बुधवार, 31 मई 2017

अगला दरवाज़ा - -

 रात के आख़री पहर, सर्द हवाओं
के हमसफ़र, कभी तो गुज़रो
यूँ ही बेख़ुदी में इस
रहगुज़र।
वो तमाम कागज़ी नाव डूब गए
रफ़्ता - रफ़्ता, किनारों में
अब नहीं बसते
जुगनुओं के
शहर। वो
मांगते हैंअक्सर हम से वफ़ादारी
का सबूत, जो  लोग ओढ़े रहे,
फ़रेब का लबादा उम्र भर।
चेहरे और मुखौटे में
यहाँ तफ़ावत
नहीं आसां,
हाथ तो
मिलते
 हैं मगर, दिल होता है बेख़बर। चलो 
किसी बहाने ही  सही उसने 
याद किया, वरना अगला
दरवाज़ा भी यहाँ होता
है बेअसर। 

* *
- शांतनु सान्याल
 

सोमवार, 22 मई 2017

रौशनी की बूंद - -

 कुछ कच्चे ख़्वाब टूट जाते हैं सुबह से
पहले, और कुछ तपते हैं उम्र भर,
फिर भी कहीं न कहीं सूरज
से शिकायत रह जाती
है दिल ही दिल
में, काश !
नरम
धूप में खिलता मुरझाया बचपन और - -
ख़्वाबों को मिलते धीरे धीरे एक
मुश्त तपन, लेकिन नियति
के आगे सब कुछ जैसे
होता है अर्थहीन,
कब कोंपल
बन जाए
एक
धूसर वृक्ष कहना नहीं सहज, देह में रहते
हैं केवल अस्थिपंजर, और सूरज के
दिए हज़ारों दग्ध निशान, फिर
भी जीवन सेमल की तरह
खिला रहता है सुबह
शाम, सीने में
समेटे
अनगिनत कांटों  के गुलिस्तान, सजाता
है वो हर हाल में लेकिन, नाज़ुक
ख़्वाबों के बियाबान।

* *
- शांतनु सान्याल

बुधवार, 10 मई 2017

निमिष मात्र - -

बिन कुछ कहे, बिन कुछ बताए, साथ चलते
चलते, न जाने कब और कहाँ निःशब्द
मुड़ गए वो तमाम सहयात्री।
असल में बहुत मुश्किल
है जीवन भर का
साथ निभाना,
कुछ न
चाह कर भी बदल जाते हैं रास्ता अपना, कुछ
यूँ ही बंधे रहते हैं मजबूरियों की बेड़ियाँ
पांवों में डाल कर। न जाने वो कौन
थे जिन्होंने लिखी थी रूहानी
प्रणय कहानियाँ, जन्म - 
जन्मांतर के बंधनों
पर मख़मली
मुहर की
निशानियाँ। कोई भी साथ नहीं चलता उम्रभर,
वस्तुतः सब कुछ बंधा है, निमिष मात्र
की झिलमिलाहट पर। कौन किस
मोड़ पर अकेला छोड़ जाए,
कहना नहीं आसान।
यहाँ तक की
प्रतिबिम्ब
भी
बहुधा मांगता है मौजूद होने का एक मुश्त - -
प्रमाण।

* *
- शांतनु सान्याल






सोमवार, 8 मई 2017

ये सोच कर अच्छा लगता है - -

बेवजह ही हम सोचते हैं कल सुबह
के वास्ते, जबकि पल में क्या
हो कहना है मुश्किल,
रोज़ सींचता हूँ
मैं गैलरी
के उस नन्हें से पौधे को, सोचता हूँ
कि कब उसमें फूल खिलेंगे,
और कब गन्धकोष से
सुगंध बिखरेंगे,
हालाँकि
हर चीज़ बंधा है अपनी जगह काल
चक्र से, फिर भी सपनों की
भूमि में सैर करना अच्छा
लगता है। मुझे मालूम
है किसी को भी
अपना बनाना
इतना भी
आसान नहीं, फिर भी रोज़ सुबह -
सवेरे, पक्षियों को बाजरी देना
अच्छा लगता है, उनका
यूँ निर्भय हो कर
पास आना
और
कौतूहल दृष्टि लिए देखना दिल को
सुकून देता है तपती  दुपहरी
में यूँ मैनों का चहचहाना,
अंतर्मन को कुछ
अलग तरह
से
पुलकित कर जाता है। माटी के - -
कटोरों में जल भरना अच्छा
लगता है, मालूम है
मुझको रस्मे
दुनिया
फिर भी नन्हें क़दमों को सहारा देना
अच्छा लगता है। पक्षी हों या
पौधे या मासूम बच्चों की
निर्मल हंसी, सब एक
दिन अपनी
तरह से
खिलेंगे, अपनी तरह से उड़ेगें, ये - -
सोच कर जीवन सार्थक
लगता है।

* *
- शांतनु सान्याल


रविवार, 7 मई 2017

उन्मुक्त अभियान - -

रिश्तों के ग्राफ, सागरमुखी नदी,अहाते
की धूप, स्थिर कहाँ होते हैं, मौसम
के साथ बदल जाते हैं अपना
रास्ता, कुछ उकताहट,
कुछ मीठापन
रह जाता
है अपने साथ। यूँ तो बड़ी नज़ाकत से -
उसने, दिल के संदूक में तह किया
था मेरे हिस्से के रौशनी को,
लेकिन वक़्त ने आख़िर
छोड़ दी सिलवटों
के निशान।
जो भी
हो अच्छा लगता है नाज़ुक तितलियों का
यूँ हथेली पर आ उड़ जाना, मेघों
का ईशानकोण में उभरना,
अनाहूत नीम सर्द हवाओं
का शाम ढले
धीरे धीरे
बहना। दरअसल ज़िन्दगी को चाहिए कभी
कभी, इक मुश्त कबूतरों की उड़ान,
बहुत दूर, उन्मुक्त अभियान।

* *
- शांतनु सान्याल

शनिवार, 6 मई 2017

मेरे आसपास - -

जो कुछ टूटा फूटा बिखरा हुआ सा था
वो सभी तो मेरा अपना था, किसे
स्वीकार करें और किसे त्याग
करें, कहाँ मिलता है इस
दुनिया में मन वांछित
सुख। हमने भी
रफ़ू करके
जीना
सीख लिया। जो कुछ भी था अपने पास
बस उसी को भाग्य समझ लिया,
कुछ बेरंग दीवारों पर हमने
टांग दिए पुराने कैलेण्डर,
रंग विहीन फर्निचरों
पर चढ़ा दिए
चटक
रंगों के सस्ते आवरण, आईने की भी
शिकायत दूर की, गीले कपड़े से
उसे पोंछ दिया, लेकिन
बिम्ब को संवारना
नहीं था सहज,
अतएव
उसे सहर्ष स्वीकार किया, जैसा भी था
अपना जीवन, उसे हमने भरपूर
जिया। आए हो बरसों बाद
ज़रा बैठो, कुछ सुनो,
कुछ सुनाओ, न
देखो मेरे
आसपास, ये सभी आत्मीय स्वजन हैं -
मेरे, ज़रा से फटे पुराने ज़रूर हैं,
जब देह में ही दरारें निकल
आएं तब इन निर्जीव
वस्तुओं की क्या
बिसात।
समय अपना सूद हर हाल में वसूलता
है और छोड़ जाता है झुर्रियों के
निशान, जंग लगे परतों पर
लिख जाता है अतीत
के अहंकारी
गान।

* *
- शांतनु सान्याल



शुक्रवार, 5 मई 2017

मौन आर्तनाद - -

तमाम लेनदेन रहते हैं निस्तब्ध से
जब उतरती है, सांझ दबे पाँव
पीपल तले, देह में लपेटे
रहस्यमयी अंधकार।
पुरातन मंदिर
के पट
जब होते हैं बंद, जीवन चक्र होता
है पुनः जागृत। सांध्य प्रदीप
के उठते धूम्र वलय
के साथ फिर
सजते हैं
राजपथ के मीनाबाज़ार। कुछ मृत
सीपों के खोल, कुछ वीरान
निगाहों के मरुस्थल,
कुछ दम तोड़तीं
समंदर की
लहरें
लिख जाती हैं गीले रेत पर जीवन
की कुछ अनकही कहानी,
कुछ अभिशप्त कथा
जो हैं यथावत
अपनी
जगह अडिग -अचल, कहने को - 
सारी पृथ्वी का रूप - रंग हो
चुका है बदल, लेकिन
नग्न सत्य है अपनी
जगह अविचल।
वही सजल
नेहों से
तकती, थकीहारी रात्रि करती है
पुनः विहान का अभिवादन,
स्व विलीन हो कर नव
सृजन की ओर
अग्रसर।

* *
- शांतनु सान्याल

गुरुवार, 4 मई 2017

सभी को चाहिए - -

सभी को चाहिए कहीं न कहीं कुछ पल
सुकून भरा, कुछ महकते हुए दिन
कुछ खिलती हुईं रातें, कुछ
ख़ालिस अपनापन, कुछ
ख़ामोश निगाहों की
बातें। सभी को
चाहिए
कभी न कभी, कुछ नज़दीकियों की - -
गर्माहट, कुछ सर्दियों के ढलते
दिन, कुछ जाने पहचाने
दिल को छूते हुए
मधुरिम से
आहट,
सभी को चाहिए किसी न किसी मोड़ पर
मुन्तज़िर चेहरे, कुछ गुलाबी मुस्कान,
कुछ ख़ुश्बुओं  में डूबे हुए कलरव,
कुछ खुला खुला सा नीला
आसमान, तमाम
मुखौटों से
दूर
कोई इक सच्चा इंसान, सभी को चाहिए
कुछ पल के लिए ही सही सभी दुःख
दर्द से अवसान।

* *
- शांतनु सान्याल 

 

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