रणय ईंटें
क्रमशः बड़े ही कलात्मक शैली में
सजाया था, सपनों के गारे से,
खिडकियों से झाँकतीं कृष्ण कलि
के फूलों ने कहा- शायद प्रीत में
थी सजलता ज्यादा या अश्रु ही
मिलाना भूल गए, दरारों में भी
जीवन थे, हमने महसूस किया
आत्मीयता की साँसें गिरती
उठतीं हों, जैसे असमय हो जाये
मोहभंग, ग्रंथियों के जनक थे
अपने अति प्रिय, हमने बड़े स्नेह
से उन्हें रोपण किया, सूर्य व्
वर्षा से बचने के लिए, दालान
में थे वो सभी अब तक, लेकिन
कब व् कैसे जड़ों ने आधार भेद,
गृह प्रवेश किया, ये सोच पाते
कि फर्श में स्वप्न हाथों से छूट
कर यूँ बिखरे, जैसे कोई अमूल्य
फूलदानी टूट जाये अकस्मात् -
-- शांतनु सान्याल

अहम् अनंत स्वप्न पश्यामि

आलोक छायामय नदी वक्ष स्थल
झुके हैं वट शाखा प्रशाखा, जटाएं,
मालविका वन, तट से कुछ दूर है,
अहंकार यहाँ मृत्युमुखी, अहम् 
अनन्त पृथ्वी पश्यामि - उद्घोषित 
मन्त्र कहीं विलीनता को दर्शायें,
पुनर्जीवित हों सभी सुप्त इच्छाएं 
जागृत हों स्वप्न जो नदी ने ग्रास 
किये श्रावणी अझर वृष्टि पूर्व, 
देह धरणी, अतृप्त कामनाएं जो 
मायाजाल बिछाएं प्रति क्षण,
विछिन्न्तायें बैराग के संकेत नहीं 
होते, जीवन चक्र गतिमय प्रतिपल, 
तटिनी सम ह्रदय लिए देखूं 
एक तीर धूम्रमय पार्थिव शरीर 
दूसरे कूल नव किशलय गर्भित,
मध्य श्रोत अज्ञात,अदृश्य किन्तु 
प्रवाहित जलराशि चिर गतिमान,
यहीं अभिनव सृष्टि  का उदय 
अहम् अनंत स्वप्न पश्यामि,
--- शांतनु सान्याल 


  

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

खुद से बाहर कभी,यूँ निकल ही न सके

 ख़याल कि छूट न जाएँ हम कहीं दुनिया की  भीड़ में
 खुद से बाहर कभी,यूँ  निकल ही न सके /

आधी रात किसी ने दी है, कांपती हाथों से दस्तक
सांसों की तपिश, हम पिघल ही न सके /

वो जो कहते हैं, हमसे बेशुमार मुहोब्बत हैं उनको
बारहा चाहा, सांचे में कभी ढल ही न सके /

धनक ने तो बिखेरी हैं रंग ओ नूर उम्र भर ऐ दोस्त
बेमुराद दिल है कि हम मचल ही न सके /

उनकी आहट में भी ख़ुशबू ऐ चमन होता है अक्सर
संदल की तरह मंदिर में बहल ही न सके /

धूप दीप तुलसी शंख की आवाज़े हमें बुलाये हर बार
न जाने क्या नमी है चाह कर जल ही न सके  /

सुलगती  हैं धीमी धीमी लौ से कोई आग सीने में
सारी नदी  है आगे, इक बूंद भी निगल न सके/

बिल्लोरी बदन ले के जाएँ  कहाँ पत्थर के शहर में
ख़ूबसूरत ख्वाबों से,खुद को बदल ही न सके/

खुद से बाहर कभी,यूँ  निकल ही न सके/
---- शांतनु सान्याल

धुँध की गहराइयाँ

धुँध की गहराइयाँ या निगाहों का धोखा
लौटतीं सदाओं ने क्यूँ राह मोड़ लिया

उफ़क़ के पार थे वो सभी कांच के ख़्वाब
बर्फ़ के नाज़ुक परतों में हमें छोड़ दिया,
क़दमों के नीचे था आसमां या झील कोई
 चाहा दिल से खेला फिर उसे तोड़ दिया,
इक पुल जो सदियों से था हमारे बीच
पलक झपकते उसे कहीं और जोड़ दिया,
सीने में कहीं है इक गुमशुदा नदी
बहती लहरों का रूख़ तुमने मोड़ दिया,
रेत के वो तमाम घर ढह गए शायद
बड़ी बेदर्दी से जिस्त, तुमने मरोड़ दिया,लौटतीं सदाओं ने क्यूँ राह मोड़ लिया ,
--- शांतनु सान्याल

ग़ज़ल

आसमां है कुछ आज मुंह फुलाए, घने बादलों में रुख छुपाये 
बरसना है तो बरस जाओ भी,थम थम के क़हर गिराया न करो,
लटों में उलझ जाती हैं, उमर खय्याम की ख़ूबसूरत रुबाइयाँ 
कांप से जाये है तुम्हारे लब, घबरा के नज़र मिलाया न करो ,
बिखरना ही है ग़र तो समंदर की तरह साहिल को ज़ब्त करें 
मंझधार से उठे लहर की तरह, करीब आ ठहर जाया न करो,
हमने रस्मे उलफ़त, बड़ी खूबी से निभाया,ईमान की मानिंद
संगसार नहीं ये  सर्द बूंदें,हलकी बारिश में यूँ डर जाया न करो, 
निकलो भी कभी खुले मौसम में, खिलते हुए बहार की तरह,
चिलमन से झांकते हुए जाने जाँ,फूलों में रंग भर जाया न करो,
बरसना है तो बरस जाओ भी,थम थम के क़हर गिराया न करो, 
--- शांतनु सान्याल  

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

पुरातन देवालय

दूर तक तैरतीं काई, जलोच्छ्वास लेते कुछ
कमलिनी जब देह बने जलासय
तट के कचनार, वन्य कुसुम, हरित तृण
बांस वन तक चाहें जल समाधि
मन्त्र मुग्ध मृग दल पिपासा लिए सहमें
कुछ पल ठहरें, अंतर्मन सरीसर्प
न जाने कब हों जागृत और ग्रास हो जाएँ,
रहस्यमयी, स्थिर जलराशि गहन
अनंत, अंधकार थाह न जाने कोई, प्रवेश
सहज, सुगम मनोहर, निर्गमन द्वार
हों जैसे अनिर्मित भ्रमित संसार
छायामय चिर धरातल, निश्वास विहीन
तलछट समेटे महादहन निशिदिन
प्रति पल अदृश्य  अग्निशिखा प्रज्वलित,
भोर में उठतीं वाष्पीकृत वेदनाएं
पर्यटक खोजें निसर्ग सौन्दर्य, ह्रदय मध्य
गिरतें  प्रति  क्षण पुरातन देवालय,
--- शांतनु सान्याल   

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

अग्नी वृत्त

 कुछ आकृतियाँ शैल चित्रों की तरह जीवन भर अर्थ
की खोज में भटकती हैं, व्यक्तित्व के परिधि में,
त्रिज्या थे वो सभी भावनाएं केंद्र बिंदु को भेद गईं
ज्यामितीय संकेतों ने छला, जीवन गणित था या
कोई महा दर्शन, हम तो केवल छद्म रूपी शतदल
में यूँ उलझ के रह गए कि निशांत का पता न चला,
क्षितिज के आँखों से जब काजल धुले, समुद्र तट
बहुत दूर किसी अपरिचित दिगंत में खो चुका,
प्रतिध्वनियाँ लौट आईं अक्सर हमने तो आवाज़ दी,
किसने किसका हाथ छोड़ा, कौन कहाँ खुद को जोड़ा
बहुत मुश्किल है,समीकरणों का शून्य होना -
किस के माथे दोष मढ़े हमने स्वयं अग्नी वृत्त घेरा,
-- शांतनु सान्याल

क्षणिका

अरण्य पथ में कुछ किंसुक कुसुम अब तक
पड़े हैं बिखरे,विगत  मधुमास की निशानी
पग चिन्हों तले  कहीं दबे हैं निसर्ग अर्घ्य
या भावनाएं, जीवन तो है लहर अनजानी
मैं डूब जाऊं उस नेह में हर बार हर जनम
प्रीत की गहराइयाँ हैं उनमें जानी पहचानी /
-- शांतनु सान्याल

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

कई मधुर स्वप्न जागे

सुदूर मुहाने में अप्रत्यासित कई  मधुर  स्वप्न जागे
चंचल सरिता और जलधि मिलतें हैं कहीं जा आगे ,
उस मिलन बिंदु में हैं, प्लावित कुछ अनंत अनुबंध
कुसुमित आद्र भूमि, जहाँ मोहित, बावरे हैं मकरंद,
  प्रीत की असंख्य पाल नौकाएं,बहतीं जाएँ  धीमे धीमे
जीवन लहर गिरतीं उठतीं, मचलती  जाएँ धीमे धीमे,
वारिद नयन, तृषित ह्रदय, मधुरिम ये समर्पण लागे
सुदूर मुहाने में अप्रत्यासित कई मधुर स्वप्न जागे /
-- शांतनु सान्याल

सोमवार, 29 नवंबर 2010

क्षणिका

सजल नयन थे ढूंढ़ न पाए हम तुमको
कुहासे  में ढक चुकी थीं पुष्प वीथिका,
अभिसारमय थे निशीथ व् ज्योत्स्ना
खिले थे हर दिक् मालती व् यूथिका,
कण कण में थे ज्यूँ  सोमरस घुले हुए
रौप्य या स्वर्ण रंगों में थी मृतिका,
विचलित ह्रदय एकाकी हंस अकेला
टूट बिखर जाय जैसे कोई वन लतिका,
-- शांतनु सान्याल

आत्मसात

शंख, सीप,रेत कण, शल्क की उतरन
समुद्र तट  था या वक्ष स्थल हमें ज्ञात नहीं
लवणीय प्रांतर अथवा पलकों से झरे थे
चाँदनी, हमने तो सर्वस्व आत्मसात किया
जो भी अवशेष थे आलिंगनबद्ध रहे, निःशब्द
हम दग्ध पाओं से चलते रहे किसी के
पद चिन्हों में, सप्तपदी के मन्त्रों की तरह
उच्चारित थे सागर उर्मि, अग्नि साक्षी थे
निशाचर पक्षी या अंतर्मन की छाया
तुमने जिस तरह चाहा हमने उसी दिशा में
मेघ की भांति अपने आप को बरसाया
हाड,मांस, रुधिर, स्नायु तंतु जो भी
देह के पांथशाला में थे, हमने प्रतिपल उन्हें
प्रतिदान किया, अब और कौनसा क्षितिज
छूट गया  हमें तो मालूम नहीं, ह्रदय झील
में अब क्यूँ बिम्ब हैं कुछ चाँद के उदास
हमने तो जीवन को गहरा रंग दिया
तुमने क्यूँ अपना मुख फेर लिया //
-- शांतनु सान्याल

रविवार, 28 नवंबर 2010

नीबू के फूलों की महक

नीबू के फूलों की महक ले के 
शाम उतरी है फिर धीरे धीरे 
छत मेंअभी तक फैले हैं कुछ 
प्रीत के सपने बेतरतीब, रंगीन 
कपड़ों की तरह, हवाओं में 

लहराते हुए, रात गए तुमने 
उन्हें उतारा और बिस्तर में 
फिर बिखेर दिया कल के लिए 
काश सुबह से पहले उन्हें तह 
कर दिया होता, इक धुली सी 
भीनी भीनी खुशबू रह गई 
होती, सलवटों में कहीं खो 
सी गईं वो नफ़ासत, अब तो 
फिर से नए सपनों को धो कर 
जिंदगी के रस्सियों में पुनः 
फैलाना होगा, भीगे भावनाओं 
को नर्म धूप में सुखाना होगा /
-- शांतनु सान्याल 


शनिवार, 27 नवंबर 2010

मधु स्पर्श

नीरव रजनी, झरे थम थम पारिजात
महके निशिगंध,निश्तब्ध पीपल पात,
नेह सजे फिर बैरागी, भूलें हम संसार
अतृप्त श्रोत बहती ,अंतर्मन दोनों पार ,
अहर्निशी सुप्त यमन गाए निर्झर गान,
अशांत ह्रदय, क्लांतमय, मम देह प्राण,
जलरंग चित्र, रिश्तों के नाज़ुक दीवारें,
घुलनशील स्मृति कण, ये दर्द की फुआरें,
मायावी पृथ्वी, जी चाहे स्वर्ण हिरण
अलकों में मोती, देह बने सीप आवरण,
सुरभित स्वर, मुखरित शेष प्रहर संगीत,
अधरों में मधु स्पर्श, ह्रदय पुष्प मनमीत,
-- शांतनु सान्याल 

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

अंखियन बरसत नीर

हिय की बतियाँ कोई न जाने, अंखियन बरसत नीर
अगन  बिन लौ की, निशदिन तिल तिल झरत शरीर,
हिन्डोलित अलस  नयन, ज्यूँ बकुल लचकत डारी डारी,
देह अन्तःरंग बिलसित,कदम्ब झुके जस  जमना तीर,
भरमाय चंद्रमल्लिका शेष पहर, अम्बुआ मुकुल सम
पग झटकत मृग अकुलाय, मधुरिम  बहत  समीर,
पिघलत शशि कोर कोर, रह रह महुआ झर जाय
मधुर सुगंध, अंचरा भर भर  जाय बनफूलन के सखी
पोर पोर रंग भरी किसने, बिन होरी उड़त रंग अबीर,
उठत हूक बंसी के, जिया घबराय, पथ भरमाय
चाहे मन सकल तज दूँ मैं, पिय बिन छलकत धीर ,
निशब्द समीह, कान्हा बांधत रह रह  मधु बाहू डोर
हिरनी सम ब्रज बाला, गिरत परत, होत अधीर //
-- शांतनु सान्याल
( इस कविता में मघधीय अपभ्रंश का प्रयोग है, आशा है कि शब्दों की मिठास को समझेंगे - जैसे हिरन न की हिरण)

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

पारदर्शी प्याला - ग़ज़ल

मैंने खुद ही पिया है पारदर्शी प्याला, विष या सलिल जो भी हो
सलीब पे ज़िन्दगी कब थी आज़ाद, प्यास है सृष्टि की आग
इश्क़ का रंग भी है पानी की तरह, जिस्त को हासिल जो भी हो,
वो तमाम चेहरे बन कर आयें हैं फिर रहनुमा या तमाशाई ?
दिल तो मोहरा बन चुका, अब आसान या मुश्किल जो भी हो,
न पूछ  दीवानगी, ज़हर पियूँ ग़र मैं, तुम नीलकंठ बन जाना
हमने  हयात-ऐ- फ़िरदौस जी ली, मुख़्तसर या तवील जो भी हो,
लोग क्यों किस्तों में करते हैं खुशियाँ तलाश, लम्हा दर लम्हा,
हमने  बाँहों में समेट ली ऐ दुनिया , दर्द-ऐ-मुस्तक़बिल जो भी हो,
--- शांतनु सान्याल
 ,

न मुश्किल हो

न देखो मेरी जाँ इस तरह कि मानी में ज़िन्दगी मुश्किल हो
बड़ी ख्वाहिस से हमने अक़ीदत क़बूल किया सभी के सामने 
कुछ तो भरम रहने दो ख़ुदा का,कुछ तो बंदगी मुश्किल हो,
आसां नहीं इतना कि हम भुला दें हर शै को तुम्हारी ख़ातिर
इतना क्यों मौसम ने रंग बिखेरा कि अब सादगी मुश्किल हो,
इस क़दर न चाहो मुझे कि टूटने का खौफ़ रहे साया बनकर 
नज़दीकियाँ न बने जंज़ीर , न मासूम आवारगी हो मुश्किल, 
ये निगाहों का हिसाब है बहुत गहरा, जी अक्सर घबरा जाये
दिल चाहे क़ायनात से ज़ियादा,न कहीं अदायगी मुश्किल हो,
--- शांतनु सान्याल


एक बूंद

वो एक बूंद जो पलकों से टूट कर
पत्थरों में गिरा, ज़माना गुज़र गया

तुम्हें याद हो, कि न हो वो  लम्हात
मगर पत्थरों के बीच वो ज़ब्त हो गया
सदियों से लेखक, कवि या शायरों ने
तलाशा उसे, उत्खनन किया रात दिन
वो घनीभूत अश्रु न जाने किस किस रूप
में लोगों ने देखा, और महसूस किया
कल्पनाओं के रंग भरे चित्रकारों ने
जौहरियों ने खुबसूरत नाम दिए
माणिक, मुक्ता न जाने क्या क्या
कैसे समझाऊं वो बूंद तो पलकों से
गिरा ज़रूर, ये हकीक़त है लेकिन
वो अब तलक मेरी दिल की पनाहों
में है मौजूद, काश कोई देख पाता उसे /
-- शांतनु सान्याल 

बुधवार, 24 नवंबर 2010

नज़्म- ख़्वाब, एक अजनबी की तस्वीर और कुछ टूटे प्याले

ख़्वाब, एक अजनबी की तस्वीर और कुछ टूटे प्याले
मैंने रखे हैं  संभाले, किसी मिल्कियत की तरह
सहम से जाये है ज़िगर जब अल्बम को छुए  कोई,
ज़िल्द की खूबसूरती इतनी की लोग समझे
पुराने पन्नों में है ज़िन्दगी के आबसार निहाँ,
न पलटों मेरी जाँ, परतों को इस बेदर्दी से कि
भूले लम्हात को समेटना हो मुश्किल, बड़े ही जतन
से परत दर परत हमने किसी की निशानी
सुलगते सीने के तहत दबाये रखा है,
ढलती दुपहरी दौड़तीं है नाज़ुक धूप की जानिब
तितलियाँ उडी  जा रहीं हों जैसे दूर तलक
उदास हैं किसी बच्चे की मासूम आँखें,
 तकता है वो खुली हथेलियों को कभी
और कभी देखता है ख्वाबों को धूमिल होते,--- शांतनु सान्याल 

नज़्म- अपना बना गया कोई

मजरूह साँस रुके ज़रा तो ऐ दोस्त
बेहोशी में न जाने क्या कह गया कोई
किसी की आँखों में थी ज़िन्दगी
सरे बज़्म वसीयत बयाँ कर गया कोई
 झुकी पलकों में लिए राज़ गहरा
घावों को फिर परेशाँ कर गया कोई
कच्ची दिल की मुंडेरें हैं हमदम
सीड़ियों में आसमां बिछा गया कोई
बेरंग दीवारें जैसे नींद से जागें
फूलों के चिलमन सजा गया कोई
उम्र भर की हसीं लडखडाहट है
 या यूँ ही  अपना बना गया कोई
बेहोशी में न जाने क्या कह गया कोई /
-- शांतनु सान्याल

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

लेकिन

धूप खिली है वादियों में संदली, लेकिन
अँधेरा है अब तलक पहाड़ियों के दूसरी तरफ
बादलों ने उन्हें क्यों दर किनार किया
ख़्वाब बोये थे हमने तो मुहोब्बत के
दोनों ही ढलानों में एक से,
आदम क़द थे वो तमाम आईने
उम्र ही न बढ़ पायी या
हम आईना देखना ही भूल गए,
क्यूँ छोड़ दिया तुमने मुहोब्बत का चलन
सूने झूलों में झूलती है अभी तलक वो यादें
घर से निकले थे हम साथ साथ
मेले के भीड़ में उंगली पकड़ना ही  भूल गए ,
न तुमने  तलाशा हम को, न हम ही खोज पाए
उम्र तो गुज़र गयी इसी उलझन में
रात है गहराई, हम चिराग़ जलाना ही  भूल गए,
 रिश्तों की कमी न थी, लेकिन
हम अपना बनाना ही  भूल गए /
-- शांतनु सान्याल

सोमवार, 22 नवंबर 2010

नज़्म

बहोत मुश्किल है किसी के लिए
खुद को यूँ ही तबाह करना
परेशां नज़रों से न देखो
आसाँ नहीं दिल को अथाह करना
डूब जाएँ किनारों  की ज़मीं
इस तरह बहने की चाह  रखना
नाज़ुक हैं कांच के रस्ते
धीरे  ज़रा प्यार बेपनाह करना
मौसमी फूलों से न हों मुतासिर
इश्क़ मेरी जाँ बारहों माह करना
खला के बाद भी है  कोई दुनिया
हर जनम में मिलने की चाह रखना /
-- शांतनु सान्याल

रविवार, 21 नवंबर 2010

ग़ज़ल

तुम मिलो तो  सही किसी मोड़ पे, पुराने वो सभी हिसाब ले लेना
बरसती हैं रहमतें, हम  भी अपना आँचल उम्मीद से फैला गए
इक मुद्दत से लिखी हैंबेसुमार ख़त,  ग़र चाहो तो जवाब दे देना /
हर एक लफ्ज़ में छुपे हैं हज़ारों फ़लसफ़ा-ऐ -तिश्नगी ऐ दोस्त
फ़लक है महज इक ख़याल, ज़मीं, सितारे ओ महताब ले लेना/
जिस्त की ओ तमाम मरहले हैं, किसी वीरां अज़ाब की मानिंद
शीशा है टूट जाए तो क्या, इक नया गुलदान-ऐ-ख़्वाब दे देना /
मंदिर की वो तमाम सीढियाँ, वक़्त की नदी निगल सी गई
उम्र गुज़ार दी हमने इबादत में, चलो तुम ही सवाब ले लेना /
परछाइयों से पूछते हैं अक्सर हम अपना ठिकाना दर-ब-दर
मिलो तो सही इक बार, बदले में यूँ ही  ज़िन्दगी नायाब ले लेना /
उठती हैं ज़माने की नज़र हर जानिब, ज़हर बुझे तीरों की तरह
शिकार हों न जाएँ किसी के ज़द में कहीं, दर्द-ऐ-शराब दे देना /
तुम मिलो तो  सही किसी मोड़ पे, पुराने वो सभी हिसाब ले लेना/
 -- शांतनु सान्याल

शनिवार, 20 नवंबर 2010

शबनम की तरह बिखर जाएँ

रजनीगंधा के गुच्छों में शबनम की तरह बिखर जाएँ
चाँदनी रात है,  दूर तलक बिछे हैं, हसरतों के मोती
खुशबू-ऐ-जिस्म है या शाख-ऐ-गुल, जी चाहे निखर जाएँ /
किसी की धडकनों में छलकती हैं मधु बूंदों की खनक
इक नशा है, छाया शब्-ऐ-तन्हाई में चाहे जिधर जाएँ /
नज़्म ओ ग़ज़ल, गीत ओ संगीत, राहों में हैं  बिखरे पड़े
किसी के क़दमों तले मौजें हैं रवाँ, दिल चाहे संवर जाएँ /
रात के पखेरू तकते हैं, उनींदी आँखों से बार बार हमको
 सागर के सीने में कौंधती हैं, बिजलियाँ ज़रा ठहर जाएँ /
कश्तियाँ भूल गये रस्ते, चाँद भटके है   मजनू की तरह
आसमां ओ ज़मीं के दरमियाँ, शिफर को इश्क़ से भर जाएँ /
इस रात की गहराइयों में चलों खो जाएँ सुबह से पहले
छु लो  यूँ ही  बेखुदी में, कहीं  शाखों से ,न  सभी फूल झर जाएँ  /
--- शांतनु सान्याल

बुधवार, 17 नवंबर 2010



नज़्म



कुछ दूरियां रहे बरक़रार, कि बेखुदी में खुद को भूल जाऊं मैं



लरज़ती बिजलियाँ, शाखों से गुल गिरते हैं, हसीं अंगडाई की तरह



शायद लम्बी है ख़ुमारी,कि नशे में हर जुर्म कुबूल जाऊं मैं



हर एक आहट में, हजारों हसरतें, हसरतों में ज़िन्दगी भटके यूँ ही



जुनूँ केहद से तो निकल आऊं,फाँस--इश्क मेंकहीं झूल जाऊं मैं



ज़िन्दगी की कश्मकश में, खुद का वज़ूद, समेट पाया कभी



किसी की चाहत में दोस्त,कहीं चेहरा अपना ही भूल जाऊं मैं /



-- शांतनु सान्याल

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

अनल पथ यात्रि


वो सभी थे कभी महा अनल पथ यात्रि

हाथों में हाथ लिए, वृन्द चीत्कार के मध्य

गहन अन्धकार हो या पुलकित निशीथ

हास्य व् क्रंदन, कभी उच्च प्रतिकार के मध्य

वो थे आग्नेय अरण्य के अनाम वासी

धर्म-अधर्म के बाहर, मानव विचार के मध्य

वो तुमुल प्रणय के साक्षी, सृष्टि के निर्माता

महोत्सव जय गान मेंथे, कभी हाहाकार के मध्य

एक विशाल विह्ग वृन्द, उड़ गये जाने कहाँ

जर्जरित नभ में थे वो, कभी सिंह द्वार के मध्य

कोई उदासीन नेहों से तकता शून्य नीलाकाश

वो यात्रि न जाने कब लौटेंगे इस संसार के मध्य/

-- शांतनु सान्याल

नज़्म


वो कौन है जो ज़िन्दगी भर साथ रहा
ख़ुशी ओ ग़म का मेरा हमराज़ रहा
वो तमाम ख़त यूँ तो जला दिए मैंने
न भूल पायें वो लरज़ता साज़ रहा
कोई पुराना ढहता महल था शायद
कभी कराह कभी मीठी आवाज़ रहा
रुख़ मेरा अब परछाई नज़र आये
वो कभी ख़्वाब, हसीं परवाज़ रहा
उसे भूल जाने का क़दीम अहद
तोड़ा न गया वो कल भी आज रहा /
--- शांतनु सान्याल

नव स्वप्न


प्रागैतिहासिक हिंसकवृति सहजता से नहीं जाते
रक्त व् मांस की वो ज्वलित गंध
संस्कृति व् सभ्यता के तिमिर गुफाओं में
प्रतिबिंबित होते बारम्बार
सुप्त सरीसृप सम मानवीय अनुबंध
उच्चारित होते अक्सर प्रणय मन्त्र बीच
मैं और केवल मैं प्रतिध्वनि मध्य
हो जैसे सम्पूर्ण वसुधा समाहित
बंधुत्व व् प्रेम जहाँ एक मिथक
दंश प्रतिदंश, सम्बन्ध जहाँ विषदंत
हर पल जैसे मौन चिर विनिमय
परित्यक्त ह्रदय, अवहेलित भावना
अभिशापित देह व् सतत उत्खनन
फिर भी चाहे जीवन एक नव आरम्भ
इन्द्रधनु से छलके प्रतिपल नव स्वप्न /
--शांतनु सान्याल

सोमवार, 15 नवंबर 2010

क्षणिका


शरद शशि उन्मुक्त आकाश, शीत छुअन
चातक स्वर, सुदूर अरण्य, मृग क्रंदन,
मध्य निशा, तरंग विहीन ह्रदय स्पंदन,
तृषित देह व् प्राण, अपेक्षित हिंस नयन,
जीवन संग्राम, प्रति पल, मृत्यु अभिनन्दन,
मम व्यक्तिव, धूप दीप हो सम चन्दन,
-- शांतनु सान्याल

नज़्म


लब - ऐ -साहिल पे उसने, कोई राज़ यूँ ही छिपा लिया अक्सर
ख़ामोश निगाहों से सही, कोई बात यूँ ही बता दिया अक्सर,
जो जान के अनजान नज़र आये, नफासत से दामन बचा गए
मुस्कराएअजनबी की तरह, खुद को यूँ ही बचा लिया अक्सर,
हर तरफ थे पहरे, हर जानिब भटकती आँखों के हजूम,
वो आये पैगाम-ऐ-वफ़ा बनकर,इश्क़ यूँ ही जाता दिया अक्सर,
न कोई शक़ न सुबू की थी गुंजाइश, पाकीज़गी तो देखो
अक्श मेरी, अपनी आँखों में चुपचाप यूँ ही बसा लिया अक्सर /
--- शांतनु सान्याल

नदी


वो एक पहाड़ी नदी, छोटीसी नन्ही सी
उथली और पत्थरों से भरी
सहमी-सहमी, तन्हा तन्हा
किसी दर्द भरी टीसकी मानिंद
खुद को समेटे जैसेबहती हो
आहिस्ता आहिस्ता टूटे पुल के नीचे
मंजिल के जानिब सिमटी सिमटी
सावन में अँधेरा बादिलों का डराए उसे
कभी इस किनारे कभी उस तट
मुसलसल टूटती, बिखरती, संवरती
बहती जाती, ऊँचे दरख़्त सायादार
उसे ढकते, बेलें छूने को बेक़रार
झरने, नाले जिस्म को चूर करते
पहाड़ों का घूरना लगे कौफनाक
लगे जैसे उसका वजूद ये तोड़ डालेंगे
लेकिन वो नहीं रूकती, बहती जाती
अपने आप में खोई खोई, गुमसुम गुमसुम
कभी जागी कभी जैसे सोई सोई
सीने में लिए बेजुबानअफसाने
अनकही बातें, राज़ की गहराइयाँ
नदी तो सिर्फ बहती जाती, रात दिन
गिरह में बांधे अपने जज़्बात
किसी हसीं आँखों से गिरतीं हों जैसे बूँदें
थम थम कर, रुक रुक कर ----
-- शांतनु सान्याल

नज़्म


कोई शख्स तन्हा किसी को हर सू तलाश करता रहा
छू भी न सके जिसको, उसे पाने की आस  करता रहा,
सितारे डूबते गए , दूर स्याह  आसमां की गहराइयों में
न जाने क्यों तमाम रात, खुद को उदास करता रहा,
चाँद की परछाई, समंदर से लुकछुप करती रही बारहा
वो जागी नज़रों में , ख्वाबों को यूँ अहसास करता रहा,
कब रात ढली , अलसाई निगाहों में लिए अफसाने
उम्र भर इसी उलझन में अपने आपको हताश  करता रहा,
-- शांतनु सान्याल

ग़ज़ल


बदलियाँ बरस कर खो गयीं जाने कहाँ, अब पुरसुकून आराम लगे
वादियों से उठता धुआं गहराए, अब दिल में थम सा गया कोहराम लगे,
तिश्नगी-ऐ-दिल बड़ा बेचैन था, आँखों के बरसने से पहले ऐ दोस्त
भीगीं पलकें, उठतीं गिरतीं बूंदें, आज ख़ूबसूरत फिर मखमली शाम लगे,
सूखे फूलों के निशाँ बाक़ी हैं, ज़िन्दगी बेदाग़ नहीं साहिब
हूँ अजनबी ये निगाहों का फर्क़ है, वैसे जाना पहचाना ये गाम लगे ,
चिराग़ों के शहर में गुमसा गया कहीं, वो अंधेरों का दोस्त मेरा,
आइना भी सबूत चाहे ये और बात है,शायद चेहरा मेरा भी गुमनाम लगे,
वो ख़त अब तलक है मौजूद, क्या हुआ तहरीरें मिट गईं जिसकी
छुं लूँ उसे ,अहसास मीठा मीठा , दिल के क़रीब अबतक वो नाम लगे,
उस बज़्म में तन्हा बचाता रहा , अपने साए को बार बार
सनम परस्तिश, न जाने और क्या, बहोत प्यारे वो सभी इलज़ाम लगे,
दीवानगी इतनी की मरना भी चाहूं, और कभी जीने की आरज़ू जागे
इब्तदा तो याद नहीं , बेखौफ़, बेअसर एक सिद्दत-ऐ-अंजाम लगे,
-- शांतनु सान्याल

रविवार, 14 नवंबर 2010

उनके जाते ही --


याद आयी वो बात उनके जाते ही
जो कहना चाहे उन्हें बार बार
घिर आयी बरसात उनके जाते ही,
मिट गए क़दमों के निशाँ दूर तक
बिखर गए जज़्बात उनके जाते ही,
अहसास-ऐ-ज़िन्दगी का इल्म हुवा
थम सी गई हयात उनके जाते ही,
क़बल इसके दिल को राहत थी
दर्द बनी मुलाक़ात उनके जाते ही,
न कोई गिला न ही शिकायत थी
बदल गए हालात  उनके जाते ही,
दामन में सज़ाओं की कमी न थी
क़ैद हुई हर निज़ात उनके जाते ही,
सुबह-ओ -शाम की खबर कहाँ
थम सी गई क़ायनात उनके जाते ही,
यूँ तो आसना थे तमाम रहगुज़र से
क्यूँ पेश आयीं मुश्किलात उनके जाते ही,
खो गए फूल,सज़र ओ तितलियाँ
वीरान हुए बागात उनके जाते ही,
दर्पण है गुमसुम अक्स धुंधलाया सा
न बाक़ी कोई तिलिस्मात उनके जाते ही,
-- शांतनु सान्याल

ग़ज़ल


उस निगाह के बाद कोई निगाह नहीं होती
उसे देखने के बाद कोई दिल में चाह नहीं होती,
जब इक आग सी लगी हो सीने में आठ पहर
उसके दामन के सिवा कोई पनाह नहीं होती,
वो जो मुस्कुराते हैं लबऐ- राज़ छुपाये हुए
रुसवा हो ज़माना हमें कोई परवाह नहीं होती,
बहोत क़रीब से गुज़रा है वो हवाओं की तरह
दिल में सरसराहट यूँ ही बेइन्तहां नहीं होती,
मुद्दतों से इक दर्द को बैठे हैं, सहलाये हुए
लोग नश्तर भी चुभोए तो कराह नहीं होती,
पथरीली राहों पे बिखरे हैं कांच की लकीरें
काँटों में खिलने वालों दर्द-ऐ-आह नहीं होती,
शाम ढलते ही कोई उजड़े मंदिर में दीप जलाये,
चंद लम्हात सही ताउम्र जलने की चाह नहीं होती,
कोई आये या जाए , बादलों की इस जहाँ में
मिलने वाले तो मिलेंगे,कोई तयशुदा राह नहीं होती /
-- शांतनु सान्याल

शनिवार, 13 नवंबर 2010

अनाम फूल की ख़ुश्बू - -


वो किसी अनाम फूल की ख़ुश्बू !
बिखरती, तैरती, उड़ती, नीले नभ
और रंग भरी धरती के बीच,
कोई पंछी जाए इन्द्रधनु से मिलने
लाये सात सुरों में जीवन के गीत,
वो कोई अबाध नदी कभी इस
तट कभी उस किनारे गाँव गाँव ,
घाट घाट बैरागी मनवा बंधना
कब जाने पीपल रोके, बरगद टोके
प्रवाह बदलती वो कब रुक पाती
कलकल सदा बहती जाती
वो कोई अनुरागी मुस्कान
अधर समेटे मधुमास,
राह बिखेरे अनेकों पलास,
हो कोई अपरिभाषित प्रीत
आत्मीयता का नाम न दो
ख़ुश्बू, पंछी और नदी
रुक नहीं पाते रोको लाख
मगर, ये बंजारे भटकते जाते
सागर तट के घरौंदें ज्यों
बहते जाये लहरों के बीच।
* *
-- शांतनु सान्याल

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

ग़ज़ल


कुछ याद की पंखुडियां है मौजूद अभी तक टूटे गुलदान के तहत
बिखरेबिखरे अहसास, पिघलते मोम की तरह, बूंद बूंद रिसते हुए
पलकों में अश्क थमें हों जैसे आबसार कोई बियाबाँ के तहत,
जाहिर न हो आम, वो इक सुलहनामा था, भूल जाने का अहद
मुद्दतों से जिसे सजा रखा है, सुलगते दिल-ऐ-अरमाँ के तहत ,
वो शमा जो बुझ कर है रौशन, हज़ार शम्स के बराबर
कोई खुशबू-ऐ-हयात हो जैसे,बिखरा ज़मीं ओ आसमां के तहत,
कोई तो होगा जहाँ में , जिसे मालूम हो उसका ठिकाना
सहरा सहरा, वादी वादी ,मंज़र आये गए उम्र-ऐ- रवां के तहत,
कभी मंदिर, कभी मस्जिद, हर शै पे लिखा पाया उसी का नाम
इक प्यास, इक आश दबी हो जैसे, हर इबारत-ऐ-बयां के तहत,
-- शांतनु सान्याल

ग़ज़ल


ग़ज़ल

शायद कभी वो आये बज़्म में भूली याद की तरह
अपने दर्द-वो-अलम को यूँ ही सहलाये रखिये ,
फ़िज़ा ओ वादी में फिर धुप खिली है सहमी सहमी
अहाते दिल के कुछ मौसमी फूल सजाये रखिये ,
न जाने किस मोड़ पे उसका पता लिखा हो ऐ दोस्त
क़दीम ख़तों से दिल को यूँ ही बहलाए रखिये ,
हर दर पे है रौशन चिराग़, इस श्याह रात में लेकिन
अंधेरों से भी दोस्ती अक्सर निभाए रखिये ,
चाँद ढलते फिर उठीं हैं, जाग साहिल की सिसकियाँ
परछाइयों से भी, कभी कभी दामन बचाए रखिये,
आइना है बहोत जिद्दी, कोई समझौता न करना चाहे
बीती लम्हात के अक्स दिल में बसाये रखिये ,
निगाह अश्क से थे लबरेज़ , अहसास-ऐ- शबनम सही
दिल की ख़ूबसूरती यूँ ही दोस्त बनाये रखिये ,
-- शांतनु सान्याल


गुरुवार, 11 नवंबर 2010

ग़ज़ल


वो तमाम चेहरे आज फिर बेनक़ाब नज़र आए
पर्दा- ऐ -दिल पे सिलवटें बेहिसाब नज़र आए,
अब तक़दीर की बेवफ़ाई न पूछ मेरे महबूब
शिक़स्त से पहले वो, फिर कामयाब नज़र आए,
कभी अक़ीदत का बाइस था मेरा वजूद भी लोगों
वक़्त बदलते ही उन्हें ज़िन्दगी अज़ाब नज़र आए ,
बड़ी नफ़ासत से संजो रखा था किसी की मुहोब्बत
दिन ढलते ही वो कभी सहरा कभी सैलाब नज़र आए,
जो कभी हमक़दम हमराह था, ज़िन्दगी के सफ़र में
पुल के ढहते ही अचानक दूर एक ख़्वाब नज़र आए,
रस्म-ओ- रिवाज की अहमियत से था अब तक बेख़बर
दिल क्या टूटा हज़ारों बिखरे हुए इन्क़लाब नज़र आए,
पूछते हैं वो मेरी दीवानगी का सबब अक्सर ज़माने से
पिघलते हदीद भी उनको ऐ दोस्त शराब नज़र आए,
नीलामी का मंज़र था बहोत ख़ूबसूरत ऐ अहदे-वफ़ा
हद-ऐ-नज़र तमाम जान-ऐ -ज़िगर अहबाब नज़र आए,
-- शांतनु सान्याल

ग़ज़ल

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

दो किनारे



दूर बहुत दूर नदी के दो किनारे



क्षितिज में शायद मिलते हों कहीं,



या महा समुद्र दोनों को निगल जाती



है, ये सोच तुम कि कहीं लवणीय



हो जाओ, ये सोच कि मैं मिठास



भूल जावूँ ,एक दूरी में बहते रहे पृथक



श्रावण के सघन मेघों ने चाहा कि एक



गुप्त संधि हो मध्य हमारे,घातक



तड़ित ने उसे बार बार यूँ तोड़ा की



हम चाह कर भी एक दुसरे के समीप



सके , समानान्तर प्रवाहित रहे /



-शांतनु सान्याल




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