27 फ़रवरी, 2024

अदृश्य कारागृह - -

खुले पिंजरे की अपनी अलग है मुग्धता,

मोह का पंछी चाह कर भी उड़ना
नहीं चाहता, स्पृहा प्रणय न
जाने क्या है उस अदृश्य
कारागृह के चुम्बक
में, ठहरा हुआ
एक अरण्य
स्रोत है
जो
अपनी जगह से बहना नहीं चाहता, मोह
का पंछी चाह कर भी उड़ना नहीं
चाहता । विस्तृत नीलाकाश
अक्सर फेंकता रहता है
इंद्रधनुषी फंदे, दिन
और रात के मध्य
घूमता रहता
है सपनों
का
बायस्कोप, सुदूर नदी पार सुलगता सा दिखे
है पलाश वन, मद्धम मद्धम रौशनी लिए
सिहरित से हैं अधरों के दीए, कोई
दे रहा है नाज़ुक उंगलियों से
दस्तक, एक मौन आवाज़
खींच लेता है अपने
बहुत अंदर, प्राण
उसे छोड़ कर
किसी
और
से हर हाल में जुड़ना नहीं चाहता, मोह
का पंछी चाह कर भी उड़ना
नहीं चाहता ।
- - शांतनु सान्याल

23 फ़रवरी, 2024

उतार की ओर - -

निकहत ए इश्क़ नहीं मिलता रौनक ए बाज़ार में,

बह जाते हैं सभी काग़ज़ी सफ़ीने उम्र के उतार में,

दिल के कोने में पोशीदा रहता है नाज़ुक एहसास, हल्की सी लकीर होती है दरमियाँ जीत ओ हार में,

वो ख़्वाब जहाँ मिलते हैं मुख़्तलिफ़ दिलों के रिश्ते,
डूब जाते हैं सभी चेहरे धुंध भरे सुबह के किनार में,

ये वादा कि हर किसी को मिले कुछ वाजिब हिस्सा,
गुम से हैं सभी, कैफ़ ए आज़ादी अब इस संसार में,
- - शांतनु सान्याल 

21 फ़रवरी, 2024

तराई और पहाड़ के मध्य - -

जीर्ण धार लिए बह रही है अरण्य नदी,
तराई और पहाड़ के मध्य है कहीं
इक मृत घाटियों का संसार,
बिखरे पड़े हैं अस्थियां
दूर दूर तक, सघन
जंगल के मध्य
जारी है मृगों
का  करुण
चीत्कार,
चिर
परिचित पुरातन मुखौटों का संस्कार, -
तराई और पहाड़ के मध्य है कहीं
इक मृत घाटियों का संसार।
अभयारण्य का बोर्ड है
अपनी जगह, लोग
देखते हैं नंगी
आँखों से
अँधेरे
में
रोमांचक दृश्यावली, स्वयं को घेर रखा
है कंटीले बाड़ से, सब कुछ देख कर
भी, कुछ भी नहीं देखते हैं हम
खिड़कियों के आड़ से,
इक अंध परिधि
के मध्य हम
अक्सर
बन
जाते हैं कृत्रिम मूक बधिर, तब समाज
की परिभाषा बदल जाती है पल भर
में, हम परम सुखी होते हैं अपने
घर में, शुतुरमुर्ग की तरह
एक न एक दिन हम
भी हो जाते हैं हिंस्र
शिकार, तमाम
कोशिशें तब
होती हैं
बेकार, तराई और पहाड़ के मध्य है कहीं
इक मृत घाटियों का संसार।   
- शांतनु सान्याल  

 


11 फ़रवरी, 2024

बहुत कुछ है बाक़ी - -

चश्म ए मयख़ाना के अलावा भी इक जहाँ है बाक़ी,

सारा शहर जल चुका ताहम दिले आशियां है बाक़ी,


इक अजीब सा जुनून है, अनदेखे हुए मसीहाई का,

जिस्म तो राख हुआ सिर्फ़ स्याह परछाइयां है बाक़ी,


यूँ तो वादा था कि हर चौखट पर होंगे चिराग़ रौशन,

अब और दुआ न दे बस कुछ सांसें दरमियां हैं बाक़ी,


न जाने कौन है, जो कांपते हाथों से दे रहा है दस्तक,

सर्द रात का सफ़र है कहने को कुछ घड़ियां हैं बाक़ी,


मुख़्तसर ज़िन्दगी में, अफ़सानों की कोई कमी न थी,

ख़ामोश पलों के बेशुमार अनकही कहानियां हैं बाक़ी,

- - शांतनु सान्याल


04 फ़रवरी, 2024

अशेष रात्रि - -

साँझ से पहले झील का सौंदर्य रहता है शीर्ष पर,

ठंडी हवाएं देती हैं ग्रीष्म में भी शिशिर का
आभास, उड़ते पत्तों के मध्य बहुत
समीप रहता है सुदूर का धूसर
आकाश, सूर्यास्त सब कुछ
बदल देता है, रात के
गहराते ही जाग
उठती है सुप्त
मृगया की
प्यास,
सुबह के उजाले में उभर आते हैं हिंस्र पद चिन्ह !
लहूलुहान किनार, जनअरण्य में खो जाते हैं
विगत रात के सभी चीख पुकार, कुछ
गल्प खो जाते हैं अंध गलियों में जा
कर, कुछ स्वप्न मर जाते हैं ओढ़
कर अदृश्य अंधकार, मृत
उड़ान पुल सहसा हो
उठता है जीवित,
अपनी जगह
कभी नहीं
रुकती
वक़्त
की रफ़्तार, मृग हो या मानव कोई फ़र्क़ नहीं - -
पड़ता, मुड़ कर देखने का किसे है अवकाश,
रात के गहराते ही जाग उठती है सुप्त
मृगया की प्यास ।
- - शांतनु सान्याल



कहीं गुम है ज़िन्दगी - -

हालांकि हम बढ़ चले हैं नए
दिगंत की ओर, फिर भी
कहीं न कहीं, हम हैं
बहुत एकाकी,
अंदर तक
लिए
शून्यता तकते हैं नीलाकाश,
और प्रदर्शित करते हैं,
छद्म, आत्म -
विभोर।
दरअसल, सीमाहीन हैं सभी
अभिलाषित सूची,आईने
और चेहरे के बीच
कहीं गुम है
ज़िन्दगी,
और
अजनबी सी सुबह खड़ी है - -
कहीं आख़री छोर।

* *
-  शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.in/

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