शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

आगंतुक - -

स्तब्धता के अंदर भी हैं अनेक स्तब्धता,
अश्वत्थ पल्लवों के अदृश्य सिहरन
में है कहीं, छुपे हुए आगंतुक
समीरण की दिशा, सब
कुछ घटता जाता
है प्रकृत लय
के साथ
कभी
हैं सुहावना दिन और कभी जीवन से - -
दीर्घ होती है महा निशा, अदृश्य
सिहरन में है कहीं, छुपे हुए
आगंतुक समीरण की
दिशा। किसी से
मिलने की
चाह में
हम
कई बार करते हैं चहलक़दमी रात भर,
और कई दफ़ा, मिल कर भी हम
रहते हैं बेहद उदास, जीवन
के इस ग्राफ में बहुधा
छूट जाते हैं कुछ
हाशिए के
बिंदु
जिन्हें हम ढूंढते हैं उम्र भर अपने आस -
पास, आख़िर में हम समेट लेते हैं
बचा - खुचा उपलब्ध हिस्सा,
अदृश्य सिहरन में है कहीं,
छुपे हुए आगंतुक
समीरण की
दिशा।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा 25.09.2021 को चर्चा मंच पर होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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  2. वाह!बहुत सुंदर सृजन सर हमेशा की तरह।
    अदृश्य
    सिहरन में है कहीं, छुपे हुए
    आगंतुक समीरण की
    दिशा। किसी से
    मिलने की
    चाह में
    हम
    कई बार करते हैं चहलक़दमी रात भर... वाह!👌

    जवाब देंहटाएं

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