रविवार, 21 फ़रवरी 2021

अंतःसलिला - -

मोह निद्रा सूखती नहीं, बहे जाती है,
सीने के बहुत नीचे, अंतःसलिला
की तरह, रेत के परतों पर
चाँदनी का रहता है
एकछत्र राज,
उन
स्रोतहीन पलों में जीवन चाहता है, -
अचानक, किसी सोते की तरह
फूट पड़ना, न कोई पूर्व
अनुमान, न कोई
आवाज़, रेत
के परतों
पर
चाँदनी का रहता है, एकछत्र राज।
मोह मूर्च्छना के लिए कहाँ
से लाएं विशल्यकरणी,
जो लौटा जाए
जीवन को,
विलुप्त  
जागृति, दे जाए जो देह से इतर कोई
सुखद परितृप्ति, जहाँ करता हो
परम सत्य विराज, रेत के
परतों पर चाँदनी का
रहता है, एकछत्र
राज।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

 

 




14 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (22-02-2021) को "शीतल झरना झरे प्रीत का"   (चर्चा अंक- 3985)    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
     आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 21 फरवरी 2021 को साझा की गई है.........  "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. मोह ऐसा ही होता है । शाश्वत प्रेम की चाह कहती सुंदर रचना

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  4. मोह निद्रा सूखती नहीं, बहे जाती है,
    सीने के बहुत नीचे..वाह! सराहना से परे सर काफ़ी बार पढ़ी यह रचना बस पढ़ती ही रही।
    लाजवाब दर्शन।
    सादर

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  5. मोह निद्रा सूखती नहीं, बहे जाती है,
    सीने के बहुत नीचे, अंतःसलिला
    की तरह, रेत के परतों पर
    चाँदनी का रहता है
    एकछत्र राज,------- बहुत बहुत सुन्दर

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