मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

ख़ामोशी - -

सरे बज़्म में हम, बहुत अकेले से -
रह गए, अनकहे लफ्ज़, ओठों
पे कांपते से रह गए, गहरे
भंवरजाल में था कहीं,
उसका पता,
ताउम्र
मिलने की चाह में, खड़े से रह गए,
न जाने कितने मुसाफ़िर गुज़रे
हैं यहाँ से, बुर्ज़ फ़ानूस की
तरह, हम देखते से
रह गए, यूँ तो
ज़माने
का रुख़, तूफ़ां से कम न था, ता'जुब
है चिराग़े दिल, जलते से रह गए,
हमारे तरकश में भी, तीरों
की कमी न थी, चौखट
में आ कर क़दम
निकलते
से रह गए, चौराहे का शाही तमाशा,
हमें कभी मंज़ूर न था, तमाशाई
की तरह, ख़ामोश चीखते
से रह गए, आज हो
या कल, हर
युग में
रहेंगे ये बहुरूपी, अनबूझ से हैं
रौशन फ़िक्र, सुलगते
से रह
गए।

* *
- - शांतनु सान्याल
 


 







16 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (24-02-2021) को     "नयन बहुत मतवाले हैं"  (चर्चा अंक-3987)    पर भी होगी। 
    --   
    मित्रों! कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं हो भी नहीं रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  2. चौराहे का शाही तमाशा,
    हमें कभी मंज़ूर न था, तमाशाई
    की तरह, ख़ामोश चीखते
    से रह गए, आज हो
    या कल, हर
    युग में
    रहेंगे ये बहुरूपी, अनबूझ से हैं रौशन
    फ़िक्र, सुलगते
    से रह
    गए।..बहुत खूब..सच में कभी-कभी न चाहते हुए भी हमें चुप रह जाना पड़ता है..

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  3. ज़माने
    का रुख़, तूफ़ां से कम न था, ता'जुब
    है चिराग़े दिल, जलते से रह गए,
    हमारे तरकश में भी, तीरों
    की कमी न थी, चौखट
    में आ कर क़दम
    निकलते
    से रह गए ।
    खूबसूरत ग़ज़ल

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  4. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 23 फरवरी 2021 को साझा की गई है.........  "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. यूँ तो ज़माने का रुख़ तूफ़ां से कम न था,
    ता'जुब है चिराग़े दिल, जलते से रह गए,
    निशब्द करता है आपका प्रभावी लेखन |शांतनु जी | हर भाषा पर आपका अधिकार और कल्पनाशीलता की असीम सीमायें मन में विस्मय भरती है |सादर शुभकामनाएं|

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  6. चौराहे का शाही तमाशा,
    हमें कभी मंज़ूर न था, तमाशाई
    की तरह, ख़ामोश चीखते
    से रह गए
    ख़ामोशी की भी अपनी चीख होती है -सच कहा है आपने ,.

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  7. गहन भावनाओं को चित्रण करती सुंदर रचना

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  8. , यूँ तो
    ज़माने
    का रुख़, तूफ़ां से कम न था, ता'जुब
    है चिराग़े दिल, जलते से रह गए, बेहद खूबसूरत रचना 👌

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