17 सितंबर, 2021

चश्मे के उस पार - -

इतिहास के पृष्ठों में गुम है कहीं सूखा
हुआ गुलाब, उधड़ी हुई कमीज से
ज़िन्दगी पोछती है, घिसे हुए
चश्मे के कोर, कहीं से
काश, नज़र तो
आए ओस
में डूबी
हुई
सुबह कोई लाजवाब, इतिहास के पृष्ठों
में गुम है कहीं सूखा हुआ गुलाब।
वक़्त है बड़ा अहमक, बच्चों
की तरह पैरों से मिटा
जाता है चाहतों
के रंगोली,
कोई जा
उसे
समझाए, अंतिम प्रहर तक रात खेलती
सप्त रंगों की होली, मैं आज भी
बुनता हूँ, रेशमी धागों के
नाज़ुक ख़्वाब, इतिहास
के पृष्ठों में गुम है
कहीं सूखा हुआ
गुलाब। अब
कुछ भी
नहीं
है शेष, जो कुछ था संचय वो सब कुछ
तुम्हें दे चुका, फिर भी जीने के
लिए तलबगार ज़रूरी है,
तुम्हारे अंतहीन
चाहतों की
सूचि
में,
जन्म जन्मांतर तक सिर्फ मेरा नाम
आना, यूँ ही बारम्बार ज़रूरी है,
ये और बात है कि धुएं के
साथ धूप गंध उड़
जाते हैं आकाश
पथ की ओर,
पड़ा रहता
है पृथ्वी
पर
भग्न मंदिर का प्रवेश द्वार, बिखरे
पड़े रहते हैं, मख़मली आसन,
पुष्प - पल्लव, अपठित
खुली हुई किताब,
इतिहास के
पृष्ठों में
गुम है
कहीं
सूखा हुआ गुलाब।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

8 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(१८-०९-२०२१) को
    'ईश्वर के प्रांगण में '(चर्चा अंक-४१९१)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. ओस
    में डूबी
    हुई
    सुबह कोई लाजवाब, इतिहास के पृष्ठों
    में गुम है कहीं सूखा हुआ गुलाब।
    बहुत ही सुन्दर...
    लाजवाब सृजन।

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  3. वक़्त है बड़ा अहमक, बच्चों
    की तरह पैरों से मिटा
    जाता है चाहतों
    के रंगोली,
    कोई जा
    उसे
    समझाए, अंतिम प्रहर तक रात खेलती
    सप्त रंगों की होली, मैं आज भी
    बुनता हूँ, रेशमी धागों के
    नाज़ुक ख़्वाब, इतिहास
    के पृष्ठों में गुम है
    कहीं सूखा हुआ
    गुलाब

    सुंदर रचना...

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