शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

ज़मीन का टुकड़ा - -

ठहाकों के नीचे हैं दफ़न अनगिनत
आहों के खंडहर, ज़रा सी खुदाई
न खोल जाए कहीं, राज़
ए पलस्तर। सीलन -
भरी रातों का
हिसाब
मांगती है ये ज़िन्दगी, टपकते हुए
छत को जवाब देते रहे ख़ाली
कनस्तर। ताउम्र घूमते
रहे पवनचक्की की
तरह अपने
आप,
ज़रा क्या रुके हम, लोग फेंकने
लगे ज़हर बुझे नश्तर। इक
अजीब कश्मकश से,
दो चार है वजूद
ए चिराग़,
सीने
में लिए हज़ार सिहरन जलता -
रहा कोई रातभर। सिरहाने
मेरे रात ढले, कौन
रख गया मीठी
सी छुअन,
ख़्वाहिश
ए जीस्त को जैसे मिल जाए - -
दुआ ए अस्तर। जाने
क्या क्या नहीं
करते हैं हम
पुरसुकूं
नींद
के वास्ते, आख़िर में वही - - -
आयताकार ज़मीं
होती है अपनी
बिस्तर।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
 


गुरुवार, 22 जुलाई 2021

दूरबीनी नज़र - -

ये हथेलियों की है ज्यामिति
इसे समझना आसां
नहीं, चाहता है
दिल बहुत
कुछ,
कहने को बाक़ी अरमां नहीं।
लब ए बाम पर, कई
चिराग़ ए शाम
लोग जलाए
बैठे हैं,
रंगीन बुलबुलों का है मंज़र
ये उजला कोई आसमां
नहीं। जी चाहे किसी
भी नाम से
पुकारो,
बहता हुआ दरिया हूँ, ज़ब्त
करना मुझे आता है
यूँ तो कोई मेरा
निगह्बां
नहीं।
क़ौमियत का मोहर जो -
भी हो, परिंदों का
मज़हब है एक,
इस आलम

आवारगी के लिए कोई
ख़ास कारवां नहीं।
सोचो तो सारी
दुनिया है
घर
अपना वरना कुछ भी नहीं,
कोई भी नहीं मुबारक
सौ फ़ीसद, आज
हैं, कल यहाँ
नहीं।
इस भीड़ भरे भूल भुलैया में
न पा सकोगे गुमशुदा
मोती, दूरबीन से
लगते हैं सभी
बहुत
नज़दीक, ये दिल की ज़मीं है
यहाँ मुझसा कोई
तनहा नहीं।

* *
- - शांतनु सान्याल  
 
 






बुधवार, 21 जुलाई 2021

बैठक - ख़ाने का समंदर - -

न जाने कितने हैं लहर, शून्य के अंदर,
शायद तुमने देखा है दूर से सिर्फ
नीले कांच का समंदर, प्राण
विहीन शंख - सीप पड़े
रहते हैं साहिल ए
निजात पर,
लौटती
नहीं
है दिल की आवाज़, सुदूर बातीघर से
टकरा कर, शायद तुमने देखा है
दूर से सिर्फ नीले कांच का
समंदर। रहती है सभी
को, एक निरापद
आश्रय की
तलाश
ये और बात है कि हर एक ज़िन्दगी
को नहीं मिलता यहाँ एक रात
का निवास, लौट जाते हैं
सभी पखेरू अपने
नीड़ की ओर,
थम जाती
है रेल
पटरियों की झनझनाहट दूरगामी
ट्रेन जाने के बाद, रात के
साए में उठते हैं निर्वासन
के बवंडर, पनाह के
एवज में लोग
लूट लेते
हैं सब
कुछ, बिखरा होता है अवशोषित -
अस्तित्व शेष प्रहर, शून्यता
के सिवा कुछ नहीं होता
है तब अंदर बाहर,
न जाने कितने
हैं लहर,
शून्य के अंदर,शायद तुमने देखा
है दूर से सिर्फ नीले कांच का
समंदर, संभवतः कोई
रंगीन सपनों का
मछली -
घर।

* *
- - शांतनु सान्याल  





मंगलवार, 20 जुलाई 2021

अब कुछ भी याद नहीं - -

वो उजली रात का समा, वो
ख़मोशी की ज़बां अब
याद नहीं, किस
मोड़ से उठा
था, वो
मद्धम, संदली धुंआ अब याद
नहीं। वो आख़री पहर था
या उरूज़े बज़्म का
आग़ाज़ कुछ
पता नहीं,
किस
मोड़ से आई थी ज़िन्दगी की
सदा वो मकां अब याद
नहीं।  सच है की उन
भीगे हुए लम्हों
ने बुझाई
थी इक
उम्र
की प्यास, कई बार की है -
ख़ुदकुशी लेकिन वो
मौत का कुंआ
अब याद
नहीं।
हज़ार बार गुज़रा हूँ मैं उसी
आतिशे दश्त से हो कर
*आब्ला - पा, हर
सिम्त थी
पुरअसरार
चुप्पी,
तबस्सुम का निशां अब याद
नहीं, वो उजली रात का
समा, वो ख़मोशी
की ज़बां अब
याद नहीं।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
 * छालेवाले पांव
 

सोमवार, 19 जुलाई 2021

मदारी का खेल - -

जब कोई उम्मीद नहीं किसी से,
मिलने बिछुड़ने का सवाल
कैसा, सभी रिश्तों में हैं
धुंधलापन गहरा,
बिखरने पर
इतना
बवाल कैसा। वो सभी जज़्बात
थे आब रंगी, एक शक़्ल
हुए बरसात से
मिलकर,
मक़ाम
ए इंतहा सभी का जब एक है,
फिर मुख़्तलिफ़ ख़्याल
कैसा।  कोहरे का
सफ़र आसां
नहीं
शरीके मुसाफ़िर बनने से क़ब्ल
सोच लो, ये सीढ़ियां उतरती
हैं सोच से गहरी फिर
न कहना कि
भूचाल
कैसा।
ये सड़क गुज़रती है ज़िन्दगी से
लम्बे सुरंगों से होकर सिफ़र
के सिम्त, मंज़िल का
पता कोई नहीं
जानता,
सब
मदारी का खेल है इंद्रजाल कैसा।

* *
- - शांतनु सान्याल 

रविवार, 18 जुलाई 2021

प्रतिबिंबित वर्णमाला - -

कुछ स्मृतियां बसती हैं वीरान रेलवे
स्टेशन में, गहन निस्तब्धता के
बीच, कुछ निरीह स्वप्न
नहीं छू पाते सुबह
की पहली
किरण,
बहुत कुछ रहता है असमाप्त इस -
जीवन में, कुछ स्मृतियां बसती
हैं वीरान रेलवे स्टेशन में।
कुछ उम्मीद बिखर
जाते हैं निद्रा -
विहीन
नयन कोर से, सूखी अरण्य लताएं
बंधे होते हैं फिर भी अदृश्य
किसी सिक्त डोर से,
जीने की अदम्य
आस होती
है इस
अप्रत्याशित आरोहण में, बहुत कुछ
रहता है असमाप्त इस जीवन
में। कुछ जीवन वृत्ति
जन्म से ही होते
हैं प्रकृत रूप
से जुझारू,
हर हाल
में तलाश लेते हैं रास्ता अपना, वो
लिख जाते हैं प्रतिबिंबित
वर्णमाला समय के
दर्पण में, कुछ
स्मृतियां
बसती
हैं वीरान रेलवे स्टेशन में।

* *
- - शांतनु सान्याल


शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

बूंदों के हमराह - -

अकस्मात सभी मेघ अदृश्य हो गए,
उजली धूप दूर तक है बिखरी
हुई, उड़ चला है नील -
पंछी अनजान
दिगंत की
ओर,
स्मृति के अहाते पड़े हुए हैं सुख के
कुछ बूंद, कुछ अपरिभाषित
सजलता, पारदर्शी
खिड़कियों के
उस पार हैं
बहुत
कुछ, मसृण सतह पर वक़्त कभी
नहीं ठहरता। हथेलियों में
कहाँ रुकता है जल -
प्रपात, स्वप्निल
दुर्ग में हैं बंद
सभी अर्ध
सत्य,
कंगूरों के बीच से झांकता है धुंध -
भरा प्रभात, हमारे दरमियां
बहुत कुछ हो कर भी,
कुछ भी नहीं होता,
कई बार उभरा
हूँ मैं डूब
कर,
कई बार लौट आए मेरे हाथ गहन
शून्यता के साथ, फिर भी
ज़िन्दगी ढूंढती है वही
गुमशुदा बरसात
की रात, ये
और
बात है कि हथेलियों में नहीं रुकते
हैं जलप्रपात।
* *
- - शांतनु सान्याल

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

अंधानुकरण - -

अद्भुत है दुनिया का चलन, उध्वस्त
घरों में सत्पुरुष गुज़ारे है अपना
जीवन, कलंकित नायकों
को यहाँ मिलता हैं
राजत्व का
सिंहासन,
अद्भुत
है दुनिया का चलन। अट्टालिकाओं
के नीचे ही बसते हैं सामयिक
अनेक संसार, वही चक्र
सदियों से घूमता
हुआ पीढ़ी दर
पीढ़ी,
ईंट ढोते कांधों का होता है केवल
बदलाव, जीवन जीते हैं लोग
बस नियति के अनुसार,
कानी कौड़ी भी नहीं
उनके पास जो
उम्र भर
करते
रहे हिरक खनन, अद्भुत है दुनिया
का चलन। चाटुकारों की इस
सभा में, हर चेहरा रखता
है अपने अंदर एक
छिपा हुआ
चेहरा,
इस महफ़िल का का सदस्य होता
है अल्पकालीन अंधा और
बहरा, हर कोई करता
हैं यहाँ भेड़ों की
तरह नग्न
राजन
का
सम्मोहित अनुकरण, अद्भुत है - -
दुनिया का चलन, उध्वस्त
घरों में सत्पुरुष गुज़ारे
है अपना
जीवन।

* *
- - शांतनु सान्याल

Painting - Kate Bedell


सोमवार, 12 जुलाई 2021

अभ्यन्तर गंध - -

रात गहराते ही उतरता है अंधकार, धुंध की
सीढ़ियों से हो कर, वक्षस्थल की अथाह
गहराइयों में, पुनर्जन्म के सभी
मिथक तब लगते हैं बहुत
सत्य, ज़िन्दगी बढ़ती
जाती है तुम्हारी
तरफ, लम्हा
लम्हा -
लांघ कर विस्तृत सहारा की तपन, तुम्हारे
प्रणय वृक्ष की परछाइयों में, उतरता है
अंधकार, धुंध की सीढ़ियों से हो
कर, वक्षस्थल की अथाह
गहराइयों में। सहसा
जाग उठते हैं
सभी -
चन्दन अरण्य और सहस्त्र मौलश्री उपवन,
ज़िन्दगी खोजती है तुम्हें दूर तक, वन
वीथिकाओं से हो कर, शहर की अंध
गलियों तक, कृष्णमृग की तरह
मैं भटकता हूँ अनंत गंध की
खोज में, जबकि तुम हो
समाहित नाभि से
ले कर ह्रदय
के बहुत
अंदर,
न जाने क्यों प्रतिध्वनित प्यास गूंजता है
तमाम रात अहसास की खाइयों में,
उतरता है अंधकार, धुंध की
सीढ़ियों से हो कर,
वक्षस्थल की
अथाह
गहराइयों में।

* *
- - शांतनु सान्याल

 

 
 




रविवार, 11 जुलाई 2021

सुबह की आहट - -

निःसीम शून्यता के बाद भी तुम्हें
पाने की है चाहत बाक़ी, अंतहीन
दीर्घश्वास है ज़िन्दगी, फिर
भी अलविदा कैसे कहें,
इस मौन संवाद में
हैं अनगिनत
लहरों के
ध्वनि,
ईशान कोणीय मेघों का जमाव है
ज़रूरी, अभी अभी निशि पुष्पों
के वृन्त हैं खुले, गंध कोषों
को कुछ और उभरने दो,
अभी तो है केवल
निशीथ प्रहर,
अभी दीर्घ
रात को  
दूर
तक है चलना, कुछ और दुःखों -
को है चुपचाप सहना, कुछ
और तेरे सीने में है राहत
बाक़ी, निःसीम
शून्यता के
बाद भी
तुम्हें
पाने की है चाहत बाक़ी। न जाने
कहाँ बरस जाएं जुनूं के उस
पार ये आवारा बादल,
वो नहीं जानते
मरुधरा का
ठिकाना,
ताहम
ना
उम्मीद नहीं होती ये ज़िन्दगी, यूँ
ही लगा रहता है धुंध का आना
जाना, डूब के उभरने की
ख़्वाहिश कभी ख़त्म
होती नहीं, रात
ढलने को
है ज़रा,
अभी
सुबह की है आहट बाक़ी, निःसीम
शून्यता के बाद भी तुम्हें पाने
की है चाहत
बाक़ी।  

* *
- - शांतनु सान्याल
 






 
 
 


शनिवार, 10 जुलाई 2021

अंतर्लीन बोध - -

वो सर्दियों की नरम धूप, जो बह गई
थीं कुहासे के स्रोत में, तुमने फिर
स्पर्श किया है अहाते की सर
ज़मीं, फिर जी उठे हैं मृत
सागर की लहरें एक
नए आत्मबोध
में, वो
सर्दियों की नरम धूप, जो बह गई थीं
कुहासे के स्रोत में। मैं आज भी
हूँ मुंतज़िर उसी जगह जहाँ
पुरातन हिमनद का था
उद्गम, जहाँ कभी
हम मिले थे,
क्या तुम
आज
भी हो उन्मत्त, अमरत्व की खोज में,
वो सर्दियों की नरम धूप, जो बह
गई थीं कुहासे के स्रोत में।
झर जाएंगे परत दर
परत दरख़्तों के
सभी धूसर
लिबास,
फिर भी न मर पाएंगे अंदर के हरित
एहसास, तुम्हारे छुअन में छुपा
है कहीं एक सुधामय प्यास,
कई जनम लग जाएंगे
उसे समझने के
शोध में,
वो
सर्दियों की नरम धूप, जो बह गई थीं
कुहासे के स्रोत में।

* *
- - शांतनु सान्याल  
 
 


गुरुवार, 8 जुलाई 2021

आईने के उस पार - -

कुछ देर का था मंज़र, कुछ हक़ीक़त और
कुछ आडम्बर, वो सभी थे मोमिन
ए जां, जिनके तेज़ धारों में
छुपे थे फ़रेब के ख़ंजर,
मुता'लबा यूँ तो
कम नहीं
उनका,
बघनखे अंदाज़ के क्या कहने, ऊपर से
मख़मली चादर, नीचे की तरफ दूर
तक कांटों के बंजर, कुछ देर का
था मंज़र, कुछ हक़ीक़त
और कुछ आडम्बर।
न जाने कौन है,
जो खड़ा
रहता
है क़ातिल मोड़ पर, थाम लेता है मुझे
नुक़्ता ए इंतहा पे सब कुछ छोड़
कर, क्षितिज पार दिखाई
देता है अक्सर कोई
रौशनी का
समंदर,
कुछ
देर का था मंज़र, कुछ हक़ीक़त और -
कुछ आडम्बर। दुनिया जीत कर
भी वो शख़्स था भीतर से
बहुत खोखला, ख़ुद से
हारा हुआ, तंज़ ए
आईने से बहोत
बौखलाया
हुआ,
उसने देखा था राज महल के अंदर ही
जिस्म का ढहता हुआ खण्डहर,
कुछ देर का था मंज़र, कुछ
हक़ीक़त और कुछ
आडम्बर।

* *
- - शांतनु सान्याल

 

सोमवार, 5 जुलाई 2021

यायावर ध्वनि - -

अंध रात के सीने पर, गूँजता रहा एकाकी
निस्वन, टूट कर बिखरते रहे बंजर
धरा पर कांच के सभी स्वर -
व्यंजन, जिन्हें जो भी
करना था दख़ल,
दोनों हाथ से
समेट ले
गए,
शून्यता के सफ़र में अब तलाशता है कुछ
बिखरे हुए शब्दों को ये जीवन, अंध
रात के सीने पर, गूँजता रहा
एकाकी निस्वन। मूक
प्रहर के उतार पर,
गूंजते हैं खुर
ध्वनि,
सहस्त्राधिक अश्वारोही गुज़रे हैं रौंद कर -
सपनों के उर्वर भूमि, राज पथ के
दोनों किनारे शताब्दियों से
लोग करते हैं मिथ्या
नर्तन, अंध रात
के सीने पर,
गूँजता
रहा
एकाकी निस्वन। कुछ भी नहीं बदलता है,
रणक्षेत्र हो या जीने की विवशता, महा
रक्तपात के बाद कुछ हो जाते हैं
अशोक सम्राट, और कुछ
बन जाते है समय
का झूठा दर्पण,
अंध रात
के सीने
पर,
गूँजता रहा एकाकी निस्वन।

* *
- - शांतनु सान्याल








रविवार, 4 जुलाई 2021

अनाम फूल की ख़ुश्बू - -


वो किसी अनाम फूल की ख़ुश्बू,
बिखरती, तैरती, उड़ती,
नीले नभ और रंग
भरी धरती के
बीच,
कोई पंछी जाए इन्द्रधनु से
मिलने लाए सात सुरों
में जीवन के गीत,
वो कोई अबाध
नदी कभी
इस
तट कभी उस किनारे गाँव
गाँव, घाट घाट बैरागी
मनवा बंधना
कब जाने
पीपल
रोके,
बरगद टोके प्रवाह बदलती
वो कब रुक पाती,
कलकल सदा
बहती जाती
वो कोई
अनुरागी मुस्कान अधर
समेटे मधुमास, राह
बिखेरे अनेकों
पलास,
हो
कोई अपरिभाषित प्रीत - -
आत्मीयता का नाम
न दो ख़ुश्बू, पंछी
और नदी
रुक
नहीं पाते, रोको लाख मगर,
ये बंजारे भटकते जाते
सागर तट के
घरौंदें ज्यों
बहते
जाये उन्मुक्त लहरों के बीच।
* *
-- शांतनु सान्याल



शनिवार, 3 जुलाई 2021

जलमग्न प्रासाद - -

निमज्जित वो सभी जलपोत, जो कभी
उभर न पाएंगे, उसी के आसपास
कहीं बसती हैं रूपकथाओं की
दुनिया, कालांतर में कुछ
अभिलाष शैवाल हो
गए, कुछ ख़्वाब
बंद कमरों
के जाल
हो
गए, देर तक उस गहराई में, मेरे अपने
भी ठहर न पाएंगे, निमज्जित वो
सभी जलपोत, जो कभी उभर
न पाएंगे। आग्नेयगिरि
और सागर के मध्य,
वाष्पित धुंध के
सिवा कुछ
भी नहीं
होता,
ताहम डूबने की चाहत कभी नहीं रूकती,
ज़रूरी नहीं, सभी कश्तियों को एक
ठिकाना नसीब हो, कतिपय
रूह हैं कालजयी तैराक,
ज़िन्दगी जिनके
हथेलियों के
क़रीब
हो,
बाक़ी सभी किनारे की लहर की तरह लौट
कर फिर उधर न जाएंगे, निमज्जित
वो सभी जलपोत, जो कभी उभर
न पाएंगे।

* *
- - शांतनु सान्याल





 

बुधवार, 30 जून 2021

लकीरें - -


आकाश पार बहती हैं अदृश्य
कुछ सप्तरंगीय प्रवाहें,
एक स्वप्नमयी
पृथ्वी शायद
है कहीं
अन्तरिक्ष में, सुप्त शिशु के
मंद मंद मुस्कान में
देखा है उसे कभी,
नदी के बिखरे
रेत में
किसी ने लिखा था पता - -
उसका बहुत कोशिश
की, पढ़ न पाए,
लकीरें जो
वक़्त ने
मिटा दिए, चेहरें में उभर
आईं काश ! उठते
ज्वार की
लहरें
इन्हें भी बहा लेतीं, अर्घ्य
में थे कुछ शब्द जो
कभी वाक्य न
बन पाए,
कुछ बूंदें पद चिन्हों में सिमट
कर खो गए, वो कभी मेघ
न बन पाए सुना है ये
नदी गर्मियों में
कगार बदल
जाती है
फिर
कभी मधुमास में, कहीं और
किसी किनारे मिलेंगे
तुमसे  - -
--- शांतनु सान्याल

मंगलवार, 29 जून 2021

ज़िन्दगी का संविधान - -

पुरातन अभिलेख देते हैं दस्तक, विलुप्त
दरवाज़ों का मिलता नहीं कोई भी
नामोनिशान, वही सीलन
भरी ज़िन्दगी, झूलते
हुए चमगादड़ों
की तरह
भीड़
भरी सांध्य लोकल लौट आती है कच्चे
रास्तों से हो कर सुबह के ठिकान,
लेकिन विलुप्त दरवाज़ों का
मिलता नहीं कोई भी
नामोनिशान।
वक्षस्थल
के नीचे
है बहुत दूर तक प्रसारित उम्मीद का
अंतरीप, भूल कर सभी उतार -
चढ़ाव, ये अंधकार के पल
हैं अनमोल, छूना चाहते
हैं सुदूर बहते हुए
अनगिनत
तिलस्मी
द्वीप,
जिसके किनारों में है कहीं उभरा हुआ
पुरसुकून का आसमान, लेकिन
सुबह तक विलुप्त दरवाज़ों
का मिलता नहीं कोई
भी नामोनिशान।
सुबह आती
है रोज़
की तरह ले कर अपने साथ सांसों का
विस्तृत हरित प्रदेश, स्वेद कणों
में पुनः जागते हैं जीने की
अदम्य अभिलाष,
नज़दीक के
आत्मीय
आँखों में उभरते हैं उत्प्रेरक अवशेष, -
फिर खींचता है भीड़ भरा शहर,
मैं निकल पड़ता हूँ उसी
सुरंग के रास्ते
लौटने की
चाह में,
कि फिर दोबारा लौट के पा सकूं सीने
में बसा ज़िन्दगी तलाशने का
संविधान - -

* *
- - शांतनु सान्याल





 
ज़िन्दगी का संविधान चल चित्र रूप में भी देखें - - नमन सह - -


गुरुवार, 24 जून 2021

आख़री पहर की बरसात - -

झूलती सी हैं परछाइयां अहाते में कहीं सूख
रहे हैं भीगे पल, जीने की ख़्वाहिश बढ़ा
गई है निशांत की बरसात, मझधार
का द्वीप डूब चुका है बहुत
ही पहले, अब है लहर
ही लहर, हद ए
नज़र, हम
ढूंढते
हैं अंतःनील में सुबह को एक साथ, जीने -
की ख़्वाहिश बढ़ा गई है निशांत की
बरसात। न जाने कितने ही
पागल हवाओं से निकल
कर छुआ है तुम्हें
सुख पाखी,
एक
छुअन, जो सांसों को दे जाए अनगिनत
स्पंदन, एक दीर्घ निःस्तब्धता जो
मिटा जाए व्यथित रूह की
थकन, जो दिला जाए
देह प्राण को सभी
दुःख दर्द से
निजात,  
जीने
की ख़्वाहिश बढ़ा गई है निशांत की - -
बरसात।

* *
- - शांतनु सान्याल

 

सोमवार, 21 जून 2021

अविभक्त एहसास - -

प्रतीक्षा की छाया नहीं घटती, दीर्घ से
दीर्घतर बढ़ती जाती है ज़िन्दगी,
तुम्हें छूने की चाह में घिर
आता है अंधकार, झर
जाते हैं शून्य में
जाने कहां
सभी
मेघ कण, रह जाते हैं हथेलियों में -
सिर्फ कुछ बूंदे निराकार, तुम्हें
छूने की चाह में घिर आता
है अंधकार। आकाश
अपने कांधे पर
लटकाए
हुए
रात का झोला उतरता है सधे क़दमों
से, बाँध जाता है सुनसान गली
कूचों में झिलमिलाता हुआ
ख़्वाबों का वंदनवार,
तुम्हें छूने की
चाह में घिर
आता
है अंधकार। हमारे मध्य आज भी है
एक अनूप की गहराई, कभी
उम्र से लंबी ज्वार की
लहरें भिगोती हैं
दोनों छोर
की
भूमि, और कभी दूर तक फैला हुआ
है बालुओं का साम्राज्य, सिर्फ
उतराई और उतराई, फिर
भी एक सेतु मज़बूती
से झूलता रहता
है हमारे आर
पार, तुम्हें
छूने
की चाह में घिर आता है अंधकार। -

* *
- - शांतनु सान्याल 

गुरुवार, 17 जून 2021

मध्य मार्ग कोई नहीं - -

जब अंधकार हो पूर्ण मुखर, खुल जाते
हैं अपने आप बंद आँखों के द्वार,
खिड़कियां हैं खुली अबूझ हवा
पलट रही है एक ही पृष्ठ
को हज़ार बार, सहेज
कर जितना भी
रखें बिखर
जाती
हैं पुरातन स्मृतियां, बेवजह हम दौड़े
चले जा रहे हैं अंधी गुफाओं के
अंदर, समय मिटा चुका
है कब से, सभी शैल
आकृतियां, कभी
था यहाँ कोई
समुद्र तो
रहा
होगा, सम्प्रति कुछ भी नहीं सिवा -
धूसर इतिहास के, कभी नीबू
फूल के गंध में डूब कर,
गहन रात ने चाहा
था उम्र भर का
जुर्माना,
कभी
वो गुज़रते रहे बहुत क़रीब से बिना
किसी आहट ओ एहसास के,  
उजाले का उतरन ओढ़
कर उतर रही है ये
ज़िन्दगी, या
सुबह के
पांव
तले अभी तक है अंधेरे की सीढ़ियां,
सुदूर है समुद्र का विस्तृत मुहाना,
पीछे दौड़ती चली आ रही है
विक्षिप्त सी एक नदी,
मध्य मार्ग है एक
मिथक, टूटती
नहीं कभी
पांवों
की बेड़ियाँ - -

* *
- - शांतनु सान्याल  


  

बुधवार, 16 जून 2021

स्वयंभू देवदूत - -

तमाम रात बढ़ता रहा मृत्यु जुलूस, दबी
सिसकियों का लेकिन मिलता नहीं
कोई हिसाब, कुछ चेहरे थे
अर्थहीन, कुछ रिश्तों
के ज़िल्द सूखे
पत्तों की
तरह
अपने आप ही झर गए, उपग्रह की आँखों
में धूल झोंकना नहीं आसान, असंख्य
लोग हैं भस्म के नीचे, चिताओं
में वो जले ज़रूर, मर्त्य -
लोक से आख़िर, वो
गए किधर, आज
नहीं तो कल
ये राज़
खुलेंगे नक़ाब दर नक़ाब, दबी सिसकियों
का लेकिन मिलता नहीं कोई हिसाब।
हम सभी हैं राजपथ के विकलांग
तमाशबीन, चेतनाशून्य हो
कर हमने किया था
जयघोष, जब
ज़मीं से
चीर
कर निकलने लगे गुप्त दुर्गन्ध, तब हमें
आया है होश, मिथकों से मुक्ति नहीं
संभव, हर एक पुरोधा यहाँ लिखता
है अपने आप इतिहास की
झूठी किताब, इस
बनावटी दौर
में सब से
सहज
है स्वयंभू देवदूत बन जाना जनाब, दबी
सिसकियों का लेकिन मिलता नहीं
कोई हिसाब।

* *
- - शांतनु सान्याल  
 

 


   

 

सोमवार, 14 जून 2021

उस पार से इस पार तक - -

रेलसेतु के उस पार उतर चली है धूसर
सांझ की छाया, ईशान कोणीय
आकाश फिर गहरा चला है,
कदाचित, अनाहूत वर्षा
भिगो जाए दग्ध
जीवन, बहुत
चाहत से
तकती
है नदी की स्थिर काया, रेलसेतु के -
उस पार उतर चली है धूसर
सांझ की छाया। कोई
उतरता है पुल की
सीढ़ियों से ले
कर कांधे
पर सदियों का अभिशाप, कबाड़ के
भीड़ में जीवन तलाशता है जीने
का सही माप, तुम्हारे पास
है विश्व पर्यटन का
परवाना ए
राहदारी,
जीना
मरना सब कुछ यहाँ, हमारी है - -
लाचारी, पुल के उस पार से
इस पार तक है मुख़्तसर
सफ़र अपना, न कोई
टिकट, न पास
है किराया,
रेलसेतु
के उस पार उतर चली है धूसर सांझ
की छाया।

* *
- - शांतनु सान्याल





रविवार, 13 जून 2021

असमाप्त अंतराल - -

अंधेरे से उजाले तक, प्रतीक्षारत रहा
एक असमाप्त अंतराल, किंतु
लौटा नहीं वो अंतरतम
का अनुनाद, वो
सभी मर्म
जो
तुमने बांधे शब्दारण्य में, दरअसल
थे बहुत ही खोखले, तैरते रहे
उथले किनारे पर, यूँ ही
चिरकाल, अंधेरे से
उजाले तक,
प्रतीक्षारत
रहा
एक असमाप्त अंतराल। हर एक के
सीने में होता है कहीं न कहीं एक
झील लहराता हुआ, बस
कुहासे में कमल
नज़र आता
नहीं,
दूर से वादियों का नज़ारा भुला देता
है सभी शब्दशास्त्र की बारीकियां,
क़रीब आने पर उभर आते
हैं बेवजह ही असंख्य
त्रुटियां, चाहतों
की इस धरा
पर रहता
है हमेशा ही परितृप्ति का अकाल,
अंधेरे से उजाले तक, प्रतीक्षारत
रहा एक असमाप्त
अंतराल।

* *
- - शांतनु सान्याल





शनिवार, 12 जून 2021

अर्थहीन अवशेष - -

जो कुछ भी बिखरा हुआ है मेरे
आसपास, उन्हीं को मैंने
माना है ज़िन्दगी
का इतिहास,
कुछ
धूसर चेहरों में आज भी खेलते हैं
ख़ालिस मुस्कान, समय
छीन लेता है अपना
महसूल ये सच
है फिर भी
चेहरा
ढल जाए तो क्या, बना रहे दिल
का अभिमान, कुछ धूसर
चेहरों में आज भी
खेलते हैं ख़ालिस
मुस्कान।
जाने
कितने आग्नेय पर्वतों से होकर
नंगे पांव गुज़री है रात,
फिर भी चेहरे पर
कोई शिकन
नहीं,
ताबूत विहीन देह का मूल्य था
माटी, वक़्त ने समझा दिया,
तुम्हारे सीने का बोझ
भी उतर गया,
और रूह
को भी
अब कोई थकन नहीं, गंगा की
गोद में डूब गए तथाकथित
धर्म और ईमान, कुछ
धूसर चेहरों में
आज भी
खेलते
हैं
ख़ालिस मुस्कान।

* *
- - शांतनु सान्याल




 

शुक्रवार, 11 जून 2021

बंद अलमारी - -

काश ! तुम खोल पाते, महोगनी
से बनी वो अदृश्य अलमारी,
चाबियों का गुच्छा यूँ
तो था तुम्हारे
सामने
लेकिन तुमने कभी कोशिश ही न
की, देखते ही देखते, राख के
ढेर में, वो ढह गई सारी,
महोगनी से बनी
वो अदृश्य
अलमारी।
कभी -
कभी बिजली गुल हो जाना चाहिए,
अंधेरे में ख़ुद से आँख मिचौली
खेलना आना चाहिए, किस
कोण पर जा रुकेगा ये
सत्य का कंपास,
जो घूमता
रहा उम्र
भर,
मायावी बंधनों के आसपास, सब
कुछ है लिपिबद्ध आईने की
साझेदारी, महोगनी
से बनी वो अदृश्य
अलमारी।
वो सभी
संचय
कहने को थे अनमोल, जिन्हें हम
भूल आए कांच के दराज़ों में,
कौन नज़दीक था और
कौन बसा परदेश,
कहना नहीं
आसान,
रहने
दें कुछ अनकही बातें बंद दरवाज़ों
में, न कोई चाहत, न कोई
तक़ाज़ा, सब कुछ तो
पड़ा रह जाएगा
प्लेटफॉर्म
पर
उपेक्षित, जब होगी अंतिम पहर की
तैयारी, काश ! तुम खोल पाते,
महोगनी से बनी वो अदृश्य
अलमारी।

* *
- - शांतनु सान्याल
   

 



गुरुवार, 10 जून 2021

रंगीन छतरियां - -

एक अजीब सा सन्नाटा है हर तरफ,
नीम से लेकर बरगद वाले चौबारे
तक, कुछ रंगीन छाते उड़ रहे
हैं ऊपर, बहुत ऊपर की
ओर, बाट जोहता
सा है गाँव
मेरा,
उदास आँगन से हो कर नदी के उस
किनारे तक, एक अजीब सा
सन्नाटा है हर तरफ,
नीम से लेकर
बरगद
वाले
चौबारे तक। जोकर का स्वांग रचाए
लोग खड़े हैं, हाथों में लिए कई
तरह की फिरकियां, एक
सुगबुगाहट सी है  
हवाओं में,
दे न
जाएं कहीं फिर वही जादू की झप्पियां,
हम फिर पड़े रहे न कहीं, ऊसर
ज़मीं से ले कर टूटे हुए
ओसारे तक, एक
अजीब सा
सन्नाटा
है हर तरफ, नीम से लेकर बरगद - -
वाले चौबारे तक।

* *
- - शांतनु सान्याल
 


 

रविवार, 6 जून 2021

उपनाम - -

बहुत कुछ छूट जाते हैं गंत्वय से
पहले, साथ रह जाता है एक
शून्यता का शहर, और
विस्मृत उपनाम,
दस्तकों के
भीड़
में हम खोजते हैं किसी परिचित
आवाज़ को, दरवाज़ा खोलते
ही, रोज़ की तरह न जाने
कहाँ लौट जाती है
संदली शाम,
साथ रह
जाता
है एक शून्यता का शहर, और -
विस्मृत उपनाम। याद की
काठी अपनी जगह
रहती है यथावत,
अहसास
के
राख बिखरे होते हैं आसपास,
हम तलाशते हैं गुमशुदा
ख़ुश्बुओं को बड़ी
शिद्दत से दूर
तक, वो
नहीं
मिलता कहीं भी, ज़मीं रहती
है चुप अहर्निश, और
विस्मित सा तकता
हुआ रहता है
गोधूलि
का
आकाश, मर्म का देवालय ढूंढ
नहीं पाता है उस अनंत
प्रणयी का नाम,
साथ रह जाता
है एक
शून्यता का शहर, और विस्मृत
उपनाम।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

शुक्रवार, 4 जून 2021

खरोचों की निशानी - -

एक जिस्म और बेहिसाब खरोचों की
निशानी, किसी आदिम सुरंग से
गुज़री है रात, एक सरसराहट
के साथ, टूटे हैं खिड़कियों
के कांच, किसी दूरगामी
रेल की तरह है ये
ज़िंदगानी, एक
जिस्म और
बेहिसाब
खरोचों
की
निशानी। पहाड़ों से फिर उठ रहा है
धुआं सा, कुछ बुझा है वादियों में
या कुछ अभी तक है सुलगता
सा मेरे सीने के दरमियां,
हर चेहरा है कुछ
मुरझाया सा,
हर एक
नज़र
है
एक शीर्षक विहीन कहानी, एक -
जिस्म, और बेहिसाब खरोचों
की निशानी। सभी सूखी
नदियां दोबारा उभर
आएंगी, सभी
रिश्ते फिर
स्मृति
फ्रेम
में जड़ जाएंगे, कोई मुड़ कर भी नहीं
देखेगा, सभी आगामी कल की
ओर बढ़ जाएंगे, किनारों
से उतर जाएंगे सभी
लहर तूफ़ानी, एक
जिस्म, और
बेहिसाब
खरोचों
की
निशानी।

* *
- - शांतनु सान्याल
   

गुरुवार, 27 मई 2021

रेत का शहर - -

निष्प्राण आईना तलाशता है इक
अदद चेहरा, मुखौटों के इस
शहर में अब ख़ालिस
अक्स का पता
कोई नहीं
जानता,
दूर
तक है रेत के नीचे रूहों की बस्ती,
दिन है यहाँ गूंगा और रात
जैसे हो सदियों से बहरा,
निष्प्राण आईना
तलाशता है
इक
अदद चेहरा। मृत्यु प्रमाण पत्र ले
कर भी भला कोई क्या करेगा,
हमारे वसीयत में कोई
चाँद सितारा न
था, बदल
दो वो
सभी तथाकथित मोक्ष के रास्ते,
कहने को सभी थे मेरे अपने,
हक़ीक़त में लेकिन कोई
दूर तक भी हमारा
न था, उभर
आएंगे
सभी
सत्य एक दिन, भुरभुरी ज़मीन
पर, सैलाब का पानी नहीं
होता है गहरा, निष्प्राण
आईना तलाशता है
इक अदद
चेहरा।

* *
- - शांतनु सान्याल

 
 


शनिवार, 22 मई 2021

धुंध के उस पार - -

उम्मीद के आलोक स्रोत कभी नहीं बुझते
दिन के उजाले में भी ये होते हैं मौजूद,
ये और बात है कि उन्हें हम देख
नहीं पाते, आकाश का सीना
है गहनतम, कहीं न
कहीं ज़रूर मिल
जाएंगे तुम
से हम
यूँ
ही आते जाते। कहने को डूबे हैं सितारे,
इस क्षितिज के अतिरिक्त भी हैं
कई अनजाने दिगंत की
सीमाएं, कहाँ जा कर
रुके इस जीवन
की नैया,
सब
कुछ है मुट्ठी बंद, बहते जाना है निरंतर
नियति के सहारे, कहने को डूबे हैं
सितारे, संभवतः धुंध के उस
पार है कोई जुगनुओं का
प्लावित द्वीप, और
नव सृजन के
सम्भाव्य
ढेर
सारे, कहने को डूबे हैं सितारे - - - - -

* *
- - शांतनु सान्याल

 

गुरुवार, 20 मई 2021

पुनर्यात्रा - -

जो खो गए समय स्रोत में उनका रंज
अपनी जगह, ज़िन्दगी को है फिर
खिलना गुलमोहर की तरह,
वो दिन जो अब हैं देह
विहीन आलिंगन,
उन्हें रख लें
बंद हृद
संदूक में, दर्द की सीमा नहीं होती - -
फिर भी कुछ तो छुपा रहता है
बिहान के कुहुक में, एक
अज्ञात सा मर्म जगा
जाता है जीवन
को, राह
चलते किसी अप्रत्याशित ठोकर की -
तरह, ज़िन्दगी को है फिर खिलना
गुलमोहर की तरह - -

* *
- - शांतनु सान्याल
  

गुरुवार, 13 मई 2021

भावशून्य गंगा - -

हर तरफ है मौन मृत्यु जुलूस, गूंगी एहसास,
दूर तक रुद्ध विलाप, फिर भी ज़िन्दगी
दौड़ती है आख़री सांस तक, गली
कूचों से निकल कर, नगर
सीमान्त के उस पार,
कहीं किसी मोड़
पर शायद
मिल
जाए वो अदृश्य पहरेदार। भावशून्य गंगा - -
तकती है सेतु के प्राचीर को, अभी अभी
कोई फेंक गया है किसी अपने एक
आत्मीय को, कञ्चन देह का
मूल्य है माटी, फिर भी
निष्ठुरता का अंत
नहीं, अनुराग
प्रेम सब
कुछ
प्लावित हैं चिथड़ों में सारमेयों के बीच - -
कालाधन संचित करने में लगे हैं
धर्म कर्म के ठेकेदार, कहीं
किसी मोड़ पर शायद
मिल जाए वो
अदृश्य
पहरेदार, जो कर पाए इस जग का - - -
पुनरुद्धार - -

* *
- - शांतनु सान्याल 

मंगलवार, 11 मई 2021

अंतरतम का शब्दकोश - -

न जाने कितनी नदियां बहती हैं निःशब्द
वक्षस्थल के नीचे, सभी विष एक
दिन हो जाएंगे प्रभावहीन,
जीवन हो जाएगा
क्रमशः मृत्यु
से भय -
मुक्त, न जाने किस रूपकथा की बात -
करते हो, इस दुनिया में कोई भी
नहीं रहता, उम्र भर के लिए
अनुरक्त। नदी बही
जाती है शब्दहीन
उद्गम से ले
कर सुदूर
मुहाने
तक, पड़े रहते हैं किनारे पर अनगिनत
किस्से कहानियां, वट की जटाओं
से खेलते हैं जल भंवर, और
कभी गांव, घाट, मंदिर,
सेतु, सभी कुछ
कुहासे में
डूबे से
आते हैं नज़र, नदी को है बहना निरंतर,
एक अदृश्य रेखा है ये जिजीविषा,
बढ़ती जाती है महासिंधु की
ओर, किए जाती है मरु
तटबंधों को यूँ ही,
परितृप्त, सभी
विष एक
दिन हो
जाएंगे प्रभावहीन, जीवन हो जाएगा
क्रमशः मृत्यु से भय मुक्त।

* *
- - शांतनु सान्याल
 


 
 



रविवार, 9 मई 2021

कदाचित फिर मिलें - -

एकाकी जीवन चला जा रहा है
सुदूर, न जाने कहां किस
की चाह में, बिखरे
पड़े हैं असंख्य
कांच के
पल
ख़ामोश, ज़िन्दगी की राह में, -
सुनसान मोड़ पर कहीं
वो आज भी है
मुंतज़िर,
भीगे
ज़िल्द में हो जैसे कोई सांझ -
रात की पनाह में, एकाकी
जीवन चला जा रहा है
सुदूर, न जाने
कहां किस
की चाह
में।
सभी मेघ उड़ जाएंगे बिहान से
पहले, ख़्वाब के मख़मली
सिलवटों में कहीं रह
जाएंगे कुछ मौन
स्पर्श, कुछ
अंतरंग
शब्द,
शायद, फिर मिले कहीं किसी
और गहनतम अथाह में,
एकाकी जीवन चला
जा रहा है सुदूर,
न जाने
कहां
किस की चाह में।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
 







शनिवार, 8 मई 2021

अंध गहराई - -

मृत नदी की तरह पड़ी रहती हैं अचल
स्मृतियां, सूख जाते हैं आर्तनाद,
रेत के टापुओं से झांकते
हैं पथरीले विषाद,
किनारों के
धूसर
पेड़ तलाशते हैं अपनी खोयी हुई सभी
परछाइयां, मृत नदी की तरह पड़ी
रहती हैं अचल स्मृतियां।
राख की तरह बिखरे
पड़े हैं दूर तक
दीर्घ जीने
के मधु
अभिलाष, आज मैं हूँ तुम्हारे दिल के
बेहद क़रीब, ज़रूरी नहीं उम्र भर
तुम मुझे रखो यूँ ही अपने
पास, कौन आए और
कौन लौट जाए,
बूढ़े बरगद
को कुछ
भी
फ़र्क़ नहीं पड़ता, विहंगों का कलरव -
यथारीति रहता है वितानों पर,
मुख़्तसर होती हैं ज़िन्दगी
की सभी तन्हाइयां,
मृत नदी की
तरह पड़ी
रहती
हैं अचल स्मृतियां, वक़्त भर जाएगा
लम्हा लम्हा, दर्द की अंधी सभी
गहराइयां - -

* *
- - शांतनु सान्याल



शुक्रवार, 7 मई 2021

मुस्कुराना कभी न भूलें - -

बर्फ़ का दरिया है एक दिन पिघल
जाएगा, समय का सिक्का
उछलता रहता है
अपनी जगह
आज का
दिन
शायद न हो मेरे लिए कोई ख़ास,
मुझे यक़ीन है कि कल वो
ज़रूर कुछ ख़ास ख़बर
ले के आएगा, बर्फ़
का दरिया है
एक दिन
पिघल
जाएगा। विस्मित आरशी है तो
रहे अक्स मुस्कुराना कैसे
भूले, अतीत के फेंके
हुए बुनियादों पर,
फिर अनेक
मंज़िलें
उभर
आएंगी, लड़खड़ाता हुआ आज
का दिन साँझ गहराते ही
संभल जाएगा, बर्फ़
का दरिया है
एक दिन
पिघल
जाएगा, स्तूपाकार इस दर्द को
रहने दो यूँ ही भूमिगत,
जितना उत्खनन
करोगे उतना
ही देह -
प्राण
से बाहर दूर तक बिखर जाएगा,
समय का मरहम किसी एक
का नहीं है पेटेंट, ज़रा
इंतज़ार करो इस
दर्द से जीवन
एक रोज़
संभल
जाएगा, बर्फ़ का दरिया है एक
दिन पिघल जाएगा - -

* *
- - शांतनु सान्याल
 



 

मंगलवार, 4 मई 2021

सूखी ज़मीन के अंदर - -

दूर तक है विस्तीर्ण बालूमय किनारा,
सूखी नदी के मोड़ पर कहीं आज
भी बहती है कोई लुप्त धारा,
कुछ स्मृतियां कदाचित
हों पुनर्जीवित, कुछ
जीवाश्म सुख
पुनः हों
सत्य
में परिवर्तित, फिर बसाएं विध्वस्त -
सपनों का संसार, करें श्रावणी
हवाओं का आवाहन, तप्त
हृदयों को दें उम्मीद
का सहारा, सूखी
नदी के मोड़
पर कहीं
आज
भी बहती है कोई लुप्त धारा। सिर्फ़ -
तुम ही नहीं हो यहाँ नियति के
शिकार, जीवन पथ में है
कभी अप्रत्याशित
विजय, और
कभी
अनचाही हार, अभी तक है मौजूद -
कोई अदृश्य सेतु हमारे दरमियां,
नश्वर जगत हो कर भी
बहुत कुछ कहता
है वो नीला
आसमां,
सब
कुछ लूटा के भी जीवन नहीं होता
है सर्वहारा, न टूट पाए कभी
उम्मीद का डोर हमारा,
सूखी नदी के मोड़
पर कहीं आज
भी बहती
है कोई
लुप्त धारा।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
  

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

धुएं की लकीर - -

पथराई आँखों से ज़िन्दगी तकती है दूर
तक धुएं की लकीर, एक अंतहीन
नीरवता के आगे सभी हैं
मजबूर, क्या राजा
और क्या फ़क़ीर,
इस पार्थिव
देह को
ले कर कितना कुछ रहा हिंसा प्रतिहिंसा,
प्रेम घृणा, अपना पराया, ताउम्र कभी
साथ रहने की कल्पना, सांस
रुकते ही दूर तक बिखरा
पड़ा था अंतिम प्रहर
का मायावी सपना,
कौन किसे रोक
पाए, हर
एक पांव पड़े यहां ज़ंजीर, पथराई आँखों
से, ज़िन्दगी तकती है दूर तक धुएं
की लकीर - -

* *
- - शांतनु सान्याल

    

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

कहीं किसी रूप में - -

आकाश है वही पूर्वकालीन, हाशिए में
कहीं छूट गए उजालों के ठिकाने,
पत्थरों के मध्य राह तलाशते
हैं छूटे हुए जल स्रोत,
दहकता हुआ सा
लगे है बांस
वन,
वैनगंगा के किनारे, किस क्षितिज डोर
पर जा बैठा है मुनिया का झुण्ड,
गाए जाएं गीत बेगाने,
आकाश है वही
पूर्वकालीन,
हाशिए
में कहीं छूट गए उजालों के ठिकाने। -
महादेव की पहाड़ियों में बसते हैं
कुछ बचपन के उजड़े गांव,
कुछ अरण्य लकीरों
में आज भी
भटकती
हैं
कितनी कहानियां अनसुने अनजाने,
फिर लौट आएंगे पलाशरंगी दिन,
फिर सजेगी नदी किनारे
जलज पक्षियों की
महफ़िल, हम
भी कहीं
आस -
पास मिल जाएंगे किसी और रूप में
कदाचित, पुनः लिखे जाएंगे पूर्व
जन्म के अफ़साने, आकाश
है वही पूर्वकालीन,
हाशिए में कहीं
छूट गए
उजालों के ठिकाने।

* *
- - शांतनु सान्याल   







सोमवार, 26 अप्रैल 2021

लवणीय नीरवता - -

सभी मुख़ातिब चेहरे पहलू बदल गए,
बिखरे पड़े हैं कटानों में टूटे हुए
नाव, दूर तक पसरा हुआ
है लवणीय ख़ामोशी,
उतरते लहरों
के साथ
बह
चुका है किनारे का गांव, जिन्हें था - -
एहसास उजड़ने का, सुबह से
पहले वो सभी लोग न
जाने किस ओर
निकल गए,
सभी
मुख़ातिब चेहरे पहलू बदल गए। - -
बंजर ज़मीं पर उग आएंगे
एक दिन विस्तृत झाऊ
वन, प्रकृति अपने
भीतर रखती
है असंख्य
निर्मिति,
एक
अदृश्य ताना - बाना रचता है सदा
हरित प्रदेश, सब कुछ कभी
नहीं होता है यहाँ शेष,
अनगिनत दिन
आए और
आ कर
ढल
गए, सभी मुख़ातिब चेहरे पहलू - -
बदल गए।

* *
- - शांतनु सान्याल




रविवार, 25 अप्रैल 2021

शून्य दृष्टि - -

अंतरतम को बेध जाती है जीवन की
शून्य दृष्टि, निर्मम नियति के
आगे सभी हैं आज बहुत
ही लाचार, चारों
तरफ टूटते
सांसों
के मध्य मानवता करती है हाहाकार,
कोई मिटाए चला हो जैसे अपने
ही हाथों, अपनी बनाई हुई
ख़ूबसूरत सृष्टि,
अंतरतम
को
बेध जाती है जीवन की शून्य दृष्टि।
आज मुस्कराहट में भी, दर्द का
है एक अदृश्य समावेश,
आज हैं हम आमने
सामने, चाहते
हैं कुछ
पल
का कथोपकथन, कल नीरवता के
सिवाय कुछ भी न रहे हमारे
मध्य अवशेष, फिर भी
सब कुछ ख़त्म
नहीं होगा,
मरू -
धरा अपनी जगह है अडिग, इस
जीवन की प्यास है अंतहीन,
कहीं न कहीं से खोज ही
लाएगा वो एक दिन,
अविरत धाराओं
में टूट कर
बरसती
 हुई
महा वृष्टि, अंतरतम को बेध
जाती है जीवन की
शून्य दृष्टि।

* *
- - शांतनु सान्याल  


 

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

पतझर का अवसान - -

शून्य आंगन में बिखरे पड़े हैं सूखे पत्ते,
टूटे पड़े हैं बांस के घेरे, असमय का
पतझर कर चला है दूर तक
अरण्य को सुनसान,
धूम्रवत सा छाया
हुआ है हर
तरफ,
जीवन खोजता है एक टुकड़ा आसमान,
इस दहन काल में भी सिंहासन का
खेल है जारी, हाहाकार करती
हुई जनता की कौन यहाँ
सुध लेगा, औषधि
से लेकर प्राण -
वायु की
हो
जहाँ काला बाज़ारी, शहर गांव सभी की
समान सी है लाचारी, फिर भी जीने
की अदम्य अभिलाष, बुझने
नहीं देती अंतिम आस,
इस मृत्युकाल का
एक दिन ज़रूर
होगा परिपूर्ण
अवसान,  
असमय का पतझर कर चला है दूर तक
अरण्य को सुनसान - -

* *
- - शांतनु सान्याल

   
 

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

काया विहीन - -

वो कौन था, कहाँ से आया, कुछ भी मालूम
नहीं, महत रूप में वो कोई काया विहीन
था, मनुष्य था या कोई परग्रही दूत,
सभी तर्क-वितर्क के उस पार
कदाचित कोई अवधूत,
एक हथेली में थी
अग्नि शिखा,
दूसरे
पर
थामे हुए समस्त ब्रह्माण्ड की व्यथा, वो
सब कुछ उजाड़ कर जैसे आत्म सुख में
अंतर्लीन था, वो कौन था, कहाँ से
आया, कुछ भी मालूम नहीं,
महत रूप में वो कोई
काया विहीन
था। उस
की
बंद आँखों में थी एक अजीब सी मुस्कान,
ओंठों के किनारे अंतहीन नीरवता,
वक्षस्थल पर दूर तक प्रसारित  
कोई भस्मरंगी आसमान,
रेत के घर पैरों से
बिखरा कर
जैसे
कोई शिशु पाता है एक अपरिभाषित ख़ुशी,
ठीक उसी तरह ये कौन है जो जलगृह
बनाकर डुबाता है बारम्बार, इस
दहन काल में जो अदृश्य
परछाइयों से ढकता है
देह प्राण, कहने
को वो छाया -
हीन
था, वो कौन था, कहाँ से आया, कुछ भी
मालूम नहीं, महत रूप में वो कोई
काया विहीन
था।

* *
- - शांतनु सान्याल

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

जलशब्द के अवशेष - -

भीगे पृष्ठतल पर सिर्फ रह जाते हैं कुछ
जलशब्द, लौट जाते हैं प्रवासी हंस,
सुदूर अपने देश, कुछ धूसर
मेघ के अतिरिक्त महा
शून्य सा रह जाता
है आकाश पथ,
उभरता है
रोज़
की तरह आदिम ध्रुव तारा, झुलसे हुए
दिन के पास, नहीं होता कहने के
लिए कुछ भी विशेष, केवल
रह जाते हैं कुछ जलशब्द,
लौट जाते हैं प्रवासी
हंस, सुदूर अपने
देश। रात
आती
है
कराहती हुई, सुनसान रास्तों में कोई
नहीं होता जो बढ़ा सके दुआओं
वाले हाथ, वटवृक्ष के नीचे
अब नहीं जलता कोई
भी चिराग़, सूने
पड़े हैं दूर तक
सभी मठ
और
मज़ार, चुप हैं पृथ्वी और चन्द्रविहीन
आकाश, गहन निशीथ स्थिर है
अपनी जगह ले के अंतिम
निःश्वास, सुदूर हार्न
बजाता हुआ
गुज़रा
है
अभी अभी एम्बुलेंस, भीगे पृष्ठतल पर
सिर्फ रह जाते हैं कुछ जलशब्द,
लौट जाते हैं प्रवासी हंस,
सुदूर अपने
देश।

* *
- - शांतनु सान्याल  








शनिवार, 17 अप्रैल 2021

हवाओं के हमराह - -

सभी चेहरे हैं ऋतु अनुचर, बदल जाएंगे
अपना रास्ता हवाओं के अभिमुख,
फिर भी सांझ उतरेगी हमेशा की
तरह, और खींच जाएगी
तुम्हारी पलकों में
कहीं महीन सी
एक सुरमयी
रेखा,
जीवन बटोर लेगा अपने हिस्से का बचा
खुचा सुख, सभी चेहरे हैं ऋतु अनुचर,
बदल जाएंगे अपना रास्ता
हवाओं के अभिमुख।
एक ही जीवन
में नहीं है
संभव
सभी
प्रश्नों का समाधान, चिर दहन के मध्य
ही छुपे रहते हैं वृष्टि वन के अभियान,
सुख दुःख के स्रोत यूँ ही बहते
रहेंगे अनंतकाल तक,
कभी ख़त्म न
होगा, ये
धूप
छांव का लुकछुप, सभी चेहरे हैं ऋतु
अनुचर, बदल जाएंगे अपना
रास्ता हवाओं के
अभिमुख।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

अनुच्चारित शिलालिपि - -

इस गहन नील अंधकार के बाद भी,
बहुत कुछ है निःशेष, कुछ बातें
हैं मौन, पत्थरों के सीने पर
लिपिबद्ध, उन अदृष्ट
शब्दों में हैं छुपे
हुए आगामी
कल के
कुछ
अवशेष, इस गहन नील अंधकार के
बाद भी, बहुत कुछ है निःशेष।
अनगिनत प्रकाश वर्षों से
जो बह रहा है हमारे
दरमियां उस
अगोचर
स्रोत
में कहीं गूंजती है भविष्य की ध्वनि,
उन अश्रुत, अनुच्चारित शब्दों से
ही उभरती है नई ज़िन्दगी,
क्रंदनमय इस महा -
निशा के शेष
प्रहर में हैं
खड़े
कुछ उजानमुखी नाव, सुदूर कहीं
तैरते दिखाई पड़ते हैं, कतिपय
टिमटिमाते हुए बंदरगाह,
कुछ नींद से जागे हुए
हरित प्रदेश,
इस गहन
नील
अंधकार के बाद भी, बहुत कुछ है
निःशेष - -

* *
- - शांतनु सान्याल 

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

सेतु विहीन नदी - -

कहने को हमारे अंदर बहती हैं सहस्त्र
स्रोतस्विनी, फिर भी बहुत अकेली
होती है ये ज़िन्दगी, दरअसल
हम कई हिस्से में ख़ुद
को यूँ बांट जाते
हैं कि स्वयं
को देने
के
लिए कुछ भी बचा रहता नहीं, कहने
को हमारे अंदर बहती हैं सहस्त्र
स्रोतस्विनी। अनगिनत
तरंगों में बहते बहते,
फिर भी सूखती
नहीं हमारे
अंदर
की नदी, हाट बाज़ार, घाट किनार,
आकाश को छूते हुए, घूमते हैं
चाहतों के उड़न खटोले,
हर तरफ होता है
एक अंतहीन
शोर, मगर
भीड़
में भी हम होते हैं बेहद अकेले, लेन
देन थमता नहीं उम्रभर, कुछ
पलों के सुख के लिए सब
कुछ लगा आते हैं हम
दांव पर, जीत हार
का लेखा जोखा
पड़ा रहता
है वक़्त
के रेत पर, दोनों किनारों के दरमियां
लेकिन दूर तक कोई सेतु बंध,
कहीं नज़र आता नहीं,  
कहने को हमारे
अंदर बहती
हैं सहस्त्र
स्रोतस्विनी। फिर भी बहुत अकेली
होती है ये ज़िन्दगी।

* *
- - शांतनु सान्याल



रविवार, 11 अप्रैल 2021

ये अंतिम बिंदु नहीं है - -

हर तरफ है उदासियों का दृश्यांतर,
आख़री सांसों में तैरते हैं कहीं
कुछ दिन और जीने की
एक अदम्य उत्कंठा,
प्रकृति अपना
महसूल
हर
हाल में करती है वसूल, पड़े रहते
हैं भस्म में लिपटे हुए सभी
अधजले उम्मीद, कुछ
बांझ महत्वाकांक्षा,
चिंगारियों में
उड़ जाते
हैं न
जाने कहाँ सभी जन्म जन्मांतर
साथ रहने की अंतहीन मंशा,
आख़री सांसों में तैरते
हैं, कहीं कुछ दिन
और जीने की
एक अदम्य
उत्कंठा।
सभी
पर्वतारोही नहीं पहुँच पाते हैं उस
अलौकिक बिंदु पर, फिर भी
जीवन यात्रा नहीं रूकती,
नदी, अरण्य, प्रस्तर -
खंड, झूलते हुए
सेतु बंध,
सभी
अपनी जगह हैं यथावत मौजूद, -
विलीन पदचिन्हों पर फिर
चलते जाएंगे अनाहूत
निर्भीक आरोही,
फिर उभरेंगे
सभी
डूबे हुए चेहरे, पुनः पृथ्वी में गूंजेगा
एक दिन हर्षोल्लास का अंतहीन
डंका - -

* *
- - शांतनु सान्याल
   
 

 

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

कंटक सीमांत के अतिक्रम - -

इक अजीब सा खिंचाव है ज़िन्दगी,
दूर जितना भी जाना चाहें, हम
उतना ही ख़ुद को मोह
जाल में उलझता
पाएं, मुक्त
करने
की
चाह में क्रमशः डूबता जाए, गहन
से गहनतम अतल की ओर
ये अस्तित्व हमारा,
अदृश्य गोंद
की तरह
हैं
लिपटे हुए स्पृहा के घोल, जितना
ख़ुद को छुड़ाएं हम, उतना ही
उस से लिपटता जाएं,
दूर जितना भी
जाना चाहें,
हम
उतना ही ख़ुद को मोह जाल में - -
उलझता पाएं। वो प्रेम है या
जीने की अनबुझ कोई
तृषाग्नि, जितना
भूलना चाहें
उतना
ही
हम स्वयं को उस के क़रीब पाएं,
उन अंतरंग पलों में करने को
कुछ होता नहीं, घुटनों
के बल तब रेंगता
है अंदर का
आदिम
सरीसृप, समुद्र, आकाश, आलोक
सम्मेलन के अतिक्रम, तब
तुम्हारा अस्तित्व कर
जाता है मुझे पूर्ण
छायाच्छन्न,
हर तरफ
होती
है
अदृश्य कांटेदार सीमान्त, जीवन
उन भूमिगत पलों में आख़िर
जाए भी तो कहाँ जाए,
अदृश्य रस्साकशी
में उलझ के
रह जाए
सभी
उन्मुक्त भावनाएं, दूर जितना - -
भी जाना चाहें, हम उतना
ही ख़ुद को मोह जाल
में उलझता
पाएं।

* *
- - शांतनु सान्याल
    

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

खंडित परकोटा -

ऊँचे खम्बों में लटकते हैं कहीं सपनों
के विज्ञापन, बिखरा हूँ मैं उसी
के नीचे कहीं, उपभुक्त
किताबों की तरह,
तुम्हारा दर्द
है गहरा,
सोम -
रस से बुझ जाए शायद, जीर्ण पृष्ठों
में तलाशता हूँ मैं दिनयापन,
ऊँचे खम्बों में लटकते हैं
कहीं सपनों के
विज्ञापन।
पास
तुम्हारे खोने को कुछ भी नहीं, तुम
पा चुके समयोपरि, तुम्हारा
मन बहता है मुहाने
की ओर समुद्र
को पाने,
हम
खोजते हैं बैठ किनारे, डूबे हुए कुछ
रौशनी के दर्पण, ऊँचे खम्बों में
लटकते हैं कहीं सपनों के
विज्ञापन। तुम्हारी
रातें, करती हैं
अनगिनत
ग्रह -
नक्षत्र से बातें, मैं तह करता हूँ - -
क्रमशः घातें - प्रतिघातें, शेष
प्रहर जोगी है कोई, उतार
फेंकता है सभी छद्म -
अपनापन, ऊँचे
खम्बों में
लटकते हैं कहीं सपनों के विज्ञापन।
इस शहर के अंतिम छोर में
कहीं आज भी है मौजूद,
समय का एक टूटा
हुआ परकोटा,
जहाँ से
हो
कर जाती है एक पगडण्डी, सुदूर - -
खंडित तारों के देश, कदाचित
जहाँ कोई नहीं चाहेगा
अस्तित्व का
सत्यापन,
ऊँचे
खम्बों में लटकते हैं कहीं सपनों के
विज्ञापन।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

अदल-बदल का खेल - -

कैसे छोड़ दूँ सपनों के पीछे दौड़ना, अंदर
का रिले रेस, हर हाल में चाहता है,
तुम तक पहुंचना, मैंने बांध
ली है, ज़ख्मों के ऊपर
स्मृति रुमाल,
हाथों में हैं
कुछ
रंगीन पताका, हर एक जनम में लेकिन
तुम उसी दिगंत बिंदु पर रुकना,
अंदर का रिले रेस, हर हाल
में चाहता है, तुम तक
पहुंचना। कुछ
तितलियों
के मृदु
स्पर्श, कुछ सुबह की कच्ची धूप, कुछ
रंगीन पेंसिलों के उपहार, कहानियों
की किताब, कुछ मुस्कान भरे
उम्मीदों का हाथ बदल,
तुम उड़ान पल के
नीचे किसी
मासूम
शिशु
के आसपास कहीं ठहरना, अंदर का रिले
रेस, हर हाल में चाहता है, तुम तक
पहुंचना। उस कांच की दीवार
के उस पार, बसते हैं कुछ
रेशमी लिबास वाले,
काश, वो भी
जान पाते
ये ख़ुशियों का खेल, भावनाओं का अदल -
बदल, जो बंद है उनकी सोच में कहीं,
वो अक्सर चाहते हैं अन्तःस्थल
से बाहर छलकना, अंदर का
रिले रेस, हर हाल में
चाहता है, तुम
तक
पहुंचना।
 
* *
- - शांतनु सान्याल   
 

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

मायावी बंद संदूक - -

खोल न पाएंगे दुर्ग द्वार किसी तरह,
चाहे जितना भी बढ़ा लें हम क़द
अपना, नियति ने फेंक दी
है चाबियों का गुच्छा,
पोखर में कहीं,
तैरता है
टूटा
हुआ बिहान का सपना, चाहे जितना
भी बढ़ा लें हम क़द अपना। उम्र
भर हम ने छीनी है ग़र हक़
पराया, चौक पर कुत्तों
को बिस्कुट खिलाने
से अब क्या
फ़ायदा,
चाहे
दाने चुगाओ कबूतरों को, या चीटियों
को कराओ मधु पान, अतीत के
पृष्ठ नहीं बदलते, वो सभी
बंद हैं दराज़ में, मुद्दतों
से बाक़ायदा, जो
कुछ लिखा
जा चुका
है उसे
मुश्किल है अब बदलना, चाहे जितना
भी बढ़ा लें हम क़द अपना। उस बंद
दिव्य द्वार के अन्तःस्थल
में क्या है, किसे मालूम,
फिर भी हर कोई
चाहता है उसे
खोलना,
कोई
कोहरे की है वो ज़मीं, या शून्य के सिवा
कुछ भी नहीं, आलोक स्रोत का है
कोई उद्गम स्थल या स्वयं
को अंधकार में है अविरत
टटोलना, उस परम
सत्य के आगे
हर हाल
में है
हमें झुकना, चाहे जितना भी बढ़ा लें - -
हम क़द अपना।

* *
- - शांतनु सान्याल    

 

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past