बुधवार, 30 जून 2021

लकीरें - -


आकाश पार बहती हैं अदृश्य
कुछ सप्तरंगीय प्रवाहें,
एक स्वप्नमयी
पृथ्वी शायद
है कहीं
अन्तरिक्ष में, सुप्त शिशु के
मंद मंद मुस्कान में
देखा है उसे कभी,
नदी के बिखरे
रेत में
किसी ने लिखा था पता - -
उसका बहुत कोशिश
की, पढ़ न पाए,
लकीरें जो
वक़्त ने
मिटा दिए, चेहरें में उभर
आईं काश ! उठते
ज्वार की
लहरें
इन्हें भी बहा लेतीं, अर्घ्य
में थे कुछ शब्द जो
कभी वाक्य न
बन पाए,
कुछ बूंदें पद चिन्हों में सिमट
कर खो गए, वो कभी मेघ
न बन पाए सुना है ये
नदी गर्मियों में
कगार बदल
जाती है
फिर
कभी मधुमास में, कहीं और
किसी किनारे मिलेंगे
तुमसे  - -
--- शांतनु सान्याल

मंगलवार, 29 जून 2021

ज़िन्दगी का संविधान - -

पुरातन अभिलेख देते हैं दस्तक, विलुप्त
दरवाज़ों का मिलता नहीं कोई भी
नामोनिशान, वही सीलन
भरी ज़िन्दगी, झूलते
हुए चमगादड़ों
की तरह
भीड़
भरी सांध्य लोकल लौट आती है कच्चे
रास्तों से हो कर सुबह के ठिकान,
लेकिन विलुप्त दरवाज़ों का
मिलता नहीं कोई भी
नामोनिशान।
वक्षस्थल
के नीचे
है बहुत दूर तक प्रसारित उम्मीद का
अंतरीप, भूल कर सभी उतार -
चढ़ाव, ये अंधकार के पल
हैं अनमोल, छूना चाहते
हैं सुदूर बहते हुए
अनगिनत
तिलस्मी
द्वीप,
जिसके किनारों में है कहीं उभरा हुआ
पुरसुकून का आसमान, लेकिन
सुबह तक विलुप्त दरवाज़ों
का मिलता नहीं कोई
भी नामोनिशान।
सुबह आती
है रोज़
की तरह ले कर अपने साथ सांसों का
विस्तृत हरित प्रदेश, स्वेद कणों
में पुनः जागते हैं जीने की
अदम्य अभिलाष,
नज़दीक के
आत्मीय
आँखों में उभरते हैं उत्प्रेरक अवशेष, -
फिर खींचता है भीड़ भरा शहर,
मैं निकल पड़ता हूँ उसी
सुरंग के रास्ते
लौटने की
चाह में,
कि फिर दोबारा लौट के पा सकूं सीने
में बसा ज़िन्दगी तलाशने का
संविधान - -

* *
- - शांतनु सान्याल





 
ज़िन्दगी का संविधान चल चित्र रूप में भी देखें - - नमन सह - -


गुरुवार, 24 जून 2021

आख़री पहर की बरसात - -

झूलती सी हैं परछाइयां अहाते में कहीं सूख
रहे हैं भीगे पल, जीने की ख़्वाहिश बढ़ा
गई है निशांत की बरसात, मझधार
का द्वीप डूब चुका है बहुत
ही पहले, अब है लहर
ही लहर, हद ए
नज़र, हम
ढूंढते
हैं अंतःनील में सुबह को एक साथ, जीने -
की ख़्वाहिश बढ़ा गई है निशांत की
बरसात। न जाने कितने ही
पागल हवाओं से निकल
कर छुआ है तुम्हें
सुख पाखी,
एक
छुअन, जो सांसों को दे जाए अनगिनत
स्पंदन, एक दीर्घ निःस्तब्धता जो
मिटा जाए व्यथित रूह की
थकन, जो दिला जाए
देह प्राण को सभी
दुःख दर्द से
निजात,  
जीने
की ख़्वाहिश बढ़ा गई है निशांत की - -
बरसात।

* *
- - शांतनु सान्याल

 

सोमवार, 21 जून 2021

अविभक्त एहसास - -

प्रतीक्षा की छाया नहीं घटती, दीर्घ से
दीर्घतर बढ़ती जाती है ज़िन्दगी,
तुम्हें छूने की चाह में घिर
आता है अंधकार, झर
जाते हैं शून्य में
जाने कहां
सभी
मेघ कण, रह जाते हैं हथेलियों में -
सिर्फ कुछ बूंदे निराकार, तुम्हें
छूने की चाह में घिर आता
है अंधकार। आकाश
अपने कांधे पर
लटकाए
हुए
रात का झोला उतरता है सधे क़दमों
से, बाँध जाता है सुनसान गली
कूचों में झिलमिलाता हुआ
ख़्वाबों का वंदनवार,
तुम्हें छूने की
चाह में घिर
आता
है अंधकार। हमारे मध्य आज भी है
एक अनूप की गहराई, कभी
उम्र से लंबी ज्वार की
लहरें भिगोती हैं
दोनों छोर
की
भूमि, और कभी दूर तक फैला हुआ
है बालुओं का साम्राज्य, सिर्फ
उतराई और उतराई, फिर
भी एक सेतु मज़बूती
से झूलता रहता
है हमारे आर
पार, तुम्हें
छूने
की चाह में घिर आता है अंधकार। -

* *
- - शांतनु सान्याल 

गुरुवार, 17 जून 2021

मध्य मार्ग कोई नहीं - -

जब अंधकार हो पूर्ण मुखर, खुल जाते
हैं अपने आप बंद आँखों के द्वार,
खिड़कियां हैं खुली अबूझ हवा
पलट रही है एक ही पृष्ठ
को हज़ार बार, सहेज
कर जितना भी
रखें बिखर
जाती
हैं पुरातन स्मृतियां, बेवजह हम दौड़े
चले जा रहे हैं अंधी गुफाओं के
अंदर, समय मिटा चुका
है कब से, सभी शैल
आकृतियां, कभी
था यहाँ कोई
समुद्र तो
रहा
होगा, सम्प्रति कुछ भी नहीं सिवा -
धूसर इतिहास के, कभी नीबू
फूल के गंध में डूब कर,
गहन रात ने चाहा
था उम्र भर का
जुर्माना,
कभी
वो गुज़रते रहे बहुत क़रीब से बिना
किसी आहट ओ एहसास के,  
उजाले का उतरन ओढ़
कर उतर रही है ये
ज़िन्दगी, या
सुबह के
पांव
तले अभी तक है अंधेरे की सीढ़ियां,
सुदूर है समुद्र का विस्तृत मुहाना,
पीछे दौड़ती चली आ रही है
विक्षिप्त सी एक नदी,
मध्य मार्ग है एक
मिथक, टूटती
नहीं कभी
पांवों
की बेड़ियाँ - -

* *
- - शांतनु सान्याल  


  

बुधवार, 16 जून 2021

स्वयंभू देवदूत - -

तमाम रात बढ़ता रहा मृत्यु जुलूस, दबी
सिसकियों का लेकिन मिलता नहीं
कोई हिसाब, कुछ चेहरे थे
अर्थहीन, कुछ रिश्तों
के ज़िल्द सूखे
पत्तों की
तरह
अपने आप ही झर गए, उपग्रह की आँखों
में धूल झोंकना नहीं आसान, असंख्य
लोग हैं भस्म के नीचे, चिताओं
में वो जले ज़रूर, मर्त्य -
लोक से आख़िर, वो
गए किधर, आज
नहीं तो कल
ये राज़
खुलेंगे नक़ाब दर नक़ाब, दबी सिसकियों
का लेकिन मिलता नहीं कोई हिसाब।
हम सभी हैं राजपथ के विकलांग
तमाशबीन, चेतनाशून्य हो
कर हमने किया था
जयघोष, जब
ज़मीं से
चीर
कर निकलने लगे गुप्त दुर्गन्ध, तब हमें
आया है होश, मिथकों से मुक्ति नहीं
संभव, हर एक पुरोधा यहाँ लिखता
है अपने आप इतिहास की
झूठी किताब, इस
बनावटी दौर
में सब से
सहज
है स्वयंभू देवदूत बन जाना जनाब, दबी
सिसकियों का लेकिन मिलता नहीं
कोई हिसाब।

* *
- - शांतनु सान्याल  
 

 


   

 

सोमवार, 14 जून 2021

उस पार से इस पार तक - -

रेलसेतु के उस पार उतर चली है धूसर
सांझ की छाया, ईशान कोणीय
आकाश फिर गहरा चला है,
कदाचित, अनाहूत वर्षा
भिगो जाए दग्ध
जीवन, बहुत
चाहत से
तकती
है नदी की स्थिर काया, रेलसेतु के -
उस पार उतर चली है धूसर
सांझ की छाया। कोई
उतरता है पुल की
सीढ़ियों से ले
कर कांधे
पर सदियों का अभिशाप, कबाड़ के
भीड़ में जीवन तलाशता है जीने
का सही माप, तुम्हारे पास
है विश्व पर्यटन का
परवाना ए
राहदारी,
जीना
मरना सब कुछ यहाँ, हमारी है - -
लाचारी, पुल के उस पार से
इस पार तक है मुख़्तसर
सफ़र अपना, न कोई
टिकट, न पास
है किराया,
रेलसेतु
के उस पार उतर चली है धूसर सांझ
की छाया।

* *
- - शांतनु सान्याल





रविवार, 13 जून 2021

असमाप्त अंतराल - -

अंधेरे से उजाले तक, प्रतीक्षारत रहा
एक असमाप्त अंतराल, किंतु
लौटा नहीं वो अंतरतम
का अनुनाद, वो
सभी मर्म
जो
तुमने बांधे शब्दारण्य में, दरअसल
थे बहुत ही खोखले, तैरते रहे
उथले किनारे पर, यूँ ही
चिरकाल, अंधेरे से
उजाले तक,
प्रतीक्षारत
रहा
एक असमाप्त अंतराल। हर एक के
सीने में होता है कहीं न कहीं एक
झील लहराता हुआ, बस
कुहासे में कमल
नज़र आता
नहीं,
दूर से वादियों का नज़ारा भुला देता
है सभी शब्दशास्त्र की बारीकियां,
क़रीब आने पर उभर आते
हैं बेवजह ही असंख्य
त्रुटियां, चाहतों
की इस धरा
पर रहता
है हमेशा ही परितृप्ति का अकाल,
अंधेरे से उजाले तक, प्रतीक्षारत
रहा एक असमाप्त
अंतराल।

* *
- - शांतनु सान्याल





शनिवार, 12 जून 2021

अर्थहीन अवशेष - -

जो कुछ भी बिखरा हुआ है मेरे
आसपास, उन्हीं को मैंने
माना है ज़िन्दगी
का इतिहास,
कुछ
धूसर चेहरों में आज भी खेलते हैं
ख़ालिस मुस्कान, समय
छीन लेता है अपना
महसूल ये सच
है फिर भी
चेहरा
ढल जाए तो क्या, बना रहे दिल
का अभिमान, कुछ धूसर
चेहरों में आज भी
खेलते हैं ख़ालिस
मुस्कान।
जाने
कितने आग्नेय पर्वतों से होकर
नंगे पांव गुज़री है रात,
फिर भी चेहरे पर
कोई शिकन
नहीं,
ताबूत विहीन देह का मूल्य था
माटी, वक़्त ने समझा दिया,
तुम्हारे सीने का बोझ
भी उतर गया,
और रूह
को भी
अब कोई थकन नहीं, गंगा की
गोद में डूब गए तथाकथित
धर्म और ईमान, कुछ
धूसर चेहरों में
आज भी
खेलते
हैं
ख़ालिस मुस्कान।

* *
- - शांतनु सान्याल




 

शुक्रवार, 11 जून 2021

बंद अलमारी - -

काश ! तुम खोल पाते, महोगनी
से बनी वो अदृश्य अलमारी,
चाबियों का गुच्छा यूँ
तो था तुम्हारे
सामने
लेकिन तुमने कभी कोशिश ही न
की, देखते ही देखते, राख के
ढेर में, वो ढह गई सारी,
महोगनी से बनी
वो अदृश्य
अलमारी।
कभी -
कभी बिजली गुल हो जाना चाहिए,
अंधेरे में ख़ुद से आँख मिचौली
खेलना आना चाहिए, किस
कोण पर जा रुकेगा ये
सत्य का कंपास,
जो घूमता
रहा उम्र
भर,
मायावी बंधनों के आसपास, सब
कुछ है लिपिबद्ध आईने की
साझेदारी, महोगनी
से बनी वो अदृश्य
अलमारी।
वो सभी
संचय
कहने को थे अनमोल, जिन्हें हम
भूल आए कांच के दराज़ों में,
कौन नज़दीक था और
कौन बसा परदेश,
कहना नहीं
आसान,
रहने
दें कुछ अनकही बातें बंद दरवाज़ों
में, न कोई चाहत, न कोई
तक़ाज़ा, सब कुछ तो
पड़ा रह जाएगा
प्लेटफॉर्म
पर
उपेक्षित, जब होगी अंतिम पहर की
तैयारी, काश ! तुम खोल पाते,
महोगनी से बनी वो अदृश्य
अलमारी।

* *
- - शांतनु सान्याल
   

 



गुरुवार, 10 जून 2021

रंगीन छतरियां - -

एक अजीब सा सन्नाटा है हर तरफ,
नीम से लेकर बरगद वाले चौबारे
तक, कुछ रंगीन छाते उड़ रहे
हैं ऊपर, बहुत ऊपर की
ओर, बाट जोहता
सा है गाँव
मेरा,
उदास आँगन से हो कर नदी के उस
किनारे तक, एक अजीब सा
सन्नाटा है हर तरफ,
नीम से लेकर
बरगद
वाले
चौबारे तक। जोकर का स्वांग रचाए
लोग खड़े हैं, हाथों में लिए कई
तरह की फिरकियां, एक
सुगबुगाहट सी है  
हवाओं में,
दे न
जाएं कहीं फिर वही जादू की झप्पियां,
हम फिर पड़े रहे न कहीं, ऊसर
ज़मीं से ले कर टूटे हुए
ओसारे तक, एक
अजीब सा
सन्नाटा
है हर तरफ, नीम से लेकर बरगद - -
वाले चौबारे तक।

* *
- - शांतनु सान्याल
 


 

रविवार, 6 जून 2021

उपनाम - -

बहुत कुछ छूट जाते हैं गंत्वय से
पहले, साथ रह जाता है एक
शून्यता का शहर, और
विस्मृत उपनाम,
दस्तकों के
भीड़
में हम खोजते हैं किसी परिचित
आवाज़ को, दरवाज़ा खोलते
ही, रोज़ की तरह न जाने
कहाँ लौट जाती है
संदली शाम,
साथ रह
जाता
है एक शून्यता का शहर, और -
विस्मृत उपनाम। याद की
काठी अपनी जगह
रहती है यथावत,
अहसास
के
राख बिखरे होते हैं आसपास,
हम तलाशते हैं गुमशुदा
ख़ुश्बुओं को बड़ी
शिद्दत से दूर
तक, वो
नहीं
मिलता कहीं भी, ज़मीं रहती
है चुप अहर्निश, और
विस्मित सा तकता
हुआ रहता है
गोधूलि
का
आकाश, मर्म का देवालय ढूंढ
नहीं पाता है उस अनंत
प्रणयी का नाम,
साथ रह जाता
है एक
शून्यता का शहर, और विस्मृत
उपनाम।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

शुक्रवार, 4 जून 2021

खरोचों की निशानी - -

एक जिस्म और बेहिसाब खरोचों की
निशानी, किसी आदिम सुरंग से
गुज़री है रात, एक सरसराहट
के साथ, टूटे हैं खिड़कियों
के कांच, किसी दूरगामी
रेल की तरह है ये
ज़िंदगानी, एक
जिस्म और
बेहिसाब
खरोचों
की
निशानी। पहाड़ों से फिर उठ रहा है
धुआं सा, कुछ बुझा है वादियों में
या कुछ अभी तक है सुलगता
सा मेरे सीने के दरमियां,
हर चेहरा है कुछ
मुरझाया सा,
हर एक
नज़र
है
एक शीर्षक विहीन कहानी, एक -
जिस्म, और बेहिसाब खरोचों
की निशानी। सभी सूखी
नदियां दोबारा उभर
आएंगी, सभी
रिश्ते फिर
स्मृति
फ्रेम
में जड़ जाएंगे, कोई मुड़ कर भी नहीं
देखेगा, सभी आगामी कल की
ओर बढ़ जाएंगे, किनारों
से उतर जाएंगे सभी
लहर तूफ़ानी, एक
जिस्म, और
बेहिसाब
खरोचों
की
निशानी।

* *
- - शांतनु सान्याल
   

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