दूरत्व रेखा अदृश्य बढ़ती गई, अंततः
सभी मिलन बिंदु हो गए ओझल,
ज़िन्दगी खेलती है नियति
के साथ आंख मिचौली,
शैशव से बार्धक्य
की यात्रा हर
एक के
लिए
है ज़रूरी, कुछ मुक़ाम पर थे खिले हुए
बोगनबेलिया के फूल, कुछ पड़ाव
थे झरे हुए गुलमोहर, आईने
के किसी कोने पर हम
खोजते हैं खोया
हुआ यौवन,
आरोहण
से पूर्व
हर
एक चेहरा था जिज्ञासु, वादियों में थी
बिखरी हुई कोहरे की चादर, कुछ
अनाम अरण्य पुष्पों के रंगीन
झालर, समय की पटरियों
पर झुका कर चेहरा,
ज़िन्दगी खोजती
है दूर सरकती
हुई सांसों
की
गुंजन, शाम ढले तलहटी पर थे सभी
चेहरे गहराई तक बोझिल, दूरत्व
रेखा अदृश्य बढ़ती गई,
अंततः सभी मिलन
बिंदु हो गए
ओझल।
* *
- - शांतनु सान्याल

आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा 16.09.2021 को चर्चा मंच पर होगी।
जवाब देंहटाएंआप भी सादर आमंत्रित है।
धन्यवाद
दिलबागसिंह विर्क
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 16 सितंबर 2021 को लिंक की जाएगी ....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
सराहनीय सृजन हमेशा की तरह।
जवाब देंहटाएंआरोहण
से पूर्व
हर
एक चेहरा था जिज्ञासु, वादियों में थी
बिखरी हुई कोहरे की चादर.. वाह!गज़ब सर 👌
बहुत सुंदर सृजन
जवाब देंहटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुंदर और सराहनीय रचना
जवाब देंहटाएंसार गर्भित रचना ।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन👌♥️
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