मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

मंज़िल दर मंज़िल - -

सर ज़मीं ए ख़्वाब दिखा कर,
लोग न जाने कहाँ गए,
मुसलसल बियाबां
के सिवा कुछ
न था हम
जहाँ  
गए, उनका अपना है जो
चश्म ए अंदाज़, कैसे
कोई बदले, संग
ए बुत हो,
या
ख़ुदा का घर, हम सिर्फ़
तनहा गए, कहते हैं
यहाँ कभी था
इक लहराता
हुआ झील
दूर तक,

दरख़्त, न कोई साया, न
जाने किधर वो कारवां
गए, आईना कहता
है मुझसे ऐनक
को ज़रा
बेहतर
पोंछ
लूँ,
कोहरा है घना, राह बता कर
जाने कहाँ वो रहनुमा
गए - -
* *
- - शांतनु सान्याल

  

सोमवार, 20 दिसंबर 2021

अंतहीन यात्रा - -

हमेशा संधि - स्थल नहीं होता अंतिम
बिंदु, कुछ दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न दिशाओं
में, सूखे हुए तलछट
पर रह जाते हैं
निःशब्द से
कुछ
क़दमों के निशां, दौड़ते हुए से लगते
हैं पेड़ पौधे, खेत खलियान, नदी
पहाड़, फूलों से लदी वादियां,
कुहासे में डूबी हुई अंध
घाटियां, ज़िन्दगी
अपने अंदर
तब होती
है एक
वेगवान सी परिश्रांत नदी, वो रुकना
चाहती है किसी मोड़ पर एक रात
के लिए, लेकिन ज़रूरी नहीं
मिल जाए कोई सराय
सघन अरण्य
राहों में,
हमेशा संधि - स्थल नहीं होता अंतिम
बिंदु, कुछ दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न दिशाओं
में। मध्य रात के थे वो
सभी मेघ दल, छू
कर गए हैं
शायद  
मेरी
ओंठों के सतह, एक नमी सी है दिल
की गहराइयों तक, फिर सुबह
की है तलाश सर्द चाँदनी
रात के बाद, कुछ
पल सुकून तो
मिले नर्म
धूप
के पनाहों में, हमेशा संधि - स्थल
नहीं होता अंतिम बिंदु, कुछ
दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न
दिशाओं
में।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

शनिवार, 18 दिसंबर 2021

क्षितिज पार के पथिक - -

बूंद बूंद ओस रुकी है कहीं, दिगंत के
नयन कोर, अंगुष्ठ और तर्जनी
के मध्य है कहीं मुहाने की
ज़मीं, देखती है जिसे
मेरी ज़िन्दगी
हो कर
आत्म विभोर, यहां अष्ट प्रहर चलता
रहता है क्रय विक्रय, कदाचित हो
निस्तब्धता तुम्हारी ओर, बूंद
बूंद ओस रुकी है कहीं,
दिगंत के नयन
कोर। सभी
स्रोत हैं
रुके रुके से तुम्हारी भव्यता के आगे,
सभी नदियों का अंत है निश्चित,
सांझ घिरते ही लौट आएंगे
सभी विहग वृन्द, अपने
अपने घर, तुम हो
वहीं अपनी
जगह
स्थिर, समय चक्र अपनी लय पर है
भागे, बिखरे पड़े हैं दूर दूर तक
अतीत के सभी छिन्न -
भिन्न पृष्ठ, क्लांत
रात्रि खड़ी है
अपने
दहलीज़ पर एकाकी, सुदूर धुंध में -
है कहीं कांपता हुआ निरीह
भोर, बूंद बूंद ओस
रुकी है कहीं,
दिगंत के
नयन
कोर।
* *
- - शांतनु सान्याल

बुधवार, 15 दिसंबर 2021

अशेष रात्रि - -

 

मन की अगम गहराई जाने न कोई,
सतह को छू कर बस मुस्कुरा
जाते हैं लोग, जल चक्र
में थे सभी अटके
हुए, मौसम
का यूँ
सहसा रुख़ बदलना पहचाने न कोई,
मन की अगम गहराई जाने न
कोई। कौन डूबे कहां, किस
अंध घाटी के अंदर,
कहना नहीं
आसान,
इसी
पल में है समाहित सारा ब्रह्माण्ड - -
और पलक झपकते ही उस
पार बिखरा हुआ सारा
आसमान, सांस
के साथ ही
उठते
गिरते हैं चाहतों के रंगीन यवनिका,
नेपथ्य के हाथों में है अदृश्य
डोर, परम सत्य को
जान कर भी
उसे माने
न कोई,
मन की अगम गहराई जाने न कोई।
कोहरे के सीढ़ियों से उतरता है
धीरे धीरे आख़री पहर का
चाँद, तुम हो दिल के
क़रीब या रस्म
अदायगी
है ये
ज़िन्दगी, उड़ते हुए मेघ कणों को है
छूने की आस या मरू थल के
सीने में है भटकती हुई
कोई सदियों की
प्यास, किसी
चकमक
पत्थर
से
अपने आप उठती हैं चिंगारियां या
कुछ सुख के पल आज भी हैं
मेरे आसपास, अजीब सी
है ये नज़दीकियां,
दिल के क़रीब
हो कर भी
सभी,
दरअसल अपना माने न कोई, मन
की अगम गहराई
 जाने न
कोई।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

बुधवार, 8 दिसंबर 2021

कुछ याद रहा कुछ भूल गए - -

कोई चिड़िया थी, या कोई बल
खाती हुई कटी पतंग, बहुत
दूर किसी टीले से उसने
 समंदर को देखा
होगा,  न
चाह
कर भी ज़िन्दगी यहां बहुत - -
कुछ करा जाती है, दिल
को कोई देखता
नहीं, डूबती
नज़र
को
देखा होगा, उनकी चाहतों
का दरिया मुहाने तक
पहुँचता ही नहीं,
किसी
अनजान पहाड़ी से शाम के
मंज़र को देखा होगा,
परछाइयों के
शहर में
तुम
ढूंढते हो गुमसुदा जिस्म को,
बियाबां रात के सीने पर,
ओस के असर को
देखा होगा,
साहिल
पर
हैं बिखरे हुए अनगिनत
सीपों की कहानियां,
गहरी नींद में
उसने
किसी ख़्वाब ए रहगुज़र को
देखा होगा।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

टूटे हुआ तारों का पता - -

बहुत दीर्घ, नहीं होते जीवन के रास्ते, फिर भी
कोई नहीं करता प्रतीक्षा, बेवजह किसी
के वास्ते, सुदूर उस मोड़ से कहीं
मुड़ गए सभी यादों के साए,
मील का पत्थर रहा
अपनी जगह
यथावत,
उसे
क्या लेना देना, कोई आए या जाए, न जाने क्या
क्या न  लिखता रहा वो उम्र भर, फिर भी
अहसास की डायरी रही अधूरी, उस
एक धुंध भरे पड़ाव में आकर
उसने छोड़ दी आगे की
डगर, ख़त्म कहां
होती है मगर
अंतर्यात्रा,
जिधर
भी देखा घूमते प्रतिबिंबों की सिवा कुछ भी न - -
था, ताउम्र करता रहा अनगिनत हिसाब
किताब, अंत्यमिल में लेकिन प्रश्न
चिन्हों के सिवा कुछ भी न था,
मुश्किल था लौट के
आना हालांकि
अतीत की
आवाज़
आती
रही रुक रुक कर दूर तक, जब टूटा गुमनाम - -
कोई यायावर तारा, एक मौन अट्टहास
बिखरा हुआ था, अंतरिक्ष में दूर
दूर तक - -
* *
- - शांतनु सान्याल

मंगलवार, 16 नवंबर 2021

विकल्प की तलाश - -

 

न जाने कितने चेहरे, अपनी ही जगह रह
जाते हैं लौह स्तंभित, और वक़्त की
भीड़ भरी बस, गुज़र जाती है
पलक झपकते ही, हमारे
पास प्रतीक्षा के
अतिरिक्त
कोई
विकल्प नहीं होता, परछाइयां बढ़ कर हो
जाते हैं जब ऊँचे दरख़्त, तब जीवन
खोजता है तंग गलियों में अपने
होने का कोई ठोस सबूत,
उस अनुसंधान में
ज़रूरी नहीं
कि हम
हों
कामयाब, फिर भी खिल उठता है नाज़ुक
ह्रदय बच्चों की तरह, किसी कोने
में खोया हुआ ख़्वाब मिलते
ही, और वक़्त की भीड़
भरी बस, गुज़र
जाती है
पलक
झपकते ही। खोने और पाने का ग्राफ़ - -
अपनी जगह, चढ़ता उतरता रहता
है अनवरत, ज़िन्दगी कभी
थकती नहीं है, कभी
उच्च अक्षांश
पर रहते
हैं हम,
और कभी शून्य रेखा के किनारे रचते हैं
एक महादेश ! कहने को दूर दूर तक
है पसरा हुआ एक अशेष धूसर
मरुभूमि, जब तक सांस
है बाक़ी, वक्षस्थल
की गहराइयों
में ख़त्म
कहां
होती है उम्मीद की नमी, कुछ देर ही
रहता है कुहासे का साम्राज्य,
उजली धूप, हर हाल में
निकल आती है
धुंध के मेघ
छंटते ही,
और
वक़्त की  भीड़ भरी बस, गुज़र जाती है
पलक झपकते ही - -
* *
- - शांतनु सान्याल



सोमवार, 15 नवंबर 2021

इत्मीनान - -

कुछ भी नहीं बदला हमारे दरमियां, वही
कनखियों से देखने की अदा, वही
इशारों की ज़बां, हाथ मिलाने
की गर्मियां, बस दिलों में
वो मिठास न रही,
बिछुड़ कर
दोबारा
मिलने की आस न रही, खिड़कियों के -
उस पार, बहुत दूर हैं नील पर्वतों के
कगार, वादियों में फिर एक
शाम, हमेशा की तरह
सूरज डूबा है
अभी -
अभी, ढूंढता हूँ मैं अक्सर ज़िन्दगी के
अलबम में, अपना खोया हुआ
अस्तित्व, किंतु  अफ़सोस
वो आतशी कांच अब
मेरे पास न रही,
वही इशारों
की ज़बां,
हाथ मिलाने की गर्मियां, बस दिलों में वो
मिठास न रही। इक चाहत है या कोई
तह टूटे बिना लिबास, संदूक के
सिवा कोई नहीं दूसरा
विकल्प उसके
पास, एक
गंध था
या
कोई अनोखा सा अहसास, वक़्त के सभी
नेफ्थलीन, हो चुके विलीन, वो आज
भी है, रूह से गुथा हुआ मेरी
सांसों के आसपास,
इक बूंद क्या
मिली
उस
निगाह ए करम की, ज़िन्दगी में अब कोई
भी प्यास न रही।
* *
- - शांतनु सान्याल 

शनिवार, 13 नवंबर 2021

अहाते का सूखा दरख़्त - -

अब लौटना नहीं आसान, चाहे कोई
कितना भी दे आवाज़, जिस
व्यासार्ध से निकलते
थे कभी रास्ते,
उसी बिंदु
पर  
थम चुकी है ज़िन्दगी, अब वो दौर
भी नहीं कि बंद दरवाज़ों पर
दे कोई दस्तक, हर कोई
अपने ही दायरे में
है सिमटा
हुआ,
एक सरसरी नज़र की तरह हैं सभी
वाबस्तगी, जिस व्यासार्ध से
निकलते थे कभी रास्ते,
उसी बिंदु पर थम
चुकी है
ज़िन्दगी। हर एक चेहरे में होता है
अप्रकाशित कोई न कोई एक
इश्तेहार, बेवजह कोई
नहीं मिलता है
यहां, क्या
अपने
और क्या पराए, वही लेन देन की -
प्राचीन  परम्परा, वही जोड़ -
तोड़ का आदिम बाज़ार,
चाहतों के हैं बहुत
लम्बे से फ़र्द,
कुछ देर
की
है ये दस्त ए गर्मीबाज़ी, फिर हर
एक रिश्ता है बर्फ़ की तरह
पथरीला और सर्द, तब
जलाऊ दरख़्त से
कुछ कम नहीं
होती
अपनी मौजूदगी, जिस व्यासार्ध से
निकलते थे कभी रास्ते,
उसी बिंदु पर थम
चुकी है
ज़िन्दगी।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

हमसाया की तरह - -

ज़िन्दगी के अहाते में आज भी उभरती
हैं किसी के मौन शब्दों की छाया,
अप्रेषित पत्रों के तहों में
कहीं आज भी है
मौजूद इक
पुरातन
सी
गंध, कितने बार खिले गुलमोहर और
कितनी बार ही बिखरीं मुरझाई
हुई पंखुड़ियां,  जुगनू की
तरह आज भी हैं
बेकल कुछ
जज़्बात
मेरी
हथेलियों में बंद, जितना भी खोलूं वो
उलझी हुईं रेशमी एहसास, उतना
ही दिल ने मुझे हर पल है
भरमाया, ज़िन्दगी
के अहाते में
आज भी
उभरती
हैं
किसी के मौन शब्दों की छाया। वक़्त
के साथ टूट जाते हैं सभी बंध, एक
निःशब्द दूरत्व बढ़ा जाती  है
नदी की गहराई, तट
भी बदल जाते हैं
रुख़ अपना,  
अतीत
का
स्लेट रह जाता है अपनी जगह ले कर
सीने पर धुंधले हर्फ़, यादें भी हो
जाती हैं एक दिन ढलते
दिन की क्षणिक
पलों की दीर्घ
परछाई,  
फिर
भी
न जाने क्यों साथ कोई चलता है दूर
तक, जैसे ख़ामोश अदृश्य कोई
हमसाया, ज़िन्दगी के
अहाते में आज
भी उभरती
हैं किसी
के
मौन शब्दों की छाया - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 

शनिवार, 6 नवंबर 2021

वाष्पित बिम्ब - -

ओस में धुली हुई है निगार ए सहर,
रात के सीने में हैं दफ़्न, कितने
ही अनकहे अफ़साने, कोई
याद नहीं रखता गुज़रे
हुए अंधेरे के गुम
नाम ठिकाने,
ज़रा सा
सांस
ले लूँ फिर ज़िन्दगी करे आगाज़ ए
सफ़र, ओस में धुली हुई है
निगार ए सहर। नेपथ्य
में कहीं छोड़ आया
हूँ मैं अपना
असली
चेहरा,
जो लोग देखना चाहें वो दरअसल है
मायावी बिम्ब मेरा, यूँ भी इस
चकाचौंध की दुनिया में,
झूठ और सच के
तराज़ू पर
पड़ता
नहीं
कोई असर, ओस में धुली हुई है - -
निगार ए सहर।
* *
- - शांतनु सान्याल

गुरुवार, 4 नवंबर 2021

दीपावली मंगलमय हो - -

फिर हों बुझे चिराग़ रौशन, ज़िन्दगी
फिर बने दिवाली की रात, कुछ
खो दिया है अंधेरे में कहीं,
बहुत कुछ पा भी लिया
है उजाले के साथ,
दुआओं के लौ
जलते रहें अंतरतम की गहराइयों में अनवरत,
आँधियों का क्या है आते जाते
रहेंगे हमेशा की तरह, बस
इल्तिज़ा है इतनी कि
अपनों का कभी
न छूटे हाथ,
बहुत
कुछ पा भी लिया है उजाले के साथ।
- - शांतनु सान्याल
 

बुधवार, 27 अक्तूबर 2021

सुरमेदानी की तलाश - -

सुबह सरका गया, देह से लिपटे
सारे लिहाफ़, बिखरे हुए हैं
फ़र्श पर कुछ सुरमई
बूंदें, ज़िन्दगी
ढूंढती है
फिर
वही क़ीमती सुरमेदानी, दर्पण
मुस्कुराता है छुपा कर ओंठों
पर इक रहस्मयी गहराई,
इत्र कब से है गुम
हवाओं में, तैरती
है केवल
पलकों
तले
गंध की परछाई, इक नशा है
या कोई ख़ुमार ए तिलिस्म,
खींचे लिए जाए न
जाने कहां, राह
तो लगे है
ज़रा -
ज़रा सा पहचाना, मंज़िल है
मगर अनजानी, बिखरे
हुए हैं फ़र्श पर कुछ
सुरमई बूंदें,
ज़िन्दगी
ढूंढती
है
फिर वही क़ीमती सुरमेदानी।
* *
- - शांतनु सान्याल
   

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2021

जुलूस का मशाल वाही - -

वो सभी हो चुके हैं किंवदंती जिनका
बखान कर के आज तुम ख़ुद को,
महा मानव कहते हो, जातक
कथाओं में कहीं, तुम
आज भी हो वहीं
पर खड़े, जहाँ
था कभी
छद्म
रुपी सियार, ओढ़े हुए व्याघ्र छाल !
पहलू बदल बदल कर छलते हो,
वो सभी हो चुके हैं किंवदंती
जिनका बखान कर
के आज तुम
ख़ुद को,
महा
मानव कहते हो। दरअसल हर युग -
में कमोबेश इसी तरह से बार
बार बदलता है इतिहास,
भीष्म जोहते हैं
ऋतुओं  
का
परिवर्तन, जीवन खोजता है सिर्फ़
एकांतवास, उंगली काट कर
मीर ए कारवां की तरह
तुम शहीदों में
अपना
नाम
लिखवाने के लिए मचलते हो, वो
सभी हो चुके हैं किंवदंती
जिनका बखान कर
के आज तुम
ख़ुद को,
महा
मानव कहते हो।
* *
- - शांतनु सान्याल     



 
 

सोमवार, 18 अक्तूबर 2021

सुरभित उपहार - -

तटबंध के नीचे होते हैं न जाने कितने ही
गह्वर, काठ का सेतु कब टूट जाए,
नाव को कहाँ रहती है उसकी
ख़बर, फिर भी तुम हाथ
तो बढ़ाओ किनारे
की तरफ, कोई
न कोई तो
ज़रूर
होगा थामनेवाला, बड़ी उम्मीद से तकती
है तुम्हें ज़िन्दगी की रहगुज़र, काठ
का सेतु कब टूट जाए, नाव को
कहाँ रहती है उसकी ख़बर।
उपहार की है अपनी
ही एक नि:स्वार्थ
परिभाषा, जो
बदले में

रखे कोई भी अभिलाषा, अदृश्य सुरभि की
तरह जो बांध जाए, देह प्राण में मर्म
के धागे, वो अंतर्भाव जीवन को
परिपूर्ण कर जाए, कालकूट
की तरह, कंठ में रह
कर हो जाए अपने
आप अमर,
काठ
का सेतु कब टूट जाए, नाव को कहाँ रहती
है उसकी ख़बर।
* *
- -  शांतनु सान्याल

बुधवार, 13 अक्तूबर 2021

जनशून्य मंच - -

बिखरे पड़े हैं पतंग, जन शून्य है दर्शक
वीथी, थम चुके हैं नेपथ्य के सभी
वृंदगान, बुझ चुके हैं रंगीन
चिराग़, थम चुका है
वक्ष स्थल पर
पिघल कर
राग
बिहाग, सभी लेन देन हो चुके पूरे, सभी
नदियां जा मिली अंतिम स्थान, जन
शून्य है दर्शक वीथी, थम चुके हैं
नेपथ्य के सभी वृंदगान।
पथरीली सीढ़ियों
से चाँद भी
उतर
चला है, झील की अथाह गहराइयों में,
हम और तुम जैसे युगों से बैठे हों
यूँ ही रूबरू, ख़ामोश, चाँदनी
की परछाइयों में, रूह को
छू रही है तुम्हारी
संदली सांसें,
ब्रह्माण्ड
का
अस्तित्व यूँ ही बना रहे न रहे, मुझे
यक़ीन है, इन अमर पलों का
कभी न होगा अवसान,
जन शून्य है दर्शक
वीथी, थम चुके
हैं नेपथ्य
के सभी
वृंदगान।
* *
- - शांतनु सान्याल

रविवार, 10 अक्तूबर 2021

समान्तराल यात्रा - -

किसी एक चन्द्रविहीन रात में, देखा था
उसे जनशून्य रेलवे प्लेटफॉर्म में,
आँखों में लिए शताब्दियों
का अंधकार, मायावी
आकाश के पटल
पर सुदूर
तारे  
खेल रहे थे सांप - सीढ़ी, ज़िन्दगी देख
रही थी, बहुत दूर जा कर पटरियों
का अचानक शून्य में खो
जाना, जिसके बाद
नहीं है कोई भी
पांथ शाला,
जहाँ
नीचे है ऊसर ज़मीं का बिस्तर, और
ऊपर देह से लिपटा हुआ
जराजीर्ण उम्र का
दुशाला, एक
घने कोहरे
में डूबी
हुई
अरण्य घाटियां, दूर दूर तक फैले हुए
है रहस्य के अंबार, आँखों में लिए
शताब्दियों का अंधकार। रात
को गुज़रना है अपनी ही
लय में, अंकों का
हिसाब वक़्त
को नहीं
मालूम,
वो
अविरत बहता जाता है अपनी ही धुन
में अविराम, सुख - दुःख के कांटें
कहाँ होते हैं एक जगह कभी
स्थिर, एक दूजे से वो
टकराते हैं बार -
बार, आँखों
में लिए
शताब्दियों का अंधकार, मृगतृष्णा की
तरह सुबह खड़ा होता है क्षितिज
के उस पार - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 

शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

रिक्त स्थान की पूर्ति - -

बहुत कुछ कहने के बाद भी, बहुत
कुछ कहने को रहता है बाक़ी,
ये और बात है कि शब्दों
के ख़ाली स्थान भर
जाते हैं दीर्घ -
निःश्वास !
बहुत दूर जाने के बाद भी बहुत -
कुछ अनदेखा रह जाता
है, मुद्दतों एक ही
शहर में रह
कर भी
हम,
देख नहीं पाते अपने ही घर के
आस पास, शब्दों के ख़ाली
स्थान भर जाते हैं दीर्घ -
निःश्वास ! बहुत
क़रीब आने
के बाद
भी
दिलों की मुलाक़ात रहती है - -
अधूरी, सब कुछ छू कर भी
अनछुआ ही रहता
अक्स हमारा,
ख़ुद से
मिलने का हमें मिलता नहीं उम्र
भर इक पल का अवकाश,
शब्दों के ख़ाली स्थान
भर जाते हैं दीर्घ -
निःश्वास !
बहुत
कुछ सोचने के बाद रुक जाते हैं
हम अकस्मात् किसी एक
बिंदु पर, और छोड़
देते है और
अधिक
सोचना, बस उसी क्षण से ज़िन्दगी
ओढ़ लेती है कबीर वाला सन्यास,
शब्दों के ख़ाली स्थान
भर जाते हैं दीर्घ -
निःश्वास !  
* *
- - शांतनु सान्याल  

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2021

उम्रदराज़ परछाई - -

ढलती दोपहरी में नीम दरख़्त की
परछाई, तपते हुए बरामदे पर,
नाज़ुक सा इक मरहमी
एहसास रख जाए,
अजीब सी है
मुंतज़िर
पलों
की अनुभूति, उड़ चुके हैं सुदूर - -
फूलों की वादियों में, वो सभी
सप्तरंगी तितलियों के
झुण्ड, बंद पलकों
की सतह पर
तैरते हैं
कुछ
स्पर्श की बूंदें, जाते जाते हलकी सी
कोई मुस्कान मेरे ओठों के पास
रख जाए, तपते हुए बरामदे
पर, नाज़ुक सा इक
मरहमी एहसास
रख जाए।
अंतहीन
होती
है
उम्मीद की गहराई, सतह को छू कर
अंदाज़ लगाना है मुश्किल, जो
दिखता है ज़रूरी नहीं वो
असली हो, इस दौर
में क्या पीतल,
क्या सोना,
देख कर
फ़र्क़
बताना है मुश्किल, मूल्यांकन का क्या
है भरोसा, बदल जाए हर एक हाट
बाज़ार के मोड़ पर, अनछुई
सी इक ख़ालिस चमक
कोई  यूँ ही मेरे
पास रख
जाए,  
तपते हुए बरामदे पर, नाज़ुक सा - - -
इक मरहमी एहसास
रख जाए।
* *
- - शांतनु सान्याल

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2021

निःशब्द अनुभूति - -

मैं आज भी वहीं हूँ खड़ा, जहाँ से निकलती
थी एक धुंधली सी रहगुज़र, न जाने
कितनी बार उजड़ कर बसता
रहा, उस मोड़ के आगे
जो झिलमिलाता
सा है एक
ख़्वाबों
का शहर, तुम आज भी हो वहीं पर खड़े,
जहाँ पर ज़मीन को छूता सा लगे
आसमान, शायद तुम्हारे हाथ
में है कहीं ऋतु चक्र का
बिंदु कांटा ! बिद्ध
कर जाता है
अंधेरे में
भी
स्मृतियों का खंडहर, मैं आज भी वहीं
हूँ खड़ा, जहाँ से निकलती थी एक
धुंधली सी रहगुज़र। कांपते
उंगलियों से पूछते हैं
शब्द, निःशब्द
हो जाने
की
वजह, किस तरह से दिखाएं अपने - -
मौजूदगी का दस्तावेज़, असमय
के तूफ़ां से पूछ लेना यूँ ही
कभी, सब्ज़ पत्तों
के झर जाने
की वजह,
दूर तक
है लहरों का साम्राज्य, द्वीप का कोई
भी नामोनिशां बाक़ी नहीं, न जाने
किस कोण से आया था, किस
ओर चला गया, समय का
वो अनाहूत बवंडर,
मैं आज भी
वहीं हूँ
खड़ा,
जहाँ से निकलती थी एक धुंधली सी - -
रहगुज़र।
* *
- - शांतनु सान्याल

बुधवार, 6 अक्तूबर 2021

सुस्वागतम् - -

कांच के बक्से में हैं बंद कुछ रंगीन हवाई
मिठाई, एक सर्पिल सा कच्चा रास्ता,
सुदूर कांस वन से हो कर खो
जाता है उथली नदी के
किनार, पोखरों में
झांकता सा
लगे है
नीलाकाश, चंडी मंडप में हो रही है फिर -
एक बार लिपाई पुताई, कांच के
बक्से में हैं बंद कुछ रंगीन
हवाई मिठाई। पुष्प -
गंधों की पालकी
में हो सवार
आ रहे
हैं ऋतु शरद सुकुमार, कैलाश से आ रही
हैं उमा अपने ननिहाल, मंगल ध्वनि
संग साजे श्रद्धा के द्वार, हर
तरफ है व्याप्त मन
की अंतहीन
रौशनाई,
कांच
के बक्से में हैं बंद कुछ रंगीन हवाई - -
मिठाई।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

शनिवार, 2 अक्तूबर 2021

सिमटती नदी का कगार - -

चाँदनी मोम सी पिघल गई, उठा
गया कोई रात का झिलमिल
शामियाना, हल्का सा
ख़ुमार है बाक़ी,
बहुत निःसंग
सा लगे
डूबता
हुआ शुक्रतारा, अहाते का पेड़ है - -
ख़ामोश, लुटा कर अपना सब
हरसिंगार, कोई दस्तक
दहलीज़ तक आ कर
लौट जाती है
बार बार,
एक
पगडण्डी है, जो दूर तक जाती है न
जाने कहाँ, ढूंढती हुई अनाम
नदी का किनारा, बहुत
निःसंग सा लगे
डूबता हुआ
शुक्रतारा।
इस
गांव से नदी को रूठे हुए एक सदी
हो गई, फिर भी वो आज भी
है शामिल, दंतकथाओं
में कहीं, बरगद
और घाट
छूट
जाते हैं दूर समय के साथ, फिर भी
नदी बहती है हमारे बहुत
अंदर तक हर्ष और
व्यथाओं में कहीं,
काश उसे
स्पर्श
करें, तो उड़ेल दें हम सजल जीवन
सारा,  बहुत निःसंग सा लगे
डूबता हुआ शुक्रतारा।  
* *
- - शांतनु सान्याल
Art - Gangnendranath Tagore

गुरुवार, 30 सितंबर 2021

विलुप्त नदी - -

तृण शीर्ष पर कुछ ओस बूंद, देते
हैं आख़री सहारा झरते हुए
पारिजात को, दूरत्व
तो होता है बस
एक बहाना,
हर कोई
चाहता है ज़िन्दगी को नए सिरे से
सजाना, मीठी सी धूप ग़र
पसरी पड़ी हो अहाते
में दूर तक, कौन
याद रखता
है लौटी
हुई
बरसात को, तृण शीर्ष पर कुछ ओस
बूंद, देते हैं आख़री सहारा झरते
हुए पारिजात को। सुदूर
क्षितिज की ओर एक
सूखी सी नदी जा
मिलती है
किसी
अनाम मरु देश में, किनारे पर खड़े हैं
प्रागैतिहासिक पल्लव विहीन
वृक्ष साधुओं के वेश में,
पद चिन्हों के
जीवाश्म
भूल
चुके हैं सदियों पुरानी याद को, तृण
शीर्ष पर कुछ ओस बूंद, देते
हैं आख़री सहारा झरते
हुए पारिजात
को।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

मंगलवार, 28 सितंबर 2021

आत्म दीपो भवः - - -

अदम्य जिजीविषा हर एक वृत्त से
निकल कर, उन्मुक्त हो कर
हर एक परिधि लांघ
जाती है, उस
केंद्र बिंदु
में रह
जाते हैं सिर्फ अवसाद भरे दिन, इस
अंधकार से मुक्ति दिलाता है
केवल अपना अंतर्मन,
शुष्क नदी पथ पर
होते हैं दूर तक
प्रस्तर खंड,
लेकिन
इन्हीं
के नीचे होते है भूगर्भस्थ जल स्रोत -
नदी सूखने से पूर्व अपने सीने
के अंदर एक झील बांध
जाती है, ज़िन्दगी
उन्मुक्त हो
कर हर
एक
परिधि लांघ जाती है। न जाने कितनी
बार मृत्यु को पुकारा मैंने, न
जाने कितने बार जीवन
ने डूबने से उबारा
मुझ को, हर
एक की
होती
है अपनी अलग अहमियत, सहज पथ
कहीं भी नहीं, दिवा निशि चलता
रहता हैं लेन देन, ये जान
कर भी कि कुछ भी
नहीं रहता है
हमेशा,
फिर
भी लोग चाहते हैं ज़रूरत से अधिक - -
संचय, काश अंदर का दीप जला
पाता, किसे ख़बर पुनर्जन्म
मिले न मिले दोबारा
मुझ को, न जाने
कितने बार
जीवन
ने
डूबने से उबारा मुझ को।  
* *
- - शांतनु सान्याल
 

  

शनिवार, 25 सितंबर 2021

तट रेखा का इतिहास - -

अंधकार में सो जाते हैं जब सभी स्मृति
अरण्य, हम तलाशते हैं झींगुरों के
मध्य, जुगनुओं की बस्तियां,
तमाम रात शंखमय  
अस्तित्व बहता
चला जाता
है तट
की
ओर, कौन किस की ख़बर रखता है यहाँ,
डूब जाती हैं मझधार में, न जाने
कितनी ही अनजान कश्तियां,
हम तलाशते हैं झींगुरों
के मध्य, जुगनुओं
की बस्तियां।
बुनते हैं
हम
अपने अदृश्य खोल के अंदर असंख्य -
छद्म परिधान, अंदर में दूर तक
होता है खोखलापन का
साम्राज्य, लेकिन
हम दिखाते
हैं बाहर
लोगों
को, अभिजात्य की मिथ्या आन - बान,
समय सब कुछ धीरे धीरे निगल
जाता है, ढह जाते हैं एक दिन
शानदार महल हो या
रंगीन हवेलियां,
इतिहास के
पृष्ठों में
खो
जाते हैं तथाकथित महान हस्तियां, हम
तलाशते हैं झींगुरों के मध्य,
जुगनुओं की
बस्तियां।
* *
- - शांतनु सान्याल   
 
 
 

शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

आगंतुक - -

स्तब्धता के अंदर भी हैं अनेक स्तब्धता,
अश्वत्थ पल्लवों के अदृश्य सिहरन
में है कहीं, छुपे हुए आगंतुक
समीरण की दिशा, सब
कुछ घटता जाता
है प्रकृत लय
के साथ
कभी
हैं सुहावना दिन और कभी जीवन से - -
दीर्घ होती है महा निशा, अदृश्य
सिहरन में है कहीं, छुपे हुए
आगंतुक समीरण की
दिशा। किसी से
मिलने की
चाह में
हम
कई बार करते हैं चहलक़दमी रात भर,
और कई दफ़ा, मिल कर भी हम
रहते हैं बेहद उदास, जीवन
के इस ग्राफ में बहुधा
छूट जाते हैं कुछ
हाशिए के
बिंदु
जिन्हें हम ढूंढते हैं उम्र भर अपने आस -
पास, आख़िर में हम समेट लेते हैं
बचा - खुचा उपलब्ध हिस्सा,
अदृश्य सिहरन में है कहीं,
छुपे हुए आगंतुक
समीरण की
दिशा।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 23 सितंबर 2021

जागृत कुरुक्षेत्र - -

सुदूर तलहटी में ऊँघता सा है पुरातन
शहर, धीरे धीरे दिमाग़ से उतर
रहा है अफ़ीम का असर,
बिखरे हुए हैं, हर
तरफ राजसी
उतरन,
लोग
देख रहे हैं मुद्दतों से खुशहाल दिनों का
सपन, कौन किसे समझाए, हर
एक मोड़ पर है नशेड़ियों की
जमात, होशवाले बस
भटक रहे हैं दर
ब दर, धीरे
धीरे
दिमाग़ से उतर रहा है अफ़ीम का असर।
मुश्किल है विकल्प की खोज यहाँ,
लेकिन नामुमकिन नहीं, बस
दिलों में चाहिए कुछ कर
गुज़रने की आस,
वक़्त नहीं
लगता
उतारने में, सम्राट के मूल्यवान पोशाक,
दिलों में कहाँ सोता है कुरुक्षेत्र आठ
प्रहर, धीरे धीरे दिमाग़ से उतर
रहा है अफ़ीम का
असर।   
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

मंगलवार, 21 सितंबर 2021

हारी हुई बाज़ी - -

कई बार रास्ता भूल कर भी हम,
आख़िरकार लौट आते हैं उसी
जगह, और लौट आती
है हमारे संग, देह
से लिपटी हुई
धूप छाँव,
कई
बार न चाह कर भी हम जीते हैं
किसी और के लिए, इस
सोच में कि हमारे
खोने से कहीं
उजड़ न
जाए
किसी और का सपनों का गांव, - -
लौट आती है हमारे संग, देह
से लिपटी हुई धूप छाँव।
कई बार हम बिन
चश्मे के यूँ
ही देखना
चाहते
हैं नज़दीक के चेहरे, ताकि लोगों -
का नाटकीय अपनापन नज़र
न आए, अजीब सा मोह
होता है ज़िन्दगी में,
पलकों में होते
हैं घनीभूत
मेघ, और
हम
चाहते हैं कि टूट कर बूंद कहीं - -
चेहरे पर बिखर न जाए,  
हम जान बूझ कर
हार जाते हैं
हर बार
वो
ख़ुश होते हैं बाज़ीगर की तरह - -
खेल कर बच्चों वाला दांव,
लौट आती है हमारे
संग, देह से
लिपटी
हुई
धूप छाँव।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 
 


सोमवार, 20 सितंबर 2021

अंतर्नाद - -

मुहाने पर जा कर नदी भूल जाती है
समस्त अहंकार, सुदूर पीछे
छूट जाते हैं, झाऊ वन,
धसते हुए नाज़ुक
किनारे, घाट
के अध
डूबी
सीढ़ियां, सांध्य आरती, देवालय के
शीर्ष से उठता हुआ रास पूर्णिमा
का चाँद, विलीन होती हुई
गौ कंठी रुनझुन, सिर्फ़
सामने होता है एक
अंतहीन नील
पारावार,
मुहाने
पर
जा कर नदी भूल जाती है समस्त
अहंकार। सागरीय गर्भपथ से
हो कर जीवन करता है
अनवरत गहन
अंध यात्रा,
असंख्य
युगों
की तृष्णा लिए प्राण खोजता है उस
अतल में मुक्ति दायिनी मोती,
निमज्जित प्रवाल द्वीपों
में कहीं कदाचित हो
लुप्तप्राय विरल
प्रणय की
ज्योति,
फिर
भी कहाँ बुझ पाता है अभ्यंतरीण -
हाहाकार, मुहाने पर जा कर
नदी भूल जाती है समस्त
अहंकार।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

रविवार, 19 सितंबर 2021

निष्पलक दृष्टि - -

यथारीति, गंध बिखेर कर निशि पुष्प
झर गए रात के तृतीय प्रहर में,
उड़ चले हैं जाने कहाँ सभी
रतजगे विहग वृन्द,
हमारे दरमियां  
ठहरा हुआ
सा है
निःस्तब्ध, समय का घूमता आईना,
निष्पलक देखता हूँ मैं, तुम्हारी
आँखों में अपना, उभरता
डूबता हुआ प्रतिबिम्ब,
खो रहे हैं न जाने
कितने ही
लहर
अधर तीर के शहर में, यथारीति,
गंध बिखेर कर निशि पुष्प
झर गए रात के तृतीय
प्रहर में। थम गया
है आकाश में
आलोक
पर्व,
डूबने को है बस बिहान का सितारा,
तुम तलाशते हो मेरे बहुत
अंदर तक पहुँच कर
पुरसुकून कोई
मरुद्यान,
मैं भी
खोजता हूँ तुम्हारे दिल में उतर कर  
जीवन नदी का किनारा, काश
मिल जाते कुछ पीयूष
बूँद वास्तविकता
के ज़हर में,
यथारीति,
गंध
बिखेर कर निशि पुष्प झर गए रात
के तृतीय प्रहर में।
* *
- - शांतनु सान्याल 

शनिवार, 18 सितंबर 2021

कांच का ताजमहल - -

कांच के गुम्बदों में कहीं उतरा होगा
किसी नील चंद्र का प्रतिबिम्ब,
हर किसी को कहाँ मिलता
है सपनों का ताजमहल,
अदृश्य स्तम्भों
के ऊपर है
सितारों
का
शामियाना, हमारी इस मिल्कियत
में आलोक स्रोतों की है अंतहीन
हलचल, हर किसी को कहाँ
मिलता है सपनों का
ताजमहल। तुम
हो लुब्धक
तारक,
खोजते हो हर एक मोड़ पर बिल्लौरी
खदान ! हम तलाशते हैं सूखी
मिट्टी में विलुप्त वृष्टि के
निशान, रुग्ण सरोवर
के वक्ष स्थल पर
हर हाल में
लेकिन
खिलता है शतदल, हर किसी को कहाँ
मिलता है सपनों का ताजमहल।
* *
- - शांतनु सान्याल



 


शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

चश्मे के उस पार - -

इतिहास के पृष्ठों में गुम है कहीं सूखा
हुआ गुलाब, उधड़ी हुई कमीज से
ज़िन्दगी पोछती है, घिसे हुए
चश्मे के कोर, कहीं से
काश, नज़र तो
आए ओस
में डूबी
हुई
सुबह कोई लाजवाब, इतिहास के पृष्ठों
में गुम है कहीं सूखा हुआ गुलाब।
वक़्त है बड़ा अहमक, बच्चों
की तरह पैरों से मिटा
जाता है चाहतों
के रंगोली,
कोई जा
उसे
समझाए, अंतिम प्रहर तक रात खेलती
सप्त रंगों की होली, मैं आज भी
बुनता हूँ, रेशमी धागों के
नाज़ुक ख़्वाब, इतिहास
के पृष्ठों में गुम है
कहीं सूखा हुआ
गुलाब। अब
कुछ भी
नहीं
है शेष, जो कुछ था संचय वो सब कुछ
तुम्हें दे चुका, फिर भी जीने के
लिए तलबगार ज़रूरी है,
तुम्हारे अंतहीन
चाहतों की
सूचि
में,
जन्म जन्मांतर तक सिर्फ मेरा नाम
आना, यूँ ही बारम्बार ज़रूरी है,
ये और बात है कि धुएं के
साथ धूप गंध उड़
जाते हैं आकाश
पथ की ओर,
पड़ा रहता
है पृथ्वी
पर
भग्न मंदिर का प्रवेश द्वार, बिखरे
पड़े रहते हैं, मख़मली आसन,
पुष्प - पल्लव, अपठित
खुली हुई किताब,
इतिहास के
पृष्ठों में
गुम है
कहीं
सूखा हुआ गुलाब।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

बुधवार, 15 सितंबर 2021

उतराई के चेहरे - -

दूरत्व रेखा अदृश्य बढ़ती गई, अंततः
सभी मिलन बिंदु हो गए ओझल,
ज़िन्दगी खेलती है नियति
के साथ आंख मिचौली,
शैशव से बार्धक्य
की यात्रा हर
एक के
लिए
है ज़रूरी, कुछ मुक़ाम पर थे खिले हुए
बोगनबेलिया के फूल, कुछ पड़ाव
थे झरे हुए गुलमोहर, आईने
के किसी कोने पर हम
खोजते हैं खोया
हुआ यौवन,
आरोहण
से पूर्व
हर
एक चेहरा था जिज्ञासु, वादियों में थी
बिखरी हुई कोहरे की चादर, कुछ
अनाम अरण्य पुष्पों के रंगीन
झालर, समय की पटरियों
पर झुका कर चेहरा,
ज़िन्दगी खोजती
है दूर सरकती
हुई सांसों
की
गुंजन, शाम ढले तलहटी पर थे सभी
चेहरे गहराई तक बोझिल, दूरत्व
रेखा अदृश्य बढ़ती गई,
अंततः सभी मिलन
बिंदु हो गए
ओझल।
* *
- - शांतनु सान्याल

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

अध खुला दरवाज़ा - -

बहुत भुरभुरे से थे वो सभी मोह के
रिश्ते, ज़रा सी ठेस क्या लगी
हवाओं में बिखर गए,
ख़ुद से निकल कर
मैं अक्सर ख़ुद
को ढूंढता हूँ,
शहर भी
वही
है, लोग भी जाने पहचाने, आख़िर
मेरे चाहने वाले, जाने किधर
गए, ज़रा सी ठेस क्या
लगी हवाओं में
बिखर गए।
सड़क
भी
वही है, गली चौबारे भी हैं अपनी
जगह यथावत, बस बिजली
के तार हैं ग़ायब, फिर
भी रौशनी में डूबा
हुआ है ये
मायावी
शहर,
हर
एक अध खुले दरवाज़ों से झांकते
हैं जैसे हैरान सी आँखे, ले कर
अपना पहचान पत्र हम
जिधर गए, बहुत
भुरभुरे से थे
वो सभी
मोह
के रिश्ते, ज़रा सी ठेस क्या लगी
हवाओं में बिखर गए।
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

 

सोमवार, 13 सितंबर 2021

नारीत्व का मूल्य - -

एक अजीब सा भयाक्रांत शैशव हम
छोड़ जाते हैं पीपल के नीचे, न
जाने कितने गल्प और
कहानियों को बाँट
जाते हैं लिंग
भेद के
मध्य,
लड़कियों को प्रेत की कथा, और -
लड़कों को सुनाते हैं सिंह
शावक से खेलने की
महा शौर्य गाथा,
असल में
जन्म
से ही हम दिखाते हैं लड़कियों को
चौखट पर खड़ा कुपित दुर्वासा,
बस, उसी दिन से शुरू हो
जाती है पंख कतरने
की आदिम प्रथा,
फिर भी, ये
कल्प -
बेल की तरह बढ़ती जाती हैं नए -
नए दिगंत की ओर, रचती
हैं पृथ्वी पर अभिनव
रूपरेखा, उनके
गर्भगृह से
जन्म
लेते हैं हर युग में बारम्बार महान
विश्व पुरोधा - -
* *
- - शांतनु सान्याल  
 

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

बेरंग आकृति - -

मानचित्र अपनी जगह पड़ा हुआ है
यथारीति, नदी, पर्वत, पेड़ -
पौधे, कुहासे में तैरते
हुए तितलियों
के झुण्ड,
सब
कुछ हैं ख़ूबसूरत, फिर भी न जाने
क्या चाहता है तुम्हारे अंदर
का वन्य आदमी, तुम
देना नहीं चाहते
हो समरूप
जीने
की
स्वीकृति, मानचित्र अपनी जगह
पड़ा हुआ है यथारीति। न जाने
किस आकाश पार की ख़ुशी
चाहिए तुम्हें, नियति
के हथेलियों में
हैं बंद एक
बूंद भर
की
ज़िन्दगी, इस पल में है शामिल
कई जन्मों की नेमत, जो
हाथ से छूट जाए तो
न मिल पाए ये
दोबारा कभी,
सब कुछ
है शून्य
सा
इस जगत में, अगर दिल में न हो
तुम्हारे मानवीय प्रीति, मानचित्र
अपनी जगह पड़ा हुआ है
यथारीति। न जाने
किस धर्म कर्म
की वो बात
करते
हैं
अपने उच्च अभिलाष की ख़ातिर
मासूमों का नर संहार करते हैं,
चाहे क्यूँ न जीत ले हम
सारी पृथ्वी, ग़र न
जीत पाए दिल
की नाज़ुक
ज़मीं
तो
है दुनिया केवल बेरंग बेजान एक
अभिशप्त आकृति, मानचित्र
अपनी जगह पड़ा हुआ है
यथारीति।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

 

शनिवार, 4 सितंबर 2021

१० x १२ के अंदर - -

इस कंक्रीट अरण्य में अभी तक हैं बाक़ी
कुछ वयोवृद्ध, कटे - छंटे अश्वत्थ
के पेड़, ठूंठ की टहनियों में
ढूंढता हूँ मैं, गुमशुदा
कोलाहल, कुछ
जल  रंग
छवि
तैरते हैं सजल नयन के तीर, सुदूर कहीं
वादियों में कदाचित हो निर्वासित
पंछियों का शिविर, शब्दों के
कलरव में खोजता हूँ
मैं अपने प्रश्नों
का उत्तर
सरल,
ठूंठ की टहनियों में ढूंढता हूँ मैं, गुमशुदा
कोलाहल। कुछ चाँद के टुकड़े बिखरे
से पड़े हैं उड़ान सेतु के नीचे,
कुछ टूटे प्रहर के ख़्वाब
दौड़े भागे जा रहे
हैं मेट्रो रेल
के पीछे,
तुम
आज भी हो सिमटे हुए दस गुणा बारह
के अंदर, लोग न जाने कहाँ से कहाँ
पहुँच गए, तुम अपनी जगह
यथावत हो सदियों से
अचल, ठूंठ की
टहनियों में
ढूंढता
हूँ मैं,
गुमशुदा कोलाहल।  
* *
- - शांतनु सान्याल
 

 

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

धुएं की ज़द में - -

चोर दरवाज़ा कहीं न था, हर तरफ गुंथी
हुई थी जालीदार झालर, तुम्हारे
सामने मेरा आत्म समर्पण
के अलावा कोई उपाय
न था, वो कोई
प्रेम था या
तृषाग्नि
अब
सोचने से क्या फ़ायदा, धुएं की ज़द में
थी ये धरती, धुंधला सा आसमान,
महाशून्य में थे देह- प्राण, वहां
कोई भी हमारे सिवाय
न था, तुम्हारे
सामने
मेरा
आत्म समर्पण के अलावा कोई उपाय
न था। वो महा यज्ञ था, या कोई
सुप्त अनल उत्सव, हलकी
सी छुअन से जो हो गए
सृष्टि पूर्व के तपन,
अब अवशिष्ट
भष्म में
कुछ
भी नहीं पद चिन्ह, जो गुज़र गए नंगे
पांव, मुश्किल है उनका अनुसरण,
जीवन की त्रिकोणमिति में
हम तलाशते हैं एक
अदृश्य सुख का
अणु बिंदु,
जो
पाप पुण्य के घेरे से हो मुक्त, लेकिन
आसान नहीं है ज्वलंत अग्निपथ
का अनुकरण, जो गुज़र गए
नंगे पांव, मुश्किल है
उनका अनुसरण।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

   

 
 

बुधवार, 1 सितंबर 2021

विलुप्त संवाद - -

नदी पहाड़ का खेल खेलते हुए, बचपन
में कहीं मिला था एक घिसा हुआ
कांच का टुकड़ा, किसी दूर -
बीन से टूट कर गिरा
था शायद, बस
वहीं से
धुंधला गई थी ये पृथ्वी, आकाश बन -
गया था चिर धूसर, मिट्टी के घर
बनाते हुए कहीं मिला था
कभी एक स्फटिक
का टुकड़ा बस
वहीं से
चाहतों को, कदाचित लगा था एक - -
अभिशप्त ग्रहण, आजन्म जिस
से न मिल सकी मुक्ति,
आँख मिचौली के
उस खेल में
कौन,
किस, कोने में जा छुपा, आज तक - -
कुछ भी पता न चला, बस वहीं
से शुरू हुई थी अंतर्यात्रा,
कभी किसी अलस
दोपहरी में हम
ने किया
था
माचिस फोन का आविष्कार, मोह - -
का धागा बांधा था अपने दरमियां,
बस वहीं से ज़िन्दगी ढूंढ रही
है विलोपित शब्दों का
अर्थ - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 

मंगलवार, 31 अगस्त 2021

चकमक पत्थरों की भाषा - -

शब्दहीन ओंठों पर चिपके हुए हैं मुद्दतों से,
ख़्वाबों के ख़ूबसूरत चुम्बन, आईने
की हंसी में है व्यंग्य मिलित
कोई महिमा कीर्तन,
कौन किसे है
छलता
हैं
यहां, दरअसल हर चेहरे पर लगा होता है
और एक चेहरा, एकांत पलों में जो
घूरता है अरगनी से नग्न देह
का परावर्तन, आईने की
हंसी में है व्यंग्य
मिलित कोई
महिमा
कीर्तन। पत्थरों से है हमें प्रणय अभिलाष,
हम तराशते हैं उन्हें अपनी आदिम
तृष्णा मिटाने के लिए, रचते
हैं नित नए प्रयोग, छेनी
हथौड़ों से गढ़ते हैं
उसका बदन
ख़ुद की
ख़ुशी
पाने के लिए, भूल जाते हैं कि भाषाहीन
पत्थरों में है अदृश्य आग, जो कर
सकती है सोने का लंका दहन,
आईने की हंसी में है
व्यंग्य मिलित
कोई महिमा
कीर्तन।
* *
- - शांतनु सान्याल

सोमवार, 30 अगस्त 2021

निशांत पलों का पड़ाव - -

रात भर अंतःकरण के साथ चलता रहा
मीमांसा रहित कथोपकथन, कुछ
नोक झोंक, निशांत पलों का
मान मनौवल, आख़िर
रात ढले, झर गए
हरसिंगार,
उनींद
आँखों में था एक जागता हुआ उपवन,
फिर भी अशेष ही रहा स्वयं से
कथोपकथन। कभी शिखर
पर चढ़ते ही, एक ही
पल में शून्य
पर थी
ये ज़िन्दगी, समय के हाथों उलटता  
रहा पासा, नियति खेलती रही
सांप - सीढ़ी, कोई काम
न आ सकी जादू
की काठी,  
वही
पोशाक परिवर्तन, वही निःस्तब्ध -
मंच पर एकांकी प्रहसन, कुछ
भी न था अपना, एक
खोखला अहसास
और धुएं में
उठता
हुआ
ज़माने का अपनापन, रात भर - - -
अंतःकरण के साथ चलता
रहा मीमांसा रहित
कथोपकथन।
* *
- - शांतनु सान्याल


रविवार, 29 अगस्त 2021

जी भर के देखा ही नहीं - -

मुख़्तसर सी ज़िन्दगी कभी हो जाती है
कई शताब्दियों सी लम्बी, कभी
यूँ लगता है जी भर के तुम्हें
देखा ही नहीं, न जाने
कितने जन्मों से
भटक रहा
है ये
चाहतों का अश्वत्थामा ले कर अनंत -
अनुभूति, अनगिनत हिस्सों में
हैं रिसते हुए घाव फिर भी
अविरल जीवनदायी
है ये महा पृथ्वी,
न जाने क्यूँ
लगता है
कभी
कभी, कि तुम्हारे बग़ैर कुछ बचा ही
नहीं, कभी यूँ लगता है जी भर
के तुम्हें देखा ही नहीं। बस
वही पल अमर हो गए
जो हमने थे साथ
गुज़ारे, बाक़ी
थे ओस -
बूंद
पत्तियों के किनारे, आ कर जाने कहाँ
खो गए, कहने को यूँ तो, हाथ पर
रहे, असंख्य मोह के लचीले
छल्ले, तुम्हें जो चाहा
एक बार किसी
और को
हमने
यूँ मिट कर चाहा ही नहीं, कभी यूँ - -
लगता है जी भर के तुम्हें
देखा ही नहीं।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

 

शनिवार, 28 अगस्त 2021

अन्तःस्थल में कहीं - -

सजल नयन में है ग्रह नक्षत्रों का
आना जाना, पलकों के तीर
कहीं बसता है सपनों
का नगर, एक
बूंद की
सतह पर है ज़िंदगी का ठिकाना,
सजल नयन में है ग्रह नक्षत्रों
का आना जाना। तुम्हारी
रहस्यमयी, स्मित
में हैं बहमान
जुगनुओं
के
द्वीप, विस्तृत आलोक उत्सवों
का देश, जो पा जाएं उसे तो
उभर जाएं हम सुख दुःख
के तिर्यक जालों से,
वो क़रीब हो
कर भी
है
बहुत अनजाना, सजल नयन
में है ग्रह नक्षत्रों का
आना जाना।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

उस पार की मुलाक़ात - -

प्रस्तर युगीन, किसी एक आदिम बिहान
में कदाचित, अपना पुनर्मिलन हो,
गुह कंदराओं से निकल कर,
अरण्य वीथिकाओं में
कहीं हिम कणों
से धुल कर
पारदर्शी
ये जीवन हो, किसी एक आदिम बिहान
में कदाचित, अपना पुनर्मिलन
हो। अदृश्य उस मृत्यु पार
मुलाक़ात में, क्या
तुम पहचान
पाओगे ?
कहना शायद कठिन हो, फिर भी कहीं
न कहीं, पुष्प गंधों में शाब्दिक
स्पर्श रहेगा जीवित, तुम
छू लेना यूँ ही बेख़ुदी
में बिखरे हुए  
जीवाश्म
को,
मुमकिन है कहीं न कहीं मेरा ठिकाना
जान जाओगे, अदृश्य उस मृत्यु
पार मुलाक़ात में, क्या तुम
पहचान पाओगे ?
उस आदिम
लावण्य
में
पुनः हम सृजन करेंगे विमुक्त जीवन,
प्रकृति पुरुष का एकरूप
बंधन - -
* *
- - शांतनु सान्याल



  

गुरुवार, 26 अगस्त 2021

क्षणिक बिलगाव - -

पंखुड़ियों के नाज़ुक परतों पर हैं अभी
तक तितलियों के स्पर्श बाक़ी,
अन्तःगंध है सीमाहीन
मधु कोष हैं क्षण
भंगुर, आंख
की है
अंतहीन गहराई जो एक बार डूब जाए,
फिर सतह तक लौटना हो मुश्किल,
उम्र भर की उस जल समाधि
में जीवन पा जाए परम
सुख मधुर, अन्तः -
गंध है सीमाहीन
मधु कोष हैं
क्षण
भंगुर। बहमान नदी कहाँ रूकती है
किनारों के कोलाहल से, सुदूर
सागर तट पर जा मिलती
है, अपने गहन नील
प्रियतम से, रोज़
बाहर निकल
कर रास्ता
भूल
जाता है वयोवृद्ध जीवन, चाय की
दुकान, पार्क की जंग लगी
बेंच, कृत्रिम सामूहिक
हास्य, अनुलोम
विलोम के
बीच से
हो
कर, घर लौट आता है वो आख़िर,
हर कोई, कहीं न कहीं बंधा
रहता है अदृश्य खूंटी
के भरम से, सागर
तट पर जा
मिलती
है
बहमान नदी, अपने गहन नील -
प्रियतम से।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

बुधवार, 25 अगस्त 2021

जंतर मंतर - -

कोई नहीं पढ़ना चाहता, किसी का
जीवन-वृत्तांत, पड़े रहते हैं
असंख्य पाती पुराने
लिफ़ाफ़े के
अंदर,
उम्र भर हम तलाश करते हैं एक
अदद वाचक, जो थाह पाए
अंतःकरण की गहराई,
बहुत मुश्किल है
मिलना यहाँ
निःस्वार्थ
कोई
परछाई, लवणीय हास लिए दूर
से तकता है नील समंदर, पड़े
रहते हैं असंख्य पाती
पुराने लिफ़ाफ़े के
अंदर। पुष्प
और
भ्रमर के मध्य घूमता रहता है
मधु चक्र, यूँ ही आते जाते
रहते हैं सदा ऋतुओं
के प्रेम पत्र, हर
पल सृष्टि
गढ़ती
है
जीवन के अपरिभाषित रूप -
कदाचित प्रकृति जानती
हो, अलौकिक कोई
जंतर मंतर,
पड़े रहते
हैं
असंख्य पाती पुराने लिफ़ाफ़े
के अंदर - -
* *
- - शांतनु सान्याल

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

अप्रत्याशित आगमन - -

उन्मेषित चाँदनी रात की चाहत में
ज़रूरी है, गुज़रना नागकणि के
राहों से, उस अधर पार है
सत या असत की
बूंदें, किसे क्या
ख़बर, रोक
पाना
है बहुत कठिन देह - प्राण को कांटे
दार चाहों से, ज़रूरी है, गुज़रना
नागकणि के राहों से। वो
कालिंदी तट हो या
सुदूर नील नद,
हर युग में,
होते हैं
विष पूर्ण सरीसृप, और त्राण हेतु -
हर युग में होते हैं कहीं न कहीं
महत् प्राण के अवतरण,
बुझते नहीं जीवन
के आलोक
स्तम्भ,
खुले
रहते हैं, सभी विकल्प द्वार गहन
समुद्र के बंदरगाहों से, ज़रूरी है,
गुज़रना नागकणि के
राहों से।
* *
- - शांतनु सान्याल


 

 

सोमवार, 23 अगस्त 2021

बंधन मुक्त प्रभात - -

हिन्दुकुश से लेकर म्यांमार तक हमने
देखा है, वही मासूम चेहरे चीखते
हुए, कांटेदार तारों के बीच
हाथ बढ़ा कर जीवन
की भीख मांगते
हुए, उड़ते
विमान
से
नीचे गिरते हुए, ख़ैबर दर्रे से निकल
कर हो सुदूर मलय प्रदेश, वही
मानवता का शव उठा कर
लोगों ने फेंका है बारम्बार,
हमने देखा है निरीह
लोगों का महा
निष्क्रमण,
रेल की
पटरियों में बिखरे हुए अंग प्रत्यंग,
गंगा के किनारों पर उभरी हुई
क़ब्रें, जली हुई झोपड़ियां,
टूटी हुई हांड़ी, बिखरे
हुए अध पके
चांवल,
हमने देखा है शुभ्र वस्त्रों में लोगों
का वीभत्स अट्टहास, वो
बामियान हो, या
उत्तर कोलकाता
मूर्ति तोड़ने
वाले
कहाँ नहीं मौजूद, हमने देखा है - -
स्वभाषा न होने का दंश,
वही लोग जो देते हैं
राष्ट्रभक्ति,
स्वधर्म
का
हुंकार, राजत्व की ख़्वाहिश में वही
चेहरे, अपनी ही जाति पर करते
हैं अत्याचार, हमने देखा है,
बहुत कुछ लघु जीवन
में, फिर भी हम
देखना चाहते
हैं एक
बंधन मुक्त भीगा सा प्रभात, जहाँ
हर चेहरा लगे शबनमी
गुलाब - -
* *
- - शांतनु सान्याल   
 










रविवार, 22 अगस्त 2021

कांच की किरचें - -

कितनी सहजता से हम कह जाते हैं जो
गुज़र गया सो गुज़र गया, फिर भी
रात गहराते हम टटोलते हैं
गुज़रे हुए लम्हात,
स्मृति की
झोली
यूँ ही निष्क्रिय पड़ी रहती है बंद आंख
के किनारे, कांच की चुभन लिए
उंगलियों में, ज़िन्दगी
करवट बदलती
है सारी
रात,
रात गहराते हम टटोलते हैं गुज़रे हुए
लम्हात। किसे फ़ुर्सत है जो सोचे
किसी सजल आंख की आत्म
कहानी, अपना अपना
हिस्सा है सहर्ष
स्वीकार
करें,
साहसी सुबह की नाज़ुक धूप दरवाज़े
पर दे रही है दस्तक, बासी हो
कर भी ताज़ा है डेहरी पर
पड़ा हुआ अख़बार,
बस बाक़ी तो
है आनी
जानी,
इस से बड़ा सुख क्या होगा, सब कुछ
लुटने के बाद भी हे जिजीविषा
तुम आज भी हो मेरे साथ,
रात गहराते हम
टटोलते हैं
गुज़रे
हुए
लम्हात, ताउम्र नहीं भूल पाते हैं हम
गुज़रनेवाली बात।
* *
- - शांतनु सान्याल

शनिवार, 21 अगस्त 2021

मुलाक़ात - -

कितने दिनों के बाद यूँ आईने से बात हुई,
एक ज़माने के बाद, ख़ुद से मुलाक़ात हुई,
उम्र तो गुज़र गई, दरख़्तों के देखभाल में,
आख़री ढलान पे जा कहीं परछाई साथ हुई,
किसे याद रहता है, बचपन की नादानियां,
ख़्वाबों के सफ़र में, यूँ तमाम मेरी रात हुई,
हर कोई था बेचैन, हर कोई जां बचाता सा,
रात ढलते ज़िन्दगी इक आवारा जज़्बात हुई,
आप भी चाहें तो आख़री क़हक़हा लगा जाएं,
बहोत दिनों बाद शहर में, आज बरसात हुई।  
* *
- - शांतनु सान्याल

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past