Tuesday, 16 November 2010

नज़्म


वो कौन है जो ज़िन्दगी भर साथ रहा
ख़ुशी ओ ग़म का मेरा हमराज़ रहा
वो तमाम ख़त यूँ तो जला दिए मैंने
न भूल पायें वो लरज़ता साज़ रहा
कोई पुराना ढहता महल था शायद
कभी कराह कभी मीठी आवाज़ रहा
रुख़ मेरा अब परछाई नज़र आये
वो कभी ख़्वाब, हसीं परवाज़ रहा
उसे भूल जाने का क़दीम अहद
तोड़ा न गया वो कल भी आज रहा /
--- शांतनु सान्याल

3 comments:

  1. रुख़ मेरा अब परछाई नज़र आये
    वो कभी ख़्वाब, हसीं परवाज़ रहा
    उसे भूल जाने का क़दीम अहद
    तोड़ा न गया वो कल भी आज रहा
    बहुत कुछ याद दिला गए आप के आज के यह लव्ज़

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  2. धन्यवाद - सस्नेह / आपके अमूल्य प्रतिक्रियाएं भविष्य में कुछ बेहतर लिखने की प्रेरणा प्रदान करते हैं/

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