शनिवार, 6 मई 2017

मेरे आसपास - -

जो कुछ टूटा फूटा बिखरा हुआ सा था
वो सभी तो मेरा अपना था, किसे
स्वीकार करें और किसे त्याग
करें, कहाँ मिलता है इस
दुनिया में मन वांछित
सुख। हमने भी
रफ़ू करके
जीना
सीख लिया। जो कुछ भी था अपने पास
बस उसी को भाग्य समझ लिया,
कुछ बेरंग दीवारों पर हमने
टांग दिए पुराने कैलेण्डर,
रंग विहीन फर्निचरों
पर चढ़ा दिए
चटक
रंगों के सस्ते आवरण, आईने की भी
शिकायत दूर की, गीले कपड़े से
उसे पोंछ दिया, लेकिन
बिम्ब को संवारना
नहीं था सहज,
अतएव
उसे सहर्ष स्वीकार किया, जैसा भी था
अपना जीवन, उसे हमने भरपूर
जिया। आए हो बरसों बाद
ज़रा बैठो, कुछ सुनो,
कुछ सुनाओ, न
देखो मेरे
आसपास, ये सभी आत्मीय स्वजन हैं -
मेरे, ज़रा से फटे पुराने ज़रूर हैं,
जब देह में ही दरारें निकल
आएं तब इन निर्जीव
वस्तुओं की क्या
बिसात।
समय अपना सूद हर हाल में वसूलता
है और छोड़ जाता है झुर्रियों के
निशान, जंग लगे परतों पर
लिख जाता है अतीत
के अहंकारी
गान।

* *
- शांतनु सान्याल



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