रविवार, 28 फ़रवरी 2021

दूर का परिदृश्य - -

नहीं मिटाया जा सकता सब कुछ,
कुछ रंगों के कणों में रहते हैं,
भीतर तक अदृश्य, छुपे
हुए जज़्बात के
अति सूक्ष्म
रेशे,
कहने को दूर से डायरी के पृष्ठ -
यूँ तो कोरे नज़र आते हैं,
रंध्र प्रति रंध्र बासी -
पन का होता है
साम्राज्य,
चेहरे
का बिम्ब तलाशता है खोयी हुई
मुस्कान, अमूल्य इत्र के
सुरासार, हवाओं के
साथ बिखर
जाते हैं,
कहने
को दूर से डायरी के पृष्ठ, यूँ तो
कोरे नज़र आते हैं, बहुत
कुछ तोड़ने की चाह
में बहुत कुछ
ख़ुद से
हम
जोड़ भी जाते हैं, किसी एक दिन
मैंने सभी इंद्रधनुषों को अपने
जीवन से दूर फेंक दिया
था, आज उम्र की
ढलान पर
फिर
उसी गुमशुदा सावन को खोजता
हूँ, न चाहते हुए भी उन बिखरे
पलों को जोड़ता  हूँ, अजीब
से हैं, ये श्वसन आलेख,
अधिक ऊपर उठने
की चाह में
मूल
बिंदू पर ही ठहर जाते हैं, कहने
को दूर से डायरी के पृष्ठ, यूँ
तो कोरे नज़र आते हैं,
अंदर का आर्तनाद
अक्सर
बना
जाता है अपाहिज, असर हो या
नहीं, अनीति को देख कर
चिल्लाना है ज़रूरी,
अंदर के बिम्ब
को जगाना
है ज़रूरी,
इस
दौर के जुलूस निकलते तो हैं - -
बहुत ही जोश ओ ख़रोश से,
लेकिन कुछ दूर जा
कर न जाने
किधर
जाते
हैं,
कहने को दूर से डायरी के पृष्ठ,
यूँ तो कोरे नज़र
आते हैं।

* *
- - शांतनु सान्याल

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

बहुत कुछ देख लिया - -

अंदर का अमावस ज़रा भी
न बदला, चेहरे का
उजाला बदल के
देख लिया,
वक़्त
की रफ़्तार अपनी जगह -
वही है, कुछ दूर उसके
पीछे चल के देख
लिया, कोई
नहीं था
दूर
तक, इक मेरे सिवा, ख़ुद
से यूँ बाहर, निकल के
देख लिया, न जाने
कितना लम्बा है,
ये इंतज़ार,
सारी रात
पूरी
तरह जल के देख लिया, -
क़िस्मत के पहलू
ज़रा भी न लरज़े,
लकीरे दस्त
पर उछल
के देख
लिया,
बहुत नाज़ुक थे, सभी कांच
के रिश्ते, झूठे ख़्वाबों के
तहत ढल के देख
लिया, चेहरे
का
उजाला बदल के देख लिया।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
 
  

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

अपना बना के देखेंगे - -

है अंधेरे का तोहफ़ा, तो दिल का
दीया जला के देखेंगे, इक
चश्म ए शबनम मिल
जाए, रूह में छुपा
के देखेंगे,
हर
एक मोड़ पर खड़े हैं, कई शुब्ह
चेहरों की मजलिस, अंजाम
ए दोस्ती जो भी हो, फिर
हाथ मिला के देखेंगे,
न जाने कितनी
बार, यूँ ही
लूटा
है तेरी महफ़िल ने हमें, जीस्त
की जुस्तज़ू  में फिर से, यूँ
ही दिल लगा के देखेंगे,
दरवेशी ख़्यालों का,
ओढ़ना ओ
बिछौना
सब
हैं बराबर, सारे जहां के मालिक
को, इक रोज़ घर बुला के
देखेंगे, दुआओं का
असर दूर तक
पहुँचता है,
ये
हमने सुना है, पत्थर ही सही,
अक़ीदत के वास्ते सर
झुका के देखेंगे,
निगाहों में
मूरत
उभरती है, तो लगे सारा जग
अपना, उस बेनज़ीर चेहरे
को इक दिन, तहे
रूह बसा के
देखेंगे।
* *
- - शांतनु सान्याल
अर्थ :
तोहफ़ा - पुरस्कार
शुब्ह - छद्म
मजलिस - जमाव
चश्म ए शबनम - आंख के ओस कण
जीस्त - जीवन
जुस्तज़ू - खोज
दरवेशी - वैरागी
अक़ीदत - श्रद्धा
बेनज़ीर - असाधारण

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

न जाने कहाँ कहाँ से गुज़रे - -

ईमां ए इश्क़ में न जाने हम, कहाँ
कहाँ से गुज़रे, राह ए सोज़ां
में भटके, कभी कहकशां
से गुज़रे, वो जुनूँ,
जो ले जाए
रूह तक,
क़ाब ए बदन से, उसे छूने की चाह
में, बातिल ए आसमां से गुज़रे,
न ज़मीं में थी राहत, न
ख़ुलूस था अफ़सानों
में, हर क़दम पे
था फ़रेब
मबहम जहाँ जहाँ से गुज़रे, निजात
भी थी बेमानी, बेमुराद थे
ज़िन्दान भी, उम्र भर
न जाने हम कितने
ही इम्तहां से
गुज़रे,
कभी कठपुतलियों की तरह, शिफर
पे डोलते रहे, कभी आँखों में
पट्टी बांधे, जिस्म ओ जां
से गुज़रे, बहुत दूर
उफ़क़ पार थीं,
सभी
उजालों के बस्तियां, इक बूंद की
चाह में, तमाम रात, रेगिस्तां
से गुज़रे, इस दौर के
रहनुमाओं का
अंदाज़े
फिक्र क्या कहिए, इक ज़िन्दगी की
तलाश में ताउम्र क़ब्रिस्तां  से
गुज़रे, बिखरे पड़े थे
सूखे पत्तों के
साथ, इक
बेक़रां
ख़मोशी, कहने को बारहा, तेरी - -
निगाह के गुलिस्तां से
से गुज़रे।
* *
- - शांतनु सान्याल    
 
   अर्थ :

ईमां  ए इश्क़ - प्रेम का ईमान
राह ए सोज़ां - सुलगते राह
कहकशां - आकाशगंगा
जुनूँ - पागलपन  
क़ाब ए बदन - देह का फ्रेम
बातिल ए आसमां - आकाश का ख़ालीपन
ज़िन्दान - बंदी
ख़ुलूस - शांति
बेक़रां - अथाह

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

ख़ामोशी - -

सरे बज़्म में हम, बहुत अकेले से -
रह गए, अनकहे लफ्ज़, ओठों
पे कांपते से रह गए, गहरे
भंवरजाल में था कहीं,
उसका पता,
ताउम्र
मिलने की चाह में, खड़े से रह गए,
न जाने कितने मुसाफ़िर गुज़रे
हैं यहाँ से, बुर्ज़ फ़ानूस की
तरह, हम देखते से
रह गए, यूँ तो
ज़माने
का रुख़, तूफ़ां से कम न था, ता'जुब
है चिराग़े दिल, जलते से रह गए,
हमारे तरकश में भी, तीरों
की कमी न थी, चौखट
में आ कर क़दम
निकलते
से रह गए, चौराहे का शाही तमाशा,
हमें कभी मंज़ूर न था, तमाशाई
की तरह, ख़ामोश चीखते
से रह गए, आज हो
या कल, हर
युग में
रहेंगे ये बहुरूपी, अनबूझ से हैं
रौशन फ़िक्र, सुलगते
से रह
गए।

* *
- - शांतनु सान्याल
 


 







सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

अंतहीन बसंत - -

हिमयुग का अंत हो न हो, बसंत दिलों
में रहे हमेशा बरक़रार, न जाने क्या
ढूंढती हैं, नीलाकाश की ओर,
चिनार की वो टहनियां
नोकदार, शीत -
निद्रा के
भंग होते ही उभर आते हैं अनगिनत
झिलमिलाते हुए, अवशिष्ट
तुषार कणिका, शायद
उन्हें है किसी
अलौकिक
पलों
का इंतज़ार, गुज़रे दिनों के सुखकर -
घरौंदों से उड़ चुके हैं, प्रवासी
पक्षियों के चूजे, तिनकों
में कहीं उलझे पड़े हैं
आत्मीय क्षणों
के उपहार,
सुबह
की नीमगर्म धूप में दिल चाहता है
पुनः पढ़ना तुम्हारी निगाहों में
प्रथम प्रणय की प्रतिश्रुति,
फूल खिले न खिले,
पत्ते हिले न
हिले, फिर
भी
इसी पल है अंतहीन बसंत, क्योंकि
मेरी ज़िन्दगी से तुम कभी दूर
गए ही नहीं, मुझ में घुल
कर, तुम हो चुके हो
मुद्दतों पहले ही
एकाकार,
हिमयुग का अंत हो न हो, बसंत
दिलों में रहे हमेशा
बरक़रार।
* *
- - शांतनु सान्याल    

 
 
 




रविवार, 21 फ़रवरी 2021

अंतःसलिला - -

मोह निद्रा सूखती नहीं, बहे जाती है,
सीने के बहुत नीचे, अंतःसलिला
की तरह, रेत के परतों पर
चाँदनी का रहता है
एकछत्र राज,
उन
स्रोतहीन पलों में जीवन चाहता है, -
अचानक, किसी सोते की तरह
फूट पड़ना, न कोई पूर्व
अनुमान, न कोई
आवाज़, रेत
के परतों
पर
चाँदनी का रहता है, एकछत्र राज।
मोह मूर्च्छना के लिए कहाँ
से लाएं विशल्यकरणी,
जो लौटा जाए
जीवन को,
विलुप्त  
जागृति, दे जाए जो देह से इतर कोई
सुखद परितृप्ति, जहाँ करता हो
परम सत्य विराज, रेत के
परतों पर चाँदनी का
रहता है, एकछत्र
राज।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

 

 




शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

अधरों के मृगजल - -

दूर तक देखा है लौट जाते हुए
मधुमास को, उड़ते पत्तों
के हमराह, बिंदु बिंदु
झरते हुए सभी
अनुराग को।
फिर भी
जीवन के अनुसंधान का नहीं
है कोई अंत, हर एक क़दम
पर है नव अभिज्ञता,
हर एक पल में
है एक नविन  
उपलब्धि,
हर एक मोड़ पर हैं उभरते हुए
पुष्प वृन्त, जीवन के सतत
अनुसंधान का नहीं है
कोई अंत। वृष्टि
और अनावृष्टि
के उस
अनसुलझे समीकरण में कहीं,
जीवन लिखे जाता है,
मुक्त छंदों की
कविता,
सभी
विसंगतियों को एक बिंदु पर
मिलाने का प्रयास, हर
सुबह एक निःशर्त
अनुबंध उजाले
के साथ,
हर
रात गाढ़ अंधकार से एक अंध
समझौता, टूटती बिखरती
गिरती संभलती बढ़े
जाए हर हाल में  
सांसों की
सरिता,
अनसुलझे समीकरण में कहीं,
जीवन लिखे जाता है,
मुक्त छंदों की
कविता।
हर
कोई तलाशता है सुनहरे फ्रेम में
ख़्वाबों की दुनिया, अधरों पर
चमकते हुए मृगजल की
बूंदें, सीने से उभरते
हुए सुरभित
स्पंदन,
पलकों के सभी नम प्रदेश ढक
जाते हैं शेष प्रहर के नील -
अंजन, देखता हूँ मैं
बड़ी उम्मीद से
भोर के उस
आकाश
को,
दूर तक देखा है लौट जाते हुए
मधुमास को - -

* *
- - शांतनु सान्याल

 

 
 








शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

स्व - परिक्रमा - -

प्रेम स्वीकृति चाहता है, अंदर की सत्ता का
चाहे वो जैसा भी हो, क्योंकि उस भीतर
की सुंदरता में ही रहता है, परम
सत्य का वास, बाह्य खोल
समय के साथ अपनी
मौलिकता खो
देता है, कर
जाता
है उजाड़ जीवन परिधि अधिकांश, भीतर -
की सुंदरता में ही रहता है, परम सत्य
का वास। शरीर के तत्व टूटते
रहते हैं, अदृश्य अवयवों
में, हम बांधते रहते
हैं, मन्नतों के
धागे,
कल्पतरु के नर्म टहनियों में, आरशीनगर
के हैं सभी निवासी, फिर भी पत्थरों
पर है अगाध विश्वास,  भीतर
की सुंदरता में ही रहता है,
परम सत्य का वास।
सब कुछ है
नश्वर,
फिर भी हम गढ़ते हैं चाँद रातों में असंख्य
सपनों के महल, कुछ ज्वार ढहा जाते
मध्य रात, कुछ देह से टकरा
कर लहरों में जाते हैं
घुल, खोजते हैं
हम एक
दूजे के धमनियों में, जिसे सुबह तक पाने
की रहती है आस, वो नहीं मिलता
उम्र भर, केवल कुछ मृत
सीपों के खोल बिखरे
होते हैं, चन्दन
पलंग के
आसपास, भीतर की सुंदरता में ही रहता -
है, परम सत्य का वास।

* *
- - शांतनु सान्याल


गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

अनल रेखा के उस पार - -

अदृश्य स्वर भिक्षां देहि, अगोचर रूप
दशासन, जीवन लाँघ जाए सभी
रेखाएं, प्रथम पंक्ति का वो
है प्यादा, उसका जीना
क्या और मरना
क्या, शून्य
जगत
के
वो बासिन्दे, अग्नि वलय चारों तरफ
उठता धुआं चहुँ दिशाएं, शून्य
विकल्प में जीवन लाँघ
जाए सभी रेखाएं।
पाप पुण्य का
तराज़ू लिए
बैठा
रहे अपनी जगह, प्रच्छन्न विचारक,
अस्तित्व बचाने के समर में
निःशस्त्र चरित्र लाँघ
जाए सभी वैध -
अवैध, दूर
या पास
की
सीमाएं, सही ग़लत का हिसाब रहे
अपनी जगह, उत्तरजीविता
के आगे बदल जाती
हैं, सभी धर्म -
अधर्म की
मानव
निर्मित परिभाषाएं, अदृश्य स्वर -
भिक्षां देहि, अगोचर रूप
दशासन, जीवन
लाँघ जाए
सभी
रेखाएं - - - -

* *
- - शांतनु सान्याल


 
   

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

C/O ( मार्फ़त )

भूमिगत जल स्रोत की गहराई किसे पता,
वक़्त छीन लेता है चेहरे का ठिकाना,
दस्तक भी धीरे धीरे हो जाते
हैं निःशब्द, किसी और
के मार्फ़त, ओंठों
पर रहता
है तब
मुस्कराहटों का आना जाना, वक़्त छीन
लेता है चेहरे का ठिकाना। अप्रेषित
ख़तों में कहीं रहती है धुंधली सी
याद की परछाई, जिसके
ठीक नीचे से हो कर
बहती है, कोई
शब्दों की
नदी !
अकसर हम तलाशते हैं, जिसके अंदर में
ज़िन्दगी का ख़ज़ाना, वक़्त छीन
लेता है चेहरे का ठिकाना।
दरअसल, कोई भी
नहीं निभाता
है अपना
वादा,
सिर्फ़ अदृश्य कच्चे धागों के मार्फ़त होता
है सामयिक इरादा, समय जिसे बना
जाता है एक दिन, खण्डहर कोई  
पुराना, वक़्त छीन लेता है
चेहरे का ठिकाना।
उलझे लटों
में हैं कुछ
चांदी
की लकीरें, झुर्रियों में कहीं खोजती है - -
ज़िन्दगी, गुज़रे दिनों की तस्वीरें,
इस रास्ते से हो कर, उस
गली के अंदर, बहोत
कुछ बदल
जाता
है, नाम की तख़्ती से उतर जाते हैं, धीरे
धीरे सभी अक्षर, C/O में कहीं
झूलता रहता है अस्थायी
आस्ताना, वक़्त
छीन लेता
है चेहरे
का
ठिकाना।
 
* *
- -  शांतनु सान्याल

 



मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

भव्य प्रदर्शन - -

अपनी मौजूदगी को हर हाल में दर्शाना
है ज़रूरी, भीतर से हम ख़ुश रहें या
न रहें, बाहर से ख़ुशी दिखाना
है ज़रूरी, पुरानी किताबों
की तरह कई रिश्ते
यूँ ही पड़े रहते
हैं शीशे के
ताक़ों में,
पढ़ें
या न पढ़ें, लेकिन जिल्द पे लिखे उनके
नाम बताना है ज़रूरी, भीतर से हम
ख़ुश रहें या न रहें, बाहर से
ख़ुशी दिखाना है ज़रूरी।
एक वजूद के अंदर न
जाने कितने वजूद
को सजा रखते
हैं लोग,
एक
अक्स उतार के, दूसरा बिम्ब उसी पल
उभार लेते हैं लोग, समझ में कुछ
आए या न आए, कोई बात
नहीं, हामी की ज़बां से,
सब कुछ, यूँ ही
समझाना है
ज़रूरी,
भीतर से हम ख़ुश रहें या न रहें, बाहर से
ख़ुशी दिखाना है ज़रूरी। मंदिर के
अंदर हो या मंदिर के बाहर बैठे
वो सभी कालग्रसित जीर्ण
चेहरों से, किसे क्या
लेना देना, बस
अपनी सभी
मन्नतों
का
वास्ता, नीलाभ कांच की खिड़कियों को
गिराए, घर से मंदिर तक अक्सर
आना जाना है ज़रूरी, भीतर
से हम ख़ुश रहें या न
रहें, बाहर से ख़ुशी
दिखाना है -
ज़रूरी।
कुछ
लोगों की नज़र पहुंचती है, दिलो दिमाग़
से कहीं आगे, अंदर के दलदल में
उतर कर कौन देखेगा, फ्रेम
में तस्वीर की दिव्यता
तो उभरे, लिहाज़ा
दाढ़ी के वन
को दूर
तक बढ़ाना है ज़रूरी, नीलाभ कांच की - -
खिड़कियों को गिराए, घर से मंदिर
तक अक्सर आना जाना है
ज़रूरी, अपनी मौजूदगी
को हर हाल में
दर्शाना है
ज़रूरी।

* *
- - शांतनु सान्याल

 

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

नव अभिज्ञान - -

उड़ चले हैं सुनहरी पंखों में कुछ सुखद
दिनों के पृष्ठ, स्मृतियों में कहीं
न कहीं, हम तुम अभी तक
हैं विद्यमान, कुछ
धुंधले दिन
कुछ
उजली रातें, ख़ामोश लम्हों के ढेर सारी
अनकही बातें, सुरमई शामों की
वो अधूरी मुलाक़ातें, श्वेत -
श्याम रंगों के कुछ
छुटमुट से वो
अभिमान,
स्मृतियों में कहीं न कहीं, हम तुम अभी
तक हैं विद्यमान। सागौन वन की
तरह, जीवन चक्र घूमता है
हरित तन से हो कर
पर्णविहीन पल
तक, दृश्यों
की वही,
पुनरावृति, बिहान से लेकर गोधूलि पलों
तक, यथारीति जीवन का अभियान,
स्मृतियों में कहीं न कहीं, हम
तुम अभी तक हैं पूर्ववत
विद्यमान। कहने
को बदलते
रहे हैं
मौसम के रंग, फिर भी जीवन झूलता है
उसी हिंडोले पर बार बार, कभी शून्य
से हम छूना चाहते हैं पृथ्वी को
और कभी ज़मीं से दिल
चाहता है छूना
नीलाभ
आसमान, स्मृतियों में कहीं न कहीं,- -
हम तुम अभी तक हैं, नए रूप में
विद्यमान, झरते पत्तों के
ठीक पीछे होते हैं नए
कोपलों के अदृश्य
अभिज्ञान।

* *
- - शांतनु सान्याल


 
 

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

सांसों के जिल्द - -

अंधकार को लहराती हुई
रात गुज़रती है, नंगे
पांव, सुनसान
रास्तों के
मोड़
पर पड़े रहते हैं छितरे हुए
कुछ अतीत के गांव,
भीगे हुए जिल्द
में बंद हैं कुछ
करवट
बदलते
हुए चेहरे, खिड़कियों के -
आड़ से उतरते हैं
कुछ ख़ुश्बुओं
के छांव,
मेघ
कण छू जाती हैं, कांपती
उँगलियों के किनार,
ज़रा सी ख़ुशी
की ख़ातिर
लगा
रहता है पूरी ज़िन्दगी का
दांव, कुछ लगाव होते
हैं समझ के बाहर,
छोड़ना चाहते
नहीं
पश्मीना के आवाज़ पर,
वो पड़े रहते हैं सीने से
से लग कर, उनकी
ख़ुशी है, विदीर्ण
कथरी के
अलाव।

* *
- - शांतनु सान्याल    





शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

आकाश पार कहीं - -

सूर्यमुखी सपनों को रहने दो ऊर्ध्वमुख,
नीलाकाश अभी तक सूखा नहीं,
संभावनाओं से है भरा, तुम
छू लो मुझे, फिर उसी
अभिलाष से, कि
मुद्दतों से है
तृषित,
हिय की मरुधरा, उभरने दो किशलय
प्रणय को नर्म माटी से ज़रा ज़रा।
ये सच कि हर एक ख़्वाब की
ता'बीर नहीं होती, फिर
भी तेरी आँखों की
गहराइयों में,
ज़िन्दगी
डूब
के तलाशता है अक्षय प्रेम की विलुप्त
मणि, ये खोज है, कई जन्मों से
कहीं अधिक गहरा, उभरने
दो गुमशुदा इश्क़ को
गहन समुद्र तल
से ज़रा ज़रा।
सभी शै
को है, एक दिन धूसर धुंध में खो जाना,
उस कोहरे के देश में भी, मुझे सिर्फ़
तुझ से है मिलना, तुझ से मिल
के तुझी में ही है खो जाना,
उस आकाशगंगा के
तट पर इक बूंद
की तरह मैं
रहूँगा
तेरी हथेलियों में, निःशब्द ठहरा, - -
उभरने दो विलीन रौशनी को
विस्तृत आकाश पार से
से ज़रा ज़रा।

* *
- - शांतनु सान्याल   

 
 

 

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

अविरल बहाव - -

सारी रात अरण्य जागता
रहा, सो गई नदी, सो
गया सुदूर तलहटी
का गांव, कुछ
जुगनुओं
की
बस्ती यूँ ही जलती बुझती
रही, तुम आते जाते
रहे, सांसों को, न
मिल सका, पल
भर का भी
ठहराव,
दूर
बहोत दूर, नील आलोक
में भीगती रहीं तुम्हारी
पलकें, गिरती रही
मद्धम, मद्धम,
मेरे प्यार
की
शबनम, जीवन यूँ ही - -
समेटता रहा बेख़ुदी
का बूंद, बूंद
बिखराव,
कुछ
सरसराहट, कुछ जिस्म -
को छूती हुई गिरते
पत्तों की आहट,
कुछ सुप्त
तरंगों
में
चाँदनी की दस्तक, फिर -
हम जी उठे हैं, करवट
बदलती नदी की
तरह, फिर
अज्ञात
किनारों की तरफ बह चले
हैं दीर्घ निःश्वासों के
अविरल बहाव।

* *
- - शांतनु सान्याल




 

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

पारदर्शी द्रव्य - -

लेन देन की दुनिया में, कुछ
भी निःशर्त नहीं होता,
हर एक चमकदार
प्याले का
द्रव्य
अमृत नहीं होता, इस चौक
से हो कर गुज़रते हैं
चार दिशाओं के
रस्ते, इन
रास्तों
से गुज़रे बिना कोई भी निवृत
नहीं होता, उस नील पर्वत
के शीर्ष में, जलती है
कोई अखंड बाती,
अंतरतम में
पहुंचे
बग़ैर ह्रदय दर्पण जागृत नहीं
होता, प्रीत के धागे बना
जाते हैं, हिंस्र को भी
गृहपालित प्राणी,
दरअसल,
यहाँ
कोई किसी का यूँ ही आश्रित
नहीं होता, अनुरागी स्रोत
नहीं रुकते, बहे जाते
हैं ढलानों की
ओर, वृद्ध
चेहरा
अपने ही घर में, अकारण यूँ
ही निर्वासित नहीं
होता।

* *
- - शांतनु सान्याल

   
 
 

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

देह से लिपटे बेल - -

उजालों में लोग पढ़ते हैं दूसरों के
आविष्कार, अंदर की कहानियों
को उघाड़ता है अन्धकार,
मुख़बिर की तरह
पीछा करती हैं
परछाइयां,
और हम
भागते हैं, माया के पीछे लगातार,
लम्बे, रहस्यमय पथ का हूँ,
एकाकी पथिक, मुझे
हर हाल में पहुंचना
है, अपने घर
द्वार,
इस खोह के अंदर हैं अदृश्य अनेक
रोशनदान, कौन किसे छलेगा,
अंतरतम की आँखें हज़ार,
देह से उठ कर सभी
चाहत हैं, धुएं के
बादल,
हर एक गिरेबां पे है, उसकी नज़र
बारम्बार, किसने देखा है,
दिव्य अदालत की
सीढ़ियां, सब
कुछ है
खुला हुआ, यहीं है न्याय का दरबार,
उस गुप्त प्रणय पाश में हैं कोई
अदृश्य कांटा, उतना ही
धंसता जाए जितना
निकालें हर बार,
सभी हो जाएं
बंदी, देह
से लिपटे जब मायावी बेल, उतर - -
जाए सब गेरुआपन, जब छू
जाए सिक्त
किनार।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

 
 
 
 




 

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

प्रतीक्षारत बसंत - -

न रोक मुझे, इन मोह के जालों
में, धुंधलकों में कहीं है वो
गंतव्य बिंदु, जिसे
अक्सर देखा
किया
ख़्यालों में, पंक्तिबद्ध हैं रखे - -
हुए सप्तरंगी प्याले,
किसे ख़बर क्या
रखा है इन
प्यालों में,
कुछ
व्यथा बने विषहर समय के संग,
कुछ सुख उलझे रहे अकारण
सवालों में, रात गुज़रती
है जब, उन आँखों
से हो कर, सुकूं
मिलता है
रूह को
तब सुबह के उजालों  में, अदृश्य
छाया सा ढक लेता है
देह मेरा, कोई
जज़्ब किए
जाता है
लम्हा
लम्हा मेरा वजूद, टुकड़े टुकड़े - -
अंतरालों में, कभी जीवन
तेरे आंच में है, जलता
हुआ शलभ, कभी
तू लगे ठहरा
हुआ इक
बसंत
वक़्त के अस्थिर डालों में, - - -
धुंधलकों में कहीं है वो
गंतव्य बिंदु, जिसे
अक्सर देखा
किया
ख़्यालों में।

* *
- - शांतनु सान्याल

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

सफ़र का अंतिम बिंदु - -

इस अंध यात्रा का कोई अंत नहीं, कोई
स्पर्श है, जो अपनी तरफ खींचे
लिए जाता है, वो निःस्वार्थ
लगाव है या स्पृहा,
जितना ऊपर
हम आना
चाहें,
उतना ही वो नीचे लिए जाता है। कोई
दहलीज़ पर खड़ा है, या उजालों
की है दस्तक, मैं खोलना
चाहता हूँ, सुबह का
बंद दरवाज़ा
लेकिन
कोई
सम्मोहन मुझे बहुत पीछे लिए जाता है,
कोई स्पर्श है, जो अपनी तरफ खींचे
लिए जाता है। मुझे पता है, इस
जीवन की त्रिकोणमिति,
हिसाब - किताब से
कभी हल
नहीं
होगी आपबीती, मुझे नहीं बनना किसी
का कोई अनुकंपित पात्र, फिर भी
न जाने क्यों मुझे, वो अपने
सीने में भींचे लिए
जाता है, कोई
सम्मोहन
मुझे
बहुत पीछे लिए जाता है। इस सफ़र का
अंतिम स्टेशन, कोई आलोकमय
महानगर है, या कुहासे में
डूबा कोई अज्ञात
समुद्र तट,
किसी
को
कुछ भी नहीं पता, जितनी मुंह, उतनी
बातें, वही चबूतरा नीम तले, वही
अख़बारों का पनघट, हर
कोई मुझे अपने
अपने दरीचे
लिए
जाता है, मुझे नहीं चाहिए दिखावे का -
अपनापन, फिर भी न जाने क्यों
मुझे, वो अपने सीने में भींचे
लिए जाता है - -

* *
- - शांतनु सान्याल    
 


 


रविवार, 7 फ़रवरी 2021

कगार विहीन नदी - -


किसे दिखाओगे दिल के शब्दकोश
हर शख़्स समझदार नहीं
होता, हदे नज़र है
धुंध की चादर,
हर क़न्दील
वाला
मददगार नहीं होता, वक़्त मिटा
जाता है सभी दस्तख़त,
बेमक़्दार से हैं सभी
समझौते, समंदर
ओ चाँद के
बीच का
क़रारनामा, बहुधा असरदार नहीं
होता, ज़माने का चलन है,
मौसम की तरह
अचानक रूप
बदल के
आना,
सभी हैं, खड़े दरख़्त के पैरोकार, -
कोई झुके पेड़ का तरफ़दार
नहीं होता, इस फ़रेब
के बाज़ार में,
किस
जायज़, नाजायज़ की बात करते
हो, लोग वहीं ले जा के
डुबोते हैं, जहाँ ज़रा
भी डूबने का
आसार
नहीं होता, ये रस्मे ख़ुलूस की बातें,
सुनहरी हरफ़ों में हैं दर्ज, किताब
के पन्नों में, दरअसल,
बेमतलब ही हर
मिलने वाला,
यूँ ही
ख़ुशगवार नहीं होता, तुम्हारे और -
मेरे दरमियां, बहती है इक
नदी, जो दिखाई नहीं
देती, डूबना या
उभरना है
अपनी
जगह, नेह नदी का कोई भी कगार
नहीं होता, किसे दिखाओगे
दिल के शब्दकोश हर
शख़्स समझदार
नहीं होता। 


* *
- - शांतनु सान्याल
 



शनिवार, 6 फ़रवरी 2021

आज़ादशुदा रूह - -

वो कोई फ़रिश्ता न था, इन्सां
का मुकर जाना है लाज़िम,
शाख़ फिर लद जाएंगे,
गुलों का बिखर
जाना है
लाज़िम,
सूरत के साथ सीरत भी हो, -
उतना ही रौशन ज़रूरी
नहीं, जब ढल जाए
उम्र की धूप,
कोने में
ठहर जाना है लाज़िम, यूँ - -
तो ज़िन्दगी भर
भटकता रहा
है वो
अख़लाख़ी शहर में, लम्बी - -
हिजरत के बाद लौट
के अपने घर
जाना है
लाज़िम,
उस
ता'वीज़ के अंदर थे, न जाने
कितने श्लोक और
आयत, नियत
बांध के भी,
कुछ
असूलों से सिहर जाना है - -
लाज़िम, वो ख़ानाबदोश
है कई जन्मों से,
उसे क़ैद
करना
नहीं
आसां, पिंजरे में बंद करते ही
उसका, निःशब्द मर
जाना है लाज़िम।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

सदियों की तिश्नगी - -

उस मरूद्वीप में जा कर, बुझ
न सकी बरसों की तिश्नगी,
नमकीन झीलों को
छू कर, बारहा
लौट आई
ज़िन्दगी,
यहाँ हर चीज़ है दस्तयाब, - -
कहने को है पत्थरों का
शहर, हर सिम्त
हैं इबादतगाह,
फिर भी
अधूरी रहती है बंदगी, चाँदनी
की लहर गुम है, कहीं
ऊंची मंज़िलों के
ओट में,
हथेलियों से उड़ गए जुगनू,- -
बाक़ी हैं एहसासों की
ख़ुशी, झूलते हैं
शबनमी
ख़्वाब,
कटी पतंगों की कंटीली डोर से,
बहुत मुश्किल है समझना,
मुहाजिर परिंदों की
आवारगी,
कितनी
ख़ूबसूरती से लोग, निबाह जाते
हैं जाली रिश्ता, अंदर हैं
ज़हर बुझे तीर,
आँखों में
है इक
बला की सादगी, उस मरूद्वीप में
जा कर, बुझ न सकी बरसों
की तिश्नगी।

* *
- - शांतनु सान्याल
   
 

 




गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

ये शेष वसंत नहीं - -

कुछ अबीर गुलाल अभी तक हैं
मेरे एहसासों में, इक
वासंती स्पर्श
उभरती है,
प्रायः
मेरी सांसों में, इस राह से गुज़रे
हैं, न जाने कितने ही मधुमास,
कुछ आज भी हैं खड़े
एकाकी, मोहक
आभासों में,
महुआ -
पलाश अरण्य के पार उस सूखी
नदी में, अनेक सजल स्रोत
हैं दफ़न उन रेत के
प्रासादों में,
पृष्ठों
का पलटना है अशेष, ये कोई
शेष वसंत नहीं, मोम
पिघल कर धुआं
हुआ, ज्योत
रही  मेरी
यादों
में, पृथ्वी, आकाश, अंतरिक्ष
सभी हो जाएं चिर विलीन,
फिर भी ज़िन्दगी
उभरती है
पुनः
फूल भरे शाख़ों में, क्षितिज
पार कहीं ठहरा हुआ है
कोई देवदूत -
उजाला,
जाने
कौन रात ढले रख गया - - -
मरहम, दर्द के
सुराख़ों
में।

* *
- - शांतनु सान्याल  

 

 
 

 

बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

कुम्हार का फ़लसफ़ा - -

उस अदृश्य कुम्हार के दिल में,
जाने क्या था फ़लसफ़ा,
चाहतों के खिलौने
टूटते रहे,
सजाया
उन्हें
जितनी दफ़ा, वो दोपहर की - -
धूप थी कोई मुंडेरों से
जाने कब उतर
गई, बेवजह
ही
तितलियों के रेशमी लम्स - - -
सीने से लगाए रखा,
कोई नजूमी था,
आधी रात,
देता
रहा ख़्वाबों को दस्तक, कच्चे
घड़े की हिसाबदारी कौन
करे, नुक़्सां हो या
नफ़अ, वक़्त
के सलीब
से
उतरा हूँ कई बार यूँ हैरत से न -
देखिए, अनगिनत हबीब
हैं मेरे जो आस्तीं में
रह कर देते
रहे दग़ा,
रंगमंच वही है प्रस्तरयुगीन, बस
मंज़र बदल जाते हैं, इन
चमकती हुई रंगीन
रौशनी में कौन
पराया कौन
सगा, उस
अदृश्य
कुम्हार के दिल में, जाने क्या था
फ़लसफ़ा।

* *
- - शांतनु सान्याल

 

 











मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

ठहरे हुए पल - -

दो चाय की प्यालियां रखी
हैं मेज़ के दो किनारे,
पड़ी सी है बेसुध
कोई मरू
नदी
दरमियां हमारे, तुम्हारे -
ओंठों पे आ कर
रुक जाती हैं
मृगतृष्णा,
पलकों
के आसपास बिखर जाते
हों जैसे सितारे, मैं
ख़लाओं में
तलाशता
हूँ
शब्दों के बिखरे कण, तुम
निःशब्द चले आ
रहे हो मेरी रूह
के किनारे,
बढ़ती
हुई उंगलियों में है कहीं - -
एक हिचकिचाहट,
मुद्दतों के बाद
जी उठे हैं,
सभी
हिमनद के धारे, दूर
वादियों में कहीं,
चिमनी से
उठ रहा
है
धुआं, फिर मैं बढ़ चला
हूँ तुम्हारे सिम्त
ख़्वाब के
सहारे,
कई
शताब्दियों से ठहरा हुआ
हूँ, उसी एक बिंदु पे,
जिस सीप के
सीने पर
दो बूंद
अश्रु
गिरे थे तुम्हारे।

* *
- - शांतनु सान्याल


 


 

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

निर्वासित सच - -

विवस्त्र खड़ा रहता है तारों से
भरे आकाश के नीचे, वो
सच जो निर्वासित है,
अपने ही घर में,
कुछ अतीत
के पृष्ठ
समाप्ति की तारीख़ पार कर
गए, बिखरे पड़े हैं, कई
स्मृति पंख पुरातन
शहर में, इस
रात के
सीने में उभरते हैं, असंख्य - -
नग्न परछाइयां, बुझा
दिए जाते हैं, कितने
ही शमा अंतिम
पहर में,
अनुच्चारित शब्द, अवशिष्ट
मोम की तरह पड़ा रहता
है मेज पर, दूर तक
कोई नहीं होता
छायापथ की
डगर में,
चाँदनी का कफ़न ओढ़े सो - -
जाती हैं, धूसर सच्चाइयां,
सिर्फ़ जागे होते हैं
रंगीन ख़्वाब,
कोहरे से
ढके
रहगुज़र में, न जाने कितनी बार,
यूँ ही मर के जी उठा है
जिस्म मेरा, कहने
को दिखता हूँ,
बहुत ही
ख़ूबसूरत महफ़िल की नज़र में,
वो सच जो निर्वासित है,
अपने ही घर में।

* *
- - शांतनु सान्याल


 

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past